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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 112

From जैनकोष



मदमाणमायलोहविवज्जियभावो हु भावसुद्धित्ति।

परिकहियं भव्वाणं लोयालोयप्पदरिसीहिं ।।112।।

भावशुद्धि नामक आलोचन का स्वरूप- आलोचना के चार लक्षणों में यह अंतिम लक्षण है भावशुद्धि। कामवासना, घमंड, कपट और लोभ से रहित जो परिणाम है, उसका नाम भावशुद्धि है। ऐसा लोकालोक के जानन देखनहार सर्वज्ञ देव ने कहा है। आलोचना से दोषों का निरावरण होता है। जैसे व्यवहार आलोचना पाठ में कहा गया है कि ‘‘तिनकी अब निरवृत्ति काजा’’ अर्थात् जो मैंने दोष किया है, उनको दूर करने के लिये मैं आलोचना करता हूं। आलोचना का अर्थ है दोषों का प्रकट करना। मैंने यह अपराध किया है, मैंने विषयकषायों से प्रीति की है, पाप किया है, उनको अपने आप मन से, वचन से निवेदन करना, सो आलोचना है। आलोचना का जितना अंतरंग रूप हो जाता है, उतनी ही आलोचना विशुद्ध कहलाती है और जब आलोचना का रूप विशेष अतिशवान् हो जाता है तो परमतत्त्व ज्ञानी पुरूष दोषों की आलोचना न करके गुणों का आलोचन करता है अर्थात् शुद्ध भावों का अवलोकन करता है।

श्रेष्ठ आलोचक का लोकदृष्टांत– जैसे लोक में यह रिवाज है कि जो बड़े पुरुष होते हैं, वे किसी के दोषों का वर्णन नहीं करते। किसमें क्या दोष हैं, उनका बखान नहीं करते हैं और कदाचित् दोषों का निरूपण करना आवश्यक हुआ तो गुणियों के दोषों का विशेष वर्णन कर लेते हैं। किसी गुणी पुरुष के गुणों का वर्णन करने से दोषी पुरुषों के दोषों की आलोचना हो जाती है। ऐसे ही जब शुद्ध निश्चय आलोचना में प्रवेश हो रहा है तो यह आलोचक ज्ञानी पुरुष दोषों पर भी दृष्टि न देकर केवल अविकारस्वभाव शुद्ध चैतन्यमात्र आत्मतत्त्व परदृष्टि देता है।

बाहर में शरण का अभाव- इस लोक में जीव को बाहर में कुछ शरण नहीं है, यह बात पूर्ण प्रमाणभूत है, इसमें रंच संदेह नहीं है। कौनसा बाहरी पदार्थ हमारी शांति का कारण बन सकता है? अरे जो भी पदार्थ हैं वे अपने परिणमन में लगें या तुम्हारी फिकर रखें। वस्तु में ऐसा स्वरूप ही नहीं है कि कोई वस्तु किसी अन्य वस्तु का कुछ परिणमन कर दे। बाहर में अणुमात्र भी कुछ शरण नहीं है। बड़ी संपदा, बड़ा राज्य ये भी जीव को क्लेश के ही कारण हुए हैं। जिनके ये हैं उन्हें देख लो, जिनका इतिहास है उन्हें निरख लो, और मान लो इस दुनियावी दृष्टि से धन, वैभव, राज्यपाट होने से कुछ प्रभाव और असर भी बढ़ा तो क्या हुआ, यह दो दिन की चांदनी है फिर तो नेत्र मुद जाते हैं, जिन्होंने इतिहास में बहुत नेतागिरी का काम किया है, बड़े राजपाट भी संभाले हैं वे भी आज नहीं हैं। उनका समय था, उन दिनों वे बाह्य-पदार्थों की ओर दृष्टि करके अपना परिणमन कर गये, किया कुछ नहीं। इस लोक में अन्य पदार्थ कुछ भी शरण नहीं हैं। यदि वैभव सुख की चीज होती तो वैभववान् पुरुष भी क्यों एक विशुद्ध, निर्ग्रंथ, निष्कषाय ज्ञानपुन्ज की उपासना करते, जिनके पास आरंभ नहीं, परिग्रह नहीं, जिनकी हम आप उपासना करते हैं।

भावशुद्धि की अतुल संपदा- भैया ! वैभव में सुख नहीं है, सुख तो शुद्ध ज्ञान में है। यह बुद्धि शुद्ध रहे, बिगड़े नहीं इस ही में आनंद है। संपदा का कुछ भी हो, थोड़ी रहे, बहुत रहे, रहे अथवा कहीं जाय, उस से इस आत्मा पर बिगाड़ का प्रभाव नहीं पड़ता है किंतु स्वयं की बुद्धि यदि बिगड़ जाय, अव्यवस्थित हो जाय, तो इस जीव का बिगाड़ है। यही एक बड़ी संपदा है कि अपना ज्ञान सँभला हुआ रहे कभी भी खोटे भावों का इसमें उदय न आये, दुर्भाव करके कभी किसी का धन, वैभव भी मिल जाय, हड़प लिया जाय तो यह संपदा नहीं है, विपदा है, आत्मा पर खोटे भाव आना ही विपदा है। भावशुद्धि का बड़ा महत्त्व है। जो भी आराध्यदेव हुए हैं वे भावशुद्धि के ही तो फल हैं। जितने भी साधु-संत हुए हैं अथवा हैं वे भावशुद्धि के ही तो प्रतीक हैं।

मनोजविवर्जित भाव में भावशुद्धि- यह भावशुद्धि नामक परम-आलोचना का स्वरूप कहा जा रहा है, और इस भावशुद्धि के स्वरूप के वर्णन के साथ-साथ यह परमआलोचना नामक अधिकार समाप्त होगा। इस अधिकार के उपसंहार में यह अंतिम गाथा है। काम, मान, कपट और तृष्णा से रहित परिणाम का नाम भावशुद्धि है। जब तीव्र चारित्र-मोह का उदय आता है तो वेद नामक कषाय का विलास विकार होता है ना, उसका नाम मद है, मदन याने काम-विकार है, इस विकार का नाम मनोज है। जैसे शरीर में फोड़ा फुंसी हो जाती है तो कुछ चीज तो है। फोड़ा हो, फुंसी हो, रोग है, पीड़ा है अथवा भूख-प्यास लगे तो बताया तो जा सकता है कि शरीर में इस भांति की वेदना है, किंतु जो कामविकारी की पीड़ा है, स्त्री-पुरुष विषयक मैथुन संबंधी जो अंतरंग कलुषित परिणाम है वह परिणाम कौनसे शरीर की पीड़ा है? उसमें क्या आँख में दर्द है, मस्तक में है, पैर में है, कहाँ पीड़ा उत्पन्न होती है, कुछ भी वहां तत्त्व नहीं है, किंतु वह केवल मनोज है। मनोज कहते हैं मन की कल्पना को। कामी-पुरूष मन की कल्पना जब काम-विकार संबंधी करता है तो उसे कुरूप, नीच शरीर भी सुहाने लगता है। यह मदन अथवा काम-विकार सब भाव-विकारों का सरताज है। जहाँ काम-वासना रहती है वहाँ आलोचना नहीं हो सकती। यह महादोष है इस महादोष से रहित जो भाव है उसका नाम भावशुद्धि है।

निरहंकारता में भावशुद्धि- अहंकार भी विकार-भाव है। मानी पुरुष अपने मान-विकार को दोष नहीं समझ पाता है, दूसरे लोग जानते हैं कि यह व्यर्थ किसी बात पर ऐंठ रहा है। कोई कला की बात तो है भी नहीं। ऐंठ इतनी बड़ी बना रखी है। इस दुनिया में कौनसी कला ऐसी है जो ऐंठ के लायक हो? कुछ नेतागिरी करने लगे, व्याख्यान देने लगे, बोलने की कला बन गयी तो कितना लोग अहंकार करते हैं? जो आत्मा लोकालोक को जाननहार स्वभाव रखता है, विश्वज्ञ बन सकता है ऐसी विश्वज्ञता की सामर्थ्य रखने वाला एक छोटी विकसित कला पर घमंड बगराये तो यह बुद्धिमानों का हास्य का पात्र है।

कल्पित चतुराई के मद में आत्मनिधि पर कुठाराघात- इस जीव के साथ नाना प्रकार के कर्म लगे हुए हैं उन कर्मों में एक आदेय नाम का भी कर्म है, जिसके उदय में कुछ ऐसा पुण्य वातावरण बनता है कि लोग उसकी कुछ प्रभुता करने लगते हैं, पर जैसे जिस मरुस्थल में, जिस देश में एक भी पेड़ नहीं है और वहाँ किसी घास के बीच में कोई एरंड आदि का पेड़ मिल जाय तो वहाँ वह वृक्षराज कहलाता है, ऐसे ही इस दुनिया में मूर्खों के अंदर, मोहियों के बीच कुछ-कुछ वचन चतुरता के कारण, धोखा छल कपट के कारण या किसी प्रकार की बुद्धि विकास के कारण कुछ महिमा बढ़ा ली तो वह मूढ़ों का सिरताज मरुस्थल में घास के बीच में उगे हुए एरंड-वृक्ष का सरीखा मालूम होता है। भले ही वह घमंड करे, पर घमंड के लायक कला कुछ नहीं है। जो पुरुष अपनी छोटी-छोटी कला पर घमंड करने लगते हैं वे अपनी महान् निधि पर कुठाराघात करते हैं। जिस आत्मा में इतनी अत्यंत सामर्थ्य है कि वह समस्त लोक का जाननहार रहे, अनंत आनंद से भरपूर रहे वह अपनी तुच्छ कला पर घमंड करके अपने स्वभाव को ढक रहा है, ठग रहा है। कौनसी चतुराई ऐसी है जो कुछ सारभूत हो और अहंकार के लायक हो?

कुलमद का दुष्परिणाम- कई लोग अपनी उत्पत्ति पर ही गर्व करते हैं। कुछ लोग मान्य कुल में पैदा हो गये, माता और पिता का बड़ा घराना मिल गया, अच्छा कुल मिल गया तो उस पर ही घमंड किया करते हैं। मैं बहुत बड़े कुल का हूं। अरे, इस आत्मा में कहाँ कुल लगा हुआ है? यह तो चैतन्यस्वरूपमात्र है। अपने आत्मा के भीतर की कला को तो देखो, यह केवल जानन देखनहार रहा करे- ऐसा विशुद्ध उत्कृष्ट कलावान् है। इसमें कुल कहाँ पड़ा हुआ है, जाति कहाँ लगी हुई है? यद्यपि व्यवहार में यह सब चलता है अपनी रक्षा के लिये। यदि हम श्रेष्ठ आचार-विचार वालों में न रमें, उनकी संगति छोड़कर नीच आचार-विचार वाले समूह में लग जायें तो उसमें तो बरबादी है। इस कारण इस आचार-विचार के कारण प्रसिद्ध हुए नीच कुल की संगति नहीं करनी चाहिये, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि हम उच्च कुल में पैदा हो गये या उच्च कुल में आ गये तो हम घमंड करने लगें। उच्च कुल के मद के फल में मरण के बाद में नीच कुल में दुर्गतियों में उत्पन्न होना पड़ेगा।

कुलीनता का सदुपयोग- उच्च कुल का मिलना घमंड करने के लिये नहीं होता है, किंतु आत्मस्वरूप का मनन, चिंतन, अध्ययन करके आत्मकल्याण करने के लिये होता है- ऐसी दृष्टि बननी चाहिये और यह धर्मलाभ तब हो सकता है, जब प्राणिमात्र में हम उस एक चैतन्यस्वरूप को निरखें। इतनी विशुद्धि हमारी बढे़, इतनी बुद्धि हमारी निर्मल हो कि हम प्रत्येक जीव में उस जीव के उच्च, नीच कुल को न देखकर एक चैतन्यस्वरूप को निरख सकें। कर्मों के उदय हैं। इन उदयों के वश जीव कभी निंद्य कुल में जन्म लेता है और कभी उच्च कुल में जन्म लेता है। यहाँ स्थायीपन कुछ नहीं है। जो आज ऊँचा है, वह कल नीचा हो सकता है और जो आज नीचा है, वह कल ऊँचा हो सकता है। यह तो संसार की स्थिति है। इसमें आत्मा का कुछ सुधार-बिगाड नहीं है। इसमें जो फँसता है और यहाँ रहकर जो अपने को उस अनुकूल अभिमान और दीनता की वृत्ति लाता है, उस परिणाम से सुधार-बिगाड है। उच्च कुल का घमंड भी अपने आपको बरबाद करने का कारण होता है। इन कर्मों से रहित जो निर्मल परिणाम है, वह भावशुद्धि है। यही है निश्चय परम-आलोचना।

देहबल की अपनायत से आत्मबल का विनाश- कितने ही पुरुष अपने शरीरबल का घमंड करने लगते हैं। शरीरबल आत्मा के गुणों को तिरोहित करके प्रकट होने वाला अशुद्ध विकार है। शरीरबल से यदि जीव की महिमा जानी जाये तो कम से कम इस समय हम आपसे अधिक महिमा तो गधे की और भैंसे की होनी चाहिये। आजकल हम आपमें संभव है कि गधे के बराबर बल नहीं है। एक गधे में जितनी ताकत है, उतनी ताकत इस समय हम आपमें न होगी। तब फिर हम बड़े नहीं हैं। हम लोगों के लिये गधा बड़ा हो जायेगा, क्योंकि शरीर के बल से इस जीव की महिमा का माप किया जा रहा है। अरे, शरीरबल का विकल्प तो आत्मबल का तिरोधान करने वाला विकार है। भले ही कुछ पापकर्म का मंद उदय रह जाये तो शरीरबल रहता है और अपनी-अपनी जातियों में जाति के माफिक शरीरबल होता है। किन्हीं–किन्हीं मनुष्यों में इतना बल होता है कि हजारों सिंह और हाथियों में भी जो बल है, उसे जोड़ लो तो उससे भी कई गुणा अधिक बल मनुष्यों में होता है, पर देहबल घमंड के लायक वस्तु नहीं है। जो शरीरबल का घमंड करते हैं, वे अपने आत्मा के अतुल बल का विनाश करते हैं।

बल का उपयोग- आत्मा का अतुल बल है समतापरिणाम में। यह अमूर्त आकाशवत् निर्लेप आत्मा किसी परपदार्थ का क्या कर सकता है? केवल मोह में मोही जीव कल्पना ही मचाया करते हैं। उन कल्पनावों से आत्मा का बल क्षीण होता है। जब विशुद्ध ज्ञान का उदय होता है, समतापरिणाम का निवास होता है तो आत्मबल बढ़ता है। आत्मबल बढ़ा हुआ है, इसकी पहिचान है निराकुलता। जो पुरुष परमार्थरूप से निराकुल हैं तो समझो उसमें उतना ही आत्मबल प्रकट है। विह्वल होना, आकुलित होना, क्षुब्ध होना- यह सब आत्मबल की कमी की निशानी है। कुछ ब्रह्मचर्य होने से, कुछ व्यायाम होने से, कुछ उदय अनुकूल चलने से कदाचित् ऐसा भी बल मिल जाये कि लाखों सुभटों को भी जीतने में पुरुष समर्थ हो जाये तो ऐसे बल से भी इस जीव का क्या पूरा पड़ सकता है? शांति मिल सके, अनाकुलता रहे, इसमें जीव का लाभ है। इस देहबल के अभिमान से इस आत्मा को लाभ तो क्या, हानि ही होती है। देहबल मिला है तो यह घमंड के लिये नहीं है- ऐसा समझो। ऐसे देहबल को पाकर हम आत्मकल्याण का काम कर लें। उत्कृष्ट ध्यान वज्रवृषभनाराचसंहनन में होता है, क्योंकि वहाँ देह में निरुपम बल है। उत्तम ध्यान के प्रताप से वज्रवृषभनाराचसंहनन वाला मोक्ष भी प्राप्त कर लेता है, यदि संक्लेश करे तो वज्रवृषभनाराचसंहनन के बल वाला पुरुष सप्तम नरक भी जा सकता है। यह तो बल के उपयोग की बात है। हमने देहबल पाया है तो इस बल का हम सदुपयोग आत्मकल्याण के लिये करें।

लोकवैभव की अप्रकृति- कितने ही पुरुष धनसंपन्न होने पर घमंड करने लगते हैं। पूर्वभव में दान किया, साधु-सेवायें की, प्रभु-भक्ति की, उससे जो पुण्य उपार्जित हुआ, उसके फल में आज धन-वैभव मिल गया है, संपदा बढ़ती चली जा रही है। उस संपदा की वृद्धि के समय अज्ञानीजन घमंड करने लगते हैं। यह संपदा की वृद्धि घमंड की बात नहीं है, अज्ञान है, तब तो यह खेद की बात है। जितनी संपदा बढ़ेगी, उतना ही यह फँसता जायेगा, उतनी ही जगह चित्त डोलता रहेगा। आज यहाँ की व्यवस्था कुछ संभल पायी तो तुरंत ही दूसरी जगहों की व्यवस्थावों की चिंता बनेगी। जितना वैभव है, जितने अर्जन के साधन हैं, उतने साधनों में इसे चिंता करनी पड़ेगी, इसका भटकना बना रहेगा। यह संपदा क्या कुछ घमंड के लायक वस्तु है? बल्कि इस पुण्य-वैभव से विशेष हानि की संभावना है। पुण्य-वैभव मिला, अज्ञान और अहंकार बढ़ा, इससे अन्याय की प्रवृत्तियाँ होने लगी। जब अन्याय की प्रवृत्तियाँ होने लगी तो तीव्र पाप का बंध होने लगा। अब उस पाप के फल में इसे नरक जाना होगा, दुर्गतियों में जन्म लेना होगा। तब इस पुण्य-वैभव ने कुछ लाभ दिया या नुक्सान दिया?

अपूर्व अवसर- भैया ! कितना श्रेष्ठ मनुष्यजन्म पाया है, जिसने रागद्वेषों को जीतकर परमात्मपद प्राप्त किया है, उस प्रभु की वाणी की परंपरा से चला आया हुआ यह विशुद्ध धर्म पाया है। ऐसे उत्कृष्ट धर्म और वातावरण को पाकर अब क्या करना चाहिये? क्या इस इंद्रजालमय भयंकर परिणाम वाले इस संपदा-वैभव में रम जाना चाहिये? ये समागम रमने के योग्य नहीं हैं। इस लक्ष्मी का क्या पता है? आज है, कल नहीं है? जो पुरुष इसमें लग रहे हैं, वे घोर क्लेश पाते हैं। यह घमंड के लायक पदार्थ नहीं है। जो पुरुष अहंकार से रहित रहते हैं, वे ही परमशरणभूत अंतस्तत्त्व का दर्शन कर पाते हैं।

परमतत्त्वज्ञों के ऋद्धियों के गर्व का अभाव- कितने ही लोगों के कुछ ऋद्धियाँ पैदा हो जाय तो उन ऋद्धियों को पाकर घमंड करने लगते हैं तो उनका पतन हो जाता है। तपस्या के बल से ज्ञान की वृद्धि होती है, क्योंकि तपस्या में विषयकषायों के परिणाम नहीं रहते हैं। उस समय ऐसी उज्ज्वलता बढ़ती है कि अनेक ऋद्धियाँ पैदा हो जायें, ज्ञान बढ़ने लगे, यह ज्ञान बढ़कर जब 11 अंग 9 पूर्व तक पहुंच जाता है, तब तक तो परीक्षा का समय नहीं आता और जब 10वां पूर्व सिद्ध होने लगता है विद्यानुवाद, तब अनेक विद्यायें, अनेक देवियाँ मानों साधक की परीक्षा के लिये आती हैं सुंदर रूप बनाकर और वे इसके मन से अनुरागवृत्तियाँ करके इस मुनि को डिगाना चाहती हैं। उस समय जो मुनि डिग जाता है, वह पतित हो जाता है, उसका जीवन भ्रष्ट हो जाता है। जो वहाँ नहीं डिगते हैं ऐसी स्थिति में भी अपने परमात्मतत्त्व की भावना में झुके रहते हैं, वे पुरुष आगे प्रगति कर जाते हैं। हो गयीं उस समय में कुछ ऋद्धि तो उन ऋद्धियों के होने से इस आत्मा का पूरा न पड़ सकेगा। गर्वरहित जो परिणाम है, वह भावशुद्धि है। भावशुद्धि में ही सच्ची उत्कृष्ट आलोचना होती है। अभेदालोचना के प्रसाद से यह जीव संसार-संकटों से छूटकर निर्वाणपद को प्राप्त कर सकता है।

ऋद्धियों में बुद्धि ऋद्धि- ऋद्धियां मूल में 7 प्रकार की होती हैं- बुद्धि ऋद्धि, तप ऋद्धि, विक्रिया ऋद्धि, औषध ऋद्धि, रस ऋद्धि, बल ऋद्धि, अक्षीण ऋद्धि। बुद्धि ऋद्धि में सर्वोत्कृष्ट ऋद्धि केवलज्ञान ऋद्धि है, फिर मन:पर्ययज्ञान, अवधिज्ञान फिर अनेक प्रकार के श्रुतज्ञान की ऋद्धियां है। जितना श्रुत उत्पन्न किया गया है, उतना श्रुत भी बराबर बना रहे तो यह भी एक ऋद्धि है। जैसे यहां देखा जाता है कि लोग जितना ज्ञान उत्पन्न कर लेते हैं यदि उसका निरंतर अभ्यास न बनाये रहें तो उस ज्ञान में कमी आ जाती है। तो जितना ज्ञान पाया है, वह ज्ञान भी बराबर बना रहे, यह भी एक ऋद्धि है। जैसे कोठे में जितने धान भरोगे, उतने ही धान रहेंगे। इसी प्रकार इस ज्ञान-कोठे में जितना ज्ञानविकास हो गया है, वह बना रहे, यह भी ऋद्धि है और जैसे एक धान का बीज बोया तो उससे कितने ही गुने धान पैदा हो जाते हैं, इसी प्रकार ज्ञान की मूल युक्ति पायी तो उसके फल से कितने ही गुना ज्ञान प्रकट हो जाये, यह भी श्रुतज्ञानविषयक ऋद्धि है। कितना ही कोलाहल मच रहा हो बाजा आदि की भीड़ में, उसमें भी भिन्न–भिन्न वचनों को जान सके, यह भी एक ऋद्धि है, नहीं तो कोलाहल में कुछ ज्ञान नहीं होता है। लेकिन कितना ही कोलाहल हो, उसमें भी भिन्न-भिन्न वचनों की पहिचान होती है- ऐसी ऋद्धि भी है। कोई एक पद किसी का बोले तो उसको ही सुनकर उसका महान् अर्थ जान जाये- यह भी एक ज्ञान की ऋद्धि है। कोसों दूर की चीज देख ली, सुन लिया, स्वाद लिया आदि अनेक ऋद्धियां होती हैं। ऐसे ही ऋद्धि उत्पन्न होने पर जो उत्कृष्ट ऋद्धि नहीं है, उस ऋद्धि पर कभी अभिमान संभव हो सकता है। ऐसे अभिमान से रहित जो निर्मल परिणाम है, उसका नाम भावशुद्धि है।

ज्ञानी का ऋद्धियों पर अभिमान अभाव- दोषों को दूर कर सकने वाला आयोजक ऋद्धि-सिद्धि के अभिमान से रहित है। वह तो यों समझता है कि यह आत्मा केवलज्ञान जैसी अनंत ऋद्धियों से संपन्न रहे- ऐसे स्वभाव वाला है। साधारण ऋद्धियां उत्पन्न हों तो उसमें कौनसा वैभव मिल गया? यह आत्मा लोक का जाननहार अपने अनंत आनंद में मग्न रहे- ऐसा अतिशयवान् है। ये सांसारिक कुछ ऋद्धियां व संपदा मिल गई तो उसमें कौनसी अभिमान के लायक वस्तु है? जो उत्कृष्ट चीज है, उसकी प्राप्ति होने पर अभिमान रहता ही नहीं है। जहां अभिमान रहता है, वहां जानना चाहिये कि कोई उत्कृष्ट चीज मिली ही नहीं है।

तप और विक्रिया ऋद्धि- तपस्या की अनेक ऋद्धियां होती है। विक्रियावों की अनेक ऋद्धियां होती हैं। आकाश में गमन करे, जल पर गमन करे और पैर न भीगें- ऐसी अनेक ऋद्धियां उत्पन्न होना तपस्या के प्रभाव से हो जाता है। अपने शरीर को छोटा बना लेना, हल्का या वजनदार बना लेना, कितनी ही विक्रियाएँ हो सकें- ऐसी ऋद्धियां उत्पन्न हो जाती हैं, पर ज्ञानी संत पुरुष को इन ऋद्धियों तक का भी पता नहीं रहता है। जैसे विष्णुकुमार मुनि को विक्रिया ऋद्धि हो गयी, पर उन्होंने स्वयं उसका उपयोग नहीं किया कि हमें कोई ऋद्धि उत्पन्न हुई है।

औषध ऋद्धि- ऐसी भी अनेक ऋद्धियां होती हैं कि साधु-संत किसी रोगी-दु:खी को अच्छी निगाह से देख लें तो उनके देखने मात्र से ही उसका रोग दूर हो जाता है। हवा उनके शरीर को छूती हुई आकर लग जाये तो उस हवा से भी रोग दूर हो जाते हैं। उनका मल, पसीना आदि कुछ चीजों का भी किसी समय रोगी से संबंध हो जाये, मल, मूत्र, थूक, खकार, लार, इनका संबंध हो जाये तो उससे भी रोगियों के रोग दूर हो जाते हैं- ऐसी सातिशय साधु-संतों के प्रकट हो जाती है। पर ज्ञानी पुरुष को ऋद्धि पर भी अभिमान नहीं रहता है। अभिमान करने वाले तुच्छ जन ही हुआ करते हैं। जो महंत हैं, सज्जन हैं, उत्कृष्ट विचार वाले हैं, वे कितनी ही ऋद्धियां, कितनी ही संपदा प्राप्त कर लें, फिर भी उनके अभिमान नहीं होता है।

रस व अक्षीण ऋद्धि- ज्ञान, वैराग्य तपश्चरण से ऐसी रस-ऋद्धियां प्रकट हो जाती है कि नीरस भी भोजन चौके में बना हो और साधु-महाराज उस चौके में पहुंच जायें तो वह भोजन सामग्री स्वादिष्ट रसरूप परिणम जाती है। कोई भी उस भोजन को खाये तो वह भोजन सरस लगता है- ऐसी भी रस-ऋद्धियां प्रकट हो जाती हैं। अतुल बल शरीर में आ जाये, इसकी भी ऋद्धियां होती हैं। जहां वे ऋद्धिवान् साधु विराजें हों, वहां कितना ही समूह भोजन कर जाये तो भी उस चौके में कमी नहीं पड़ती है- ऐसी भी ऋद्धियां होती हैं, परंतु मोक्षमार्ग में प्रगति करने वाले साधु पुरुष के किन्हीं भी ऋद्धियों में अभिमान नहीं होता है। यों सर्वप्रकार के घमंडों से रहित जो आलोचन परिणाम है, वह ही मोक्षमार्ग का सच्चा पथ है।

देहसौंदर्य पर अभिमान का अभाव- किसी को शरीर भी बड़ा सुंदर मिले, शरीर की सुंदरता दो बातों से होती है- एक तो अंगोपांग, नाक, मुँह, आँख, कान- ये सब सुडौल हों, जिसे कहते हैं आकृति ठीक है। दूसरे कांतिमानरूप होना- ऐसा विशिष्ट रूप प्राप्त करके भी जिनके अभिमान जागृत नहीं हो सकता है, वे ही पुरुष सच्चे, धर्म के साधक हो सकते हैं। शरीर कितना ही सुंदर हो, नाक, मुंह, आँख, कान- सभी सुंदर हो गये, ठीक सुडौल हो गये तो उसमें कौनसी निधि मिल गयी? आखिर मांस, खून, मज्जा इत्यादि का ही तो यह पिंड है, दुर्गंधित चीजों को ही तो यह शरीर बहायेगा। यह शरीर की सुंदरता अभिमान करने के योग्य नहीं है। यों सर्वप्रकार के अभिमान से रहित जो आत्मपरिणाम है, वह परिणाम ही आलुंछन कहलाता है।

माया के अभाव में भावशुद्धि- छल, कपट, माया धर्म के बाधक परिणाम हैं। मायाचारपूर्वक यदि कुछ संपदा भी इकट्ठी कर ली या कुछ साधन समागम भी जुटा लिये तो उससे चैन नहीं मिलती, क्योंकि मायावी पुरुष अपने आपकी माया को जान रहा है और उस माया को अंतर में छुपाने का प्रयत्न करने का उत्सुक रहा करता है, उसे चैन कहां मिल सकेगा? इस असार संसार में जहां किसी का कोई ठौर निश्चित नहीं है, 343 घन राजू प्रमाण लोक का असंख्यातवां हिस्सा है यह, जितनी जगह में हम आप रहते हैं अथवा परिचय पाते हैं, आज यहां पैदा हुए हैं, कल मरण करके कहीं के कहीं चले गये तो क्या रहा फिर यहां का? जो समागम मिला है, क्या सारभूत है? गृहस्थावस्था में यह समागम धर्म के उपयोग के लिये होना चाहिये, मान कषाय को बढ़ाने के लिये नहीं अथवा अपने दिल को रमाने के लिये नहीं।

ज्ञानी को कष्टों में आस्था और अन्याय में अनास्था- भैया ! जो कष्टों का आदर नहीं कर सकता, वह कष्टों में कभी धीर और साहसी नहीं हो सकता। वह धर्म का पात्र नहीं है अथवा यों कहो कि शांति का वह पात्र ही नहीं है। उसे तो किसी न किसी रूप से अशांति ही मिलती रहेगी। सज्जन पुरुष, ज्ञानी पुरुष धन-संपत्ति को भी आदर नहीं देते, उसे विपदा समझते हैं और वे संपत्ति से नहीं खेलते, विपदावों से खेला करते हैं। जहां तक बिगाड़ की बात है, वह संपत्ति से अधिक हो सकती है। भावों को कलुषित बनाना, मलिन बनना यही सबसे बड़ी विपदा है। भाव शुद्ध रहें और चाहे कैसी भी परिस्थिति आये वह पुरुष अंत: प्रसन्न रहेगा। जो अन्याय करता है, वह अत्याचार करता है वह अपनी खुद की कलुषित प्रवृत्ति को जान रहा है ना, और जब यह अपनी बात को जान रहा है तो यह प्रभु न्याय न करेगा क्या? उसका न्याय यह है कि यह दु:खी रहा करे? जो दु:ख के योग्य बात को करता है उसे दु:खी रहना ही चाहिए।

माया के अभाव में भावशुद्धि- माया-परिणाम के रहते हुए भावों में शद्धि कभी आ नहीं सकती है। मनुष्य को बालकवत् सरल होना चाहिये, जैसे बालक निष्कपट है वैसा होना चाहिए। कोई मायाचार करके चार पैसा ज्यादा कमा ले तो उससे क्या लाभ है? अपना व्यवहार शांति उत्पन्न करने वाला होना चाहिए। सरल चित्त वाले पुरुष को कभी विपदा नहीं आ सकती है। जो मायारहित परिणाम है, वह है भावशुद्धि। इस भावशुद्धि में परमआलोचना प्रकट होती है।

लोभ की पाप जनकता- लोभ कषाय के संबंध में एक लोकोक्ति है- लोभ पाप का बाप बखाना। लोभ पाप का बाप क्यों है? उसमें परपदार्थ को अपनाने का भाव रहता है, जो होना त्रिकाल असंभव है। यह आत्मा कहाँ-कहाँ नहीं पैदा हुआ, किस-किस शरीर को इसने नहीं ग्रहण किया, किस-किस समागम को इसने नहीं पाया? मगर आज कोई भी समागम, कोई भी वस्तु उसके पास नहीं है। कोई भी परवस्तु अपनी बने, यह त्रिकाल असंभव है। तो यह लोभ पाप का बाप है। जितने भी अन्य पाप होते हैं उन सबका जनक यह लोभ है। लोभ कषाय से रंगे हुए हृदय में शुद्ध स्वच्छ धर्म का प्रवेश नहीं होता है। शांति का करने वाला तो एक धर्म का आलंबन ही है। धर्म के आलंबन के अतिरिक्त अन्य कुछ भी इस जीव को शरण नहीं है।

लोभ की परिभाषा- योग्य स्थानों में धन को खर्च न करना, यह है लोभ की परिभाषा। कोई धर्म का स्थान है, वहाँ धन खर्च करने का परिणाम न हो सकना, इसका नाम लोभ है। कोई पुरुष अपने मौज के लिए हजार रुपये माहवार खर्च करता है, कितनी मोटरें रखे हैं, कितने ही नौकर पड़े हैं, अनाप-सनाप खर्च हो रहा है, दोस्त लोग खूब ठग रहे हैं, किंतु धर्मस्थानों में धन खर्च करने का परिणाम नहीं है तो यह लोभ नहीं तो और क्या है? योग्य कार्यों में धन खर्च न करना, यह तारे लोभ ही है। विषयों में जो अनाप-सनाप खर्च करते हैं वे लोभी हैं। जिसके पास शरीर बल है, जिसके पास बुद्धिबल है, जिसके पास जो भी शक्ति है उसका उपयोग योग्य कार्यों में न लगाये तो यह लोभ कहलाता है। लोभ से रंगे हुए हृदय में धर्म का प्रवेश नहीं होता है।

लोभ व आकुलता के अभाव का उपाय- निश्चय-दृष्टि से देखा जाय तो समस्त परिग्रह का त्याग जिसके स्वरसत: बना हुआ है, ऐसे आत्मतत्त्व का आलंबन ही लोभ का अभाव है अर्थात् जो समस्त परिग्रहों से न्यारे अपने शुद्ध ज्ञानाननंदस्वरूप परमात्मतत्त्व को निरखना है, स्वीकार करना है वह ही धर्म है। वह ही करना युक्त है। अपने शुद्ध स्वभाव का आलंबन छोड़कर अन्यत्र बाहर परमाणुमात्र द्रव्य को स्वीकार करना, यही लोभ है। योग्य कार्यों में धन खर्च न कर सकता, यह तो व्यवहार-दृष्टि से लोभ है और निश्चयदृष्टि से किसी परमाणुमात्र को भी, एक दमड़ी छदाम तक को भी अपना मानना लोभ है। अध्यात्म-क्षेत्र में निराकुलता वह कहलाती है जहाँ केवल शुद्ध ज्ञानानंदस्वभाव को ही आत्मा स्वीकार करे यह ही उसका सर्वस्व वैभव है, इस ही में तन्मय होना, ऐसे आत्मस्वभाव को ही स्वीकार करना इसका नाम है निराकुलता। काम, क्रोध, माया, लोभ इन सभी भावों से जो छुटकारा पा लेवे उस शुद्ध भाव का नाम है भावशुद्धि। भगवान् अरहंतदेव ने इस भावशुद्धि को परमआलोचना कहा है।

स्वावलंबन का मोड़- भैया ! स्वरूपपरिचयी पुरुष इन कर्मों से हटकर संसार-सागर से पास हो जायेगा। इस संसार से पार, जीवनमुक्त, अरहंतप्रभु की दिव्यध्वनि में यह उपदेश आया है कि सर्वविकारों से रहित अविकारस्वभावी ज्ञानप्रकाशमात्र अपने आपको निहारो, इस उपाय से परमकल्याण होगा। कोई अपने को आकिंचन्य निरख सके, मेरा कहीं कुछ नहीं है, मेरा तो मात्र मेरा एक चैतन्यस्वभाव है, मैं स्वरूपास्तित्त्वमात्र हूं- इतनी श्रद्धा किसी में आ सके तो उसका मनुष्य-जीवन पाना सफल है। लाखों का वैभव भी जोड़ लिया, किंतु अपने आपके सहजस्वरूप की परख न आ सकी तो उसका जीवन बेकार है। भव्य पुरुषों को यह उपदेश हितकारी है।

साधु संतों की करुणा का लाभ लेने का अनुरोध- इन साधु संतों की कितनी परमकरुणा है कि जो उन्होंने अपनी तपस्या से जो वैभव पाया है, उन वैभव को अक्षरों में लिख गये हैं और हम आप सब ऐसे कपूत रहे कि बना बनाया भोजन भी न खा सके। जो तत्त्व बड़े तप और साधना के बाद अपने आपकी मेहनत से प्राप्त हो सकता है, वह तत्त्व, वह अमृत आज यह लिपिबद्ध है। इसे भी हम न पढ़े, न सुनें, न मनन करें तो और क्या दशा होगी? विषयकषायों में ही रत होंगे। इन ढेले, पत्थरों को ही सब कुछ मानते रहेंगे तो परिणाम क्या होगा? दुर्गति होगी, संसारभ्रमण होगा। तब फिर यह मनुष्य-जीवन पाया न पाया एक समान है।

भावशुद्धि की आलोचना- आलोचना के लक्षणों में यह अंतिम आलोचना है भावशुद्धि। जहां घमंड नहीं, कामविकार नहीं, छल-कपट नहीं, लोभ नहीं, और भी समस्त विभाव नहीं, केवल ज्ञाताद्रष्टारूप परिणति चल रही है- ऐसे परिणाम का नाम है भावशुद्धि। निश्चय परमालोचन का अर्थ देखना है। दोषों को देखें तो दोषों को दूर करने के ध्येय से देखें। आलोचन की पहिली स्थिति होती है दोषों के आलोचना की। दोषों की आलोचना से यह स्वभाव का आलोचन बन जाता है, गुणों को निरखने में परिवर्तित हो जाता है। किसी के गुणों का वर्णन करने का अर्थ ही दूसरों के दोषों का प्रसिद्ध हो जाना है। कोई दो साधु पुरुष बैठे हों, उनमें से एक के गुण बता दिये जायें, दूसरे की बात ही न कही जाये तो उसका स्वयं ही यह अर्थ हो जाता है कि यह द्वितीय साधु दोषों से भरा हुआ है, सन्मार्ग पर नहीं है। दूसरे के दोषों का वर्णन करने में उपयोग क्यों बिगाड़ा जाये? जैसे लोकव्यवहार में दूसरे के दोष बताने की विधि यह है कि अन्य गुणी के गुणों का वर्णन कर दे। इसी प्रकार अध्यात्मक्षेत्र में आत्मदोषों की आलोचना करने की उत्कृष्ट विधि यह है कि आत्मा के गुणों को निरखते रहें। आत्मदोषों की आलोचना वहां स्वयं ही हो जाती है। यों यह परम आलोचक ज्ञानी संत आत्मतत्त्व की रुचिवश आत्मस्वभाव के गुणों को देख रहा है और उस चित्प्रकाश में मग्न होकर दोषों को दूर कर रहा है। दोष दूर हुए कि गुणों का विकास स्वयमेव हो जाता है।

शुद्धमार्मानुशरण से सिद्धि- जो भव्य जीव जिनेंद्रदेव के मार्ग में कहे हुए जो आलोचना के उपाय हैं, उनको करके अपने स्वरूप में रमता है। जो सर्वथा परभावों का त्याग करता है, उसे मुक्तिरूपी लक्ष्मी प्राप्त होती है। जीव को होना है मुक्त अर्थात् औपाधिक जितने भी भाव हैं, उन सर्वभावों से भिन्न अपने आपको निरखना है। जो सर्व पर विमुक्त अपने आत्मस्वरूप को निरखेगा, वह अवश्य ही मुक्त होगा। जो अपने को सर्वपदार्थों में लिप्त देख रहा है और ऐसी ही रुचि कर रहा है, वह पदार्थ से कैसे छूटेगा। जितने भी क्लेश हैं, वे सब बाह्य अर्थों की ममता के हैं। ममत्व न हो तो इस जीव को कोई भी क्लेश नहीं है। रही शारीरिक क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण की बाधा की बात। यदि ममत्व न रहेगा तो शरीर भी न रहेगा। सदा के लिये शरीर से मुक्त हो जायेंगे, फिर कष्ट की कोई बात न रहेगी। जो कल्याणार्थी पुरुष हैं, उन्हें चाहिये कि शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप निज आत्मतत्त्व की प्रतीति बनाये रहें। जो सदामुक्त आत्मतत्त्व की भावना करते हैं, वे कर्मों से अवश्य ही मुक्त हो जाते हैं।

शुद्धनयात्मक आलोचना- आलोचना दोषों को दूर करती है। कोई दोष बन जाये, उस दोष को अपने मुख से प्रकट करने से वह दोष हल्का हो जाता है। दोष बनते रहें तो दोषों से मुक्ति नहीं होती है। इसी आलोचना का जो उत्कृष्ट रूप है ज्ञानानंदस्वभाव निजतत्त्व का दर्शन, विभावरहित आत्मतत्त्व का परिणमन- यही ही उत्कृष्ट आलोचना है। संयमी जीवों को यह आलोचना अवश्य मोक्ष का फल देती है। इस आलोचना का नाम है शुद्धनयात्मक आलोचना अर्थात् शुद्ध दृष्टि से जो अपने आपके स्वरूप का निरीक्षण होता है, उसे कहते हैं शुद्धनयात्मक आलोचना। यह शुद्धनयात्मक आलोचना कामधेनु की तरह सर्वसिद्धियों को उत्पन्न करने वाली होती है। जहां शुद्ध आत्मतत्त्व के अनुरूप आत्मा का आचरण होता है, उसे शुद्धनयात्मक आलोचना कहते हैं। आत्मा है केवल जाननहार देखनहार, जिसमें रागद्वेष का विकार नहीं पड़ा हुआ है। रागद्वेष के विकार से रहित शुद्ध ज्ञानप्रकाश ही बर्तता रहे- ऐसा इस आत्मा का स्वभाव है। इस स्वभावरूप आत्मा की प्रतीति करना, ऐसा ही उपयोग बनाना- यही है शुद्ध नयात्मक आचरण और शुद्ध आलोचन।

आत्मा का स्वत:सिद्ध स्वरूप- आत्मा का स्वरूप स्वत:सिद्ध है। इस जीव को किसी ने बनाया नहीं है। जीव को ही क्या, जगत् में कितने ही पदार्थ हैं, किसी भी पदार्थ को किसी ने बनाया नहीं है। पदार्थ का अनादि सिद्धस्वरूप जब ध्यान में नहीं आता है और हम लोकव्यवहार में अनेक पदार्थों का निर्माण देख रहे हैं तो लौकिक जनों में यह कल्पना होना प्राकृतिक है कि सारी दुनिया का भी कोई बनाने वाला होगा। कपड़ा, घड़ा आदि अनेक वस्तुएँ कुम्हार कोरी आदि के बनाये बिना नहीं बन रहे हैं तो वह सारी दुनिया भी कैसे अपने आप हो जायेगी? इसको भी बनाने वाला कोई होगा- ऐसी धारणा वस्तुस्वरूप से अनभिज्ञ पुरुष के हो जाती है, किंतु एक यही उहापोह कर लो कि जैसे कुम्हार ने घड़ा बनाया तो कुछ न था, बना दिया ऐसा कर सकेगा क्या कुम्हार? मिट्टी थी, उपादान था, पहिले से कोई वस्तु थी, तब उस वस्तु में कुछ परिवर्तन हुआ है। वस्तुत: तो उस काल में भी जब घड़ा बन रहा है, कुम्हार केवल अपनी चेष्टा कर रहा है और उसके उस प्रकार के हाथ आदि चलने का निमित्त पाकर उस मिट्टी के घड़ेरूप परिणमन स्वयमेव हो रहा है। ऐसे ही कदाचित् मान लो कोई एक इस समस्त जगत् का कुछ परिणमन करे तो कुछ चीज हो, तभी ना परिणमन करे। तो चीज की सिद्धि तो पहिले से ही हो गयी। उपादान अनादि सिद्ध हुआ। न हो और असत् से सत् बना सके कोई- ऐसा न्याय में आ ही नहीं सकता।

सर्वज्ञ वीतराग परमेश्वर की विविक्तता व आनंदभवता- अब देखिये निर्माण के निमित्त की बात। भला इतने विस्तृत लोक का, जिसका रवा-रवा, अणु-अणु समस्त पदार्थ जिसमें व्याप्त है, कोई एक ईश्वर या कोई प्रभु किस वस्तु का निर्माण करता होगा। इस ईश्वर का स्वरूप सर्वज्ञ और वीतराग है, परम आनंदमय है। प्रभु को सच्चिदानंद कहते हैं, जिसका अर्थ है अनंतशक्ति, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन और अनंत आनंदस्वरूप। किसी पदार्थ का निर्माण किया करे- ऐसा परमेश्वर का स्वरूप नहीं है। ये समस्त पदार्थ अनादिसिद्ध हैं और इनका विभावरूप परिणमन जब जिस प्रकार का निमित्त पाकर ज्यों होता है, उस प्रकार चलता है। यह आत्मतत्त्व शुद्ध है, ज्ञाताद्रष्टा है। इसका सच्चिादानंदस्वरूप जानकर जो इस पर ही अपना उपयोग लगाता है, वह शुद्ध शील का आचरण करके सिद्धि का स्वामी होता है। सर्वविशुद्ध स्वत:सिद्ध आत्मस्वरूप उस शुद्ध उपयोग में है।

मोह की बाधा- भैया ! मोह का बड़ा विकट जाल है। यहाँ एक अणु का भी तो संबंध नहीं है, किंतु विकल्प में कितने विभाव बसा रखे हैं। इन कल्पनावों के कारण यह लोक संसार-भ्रमण कर रहा है। जिसने जिसे राग का विषय बनाया वह उसके लिए ही अपना सर्वस्व न्यौछावर करता है। पर, जीव का एक भी आत्मा से संबंध नहीं है। ऐसे सच्चिदानंदस्वरूप आत्मतत्त्व में मग्न मुनिजनों के हृदय-कमल में यह स्वरूप आनंदसहित विराजमान् है। इसमें कोई बाधा नहीं है। बाह्य पदार्थ किसी प्रकार से परिणमे, कोई किसी दूसरे को बाधा नहीं देता है। सड़कों पर कोलाहल हो रहा है, क्या उन कोलाहल करने वालों के वह कल्पना तक भी है कि जो मंदिर में बैठते हैं, सुनते हैं, पढ़ते हैं उनको मैं बाधा दूँ, और उन्हें मंदिर से भगायें? वे अपनी कषाय के अनुकूल अपने कोलाहल में मस्त हैं। अब दूसरे जीव कल्पना से अपनी अभीष्ट वृत्ति में बाधा जानकर यह मान लें कि ये लोग बड़ा डिस्टरबेन्स करते हैं तो यह हम आपकी कल्पना है। कोई पदार्थ किसी दूसरे पदार्थ को बाधा नहीं देता है। यह बाधा रहित है आत्मतत्त्व। बाधा तो इसमें इसके मोह की है। अंतरंग में मोह की कल्पना जगाई कि बाधा होने लगी।

आत्मा में अयोग्य तत्त्व का अभाव- यह आत्मस्वरूप काम-विकार से रहित है। इसमें क्रोध, मान, माया, लोभ का रंच प्रवेश नहीं है। इस स्वरूप को न जानकर, बाह्य पदार्थों को अपनाकर इंद्रिय के विषयों में लोभ करके यह जीव परेशान होता है। जिसने शुद्ध ज्ञानरूपी दीपक के द्वारा अपने मन के घोर अंधकार को दूर कर दिया है वह तत्त्व साधुवों द्वारा भी वंदनीय है। जन्म-समुद्र को लांघ जाने की नौका स्वरूप उस शुद्ध स्वरूप का मैं सेवन करता हूं। इस लोक में हम-आपका कोई शरण नहीं है। केवल एक तत्त्वज्ञान ही शरण है। जो पुरुष इस तत्त्वज्ञान पर न्यौछावर हो जाते हैं उनके सकल संसार संकट कट जाते हैं। अन्य पदार्थों पर अनुराग करने का फल ही कल्पनाजन्य-जीवन का कुछ सुख मान लिया जाय, परंतु संकट नहीं कट सकते हैं। कोई पुरुष बड़ी ऊँची तपस्या करके ज्ञानी बनकर भी कदाचित् किसी को पाप कार्य करने का उपदेश दे तो क्या यह शोभा देता है? जिस बात के बोलने में भी शोभा नहीं हो, जिस पाप का उपदेश करने में भी शोभा नहीं आती, क्या उस पाप के करने में शोभा है? जिसकी बात कहना भी गुनाह और अपराध माना जाता है वह कार्य करना कैसे युक्त हो सकता है? वह सहज तत्त्व जयवंत हो, जो सदा निर्व्याकुल है, सुलभ है, समता का पुन्ज है। अपने क्षेत्र में बसा हुआ अपना परमात्मा निर्विकार, शुद्ध ज्ञानज्यातिर्मात्र है, जिसकी सहजदृष्टि होने से शुद्धपरिणमन, अनंत आनंद प्रकट होता है।

यथार्थ श्रद्धा से मोह के बोझ का दूरीकरण- भैया ! बहुत बड़ा भारी बोझ है इस अज्ञानी जीव पर कि इसे मोह की बात ही सुहाती है, रहेगा यह समागम कुछ नहीं, पर मोह में ग्रस्त होने से यह अपने प्रभु को भूला है और जो जीव शरण नहीं हैं, साथ नहीं देते हैं ऐसे जीवों में, पदार्थों में यह रम जाता है। समस्त तत्त्व का सिरताज तत्त्व यह चैतन्यस्वभाव है। जीव, अजीव, आश्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष इन 7 तत्त्वों का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है, किंतु इन 7 तत्त्वों का श्रद्धान इस विधि से हो कि चैतन्यस्वरूप का दर्शन हो सके तो वह श्रद्धान सम्यग्दर्शन है। पापों का जानना बुरा नहीं है पर पापों को पापरूप से तो बुरा नहीं है, कोई पापों को उपादेयरूप से जाने, यही मेरा कर्तव्य है, यों समझे तो बुरा हो जाता है। आस्रव बंध का ही ज्ञान करना भला है पर यह आस्रव हेय है और निराश्रय आत्मस्वरूप उपादेय है इस विधि से आस्रव बंध का जानना और श्रद्धान करना यह सम्यग्दर्शन का अंग है।

अद्वैत ब्रह्म- यह परमतत्त्व कल्याणमय है, निरावरण है, नित्य है, समस्त मायाजालों से रहित है। जिसकी चर्चा अनेक लोग परमब्रह्म के रूप में करते हैं कि वह एक है, सर्वव्यापक है। वह एक सर्वव्यापक हमें किस पद्धति से नजर आए, वह पद्धति है शुद्ध निश्चय की दृष्टि और इस शुद्ध निश्चयदृष्टि में यह विकल्प भी नहीं रहता है कि यह एक है और सर्वव्यापक है, किंतु एक अद्वैतमात्र केवल वही-वही अनुभूत होता है। ऐसा यह निज कारणसमयसार मन से और वाणी से अगोचर है। मुनिजन अनुभव द्वारा इस अमृतरस का पान किया करते हैं, और निर्जन वन में भी ये प्रसन्न होकर आराधना किया करते हैं, ऐसा अपने आपमें विराजमान् परमात्मप्रभु वंदनीय है।

चतुर्विध आलोचन से सिद्धि की सिद्धि- यह आलोचना के अधिकार में उपसंहार चल रहा है। जो पुरुष अपने दोषों की आलोचना करते हैं उसे व्यवहार आलोचना कहते हैं और जब समताभाव में स्थित होकर अपने स्वभाव को निरखते हैं तो वह निश्चयालोचना है। शुद्ध प्रभु का निरखना आलोचन है और इस शुद्ध ज्ञानस्वभाव के निरखने से जो दोष स्वत: दूर होते हैं, उनका नाम आलुंछन है। आलुंछन और आलोचना हो तो सर्वविकार दूर हो ही जाते हैं। जहां सर्वविकार दूर हुए वहां परिणामों की निर्मलता प्रकट होती है। इस जीव का सहाय केवल परिणामों की निर्मलता है। जिसने जन्म जरा मृत्यु को जीत लिया है, दारुण रागादि बैरियों को जिसने दूर कर दिया है, जो परमात्मस्वरूप में स्थित हों- ऐसे सत् पुरुष जयवंत हों।

निर्दोषसाधना में उच्चस्थिति का लाभ- हम आप लोग आज बड़ी ऊँची स्थिति में हैं- कीड़ा-मकड़ी नहीं रहे हम आप, सब स्थावरों से निकल आये, असंज्ञी भी नहीं हैं, तिर्यंच पशु भी नहीं हैं, मनुष्य हैं। इस मनुष्य जीवन से जी कर यदि इस संसार की माया में ही अपना उपयोग फँसाया, इस मायामय जगत् के जीवों में ही अपना राग और द्वेष बनाया तो इसका फल संसारभ्रमण ही है। जहां से निकल कर आया है, उस गर्त में ही गिराने का काम है। एक चैतन्यतत्त्व का ज्ञान न उत्पन्न किया और इस तत्त्वज्ञान की रुचि न बनायी तो ये सब काम, ये सब समागम, यह उत्कृष्ट पर्याय की प्राप्ति- ये सब निष्फल हो जायेंगे। हम आलोचना से न डरें, आलोचना का आदर करें। मुझमें कोई दोष हुआ है, यदि उसे 10 आदमी जान जायें तो यह भलाई है। उस दस के जान लेने में मेरे में कोई बिगाड़ नहीं होता है। कदाचित् यह भी सोचें कि ये दस लोग मुझे बुरा कहेंगे, अरे बुरा कहेंगे तो वे अपना परिणमन करेंगे। वे मेरा बुरा न कर सकेंगे। बल्कि दोषों को उखाड़ फैंक देने से हम बोझ से हल्के हो जाते हैं।

ज्ञानबल के बिना व्यवहारालोचना का भी अभाव- व्यावहारालोचना भी जब बहुत बड़ा ज्ञानबल हो, तब की जा सकती है। छलरहित दोषों का निवेदन करना- यह इस जगत् से विविक्त आत्मस्वभाव की प्रतीति बिना नहीं हो सकता। जो अपने को इस जगत् की निगाह में मरा हुआ समझ ले, उसमें ही ऐसा माहात्म्य प्रकट हो सकता है कि वह अपने दोषों का छलरहित निवेदन कर सके, नहीं तो कई छल हुआ करते हैं दोष निवेदन करने में भी। बड़े दोष को तो बता दिया और छोटे दोष को छिपा लिया अथवा छोटे दोष को तो बता दिया और बड़े दोष को छिपा लिया, जिससे लोग जानें कि इतने सूक्ष्म दोषों की भी जब यह आलोचना करता है तो इसका कितना बड़ा शुद्ध हृदय होगा? जैसे श्रावक जनों में कोई कहे कि साहब आज पानी छान रहे थे तो छन्ने का एक खूँट फिसल जाने से कोई एक पाव पानी बिना छना चला गया, इसका प्रायश्चित्त दीजिये तो सुनने वाला जानता है कि यह बड़े शुद्ध आचार-विचार का है और चाहे किन्हीं गरीबों पर अन्याय करके अपना स्वार्थ साधता हो। तो सूक्ष्म दोष को बताना और बड़े दोष को छिपाना, यह भी दोष है और बड़े दोष को छिपाना तथा छोटे दोष को बताना, वह भी दोष है। उन समस्त दोषों से रहित शुद्ध आलोचना करना, यह व्यवहारालोचना है। इसमें भी महान् ज्ञानबल की आवश्यकता है।

परमालोचना के आलंबन की दृष्टि- जिस तत्त्वज्ञान से अपने लिये अपने को जाना, उस तत्त्वज्ञान में ही सामर्थ्य है कि वह शुद्ध आलोचना कर सकता है। फिर उसके मुकाबले बहुत ही अधिक पुरुषार्थ चाहिये, जो निश्चयालोचना कर सके। केवल स्वभाव की आराधना करना- यह है शुद्ध निश्चयालोचना। इस परमालोचना के प्रसाद से ही सिद्धपना प्राप्त हो सकता है। इस परमालोचना का हम आप आदर करें और इस प्रकरण से यह शिक्षा लें कि हममें जो दोष आते हैं, उन दोषों को ढके नहीं, बल्कि बड़े जनों से निवेदन कर दें और उन दोषों के बोझ से मुक्त हो जायें। दोषों का बोझ भी बड़ा कठिन बोझ है। इस बोझ से यह शुद्ध प्रभु तिरोहित रहा करता है। दोषों को उखाड़कर दोषों से रहित चिदानंदस्वभाव को निरखना, इसका ही नाम परमालोचना है। इस परमालोचना के प्रसाद से शाश्वत आनंद प्राप्त करो।

शुद्ध नय प्रायश्चित्ताधिकार


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