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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:द्रव्‍य संग्रह - गाथा 38

From जैनकोष



सुहअसुहभावजुत्ता पुण्यं पावं हवंति खलु जीवा ।

सादं सुहाउ णामं गोदं पुण्णं पराणि पावं च ।।38।।

अन्वय―सुहअसुहभावजुत्ता जीवा खलु पुण्णं पावं हवंति । सादं सुहाउ णादं गोदं पुण्णं, च पराणि पावं ।

अर्थ―शुभ व अशुभ भाव से युक्त जीव पुण्य और पाप होते हैं । सातावेदनीय, तिर्यग्गायु, मनुष्यायु, देवायु, नामकर्म की शुभ प्रकृतियाँ, उच्च गोत्र ये तो पुण्यरूप हैं और बाकी सब पापप्रकृतियां हैं ।

प्रश्न 1―क्या जीव स्वभाव से पुण्य, पापरूप है?

उत्तर―परमार्थ से जीव सहज ज्ञान और आनंदस्वभाव वाला है इसमें तो बंधमोक्ष के भी विकल्प नहीं हैं, फिर पुण्य पाप की तो चर्चा ही क्या है ꠰

प्रश्न 2―फिर जीव पुण्यपापरूप कैसे होते हैं?

उत्तर―अनादिबंध परंपरागत कर्म के उदय से जीव पुण्यरूप व पापरूप होते हैं ।

प्रश्न 3―पुण्यरूप जीव का क्या लक्षण है?

उत्तर―कषाय की मंदता होना, आत्मदृष्टि करना, देव गुरु की भक्ति करना, देव गुरु के वचनों में प्रीति करना, व्रत तप संयम का पालन करना, जीवदया करना, परोपकार करना आदि पुण्यरूप जीव के लक्षण हैं ।

प्रश्न 4―पापरूप जीव के लक्षण क्या हैं?

उत्तर―कषाय की तीव्रता होना, मोह करना, देव गुरु से विरोध करना, कुगुरु कुदेव की प्रीति करना, हिंसा करना, झूठ बोलना, चुगली निंदा करना, चोरी डकैती करना, व्यभिचार करना, परिग्रह की तृष्णा करना, विषयों में आसक्ति करना आदि पापरूप जीव के लक्षण हैं ।

प्रश्न 5―पुण्य के कितने भेद हैं?

उत्तर―पुण्य के दो भेद हैं―(1) भावपुण्य और (2) द्रव्यपुण्य ।

प्रश्न 6―भावपुण्य किसे कहते हैं?

उत्तर―शुभ भावों करि युक्त जीव को अथवा जीव के शुभ भावों को भावपुण्य कहते हैं ।

प्रश्न 7―द्रव्यपुण्य किसे कहते हैं?

उत्तर―साता आदि शुभ फल देने के निमित्तभूत पुद्गल कर्मप्रकृतियों को द्रव्यपुण्य कहते हैं ।

प्रश्न 8―पुण्य प्रकृतियाँ कितनी हैं?

उत्तर-―पुण्य प्रकृतियां 68 है―(1) सातावेदनीय, (2) तिर्यगायु, (3) मनुष्यायु, (4) देवायु, (5) मनुष्यगति, (6) देवगति, (7) पंचेंद्रियजाति, (8-12) पाँच शरीर, (13-17) पांच बंधन, (18-22) पाँच संघात, (23-25) तीन अंगोपांग, (26) समचतुरस्रसंस्थान, (27) वज्रऋषभनाराचसंहनन, (28-35) आठ शुभ स्पर्श, (36-40) पांच शुभ रस, (41-42) दो शुभ गंध, (43-47) पांच शुभ वर्ण, (48) मनुष्यगत्यानुपूर्व्य, (49) देवगत्यानुपूर्व्य, (50) अगुरुलघु, (51) परघात, (52) आतप, (53) उद्योत, (54) उच्छ᳭वास, (55) प्रशस्त विहायोगति, (56) प्रत्येक शरीर, (57) त्रस, (58) सुभग, (59) सुस्वर, (60) शुभ, (61) वादर, (62) पर्याप्ति, (63) स्थिर, (64) आदेय, (65) यश: कीर्ति, (66) तीर्थंकर, (67) निर्माणनामकर्म, (68) उच्चगोत्र ।

प्रश्न 9―पाप के कितने भेद हैं?

उत्तर―पाप के दो भेद है―(1) भावपाप और (2) द्रव्यपाप ।

प्रश्न 10―भावपाप किसे कहते हैं ?

उत्तर-―अशुभ भाव करि युक्त जीव को अथवा जीव के अशुभ भाव को भावपाप कहते हैं ।

प्रश्न 11―द्रव्यपाप किसे कहते हैं?

उत्तर―असाता आदि अशुभ फल देने के निमित्तभूत पुद्गलकर्मप्रकृतियों को द्रव्यपाप कहते हैं ।

प्रश्न 12-―पापप्रकृतियां कितनी है?

उत्तर―पापप्रकृतियाँ 100 है―(1-5) पांच ज्ञानावरण, (6-14) नौ दर्शनावरण, (15-42) अट्ठाईस मोहनीय, (43-47) पाँच अंतराय, (48) असातावेदनीय, (49) नरकायु, (50) नरकगति, (51) तिर्यग्गति, (52) एकेंद्रियजाति, (53) द्वींद्रियजाति, (54) त्रींद्रियजाति, (55) चतुरिंद्रिय जाति, (56) न्यग्रोधपरिमंडलसंस्थान, (57) स्वातिसंस्थान, (58) वामनसंस्थान, (59) कुब्जकसंस्थान, (60) हुंडकसंस्थान, (61) वज्रनाराचसंहनन, (62) नाराचसंहनन, (63) अर्द्धनाराचसंहनन, (64) कीलकसंहनन, (65) असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन, (66-73) आठ अशुभस्पर्श, (74-78) पाँच अशुभरस, (79-80) दो अशुभगंध, (81-85) पांच अशुभवर्ण, (86) नरकगत्यानुपूर्व्य, (87) तिर्यग्गत्यानुपूर्व्य, (88) उपघात, (89) अप्रशस्तविहायोगति, (90) साधारणशरीर, (91) स्थावर, (92) दुर्भग, (93) दुःस्वर, (94) अशुभ, (95) सूक्ष्म, (96) अपर्याप्ति, (97) अस्थिर, (98) अनादेय, (99) अयश:कीर्तिनामकर्म, (100) नीचगोत्रकर्म ।

प्रश्न 13―पुण्यप्रकृति 68 व पापप्रकृति 100, ये मिलकर 168 कैसे हो गई? प्रकृतियाँ तो कुल 148 ही है ।

उत्तर―आठ स्पर्श, पाँच रस, दो गंध, पांच वर्णनामकर्म, ये 20 प्रकृतियाँ पुण्यरूप भी होती हैं और पापरूप भी होती हैं, अत: इन बीस को दोनों जगह गिनने से 168 हुई है, सामान्य विवक्षा करके बीस निकाल देने से 148 ही सिद्ध हो जाती हैं ।

प्रश्न 14―पुण्यप्रकृतियों में सबसे विशिष्ट और प्रकृष्ट पुण्यप्रकृति कौन है?

उत्तर―तीर्थंकरनामकर्म प्रकृति समस्त पुण्यप्रकृतियों में विशिष्ट और प्रकृष्ट पुण्यप्रकृति है ।

प्रश्न 15―तीर्थंकरप्रकृति का लाभ कैसे होता है?

उत्तर―दर्शनविशुद्धि आदि 16 भावनाओं के निमित्त से तीर्थंकरप्रकृति का लाभ होता है, किंतु सम्यग्दृष्टि समस्त प्रकृतियों को हेय अथवा अनुपादेय मानने के कारण इसका लक्ष्य नहीं करता है अर्थात् इसे भी उपादेय नहीं समझता है ।

प्रश्न 16―पापप्रकृतियों में सबसे अधिक निकृष्ट पापप्रकृति कौन है?

उत्तर―मिथ्यात्वप्रकृति समस्त पापप्रकृतियों में निकृष्ट पापप्रकृति है । मिथ्यात्वप्रकृति के उदय से होने वाले मिथ्यात्व परिणाम से ही संसार व संसार दुःखों की वृद्धि है ।

प्रश्न 17―मिथ्यात्वप्रकृति का लाभ कैसे होता है?

उत्तर―मोह, विषयासक्ति, देव शास्त्र गुरु की निंदा, कुगुरु कुदेव कुशास्त्र की प्रीति आदि खोटे परिणामों से मिथ्यात्वप्रकृति का लाभ होता है ।

प्रश्न 18―मिथ्यात्व का अभाव कैसे होता है?

उत्तर―मिथ्यात्व का अभाव का मूल उपाय भेदविज्ञान है, क्योंकि भेदविज्ञान के न होने से ही मिथ्यात्व हुआ करता है ।

प्रश्न 19―भेदविज्ञान का संक्षिप्त आशय क्या है?

उत्तर―धन, वैभव, परिवार, शरीर, कर्म, रागादि भाव, ज्ञानादि का अपूर्ण विकास, ज्ञानादि का पूर्ण परिणमन―इन सबसे भिन्न स्वरूप वाले चैतन्यमात्र निजशुद्धात्मतत्त्व को पहिचान लेना भेदविज्ञान है ।

प्रश्न 20―सम्यग्दृष्टि को तो पुण्यभाव और पापभाव दोनों हेय हैं, फिर पुण्यभाव क्यों करता है?

उत्तर―जैसे किसी को अपनी स्त्री से विशेष रांग है । वह स्त्री पितृगृह पर है और उस गांव से कोई पुरुष आये हों, तो स्त्री की ही वार्तादि जानने के अर्थ उन पुरुषों को दान सन्मान आदि करता है, किंतु उसका लक्ष्य तो निज भामिनी की ओर ही है । इसी तरह सम्यग्दृष्टि उपादेयरूप से तो निज शुद्धात्मतत्त्व की भावना करता है । जब वह चारित्रमोह के विशिष्ट उदयवश शुद्धात्मतत्त्व के उपयोग करने में असमर्थ होता है तो “हम शुद्धात्मभावना के विरोधक विषय कषाय में न चले जाये व शीघ्र शुद्धात्मभावना करने के उन्मुख हो जायें” एतदर्थ जिनके शुद्ध स्वभाव का विकास हो गया है, जो विकास कर रहे हैं ऐसे परमात्मा गुरुओं की पूजा, गुणस्तुति, दान आदि से भक्ति करता है, किंतु लक्ष्य शुद्धात्मतत्त्व का ही रहता है । इस प्रकार सम्यग्दृष्टि के पुण्यभाव हो जाता है ।

प्रश्न 21―क्या इस पुण्य के फल में सम्यग्दृष्टियों का संसार नहीं बढ़ता है?

उत्तर―सम्यग्दृष्टियों के भी पुण्य के फल में मिलता तो संसार ही है, किंतु संसार की वृद्धि का कारण नहीं होता । सम्यग्दृष्टि मरण करके इस पुण्य के फल में देव होता है तो उस पर्याय में तीर्थंकरों के साक्षात् दर्शन कर “ये वही देव हैं, वही समवशरण हैं जिसे पहिले सुना था आदि” भावों से धर्म प्रमोद बढ़ाते हैं, और कदाचित् भवों का अनुभव करने पर भी आसक्ति नहीं करते हैं । पश्चात् स्वर्ग से चयकर मनुष्य होकर यथासंभव तीर्थंकरादि पद प्राप्त कर पुण्यपापरहित इस निज शुद्धात्मतत्त्व के विशेष ध्यान के बल से मोक्ष प्राप्त करते हैं ।

प्रश्न 22―पुण्य व पाप तत्त्वों में क्यों नहीं दिखाये?

उत्तर―पुण्य व पाप का अंतर्भाव आस्रवतत्त्व में हो जाता है । आस्रव दो प्रकार के होते हैं―एक पुण्यास्रव दूसरा पापास्रव । अत: सामान्य विवक्षा करके एक आस्रव तत्त्व ही कह दिया है ।

प्रश्न 23―यदि आस्रव के ही भेद पुण्य पाप हैं और कोई अंतर नहीं, तो पदार्थ भी 8 ही कहलायेंगे 9 नहीं?

उत्तर―आस्रव और पुण्यपाप में कथंचित् अंतर है―आस्रव तो अकर्मत्व से कर्मत्व अवस्था प्राप्त होने को कहते हैं । इसकी तो कियापर प्रधानता है और पुण्य पाप में प्रकृतित्व की प्रधानता है । इसी कारण पदार्थ की संख्या कहते समय पुण्य पाप कहकर भी आस्रव का ग्रहण नहीं हो सकने से आस्रव को भी पदार्थ में गिना तब पदार्थ 9 कहना युक्तियुक्त ही है ।

इस प्रकार सात तत्त्व और नव पदार्थ का व्याख्यान करने वाला यह तृतीय अधिकार समाप्त हुआ ।


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