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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 161

From जैनकोष



णाणं परप्पयासं दिट्ठी अप्पप्पयासया चेव।

अप्पा सपरहयासो होदित्ति हि मण्णसे जदि हि।।161।।

आत्मा की स्वपरप्रकाशकता की विधि में शंकाकार का मंतव्य—इस गाथा में शंकाकार जिज्ञासु आत्मा का स्वपरप्रकाशकपना इस प्रकार सिद्ध करना चाहता है कि ज्ञान तो परप्रकाशक है और दर्शन आत्मप्रकाशक है और चूँकि आत्मा ज्ञान दर्शन दोनों गुणों से युक्त है, इस कारण आत्मा स्वपरप्रकाशक है। ऐसा यदि मानते हो तो आचार्यदेव उत्तर में कह रहे हैं। इस पर जो विपदा हो सकती है, उसे आचार्यदेव अगली गाथा में बतावेंगे, फिर चूँकि समाधान करने का संकल्प इसी गाथा में कहा गया है, इस कारण कुछ समाधान इसी में बताया जायेगा। शंकाकार के पक्ष का विवरण—शंकाकार का यह मंतव्य है कि आत्मा, ज्ञान दर्शन आदिक विशेष गुणों से समृद्ध है अर्थात् आत्मा में अनंत गुण हैं और यह आत्मा उन सब अनंत गुणों से तन्मय है, उनमें से एक ज्ञान गुण है। वह ज्ञान शुद्ध आत्मा के प्रकाशन में समर्थ नहीं है, वह तो केवल पर का ही प्रकाश करता है। लोगों के अंदाज में यही बात आती है कि हम ज्ञान से बाहरी पदार्थों को जाना करते हैं और जब यह बात सही बैठ जाती है कि ज्ञान पर का प्रकाशक है तो यह भी सिद्ध हो गया कि आत्मा केवल अपने अंतर में अपने आत्मा का ही प्रकाश करता है। इस विधि से आत्मा स्व और पर का प्रकाशक है—ऐसा शंकाकार ने अपना पूर्वपक्ष रक्खा है। इसके समाधान में अब सुनिये। शंकाकार द्वारा अभिमत आत्मप्रकाशकता की विधि का समाधान—आत्मा है एक प्रतिभासस्वरूप पदार्थ। वह प्रतिभास साकार स्वरूप भी है और निराकार स्वरूप भी है। निराकार प्रतिभास न हो तो साकार प्रतिभास हो ही नहीं सकता। आत्मा निराकार प्रतिभास भी है और साकार प्रतिभास भी है। साकार प्रतिभास का अर्थ यह है कि पदार्थ के जाननेरूप प्रतिभास है, प्रतिभास को समझने रूप विकल्प है। यो यह साकार प्रतिभास ज्ञान कहलाता है और निराकार प्रतिभास दर्शन कहलाता है। जहाँ पदार्थों के ग्रहण का विकल्प नहीं है, वह निराकार प्रतिभास है। इस दिशा में यद्यपि यह शीघ्रता में कहा जा सकता है। तब तो फिर यह सिद्ध हो गया कि जो बाह्य प्रकाश करे वह ज्ञान है और जो अंतरंग को प्रकाश करे वह दर्शन है, किंतु यहाँ यह भी ध्यान में लायें कि वह साकार प्रतिभास आत्मा में है या बाह्यपदार्थ में है। यदि यह ज्ञान केवल बाह्यपदार्थों को ही जाने याने बाह्यपदार्थों में ही यह ज्ञान हो तो इसका अर्थ यह हुआ कि ज्ञान का आधार आत्मा नहीं रहा। ज्ञान का आधार आत्मा तब माना जा सकता है, जब ज्ञानमय आत्मा माना जाये। ज्ञानमय आत्मा मानने पर यह मानना अनिवार्य है कि यह ज्ञान आत्मा को भी जानता है। समाधान में दीपक का दृष्टांत—भैया ! कहीं ऐसा दीपक देखा है जो पर को तो प्रकाश करे और खुद को प्रकाश न करे? यदि ऐसा दीपक होने लगे तो बड़ी अव्यवस्था मच जायेगी। किसी से कहा जाये कि उस कमरे में लालटेन जल रही है जरा उसे उठा लाना तो क्या वह यह कहेगा कि हमको जलती हुई एक लालटेन दे दो, जिससे उस लालटेन को देख सके और ला सके, क्योंकि अब ऐसे भी दीपक माने जाने लगे हैं जो खुद का तो प्रकाश करें नहीं और बाह्य में ही प्रकाश करते हैं तो ऐसे दीपक को लाने के लिये, ढूँढने के लिये नया दीपक चाहिये। इस सिद्धांत को समझने के लिये दर्शनशास्त्र और अध्यात्मशास्त्र की संधि पर ध्यान देना होगा। दर्शनशास्त्र के अनुसार यह ज्ञान पर को प्रकाशित करता है और ज्ञान निज स्वरूप को भी प्रकाशित करता है। भले ही कोई परपदार्थ के व्यामोह के कारण अपने ज्ञान की प्रकाशकता न समझे, किंतु युक्ति से ही विचारो कि ऐसा कोई भी ज्ञान जो अपने आपके बारे में यह न जानता हो कि मैं ज्ञान पुष्ट हूँ, ठीक हूँ, तब तक बाहरी पदार्थों को भी ठीक नहीं जान सकता, यों ज्ञान प्रकाशक भी है और परप्रकाशक भी है। अब यह ज्ञान स्वतंत्र निराधार तो है नहीं, कोई अलग वस्तु है नहीं। आत्मा ही ज्ञान है। आत्मा को समझने के लिये भेद करके उसमें से यह ज्ञानगुण विभक्त किया है। यह ज्ञान यदि आत्मा को प्रकाशित न करे तो पर को भी प्रकाशित नहीं कर सकता है।

     व्यवहार से अभिमत परप्रकाशकता के एकांत पर आपत्ति—व्यवहार पक्ष के वक्तव्य को सुनकर कि ज्ञान पर का प्रकाशक है व्यवहार से और उस व्यवहार पक्ष का एकांत करके यदि सर्वथा यह ही माना जाय कि ज्ञान पर का प्रकाशक है तो ज्ञान का आत्मा से संबंध नहीं रहा, क्योंकि यह ज्ञान तो सदा बाहर में ही अवस्थित है। काम करने से ही होता है और काम करने से ही स्थान मिलता है। ज्ञान ने जब इस पक्ष में केवल बाहर ही काम किया, बाह्यपदार्थों में ही इसका फिर अवस्थान होगा। इसका आत्मा से क्या संबंध रहा? जो ज्ञान आत्मा में प्रभाव न डाले, जिस ज्ञान की क्रिया का विषय आत्मा न रहे, इसका अर्थ यह है कि ज्ञान अलग है, आत्मा अलग है। ऐसा पृथक् ज्ञान निराधार होने से सद्भूत न हो सकेगा।

ज्ञान को मात्र परप्रकाशक मानने में ज्ञान की सर्वगतता का अभाव—पदार्थ में जितने भी गुण होते हैं, उन सब गुणों की क्रियावों का विषय वही पदार्थ होता है। ज्ञान ही क्या, जिस ज्ञान का जो भी काम है, चाहे वह चेतक गुण है या अचेतक गुण है, उन गुणों की जो अर्थक्रिया है, उन समस्त क्रियावों का विषय यह आत्मा है। कोई भी गुण बाहर के काम करे और अपने आधार के काम न करे तो इसका अर्थ यही तो हुआ कि जैसे कोई परद्रव्य हो, वह जितना भिन्न है आत्मा से उतना ही भिन्न वह गुण होगा, जिसकी क्रिया का विषय पर रहे और आत्मा न रहे। आप जो कुछ सोचते हैं, उस सोचने का विषय आप ही रहते हैं, मैं तो नहीं हो जाता। आप जो भी विकल्प करते हैं उसका अनुभव आपमें ही रहता है, मुझमें तो नहीं होता, क्योंकि मेरे से आपका कुछ संबंध नहीं। आप भिन्न पदार्थ हैं, मैं भिन्न पदार्थ हूँ। यों ही इस ज्ञानगुण में अर्थक्रिया का विषय केवल पर है, खुद नहीं है। तो इसका अर्थ यह हुआ कि यह ज्ञान आत्मा से भिन्न है और ऐसा होने पर जब आत्मा की प्रतिपत्ति न हो सकी, आत्मा को यह ज्ञान न जान सका तो ज्ञान को फिर सर्वगत भी कैसे कह सकेंगे? स्वप्रकाशकता के बिना ज्ञान की सर्वगतता का मखौल—वाह रे, शंकाकार के ज्ञान का सर्वगतपना कि सबमें तो यह व्यापक बन जाये और आत्मा में यह व्यापक न हो सके, अपने ठौर ठिकाने से न रहने पर पर को अपना ठौर बनाने वाले लोग तो ठोकरें खाते फिरते हैं। यों यह ज्ञान खुद में व्यापक न हो और अन्यत्र व्यापक हो चले तो ठोकर खाता रहेगा, इसका सिद्धांत ही कुछ न हो सकेगा और फिर तो यह ज्ञान मृगतृष्णा के जल की तरह प्रतिभासमात्र ही रहेगा, फिर तो ठोस परिज्ञान कुछ कर ही नहीं सकते, क्योंकि इस ज्ञान ने अपना आधार छोड़ दिया। इस ज्ञान की पुष्टि का करने वाला तो ज्ञान का स्वत्व था, उस स्वत्व का विच्छेद हो गया। अब यदि यह जानता हो तो समझ लो यों जानता है मृगतृष्णा-जल की तरह अटपट भ्रमरूप, जिसका कुछ ठोस मूल्य भी नहीं है। जैसे कोई चालाक पुरुष किसी प्रसंग में कभी हँसता भी है तो वह बेमूल हँसता है। उसके खुश होने का आधार कुछ नहीं है। सो केवल उसकी आदत में ऐसा शुमार हो गया है, उसे अपनी ऐसी व्यवहार-कला बनाई है कि आपको अपना बड़प्पन जताने के लिए एक ढंग से, जैसे बड़े पुरुष किसी बात पर मुस्कराते हँसते रहते हैं। इस तरह की मुद्रा से बात करेंगे, हँसेंगे; पर उनका यह हास्य, उनका यह हर्ष अमूल है, भीतर में कुछ जड़ नहीं है। यों ही यह ज्ञान जानेगा भी तो नाममात्र मृगतृष्णाजल की तरह भ्रममात्र, निराधार, अटपट, उसका कोई ठोस प्रमाण भी न रहेगा। इस कारण ज्ञान को केवल परप्रकाशक मत मानो। उसमें ज्ञान की भी सिद्धि न हो सकेगी। ज्ञान को मात्र परप्रकाशक मानने पर अचेतन पदार्थों के अभाव का प्रसंग—एक नई आपत्ति और सुनिये। यह ज्ञान यदि पर में ही व्यापक बनता है तो ज्ञान जिसमें व्यापक है, ज्ञान का जो विषय है वह सब ज्ञानमय ही रहेगा। यों सारा जगत् ज्ञानमय हो जायेगा, कुछ अचेतन रहेगा ही नहीं। फिर तो एक विज्ञान अद्वैतवाद आ उठेगा। विज्ञानवाद में यह सिद्धांत है कि जो कुछ है वह सब ज्ञान ही है। यह भींत दिखती है तो झूठ दिखती है। है नहीं कुछ। जो कुछ भी दिख रहा है यह सब कौरा भ्रम है। सब ज्ञान ही ज्ञान है। ऐसा विज्ञानवाद का सिद्धांत है। वस्तुत: ऐसा है नहीं। अरे, ये प्रकट अचेतन हैं। जाननहार कोई पदार्थ अलग रहता है, किंतु विज्ञानवाद में यह सब ज्ञान ही ज्ञान है—ऐसा माना जाता है। ज्ञानैकांत में परिणमनों की भ्रांति की भ्रांति—ज्ञानाद्वैत की सिद्धि के प्रमाण के लिये शंकाकार की ओर से पूछ रहे हैं—अच्छा, यह तो बतावो कि जब सोते हुए में स्वप्न आता है और उस स्वप्न के समय में जो कुछ दिखा वह सही लगेगा कि न लगेगा? यह नदी है, मैं यहाँ गिर गया—यों स्वप्न में देखा तो दु:खी हुआ कि नहीं? कुछ डूबने जैसा स्वप्न आ जाये, तब की बात सोचो व यह तो बतावो कि उस समय वहाँ है क्या? केवल ज्ञान ही ज्ञान है, कल्पना ही कल्पना है, है कुछ नहीं। वह सब भ्रम में दिखता है। ऐसे ही विज्ञानवाद यह कहता है कि तुम्हें भ्रम हो गया है कि यह भींत मालूम पड़ती है, चौकी मालूम पड़ती है। यह तो सब ज्ञान ही ज्ञान है, कल्पना ही कल्पना है, है कुछ नहीं। वास्तविक परिणमनों में स्वप्नभ्रम की तुलना—अरे बाबा ! हम हाथ से उठाकर, टटोलकर भी तो देख रहे हैं कि यह चौकी है। इस भींत से हम टकरा भी तो जाते हैं कि यह भींत है। अरे, तो क्या स्वप्न में टकराते नहीं हो? किसी चीज को स्वप्न में उठाकर रखते नहीं हो? वहाँ भी तो तुम्हें सही नजर आता है। यहाँ भी ये सब तुम्हें सही मालूम पड़ते हैं, यह सब भ्रममात्र है। यों ज्ञान का आधार आत्मा को न मानोगे और बाह्य में व्यापक मानोगे तब क्या हो जायेगा? सब ज्ञान ही ज्ञान तत्त्व रह जायेगा, क्योंकि फिर ज्ञान से जुदा कुछ नहीं रहा। तो ज्ञान भी किसका नाम है? लो यों ज्ञान भी मिट जायेगा। अरे ! सीधे-सीधे ठीक सिद्धांत की बात मानते जावो, आत्मा स्वपरप्रकाशक है, ज्ञान स्वपरप्रकाशक है और दर्शन स्वपरप्रकाशक है। दृश्यमान पदार्थों की मायारूपता का कारण—भैया ! जो चीज जिस प्रकार से असार है उसको उस प्रकार से असार समझो, अन्य भांति से असार समझने का यत्न न करो। ये बाहरी पदार्थ जो भी नजर आ रहे हैं ये सब मायारूप हैं, पर ये मायारूप किस कारण से हैं, उसकी विधि तो यथार्थ जानो। यों ही कहने से काम न चलेगा कि जैसे स्वप्न में यह दिखता है कि वह भ्रम है, मायारूप है—ऐसे ही इन खुली हुई आँखों से भी जो कुछ दिखता है यह माया है। यों माया नहीं है, किंतु जो कुछ दिखता है वह परमार्थस्वरूप नहीं है। परमार्थस्वरूप तो इन भौतिकों में अणु-अणु हैं और उन अणुवों का यह ढेर बन गया, जिसका विश्वास नहीं है, विनश्वर है, संयोगवियोग होता रहता है। यों विनश्वर संयोगवियोगात्मक ये सब पिंड नजर आ रहे हैं, इसलिये माया हैं परमार्थ नहीं हैं। यह ज्ञान माया को भी जानता है, परमार्थ को भी जानता है, स्व को भी जानता है। दर्शन की प्रकाशकता के संबंध में शंका समाधान—ऐसे ही केवल अभ्यंतर का ही प्रकाश करता है, बाह्यवस्तुवों का नहीं। ठीक है, दर्शन भी जो करता है सो ठीक है, ज्ञान भी जो करता है सो ठीक है, किंतु इन दोनों का प्रतिपादन जब हम बाह्यद्रव्यों का सहारा लेकर करते हैं और उसमें जो कुछ कहा जाता है वह व्यवहार का वर्णन है और उसमें बाह्यद्रव्य ही बताये जायेंगे, यों दर्शन भी परप्रकाशक समझा जायेगा और स्वप्रकाशक भी समझा जायेगा। दर्शन से परप्रकाशकता की भी सिद्धि—और भी देखो भैया ! बात केवल एक समझाने के लिये कही जा रही है—यह आँख देखती है, यह हमेशा बाहरी चीजों को देखती है खुद को तो देख ही नहीं पाती। आँखों में कभी काजल लगा हो तो उसे आँखें खुद नहीं देख पातीं। आँखें दर्पण को देखेंगी तो जान पायेंगी कि मेरे में काजल लगा है, वहाँ भी उसने बाहरी चीजों को रखा। तो दर्शन तो प्रत्यक्ष बाहर ही बाहर देखता है, खुद को नहीं देखता है। यह एक समझाने के लिये दलील है और तुम अड़ रहे इस बात पर कि आत्मा का दर्शन पर को प्रकाश करता ही नहीं, मात्र खुद का प्रकाश करता है। तुम उल्टी बात बनाये जा रहे हो। यद्यपि दर्शन का विषय मुख्यता से आत्मा ही है। पर की बात कहना तो व्यवहार से है, लेकिन उसके समझाने के भी यों ढंग होते हैं। जो रोग ज्यादा बढ़ गया है, उसे लेवल पर लाने के लिये भी उसके विरुद्ध भी कुछ दवाई दी जाती है। आत्मा, ज्ञान व दर्शन की स्वपरप्रकाशकता की सिद्धि का उपसंहार—खैर, युक्त बात इतनी है कि आत्मा प्रतिभासात्मक है और वह स्वपरप्रकाशात्मक है। पर का प्रतिभास करने में भी स्व का प्रतिभास साथ चल रहा है और स्व का प्रतिभास करने में भी पर का प्रतिभास साथ चल रहा है। ज्ञान ने समस्त विश्व को जाना और यह जानना ठीक है। इस प्रकार से खुद को भी जाना और ऐसे खुद को जानने वाले ज्ञान से तन्मय आत्मा को प्रतिभास में ले लिया गया है। इस प्रकार से दर्शन भी स्वपरप्रकाशक हुआ और ज्ञान भी स्वपरप्रकाशक हुआ। जिन सिद्धांतों में यह लक्षण किया गया है। अंतर्मुख चित्प्रकाश को दर्शन कहते हैं और बहिर्मुख चित्प्रकाश को दर्शन कहते हैं। करणानुयोगशास्त्र में इसी प्रकार परिभाषा है। उसमें भी यह निषेध नहीं किया गया था कि बहिर्मुख चित्प्रकाश करने वाला आत्मा स्व का प्रकाश नहीं करता है। वहाँ तो बहिर्मुखता की पद्धति बताई है। यों ज्ञान और दर्शन में स्वपरप्रकाशकता युक्तियुक्त है, इस कारण आत्मा ज्ञानदर्शनस्वरूप है और वह स्वपर का प्रकाश करता है, यह सिद्ध हुआ। केवली भगवान का ज्ञातृत्व व द्रष्टत्व—ये भगवान केवली समस्त लोक को जानते हैं, फिर भी मोह का अभाव होने से पररूप परिणमते नहीं हैं अर्थात् कल्पना में पर का संबंध, पर का हित आदिक की भावना प्रभाव नहीं डालती। इस प्रकार यह समस्त विश्व ज्ञेयाकार को पी लेने वाला भी यह भगवान प्रभु मुक्त स्वरूप है। यह तो अल्पज्ञानी, रागी, द्वेषी, मोहियों की बात है कि ‘‘तन की भूख है तनिकसी, तीन पाव या सेर। मन की भूख अपार है, लीलन चहत सुमेर।।’’ यह ज्ञान सहज परमात्मतत्त्व को जानता हुआ समस्त लोक को जानता है। यह नित्य शुद्ध क्षायिक ज्ञान है और दर्शन भी नित्य शुद्ध क्षायिक दर्शन है और स्वपर को साक्षात् प्रकाशित करता है। यह आत्मा भी स्वपरप्रकाशक होता है, इस प्रकार शंका के समाधान में संकेत किया गया है। अब इसका विशदरूप से समाधान अगली गाथा में करेंगे।


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