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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 162

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णाणं परप्पयासं तइया णाणेण दंसणं भिण्णं।

ण हवदि परदव्बगयं दंसणमिदि वण्णिदं तम्हा।।162।।

ज्ञान की मात्र परप्रकाशकता का निषेध—पूर्व गाथा में जो शंकाकार ने पक्ष रक्खा था कि आत्मा परप्रकाशक इस प्रकार है कि आत्मा का ज्ञानदर्शनस्वरूप, उसमें ज्ञान है परप्रकाशक और दर्शन है स्वप्रकाशक, इस ही कारण आत्मा स्वपरप्रकाशक है। इस पूर्व पक्ष के समाधान में सिद्धांतरूप इस गाथा में प्रतिपादन किया है। यदि ज्ञान मात्र पर का प्रकाशक हो तो ज्ञान से दर्शन जुदा कहलायेगा और यह तो स्वीकार ही कर लिया था शंकाकार ने कि दर्शनपरप्रकाशक नहीं है। तो दर्शन तो रहा स्वप्रकाशक ही इस शंकाकार के मंतव्य में और ज्ञान रहा परप्रकाशक ही। जिसका इतना विरुद्ध काम है, विरुद्ध मुख है तो वे दोनों भिन्न ही हैं। ज्ञान तो पर की ओर मुख किये हुए है, दर्शन स्व की ओरमुख किये हुए है—ऐसे अत्यंत भिन्न ज्ञान और दर्शन का एक जगह कैसे संबंध होगा?

     ज्ञान की अनात्मनिष्ठता में अभाव की आपत्ति—जैसे विंध्याचल पर्वत और हिमाचल पर्वत—ये दोनों जुदी-जुदी दिशा में बने हुए हैं, भिन्न-भिन्न क्षेत्र में बने हुए हैं तो क्या एक हो जायेंगे? नहीं होंगे। तो शंकाकार यह कहता है कि इसमें क्या हर्ज है? ज्ञान जुदी चीज है, दर्शन जुदी चीज है। ज्ञान तो बाह्यनिष्ठ हो गया, दर्शन आत्मनिष्ठ हो गया। यहाँ उत्तर में कह रहे हैं कि हे जिज्ञासु ! यदि ज्ञान आत्मनिष्ठ नहीं है, आत्मा से संबंध नहीं रखता, संबंध रखने का अर्थ प्रकाश करना होता है। इस आत्मा का प्रकाश न करे तब ज्ञान का संबंध क्या? ज्ञान कोई अलग द्रव्य नहीं है कि संयोग मान लिया जाये कि आत्मा में ज्ञान का संयोग हो गया है। जैसे कि चौकी का और वस्तु से संयोग हो गया। ज्ञान का संबंध जाननरूप ही हुआ करता है, अन्यरूप नहीं होता। ज्ञान का संबंध आत्मा से नहीं माना तुमने, क्योंकि तुम्हारे मंतव्य में ज्ञान जानता नहीं आत्मा को, पर को जानता है। तो ज्ञान का संबंध पर से रहा, परनिष्ठ हो गया। आत्मा तो आधार रहा नहीं और ज्ञान का पर आधार है ही नहीं। परपदार्थ तो समस्त अचेतन हैं। जो आत्मनिष्ठ है यह दर्शन ही है।  ज्ञान तो अब निराधार हो गया। निराधार होने से ज्ञान शून्य हो जायेगा। कुछ भी नहीं रहा ज्ञान।

ज्ञान की मात्र परप्रकाशकता मानने में आपत्ति का विवरण—यद्यपि इस आशंका इसी प्रकार का समाधान कल की गाथा में कर दिया गया था, क्योंकि उस पूर्व गाथा में उत्तर देने का भी पूज्यश्री कुंदकुंदाचार्यदेव ने वादा कर लिया था। उसी समाधान को पूज्यश्री कुंदकुंदाचार्यदेव गाथा के रूप में वर्णित कर रहे हैं। ज्ञान को मात्र परप्रकाशक मानने पर क्या विपदा आती है, इस बात का वर्णन इस गाथा में है। ज्ञान जानने का काम करता है, पर शंकाकार ने यह कहा है कि ज्ञान मात्र पर को जानने का काम करता है, किंतु सिद्धांत यह कह रहा है कि ज्ञानमात्र पर को ही नहीं जानता है। देखो ज्ञान स्व को जाने बिना किस ही प्रकार अव्यक्तरूप से सही, न हम उसे पकड़ पायें, फिर भी यह ज्ञान अंतरंग में यदि अपने आपको जानता न हो तो जो ज्ञान किया जा रहा है, वह ज्ञान पक्का है, ठीक है, उसका ज्ञान सही है इस प्रकार का अपने आपमें निर्णय न होने से पर के जानने की भी गारंटी क्या रही? हमने यह ठीक-ठीक जाना कि नहीं जाना? इस पकाई के साथ ही पर के जानने की पकाई है। हाँ, मैंने ठीक समझा है कि यह चौकी है। इतना अंश यदि न प्रकट हो तो चौकी के जानने की कीमत क्या रही? वह तो अटपट प्रतिभास मात्र ही रह गया। ज्ञान की अनात्मनिष्ठता मानने पर ज्ञान की शून्यता की आपत्ति का विवरण—अब इसी प्रसंग से संबंधित यहाँ यह बात कही जा रही है कि ज्ञान आत्मनिष्ठ नहीं है तो निराधार होने से ज्ञान में शून्यता आ जाएगी। दर्शन शास्त्र में है एक सिद्धांत ऐसा, जिसने ज्ञान को केवल परप्रकाशक माना है, स्वप्रकाशक नहीं माना है और उसही से संबंधित यह भी कुछ दर्शन का मंतव्य है कि ज्ञान आत्मा का गुण नहीं है, आत्मा का धर्म नहीं है, स्वभाव नहीं है। ज्ञान से आत्मा तन्मय नहीं है, आत्मा तो केवल चेतन है। इस चेतन आत्मा में ज्ञान का जब संयोग होता है तो आत्मा ज्ञानी बनता है। इस सिद्धांत में ज्ञान को व आत्मा को जुदा-जुदा कर दिया गया है। वे जो ऐसा कहते हैं उसमें भी कुछ बल है, उन्होंने यह आशय क्या समझकर बनाया है? उनका परंपरा का मूल भाव समझने के लिये इस ओर ध्यान दो कि हम आप जो कुछ भी ज्ञान करते हैं, यह ज्ञान आत्मा में कहाँ रहता है? हुआ ज्ञान और मिट गया। अभी भींत को जान लिया, अब चौकी को जानने लगे, वह ज्ञान मिट गया। तो ज्ञान के संयोग-वियोग तो हो रहे हैं ना? ऐसा ही निरखकर वह पक्ष बना रहा है, जिसका समाधान दिया जा चुका है। ज्ञान को कलंक माने जाने का एक सिद्धांत—इस प्रसंग से ही संबंधित यह भी बात उनके अभिमत में है कि इस आत्मा के साथ जब तक ज्ञान रहेगा तब तक संसार में रुलना पड़ेगा, जन्म-मरण लेना पड़ेगा, और जब इस ज्ञान से मुक्त हो जाएगा तो जीव को मोक्ष मिल जायेगा, ऐसा भी उनका सिद्धांत है। इसमें भी उनका परंपरापूर्वक मूल पूर्व का आशय समझने के लिए इस ओर ध्यान दीजिये। हम आप लोगों का ज्ञान यह सब क्लेश का कारण बन रहा है। धन, वैभव, परिजन, संपदा, यश, प्रतिष्ठा—इनमें फँसा हुआ ज्ञान हम सबके दु:ख का कारण है और ऐसा लगता है कि हम यदि ऐसा ज्ञान न बनाया करें तो कोई क्लेश न होगा। यदि यह ज्ञान मिट जाए तो सारा क्लेश भी मिट जाये। इस अंश को लेकर उनका यह सिद्धांत बना है कि ज्ञान का जब तक जीव में संयोग है तब तक जीव को संसार में रुलना पड़ता है और जब ज्ञान बिल्कुल हट जाए, यह जीव जीव ही रह जाए, चेतन ही रह जाये, ज्ञान न रहे तो इसको मुक्ति है। इससे तो यह शिक्षा लेनी चाहिये थी कि ज्ञानस्वभाव जीव का स्वरूप हैं, ज्ञानविपरिणमन नहीं। ज्ञान की निष्कलंकरूपता का समर्थन—वह चेतन क्या है कि जिसमें ज्ञान का संबंध न रहे और फिर भी चेतन रहे? ऐसा अपरिणामवादियों ये पूछिये तो उनका स्पष्ट कथन है ‘चैतन्यं पुरुपस्य स्वरूपं’। चैतन्य तो पुरुष का स्वरूप हैं। उसमें ज्ञानपना कहाँ बताया गया है? ज्ञान तो तरंग है आत्मा निस्तरंग है। ऐसा कहाँ से उन्हें बल मिला? इस ओर ध्यान दीजिये। हम आप ज्ञान करते हैं तो अंत:तरंग तो उठती ही है। कोई बड़ा निर्मल ज्ञान भी करे तो भी अर्थाकार विकल्प तो होता ही है। ऐसे ही अंश को कुछ प्रतिग्रह में रखकर यह बात कही गई है कि आत्मा का स्वरूप ज्ञान नहीं है, चैतन्य है। अब देखते जाइये, ये सब मंतव्य ज्ञान को मात्र परप्रकाशक ही मानने पर बने हैं। यहाँ यह ध्यान में ही नहीं रहा कि ज्ञानशक्ति के मूल में तो केवल ज्ञानाकार है, उसकी खबर न रही और उसका परिणमन उस व्यक्त परिणमन में ज्ञेयाकार आता है। ज्ञान का स्वरूप ज्ञेयाकार है यह सिद्धांत भी नहीं कहा। वह तो उसका उस उस समय का परिणमन है, पर ज्ञान ज्ञानाकार में शाश्वत अव्यक्तरूप से रहता है। स्वपरप्रकाशकता का अविनाभाव—वह ज्ञान जिससे भी संबंधित होगा, उसको प्रकाश किए बिना बाहर को प्रकाश कर दे, यह कैसे हो सकता है? दीपक जिस कमरे में रखा होगा, दीपक का जो आधार है और निकट चलो—दीपक का स्वयं ही जो आधार है, निश्चय से जो भी आधार है, दीपक आधार को तो प्रकाशित न करे और कह दें कि दीपक का संबंध इस जगह है, यह कैसे संभव है? अरे, ज्ञानज्योतिस्वरूप जानन का संबंध है। उसका अर्थ यह है कि यह उसे जान रहा है। यह ज्ञान स्वपरप्रकाशक है और आत्मा भी स्वपरप्रकाशक है। केवल मात्र परप्रकाशक नहीं है। ज्ञान की परप्रकाशकता के एकांत में अचेतनों के प्रभाव का प्रसंग—इस संबंध में और भी दृष्टि डालो। यह ज्ञानमात्र पर से संबंध रखे, यदि मात्र पर का ही प्रकाशक हो तो यह ज्ञान जहाँ-जहाँ गया वे-वे सब द्रव्य चैतन्य बन जायेंगे, क्योंकि ज्ञान का आत्मा से संबंध तो माना नहीं। ज्ञान का संबंध पर से माना गया है, पर का ही प्रकाशक है। तो जहाँ-जहाँ पर में गया वे सब द्रव्य चेतन बन जायेंगे। इस तरह फिर इस तीन लोक में कोई भी पदार्थ अचेतन न रहेगा। यह भी एक दूषण है। सिद्धांत की बात ता यह है कि ज्ञान ज्ञान के आधारभूत आत्मा में रहता हुआ ही वह इस विधि से परिणमता है कि जो कुछ भी सत् पदार्थ है वह विदित हो जाता है। इस ज्ञान को परपदार्थों में लगाना-जोड़ना नहीं पड़ता। यह ज्ञान परपदार्थों में प्रवेश कर-करके नहीं जानता है। यह ज्ञान तो अपने आत्मा में शक्ति गुणरूप रहता हुआ यहीं विराजा हुआ यह राजा सब कुछ परिचय लेता रहता है। सिद्धांतपक्ष का निगमन—इतनी बात सुनकर जिज्ञासु कहता है कि हाँ, ठीक, आया समझ में कि ज्ञान केवल पर का प्रकाशक नहीं है। आया न समझ में? हाँ, तो यह भी समझो कि दर्शन भी केवल आत्मनिष्ठ नहीं है। दर्शन की अंतर्मुखी वृत्ति है, यह बात तो है, किंतु इसका सर्वथा यह अर्थ नहीं हो जाता कि दर्शन में पर का प्रकाश नहीं है और ज्ञान में स्व का प्रकाश नहीं है। अरे, ये तो प्रकाशात्मक आत्मा के धर्म हैं, यही समाधान इस सिद्धांत पर सारभूत है, ज्ञान में भी कथंचित् स्वपरप्रकाशकता है और दर्शन में भी कथंचित स्वपरप्रकाशकता है। ज्ञानस्वरूप आत्मा—अब जरा आत्मतत्त्व के विषय में यह निर्णय कर लो कि यह आत्मा ज्ञान से भिन्न है या अभिन्न है। यदि आत्मा ज्ञान से सर्वथा अभिन्न ही है तब तो चुपचाप बैठो, बात ही न करो ज्ञान के विषय में। यदि ज्ञान से आत्मा को सर्वथा भिन्न करोगे तो भी आत्मा की चर्चा छोड़ो, इससे कुछ संबंध ही नहीं रहा, फिर तो यह ज्ञान जहाँ होगा, वहाँ रहेगा, यह आत्मा तो बेचारा दरिद्र ही रहा, ज्ञान शून्य ही रहा। ज्ञान से आत्मा सर्वथा भिन्न नहीं है और ज्ञान से आत्मा सर्वथा अभिन्न नहीं है। कथचिंत भिन्न है और कथन्चित् अभिन्न है। अब यह दृष्टि दो कि ज्ञान के जो निरंतर के परिणमन हैं, पूर्व और अपर, प्रतिक्षण के परिणमन, उनका प्रवाह याने जो निरंतर ज्ञान के परिणमन का प्रवाह है बस उसी प्रवाह का एकत्व तो आत्मा है। इस निगाह से भी समझ लो, यह ज्ञान स्वपरप्रकाशक है। अखंड आत्मा के प्रतिबोध के लिये प्रयोजनवश भेद—समस्त पापसमूह का नाश करने का स्वभाव रखने वाले इस आत्मा में ज्ञान और दर्शन का भेद एक संज्ञाभेद से, प्रतिपादनभेद से भेद किया गया है। इनकी संज्ञा जुदी है। संज्ञा भी इनकी जुदी है। आत्मा तो एक है और ज्ञान नाना हैं। सिद्धांत भेद में मतिज्ञानादिक पाँच और परिणमनभेद में अनगिनते भेद हैं। ज्ञान का लक्षण जाननमात्र है, आत्मा का लक्षण ज्ञानादिक गुण और उनके समस्त पर्यायों से जो युक्त है वह आत्मा है। प्रयोजन भी भिन्न है। जब प्रतिपादन का हमारा प्रयोजन होता है तब इसमें भेद चलते हैं। परमार्थ से जैसे अग्नि में और उष्णता में अंतर नहीं है, इसी प्रकार से आत्मा में और ज्ञानदर्शन में कुछ अंतर नहीं है। आत्मा का अनात्मावों से पार्थक्य—आत्मा ज्ञानदर्शनात्मक है, प्रतिभास स्वरूप यह आत्मा अपने स्वरूप में परिपूर्ण है। अन्य समस्त पदार्थों से यह अत्यंत न्यारा है। देह में रहते हुए भी देह की ओर यह रंच झुकता नहीं है। यह आत्मा तो स्वरूप में ही रहता है, देह अपने स्वरूप में ही रहता है। यह आत्मा विकल्परूप हाथ से इस देह को हिलाता, डुलाता, झकझोरता है, किंतु यह देह आत्मा की बात कुछ सुनता ही नहीं है। यह देह अपने गुणपर्याय में मग्न है। जिस आत्मा का इस निकटवर्ती एकक्षेत्रावगाही देह से भी संबंध नहीं है, उस आत्मा का इन जड़पदार्थों से अंत:संबंध मानने की जो श्रद्धा की जा रही है, वह इस परमात्मतत्त्व पर बड़ा प्रहार है और यह अपने आपके प्रभु पर बड़ा अन्याय है, महापाप है। यदि अपनी भलाई चाहते हो तो अंतरंग में सत्य श्रद्धा बना लो कि मैं सब पदार्थों से न्यारा केवल अपने स्वरूपमात्र हूँ। बात सही हो तो मान लो, न सही हो तो न मानो, निर्णय तो देख लो। मोह की विडंबना—भैया ! कितनी ही बार इन परपदार्थों की ओर से अनेक आपत्तियाँ भोगते आ रहे हैं और फिर भी नहीं मानते हैं। इस मोह का फल तो खुद को ही भोगना पड़ेगा। कोई एक बूढ़ा अपने नाती-पोतों को खिलाकर प्रेम करके उन्हें अपने सिर पर चढ़ाकर खिलाता था। वे नाती-पोते थप्पड़ मारें, मूँछ भी नोचें, परेशान करें। वह बूढ़ा बड़ा दु:खी होता था, कभी रोता भी जाता। वहाँ से निकले एक साधु। पूछा—बूढ़े बाबाजी ! तुम क्यों दु:खी हो? तो उस बूढ़े ने अपने दु:ख का कारण बताया। तो साधु ने कहा कि हम तुम्हें ऐसा उपाय बतावें कि तुम्हारे ये सारे दु:ख दूर हो जावें। उस बूढ़े ने समझा कि साधु महाराज कुछ मंत्र फूँक देंगे तो ये नाती-पोते चौबीस घंटे हमारी हू-हजूरी में लग जायेंगे। साधु ने कहा कि तुम अपना घर छोड़कर हमारे संग में हो जावो, तुम्हारा सारा संकट मिट जायेगा। तो वह बूढ़ा बोला कि महाराज ! ये नाती-पोते चाहे हमें मारें, चाहे जो करें, पर हम उनके बब्बा तो न मिट जायेंगे। हम उनके बब्बा ही कहलायेंगे और वे हमारे नाती ही कहलायेंगे। तो ये मोही जीव दु:खी भी होते जाते हैं और दु:ख के ही कार्य करते जाते हैं। आत्मा की सुरक्षाकला—भैया ! अपने ज्ञान को जिस क्षण भी संभाल लो उसी क्षण सारे क्लेश भी मिट जायेंगे। कोई नदी में तैरने वाला कछुवा पानी में सिर ऊपर उठाकर चले तो सैकड़ों पक्षी उसकी चोंच पकड़ने के लिये झपटते हैं। अरे कछुवे ! तू क्यों घबड़ाता है, क्यों दु:खी होता है, जरासी कला में ही तेरे संकट दूर हो जायेंगे। वह क्या कला है कि पानी में चार अंगुल डूब जा, फिर सभी पक्षी तेरा क्या बिगाड लेंगे? यों ही हे आत्मन् ! तूने बाह्य में अपना ज्ञान उपयोग बनाया है तो तू इष्टवियोग, अनिष्टसंयोग में बढ़ गया है और दु:खी हो रहा है। तो तू दु:खी मत हो। तेरे में तो वह कला है कि तेरे सभी संताप एक साथ नष्ट हो सकते हैं। वह कला है तेरी ही अंतर्मुखवृत्ति। अपनी अंतर्मुखवृत्ति करके अपने आपके स्वरूप में मग्न हो जा, फिर एक भी संताप न रहेंगे। यह ज्ञानमय आत्मा आत्मा आनंदमय है और सबसे निर्मल है, इसके आलंबन से ही समस्त संकट दूर होंगे।


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