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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 111

From जैनकोष



कम्मादो अप्पाणं भिण्णं भावेइ विमल गुणणिलयं।

मज्झत्थभावणाए वियडीकरणंति विण्णेयं। ।111।।

अविकृतिकरण का स्वरूप- जो जीव मध्यस्थभावना रखकर देह से भिन्न आत्मा को निर्मल गुणों का निवासरूप भाता है उस जीव के अविकृतिकरण जानना चाहिए। इस गाथा में आलोचना के लक्षणों में से जो तृतीय लक्षण अविकृतिकरण है उसका स्वरूप कह रहे हैं। इसमें शुद्ध अविकारी जीव की परिणति बतायी गयी है। जो पुरूष पापरूपी वन को जलाने के लिए अग्नि की तरह प्रज्ज्वलित है, जिसने समस्त विभावों से भिन्न आत्मतत्त्व की ओर अपना झुकाव किया है, जहाँ केवल ज्ञानानंदस्वरूप ही अनुभूत होता है, जो द्रव्यकर्म और भावकर्म से भिन्न है ऐसे आत्मा को जो ध्याता है वह स्वयं ही अविकृतिकरण नामक आलोचना का स्वरूप है। अविकृति का अर्थ है विकार न होना। अपने आपको अविकारी करने का नाम है अविकृतिकरण। यह जीव स्वभाव से अविकारी है प्रत्येक पदार्थ स्वयं जैसा है वैसा ही सदा रहता है। उसमें पर्यायदृष्टि से उपाधि का निमित्त पाकर विभाव-परिणमन चलता है पर विभाव-परिणमन चलने पर भी पदार्थ का स्वरूप वही रहता है जो उसके सत्त्व के कारण उसमें अंतर व्यक्त रहता है। यह अविकृतिकरण सहज गुणों का आलंबन करने से प्रकट होता है।

परभावविविक्त अविकार स्वभाव- जो पुरुष अपने आपको अविकाररूप से श्रद्धान नहीं कर सकता उस पुरुष के विकार कभी हट भी नहीं सकते हैं। जिनकी समझ ही में यह बात नहीं आयी है कि मैं स्वभावत: शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप हूं, जो विकार आये हैं वे परनिमित्त पाकर आये हैं, हुए हैं आत्मा में ही पर आत्मा ही उपादान हो और वही निमित्त हो, ऐसा नहीं है। अशुद्ध भाव का दान तो अशुद्ध आत्मा है परंतु वही आत्मा अपने विभाव के लिए निमित्त हो जाय तो फिर विकार कभी दूर हो ही नहीं सकते हैं। होते हैं आत्मा में, परनिमित्त है परोपाधि द्रव्यकर्म। परनिमित्त होने पर भी इस आत्मा में न निमित्त का प्रदेश आया, न द्रव्य आया, न गुण आया, न पर्याय आया और न निमित्त का प्रभाव भी इस जीव में नहीं आया। द्रव्यकर्म अपने प्रभाव से इस जीव को रागी बना सकते हो, ऐसा त्रिकाल नहीं है किंतु ऐसा ही सहज निमित्त नैमित्तिक संबंध है कि अमुक प्रकार का अशुद्ध उपादान किसी परपदार्थ को योग्य उपाधि को निमित्त पाकर स्वयं ही अपनी शक्ति से विभावरूप परिणम जाता है।

निमित्त के तत्त्व का उपादान में अप्रवेश- मोटे दृष्टांत में, कभी कोई किसी को गाली देता है तो जिसका नाम लेकर गाली दे रहा है और उसमें क्रोध आ गया तो गाली देने वाले पुरुष ने अपने प्रभाव से, अपने असर से, अपने परिणमन से दूसरे में क्रोध उत्पन्न नहीं किया, किंतु वहाँ ऐसा ही निमित्त-नैमित्तिक संबंध है कि स्वयं अपराधी वह पुरुष था जो क्रोध में आ रहा है। सो गाली देने वाले की बात को अपने आपमें घटाकर अपने ऊपर अर्थ लगाकर स्वयं कार्य करने लगता है, ऐसे ही सर्वत्र पदार्थों का परस्पर में निमित्तनैमित्तिक संबंध है, कर्मों का उदय होता है और अशुद्ध जीवों में उसका निमित्त पाकर कल्पनाएँ होने लगती हैं और इस प्रकार के संबंध से यह चलने लगता है। कभी एक ही पदार्थ विभावों की गाड़ी नहीं चला सकता है। यद्यपि विभाव प्रत्येक पदार्थ में केवल अपने-अपने में ही होता है। दो पदार्थ मिलकर विभावरूप नहीं परिणमते हैं, अथवा किसी पदार्थ के विभाव को दूसरा पदार्थ ग्रहण नहीं करता है लेकिन विभाव परिणमन में कोई निमित्त होता है और परिणमने वाला कोई पदार्थ उपादान होता है, ऐसी स्थिति के मर्म के जानकार ज्ञानी-संत यह निरखा करते हैं कि मैं रागद्वेष रहित अविकार-स्वभावी हूं। मेरे स्वभाव से ही विकार नहीं उठा है किंतु अशुद्ध योग्यता जो थी वह उपाधि का निमित्त पाकर अपने परिणमन में लग गयी। मैं वस्तुत: एक निज स्वरूपमात्र हूं। अविकार-स्वभाव का ज्ञानी को दृढ़ श्रद्धान है, इस कारण यह ज्ञानी पुरूष अपने आपको भिन्न भाता है एवं इस सर्व विविक्त ज्ञानानंदस्वरूपमात्र शुद्ध चैतन्यस्वरूप का आलंबन करके शुद्ध पर्याय को प्राप्त कर लिया करता है।

अविकार विलास का उपाय- यहाँ अविकृतिकरण का स्वरूप कहा जा रहा है। कैसे यह जीव विकार भाव से हटकर अविकार-भाव में आए, उसका इसमें उपाय दिखाया गया है। ज्ञानीजीव का विकार-भाव में लक्ष्य नहीं है। कोई एक घर बसाकर थोड़ीसी गृहस्थी मानकर उसमें मोह करके यह व्यापक विभु ईश्वर कारणपरमात्मतत्त्व अपने आपको बरबाद कर रहा है। इस जीव की बरबादी है तो मोहममता से, दूसरा कोई बरबादी का कारण ही नहीं है। धन न ज्यादा हो तो कौनसी हानि है और धन हो गया ज्यादा तो कौनसा लाभ लूट लिया? जीव तो अपने विवेक के कारण सुखी रहा करता है धन-वैभव के कारण नहीं, सुखस्वभावी निज आत्मतत्त्व की दृष्टि हो तो वास्तविक सुख पैदा होगा। जिसे यह ही श्रद्धा नहीं कि मैं स्वयं ही स्वरसत: आनंदमय हूं, वह आनंद कहाँ से पायेगा? जिसकी दृष्टि बाहरी पदार्थों की ओर लगी है, इतने रुपए आ जायें तो मुझे आनंद होगा, ऐसा भोजन मिले तो आनंद होगा, यों जिसकी दृष्टि परपदार्थों की ओर लगी है उससे बढ़कर गरीब दुनिया में कोई नहीं है, क्योंकि वह आकुलित हैं, दु:खी हैं, किंकर्तव्यविमूढ़ है, उसे यथार्थस्वरूप का कुछ परिचय भी नहीं है।

मोह से बोझल जीवन- अनादिकाल से मोही-जीव ने अब तक इतना लंबा जीवन जिसमें अनंतकाल व्यतीत हो गया, मोहममता में ही खो डाला। आज मनुष्य हुए हैं तो मनुष्य के बच्चों में रम गए है और कभी पशु था तो पशु के बच्चों में यह रमा था। अब आगे जो-जो कुछ बनेगा वहां के ही समागमों में रमेगा। जैसे अतीतकाल के, अतीतभव के समागम में से एक भी समागम आज नहीं है इसी प्रकार इन वर्तमान समागमों में से भविष्यकाल में एक भी समागम न रहेगा। ज्ञानबल से नहीं बढ़ा सकते हैं, बाह्यपदार्थों की आशा कर करके अपनी कायरता बढ़ा करके वे पुरुष व्यर्थ ही अपना जीवन ढो रहे हैं, उनकी जिंदगी उनके लिए बोझ है। अपने को अविकारस्वरूप निरखो जिसके प्रताप से ये विकार दूर हो सकें।

बाह्य में शरण का अभाव- इस जगत में हम आपको कोई शरण नहीं है। यदि हो शरण कोई तो नाम लेकर आंखों के सामने रखकर निर्णय कर लो, कौन अपने लिए शरण हो सकता है? जगत में जितने भी जीव हैं वे सब कर्मों के प्रेरे हैं। जिन-जिन से समागम होता है, जिन-जिन से पाला पड़ता है वे अपनी कषाय बुझायें या तुम्हारा परिणमन करें। कुछ तो निर्णय करो। क्या किसी जीव में ऐसी सामर्थ्य है कि वह अपना परिणमन न करके दूसरे का परिणमन कर सके? वस्तु के स्वरूप में भी यह बात नहीं है। प्रत्येक पदार्थ में द्रव्यत्व व अगुरुलघुत्व के कारण स्वयं अपने आपमें परिणमन होता रहता है, फिर किसकी आशा करना? क्या धन, वैभव में ऐसी सीमा हे कि लाख रुपया हो जाय तो सुख मिलता है अथवा 10 लाख हो जायें तो सुख मिलता है? कोई सीमा हो तो बतलावो? अरे सीमा की बात तो जाने दो, जितना धन मिलता है उतनी ही तृष्णा बढ़ती है, उतना ही क्लेश बढ़ता है, उतनी ही रक्षा की चिंता होती है, उतनी ही विडंबना सामने आती है। अरे किसलिए यह मनुष्य-जीवन पाया है, क्या धन जोड़ने के लिए पाया है? क्या विषयों को भोगने के लिए पाया है?

जीवन के सदुपयोग पर दृष्टिपात- इस अनादि संसार में भ्रमण करते-करते श्रेष्ठ मनुष्यभव पाया है तो इसका यह सदुपयोग करो कि शास्त्राभ्यास से, प्रभुभक्ति से, आर्य-पुरुषों की संगति से, गुणियों के गुणगान से, दोष-दृष्टि से दूर रहकर आत्मतत्त्व की बात देखो। मिला हुआ समागम, मिला हुआ वैभव, छिद जावो, भीद जावो, कोई लेता हो तो ले जावो, किसी भी दशा को प्राप्त होओ, हम तो अपने आपके इस परमार्थस्वरूप की दृष्टि करके तृप्त रहेंगे। इस संसार में कोई भी जीव शरण नहीं है, किसकी ओर दृष्टि देते हो शरण है कोई तत्त्व? सर्व-विकल्प मेटो, सर्व परपदार्थों को भूल जावो, परम-विश्राम से बैठो, इस शरीर से भी न्यारा, इन कर्मों से भी न्यारा जो एक ज्ञानानंद पुन्ज है, जो अपना असली मर्म है, मूल पते की बात है उस स्वरूप रूप अपना विश्वास करो।

यथार्थ प्रतीति का प्रसाद- मैं ज्ञानानंदमात्र ही हूं, ऐसी प्रतीति ही वास्तविक शरण है। इस प्रतीति के बल से ही साधु-संत पुरूष घातिया कर्मों का नाश करके अरहंत हुए हैं, जिनके केवलज्ञान, केवलदर्शन, अनंत सुख, अनंत शक्ति प्रकट हुई है, जिनकी मूर्ति स्थापित करके हम आप सब भव्यजन वंदन करते हैं और इन्होंने धर्मपालन किया है ऐसा मानकर संतुष्ट होते हैं। वह सब अन्य सर्व से विविक्त ज्ञानानदस्वरूपमात्र अपने आपकी श्रद्धा का फल है। वे ही अरहंत फिर बाह्य मल को भी दूर करके अघातिया कर्म और इस शरीर से भी छूटकर केवल शुद्ध आत्मस्वरूप रह गए हैं, उन्हें सिद्धप्रभु कहते हैं। जिसकी प्रतीति के बल से शुद्ध ज्ञानानंदमय परिणमन होता है उस इस आत्मतत्त्व की प्रतीति ही वास्तविक शरण है। एक बार तो अपने जीवन में साहस करके निरख तो लो अपने आपमें बसे हुए इस ज्ञानस्वरूप परमात्मा को। फिर कृतार्थ हो जावोगे।

समागम की मायारूपता- ये मायामय पदार्थ तो छल-कपट से भरे हुए मोह-नींद के दृश्य हैं, ये रहें तो क्या, न रहें तो क्या, आखिर वह समय तो आयेगा ही कि कुछ न रहेगा, सब कुछ छोड़कर जाना ही होगा तो जिस संपदा को हम छोड़कर उस संपदा को छूटा हुआ दो मिनट भी अपने आपमें विश्वास नहीं कर सकते। जो सदा के लिए छूट जायेगा उसके प्रति यह मुझसे छूटा ही हुआ है ऐसी कुछ सेकेंड की प्रतीति आये और उस विश्वास के बल से समस्त परपदार्थों के विकल्प को भुला दीजिए, तो आनंदमय यह परमात्मतत्त्व अब भी अपने आपके स्वरूप में दृष्ट हो जायगा। यह आत्मा निरंतर प्रतिसमय द्रव्यकर्म और नोकर्म के समूह से रहित है। इस समय यद्यपि यह जीव इस शरीर में कसा हुआ है शरीर से अलग कहीं जा नहीं सकता। जब शरीर चलता है तो आत्मा भी जाता है ऐसा यह शरीर में इस तरह बँधा हुआ है तिस पर भी यह आत्मा शरीर के स्वरूप से अत्यंत जुदा है, प्रतिसमय जुदा है। ऐसा नहीं है कि किसी समय शरीर और आत्मा एक हो जायें और कभी भिन्न हो जायें। यह आत्मा तो अपने स्वरूपचतुष्टय की तन्मयता के कारण सदा परद्रव्यों से भिन्न है, शुद्ध है। इस आत्मा की यह प्रकृति है कि वह शांतभाव में रमण किया करे। यह सदा आनंदगुणस्वरूप है।

आत्मा का बाह्य वैभव से असंबंध- केवल चैतन्य चमत्कार ही आत्मा की मूर्ति है। इसका एक भी तो अणु नहीं है कुछ, इन स्कंधों की बात तो दूर जाने दो। किंतु, अहो कितना मोह का प्रबल प्रताप संताप बना हुआ है कि सबसे अत्यंत न्यारा है यह जीव। एक पैसे से भी इस जीव का संबंध नहीं है, परमाणुमात्र भी संयोग नहीं है, लेकिन यह मोही जीव कल्पना में अपने आपको धनी समझता है, वैभववान् समझता है। लोक व्यवस्थावों के कारण कदाचित् हो गया ऐसा प्रबंध कि आपके जिम्मे एक, दो, चार मकान हैं और कुछ वैभव है, ऐसे ही सबके अपने-अपने अधिकार में कुछ-कुछ वैभव है, फिर भी किसी का कुछ भी नहीं है, यह तो मोहियों ने अपने आराम के लिए विषय-साधनों के लिए व्यवस्था बना ली है। राज्य ने, सरकार ने, पंचायत ने कानून बना लिया है कि हम सब मोहियों के मोह के साधन ठीक-ठीक चलते रहें। यह मोहियों की कृत्रिम व्यवस्था है कि किसी के घर है, दुकान है, मकान है, वैभव है, पर परमार्थ से किसी का अणुमात्र भी नहीं है। ऐसे सर्व विविक्त इस अविकारी स्वभाव को जो नहीं निरख सकते हैं उनको कल्याण का मार्ग, शांति का मार्ग कदापि नहीं मिलता।

मोह में मोहियों के प्रसंग की रुचि- यह जीव मोहियों में, अज्ञानियों में अपना नाम चाहता है। जो स्वयं दु:खी हैं, कर्मों के प्रेरे हैं, जिनका कुछ उनके लिए भरोसा नहीं है, आज मनुष्य हैं और कल मरकर कीड़ा हो जायेंगे, कुछ भी बन जायेंगे, जो स्वयं दु:खी हैं- ऐसे पुरुषों में नाम की चाह, यश की चाह उत्पन्न करना, इसको कितनी मूढ़ता कहोगे? इसे अपने अविकारी स्वभाव का कुछ ध्यान ही नहीं है। अरे, यह मैं स्वयं ही अनंत ज्ञान और अनंत आनंद के स्वभाव वाला हूं। इस स्वभाव का आश्रय किया जाये तो अनंत ज्ञान और अनंत आनंद प्रकट होता है। इस उपयोग द्वारा किन्हीं बाह्य बहिरात्मा पुरुषों का कल्पित आश्रय किया जाये तो उससे क्या प्राप्त होगा? विकार बढ़ते हैं, क्लेश होता है, विपदा आती है। यह आत्मा स्वयं अंत:शुद्ध है। यह अपने इस शुद्ध स्वरूप का आश्रय करे तो मोह का अभाव होता है। मोह मिटा कि सर्वसंकट मिट गये। मोह मिटने पर फिर यह किसी भी परवस्तु का ग्रहण नहीं कर सकता।

मायावैभव की असारता व आत्मनिधि का प्रसाद- भैया ! मान लो आज 50 हजार का धन है और क्या ऐसा नहीं हो सकता था कि 10 हजार के ही धनी होते अथवा क्या यह नहीं हो सकता था कि भिखारियों की तरह भीख मांगकर पेट भरते? कौनसी स्थिति संभव नहीं है। कौनसी स्थिति इस मोही पुरुष के नहीं हुआ करती है? आज 50 हजार में से कभी दो हजार का भी घाटा पड़ता है तो यह जीव बड़ा विकल होता है कि हाय ! इतना नुकसान हो गया। जैसे कि मानों उसके प्राणों का छेदन-भेदन किया गया हो। अरे, एक अणुमात्र भी तो तेरा नहीं है। तू तो केवल ज्ञानानंदस्वरूपमात्र है। क्यों परतत्त्वों में मोहभाव करके अपने आपको बरबादी की ओर लिये जा रहा है? यह आत्मत्त्व अविनाशी अनंत गुणों का समूह है। जिसने इस तत्त्व को अपने अनुभव में लिया है, उसे इस शुद्ध भाव के आश्रयरूप अमृत के द्वारा अथवा इस अमृत का पान करके अपने को अमर बना लिया है और इस ही अमृत-सागर में डूबकर, मग्न होकर समस्त पाप-कलंकों को धो डाला है।

ज्ञानी के अनर्थ कोलाहल का अभाव- जो ज्ञानी संत हुए हैं, जिनको अपने आनंद के स्रोत का परिचय हो जाता है, उनके फिर इंद्रिय का कोलाहल नहीं रहता है अर्थात् बहिरात्म अवस्था में जो इंद्रिय विषय-साधन के लिये तड़फा करता था, पंचेंद्रिय के विषयों के भोगों में ही अपना महत्त्व माना करता था, अब इस निर्भ्रांत पुरूष के यथार्थ प्रकाश का उदय हुआ है, अब इसके इंद्रियसमूह में रंच भी कोलाहल नहीं है, उसकी दृष्टि अब विषयसाधनों में नहीं फँसती है। जो शुद्ध आत्मा ज्ञानज्योति द्वारा समस्त अंधकार को नष्ट कर देता है और अपने आपमें नित्य शुद्ध प्रकाशमान् रहता है- ऐसे आत्मतत्त्व का आलंबन करना ही वास्तव में शरण है। इसके अतिरिक्त जगत् में अन्य कोई पदार्थ इस जीव के लिये शरणभूत नहीं है।

संतप्तलोक में योगीश्वरों का शांत निवास- यह संसार घोर दु:खों से भरा हुआ है। इसमें बसने वाले जीव प्रतिदिन रौद्रध्यान से और आर्तध्यान से संतप्त रहा करते हैं। इस लोक में कोई भी भव ऐसा नहीं है, कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहाँ यह कर्मसहित जीव किसी भी समय सहज शांति को प्राप्त कर ले। कर्मों से प्रेरित हुए थे संसारी जन दु:खों से निरंतर तप्तायमान् रहते हैं। ऐसे इस दु:खव्यापक लोक में एक मुनीश्वर ही समतारूप अमृत को प्राप्त करते हैं अथवा शांतिरूपी बर्फ के गृह में बसा करते हैं। जिन दिनों गर्मी के दिनों में ऐसी लू चला करती है, जहाँ चलते-फिरते, घर से बाहर निकलने पर अनेक पुरुष मरण कर जाते हैं- ऐसी तीव्र लू से व्याप्त ग्रीष्मकाल में कोई महाभाग ही बर्फीले घर में निवास करता है ऐसे ही अनेक दु:खों से व्याप्त संपदा, वैभव के क्लेशों से पीड़ित इन दु:खी जीवों से भरे हुए लोक में निकटभव्य मुनीश्वर ही शांतिगृह में निवास करते हैं। उनका उपयोग शांति और आनंद का अनुभव करने वाला होता है। यह शांति किसके प्रसाद से प्राप्त हुई है? यह शांति केवल शुद्ध ज्ञानानंदस्वभाव की दृष्टि के प्रसाद से प्राप्त हुई है।

सर्वदा मुक्ति- जो एक बार भी इस द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म से मुक्त हो जाता है, वह फिर भविष्य में किसी भी विभावों को प्राप्त नहीं हो सकता है, वह मलिन रागी द्वेषी कभी नहीं बन सकता है। कैसे बने मलिन? मलिन परिणामों का कारण था पुण्य पाप कर्म। सो उस कर्मजाल का तो विनाश हो गया है और इन कर्मजालों का कारण था सुकृत और दुष्कृत परिणाम, सो इन परिणामों का भी अभाव हो गया है। अब यह मुक्त प्रभु भविष्यकाल में कदाचित् भी विभावों को प्राप्त नहीं हो सकता है।

कर्मविलय का स्वाधीन उपाय- कर्म यद्यपि इस जीव के क्लेशों की उत्पत्ति में निमित्त हैं, फिर भी कोई जीव संकटों से मुक्त होना चाहता है तो वह कर्मों में क्या करेगा? कर्म पौद्गलिक हैं, भिन्न तत्त्व हैं, भिन्न पदार्थ हैं। कोई भी पदार्थ किसी भिन्न पदार्थ में अपना परिणमन नहीं कर सकता है। क्या करेगा आत्मा इन कर्मों के विनाश के लिये? कर ही नहीं सकता कोई पदार्थ किसी दूसरे पदार्थ का विनाश। उसके विनाश का उपाय बन सकता है, पर विनाश नहीं कर सकता है। कर्मों के विनाश का उपाय कर्मों में कुछ करना नहीं है, किंतु अपने आपमें एक शुद्ध ज्ञानप्रकाश लेना है, जिस ज्ञानानुभूति के कारण सुकृत और दुष्कृत परिणाम नष्ट हो जायेंगे। बस सुकृत और दुष्कृत परिणाम न रहें तो ये कर्म अपने आप ही अपना रस सोख लेंगे और क्षीण हो जायेंगे, छूट जायेंगे। इन कर्मों से मुक्ति पाने का उपाय केवल सुकृत और दुष्कृतरूप परिणामों का विनाश है, इसलिये अब मैं सुकृत और दुष्कृत दोनों प्रकार के भावकर्मजालों को छोड़कर एक उस शुद्ध मार्ग पर जाता हूं, जिस शुद्ध मार्ग पर चलकर मुमुक्षुजन सर्वथा शुद्ध विलास वाले हो गये हैं। सर्वसंकटों से मुक्त होने का उपाय केवल यह ही है कि सर्व पर से विविक्त निज स्वरूपास्तित्त्वमात्र चैतन्यस्वभाव का आश्रय करे और शुभ-अशुभ भाव, सुकृत-दुष्कृत भाव- इनसे हटा जाये तो फिर ये कर्म अपने आप ही हट जायेंगे। कर्मों पर दृष्टि देकर इनके विध्वंस का उपाय चाहें तो नहीं हो सकता है।

अविकार पद का आलोचन- यह परम-आलोचक ज्ञानी-संत अपनी आलोचना कर रहा है। आलोचना नाम भली प्रकार देखने का है। देखने का ही नाम लोचन है। लोचन नेत्र को कहते है। जैसे नेत्र का काम स्पष्ट देख लेना है, इसी प्रकार आलोचना का काम अपने आपके सहज शुद्ध स्वरूप को स्पष्ट देख लेने का है। यह मैं आत्मा शरीर से रहित हूं, द्रव्यकर्म से रहित हूं और भावकर्म से भी रहित हूं। इस प्रकार इन तीनों प्रकार के समागमों से रहित जो इसका यथार्थ सहजस्वरूप है, वह दिखने में आ गया तो परम-आलोचना हो गई और इस परम-आलोचना के प्रसाद से मोक्ष का लाभ निश्चित् हो गया।

आत्मा की भवमूर्ति से विविक्तता- यह मैं आत्मा शरीर से रहित हूं। यह शरीर भवमूर्ति है। संसार किसे कहते हैं? इसको स्पष्ट जानना हो तो इस शरीर को देखकर ही बता दीजिये कि इसका नाम संसार है। लोग कहते हैं कि दुनिया बड़ी चालाक हो गई है। वह दुनिया कौनसी है, जो चालाक हो गई है? क्या ये पत्थर, लकड़ी? नहीं। ये चलते-फिरते शरीरधारी मनुष्य ही उनकी निगाह में दुनिया हैं। यह दुनिया चालाक हो गई है अर्थात् इस दुनिया में बसने वाले मनुष्य चालाक हो गये हैं। संसार की मूर्ति यह शरीर ही है। दुनिया का रूपक यह शरीर है। यह शरीर स्थिर नहीं है, क्योंकि इस शरीर में पुद्गल स्कंध आते हैं और जाते हैं। हम आप सबके शरीर में बहुत से पुद्गल स्कंध प्रतिक्षण आते रहते हैं, बहुत से जाते रहते हैं। जब शरीर पुराना हो जाता है तो पुद्गल स्कंधों का आना कम हो जाता है और उन पुद्गल स्कंधों का खिरना अधिक होता रहता है। इसी का नाम बुढापा है, पर जब तक भी आयु है, तब तक यह भी नहीं होता कि पुद्गल स्कंध जाते ही जाते हैं, आते नहीं हैं। यह भी नहीं होता कि पुद्गल स्कंध आते ही आते हैं, जाते नहीं हैं। जब पुद्गल स्कंधों का आना अधिक रहता है उसे कहते हैं जवानी, अर्थात् चढ़ती उमर और जब इन स्कंधों का निखरना ज्यादा होता है, आना कम रहता है तो उसे कहते हैं- ढ़लती अवस्था।

भवमूर्ति की अस्थिरता- यह शरीर पुद्गल स्कंधों के आने-जाने से बना हुआ है, इसी कारण यह शरीर अस्थिर है। कभी दस-पाँच वर्ष बाद किसी को देखो तो मालूम पड़ता है कि यह तो आदमी बदल गया है या दुर्बल से मोटा हो गया है या मोटा से दुर्बल हो गया है, यह तो बदल गया है। यह बदलना 5 वर्ष में नहीं हुआ है, प्रतिक्षण बदलना हो रहा है और कितना ही आकार रंग तो इस मनुष्य में रोज-रोज बदलता नजर आता है। सुबह आकार-रंग कुछ और है, दोपहर को, शाम को आकार-रंग कुछ और है, जाड़े के दिनों में आकार-रंग कुछ और है, गर्मी के दिनों में कुछ और है।। यह शरीर अस्थिर है। इस भव की मूर्ति को मैं अपना कैसे मानूँ? यह तो पौद्गलिक है, मायारूप है, अस्थिर है, मिट जाने वाला है, मुझसे अत्यंत भिन्न है और जब तक लगा भी हुआ है तब तक केवल क्लेश का कारण है। इस शरीर के कारण कुछ हित नहीं पाया। ऐसे इस शरीर को छोड़कर मैं सदा शुद्ध ज्ञानशरीरी आत्मतत्त्व का ही आश्रय करता हूं।

भवरोग- अहो ! इस मेरे को अनादि काल से यह संसार का रोग लगा हुआ है। यहाँ कौनसी स्थिति ऐसी है पाकर मैं अपने को सुखी मान लूँ। मान लो घर धन से भर गया तो उस धन का क्या करें? कौनसा जब तक धन है तब तक भी क्लेश है, जब धन छूटेगा तब भी क्लेश होगा। इस धन का क्या करें? कौनसा तत्त्व ऐसा है जिसका हम आश्रय करें तो वास्तव में शांति का हम अनुभव कर सकेंगे। ये परिजन-समूह, पुत्र-स्त्री, मित्रादिक ये सब मिल गये हैं, बहुत हो गये हैं, परिवार बढ़ गया है इस परिवार का क्या करें? इस परिवार के खातिर क्लेश ही उठाना पड़ता है। वास्तविक शांति तो प्राप्त हो ही नहीं सकती है क्योंकि परिवार के लोगों की प्रवृत्तियां ऐसी होंगी जिनको निरखकर मोह के कारण या तो यह अनुराग बढ़ायेगा या द्वेष बढ़ायेगा। वह संबंध ही ऐसा है कि उन्हें समतापरिणाम नहीं रह सकता है। या तो राग में बढ़ जायेगा या विरोध में बढ़ जायेगा। इनसे भले तो वे गैर पुरूष हैं जिनसे कुछ परिचय नहीं है, उन्हें देखकर न राग होता है, न विरोध होता है। उनके बीच इस समतापरिणाम का भान कर सकते हैं।

शरण्य तत्त्व- भैया ! किसका सहारा लें जिस सहारे से मेरा यह संसार का क्लेश मिट जाय? ये प्रतिष्ठा यश की बातें तो सबसे विकट संकट है। उस ओर दृष्टि होने पर उसका ज्ञानबल घटता जाता है और ऊपर से पोलखाता बढ़ता जाता है। जिसको अपने यश नामवरी की अंतर से इच्छा होती है उसका ज्ञानबल दूर हो जाता है और जो कुछ उसकी मुद्रा, वातावरण, लोकढांचा, व्यवस्था जो कुछ भी बनती है वह खोखली हो जाती है, उसका पणित्म अत्यंत भयंकर निकलता है। किस तत्त्व का सहारा लें कि जिससे यह संसार के रोग दूर हो जायें? सहारा लेने योग्य है वह निज शुद्ध चैतन्यस्वरूप जो शुभ-अशुभ भावों से रहित है, मेरा ही स्वरूप है, मुझमें शाश्वत विराजमान् है।

अभीष्ट मार्ग- भैया ! अब तो केवल एक मार्ग चाहिए जिस मार्ग से अपना प्रकाश चले, वह मार्ग मिले तो यह शुद्ध चैतन्यस्वरूप दृष्ट हो जायेगा। वह मार्ग मिलता है तब, जब मार्ग में रोड़े न रहें, उस मार्ग के रोडे़ हैं ये विषयकषाय। जिन्हें मोही जीव अपना सर्वस्व मानते हैं, जिनके लिये अपना तन, मन, धन, वचन सब कुछ न्यौछावर हो जाता है, वे सब इसके लिये रोड़े हैं। उन रोड़ों को दूर करें। जब हम निर्विकल्प मार्ग में प्रवेश करते हैं तो ये शुभ-अशुभ से रहित शुद्ध चैतन्यमात्र आत्मतत्त्व मेरे को दृष्ट होता है। इस शुद्ध तत्त्व की भावना ही मेरे संसार-रोग को दूर करने की उत्तम औषधि है। मैं अन्य सब उपचारों को त्यागकर केवल इस शुद्ध चैतन्यरूप भावनारूप औषधिका ही सेवन करूँ, जिस से यह रागद्वेषरूप संसार का रोग समूल नष्ट हो जाये।

अंतस्तत्त्व के दर्शन की विधि- यह शुद्ध आत्मतत्त्व हमें दो बुद्धियों से निरखने में आता है- एक तो कार्यसमयसार की दृष्टि देकर और एक कार्यसमयसार की दृष्टि लेकर। कार्यसमयसार शुद्ध परमात्म तत्त्व द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, भाव- इन पंचपरावर्तनों से मुक्त है और यह कारणसमयसार भी। इस शुद्ध ज्ञायकस्वरूप आत्मा में अंतर में शाश्वत तन्मयता से रहने वाले अपने सत्त्व के कारण सदा अंत:प्रकाशमान् यह चित्स्वभाव भी समस्त परिवर्तनों से मुक्त है। जो विशेषता सिद्ध परमात्मा की कहो, वही विशेषता इस कारणसमयसार की है। यह परमात्मा शुभ-अशुभ कर्मों से और शुभ-अशुभ भावों से मुक्त हो गया है। यह चैतन्यस्वभाव स्वरसत: ही अनादि से शुभ-अशुभ भाव और कर्मों से दूर है, मुक्त है। यह प्रभु कार्य समयसार, द्रव्यकर्म, भावकर्म से मुक्त है तो यह कारणसमयसार इन समस्त परतत्त्वों से सदा से मुक्त है। यह प्रभु कर्मयुक्त है, सादि मुक्त है। यह कारणसमयसार अनादि मुक्त है। परभावविविक्त अंतस्तत्त्व के दर्शन में अंतस्तत्त्व का मिलन होता है।

अनादिमुक्त परमेश्वर- कुछ लोग ईश्वर को सदामुक्त मानते हैं और जो जीव संन्यास धारण करते हैं, तपस्या करते हैं, भक्तिमग्न होते हैं वे मुक्त होते हैं; उन्हें सादिमुक्त कहते हैं। केवल एक ही ईश्वर ऐसा है जो अनादि मुक्त है, ऐसी मान्यता वालों की क्या दृष्टि थी? वह एक स्वरूप तो सदा मुक्त है और ये अनगिनते जीव ऋषि-संत, साधुजन तपस्या करके कर्मों से मुक्त हुए हैं वे सादिमुक्त है। इसमें दृष्टिस्वभाव तथा वस्तु की है। जब स्वभाव को देखा जाय तो वह स्वभाव सदामुक्त है। यह चैतन्यस्वभाव, यह कारणसमयसार अपने स्वरूपसत्त्व के कारण अपने ही केवल स्वरूपमात्र है। इसमें किसी भी परतत्त्व का, परपदार्थ का प्रवेश नहीं है। यह स्वभाव सदा मुक्त है, यही परमब्रह्म है, यही परमेश्वर है। स्वभावदृष्टि जब दी तब सदामुक्त ईश्वर का दर्शन हुआ और जब आत्मवस्तु पर दृष्टि दी, द्रव्यक्षेत्रकालभावचतुष्टयात्मक चैतन्य पदार्थ पर दृष्टि दी तब इसकी समस्त रूप-रेखाएं भी जानने में आयीं। कर्मों से घिरा, कर्मों से पिरा, संकटी दृष्ट हुआ यह आत्मपदार्थ अपने आपमें बसे हुए स्वभावरूप परमेश्वर की भक्ति करे, उसकी दृष्टि करे तो इसका जितना भी बाह्य वातावरण है, रूपरेखा है वह सब दूर हो जायेगी। अब इसको सादिमुक्त कहते हैं।

सर्वजीवों में अनादिमुक्त पारमैश्वर्य- भैया ! जो सादिमुक्त हुआ है उसमें भी अनादि मुक्त तत्त्व है। जो अब तक मुक्त नहीं भी हुआ है ऐसे समस्त संसार प्राणियों में भी वह अनादिमुक्त परमेश्वर विराजमान् है। तत्त्व की बात तो यह है किंतु दोनों दृष्टियों को शुद्ध न रखकर एक ईश्वर को ही सृष्टि का कर्ता मान डाला। फिर तो लोक-प्रकृति के अनुसार उस ईश्वर को पूरा व्यवस्थापक मान लिया गया। जितने भी मंतव्य है उन सब मंतव्यों में तत्त्व और दृष्टि मूल में अवश्य थी, लेकिन उस मूल डोरी का परित्याग करके जब उसका विस्तार बनाया तो यह विस्तार अब नानारूपों में फैलता गया। यह कारणसमयसार अनादिमुक्त है।

निर्दोष तत्त्वज्ञता की कला- यह प्रभु-परमात्मा जन्म-मरण से रहित है। यह मुझमें विराजमान् मेरे ही सत्त्व के कारण, अंत:प्रकाशमान् यह चैतन्यस्वभाव भी जन्म-मरण से रहित है। स्वभाव और चतुष्टयमय पदार्थ ये दोनों भिन्न-भिन्न तत्त्व नहीं हैं, किंतु उस एक ही चीज को अभेदभाव की दृष्टि से निरखा तो स्वभाव समझ में आया और जब उसे सर्वमुखी दृष्टियों से निरखा तो पदार्थ ध्यान में आया। यह दृष्टियों से निरखने की कला से जब कभी अनभिज्ञ रहा और परिस्थिति के कारण इस तत्त्व की चर्चा भी करनी जारी रखी तो उसका परिणाम इस मंतव्य के रूप में फूट निकला कि यह परमब्रह्म परमेश्वर कोई अलग सत् है और यह जीव कोई अलग चीज है, किंतु चेतन पदार्थ तो प्रत्येक एक है, उसको निरखने की कला ही भिन्न-भिन्न हैं।

संकटहारी कारणसमयसार का आलंबन- इस कारणसमयसार का आलंबन 5 प्रकार के संसारों से मुक्ति दिलाने वाला है अर्थात् पंच परिवर्तन को दूर करने वाला है। ऐसे इस शुद्ध आत्मतत्त्व की मैं प्रतिदिन भावना करता हूं। यह अनादिनिधन आत्मज्योति वाणी का भी विषय नहीं है, फिर भी इस आत्मज्योति पर अधिकार पाये हुए गुरुजनों के वचनों के द्वारा इसे प्राप्त कर शुद्ध दृष्टि वाला हुआ जा सकता है, जिसके प्रताप से यह सदाकाल में लिये संकटों से मुक्त होगा। यह चैतन्यस्वभाव सदा जयवंत हो, जिसके सहज तेज से रागरूपी अंधकार नष्ट हो जाता है, जिसका यथार्थ निवास मुनिजनों के हृदय में रहता है। जो अज्ञानी जनों को तो दुर्लभ है, किंतु ज्ञानी जनों को सदा व्यक्त रहता है- ऐसा आनंद का निधान यह चित्स्वभाव सदा जयवंत हो।


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