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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 170

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णाणं जीवसरूवं तम्हा जाणेइ अप्पगं अप्पा।

अप्पाणं णवि जाणइ अप्पादो होदि विदिरित्तं।।170।।

आत्मा की ज्ञानमयता—यह आत्मा ज्ञान और आनंद स्वरूप है। इंद्रियों को संयत करके, अपनी इंद्रियों को विषयों में न लगाकर अपने आपकी ओर यह झुके तो एक परम विश्राम मिलता है। जिसे किसी भी वस्तु की चिंता नहीं रहती है ऐसी स्थिति में यह स्वयं अनुभव कर लेता है कि मैं केवल ज्ञानमात्र हूँ मेरा ज्ञानस्वरूप ही वैभव है, ज्ञान के अतिरिक्त अन्य कुछ वैभव नहीं है।

बहिर्मुखता में ज्ञानमयता का अपरिचय—जहाँ इन इंद्रियों को केंद्रित न करके जैसे आँखों देखा और अनेक मायामय जीव नजर आने लगे यों सभी उन मोहियों में अपना उपयोग फँसायें तो आत्मदृष्टि नहीं रहती, पर्यायबुद्धि हो जाती है। पर्यायबुद्धि से ही मोही जीव इस शरीर को ही निरखकर कहते हैं कि यह मैं हूँ, ये दूसरे हैं। यह बाहरी दुनिया जिसमें सारे शरीर ही नजर आ रहे हैं एक अंधकार को उत्पन्न कर देती है। मैं आत्मा ज्ञानमात्र हूँ। मैं क्या हूँ इसको अधिकाधिक अंतर में प्रवेश करके निरखते जाइए तो यह विदित होगा कि जो कुछ मैंने मान रक्खा है वह सब मैं नहीं हूँ। 

पर का असहयोग—भैया ! एक मोटी सी बात है, जब तक जीवन है, लोगों के बीच रहना है तब तक यह नाच चल रहा है। इस देह को छोड़कर चले गये तो फिर मेरे साथ क्या रहेगा? यहाँ का कोई पदार्थ मेरे साथ नहीं रह सकता। लाखों का, करोड़ों का वैभव भी संचित कर लें, उस सबको भी छोड़कर अकेले ही जाना पड़ता है। मेरे साथ तो यह तन भी नहीं जाता है। फिर क्या-क्या चीजें जाती हैं इस जीव के साथ? इसके साथ जो कर्म बँधे हैं वे साथ जाते हैं। ये कर्म पौद्गलिक हैं, रूप, रस, गंध, स्पर्श वाले हैं, किंतु इतने सूक्ष्म हैं कि पहाड़ और कांच आदि कुछ भी आड़े आ जायें, जैसे जीव उन वज्रों के पटल के बीच से भी साफ निकल जाता है, ऐसे ही ये कर्म भी जीव के साथ बँधे-बँधे यों ही साफ निकल जाते हैं। इन कर्मों का रंग सिद्धांत में श्वेत कहा गया है, इनका फल तो काला है, खोटा है, संसार में रुलाना है। ये कर्म जब उदय में आते हैं तो नाना प्रकार की खोटी बुद्धि हो जाती है। व्यर्थ का विकल्प और क्लेश—इस जीव को अशांति कहीं नहीं है, दु:ख कहीं नहीं है, खूब निरख लो। जितना यह मैं आत्मा हूँ उतना ही मैं अपने को निरखूँ तो वहाँ कष्ट नहीं है। अन्य जीवों को चित्त में पकड़ करके कष्ट बनाया जाता है। क्या उन अन्य जीवों के भी कर्मों का उदय नहीं है? किसी के पाप का उदय हो तो क्या मैं उसे सुख दे सकता हूँ? नहीं दे सकता। ऐसे ही किसी के पुण्य का उदय हो तो क्या मैं उसे दु:ख दे सकता हूँ? नहीं दे सकता। फिर भी व्यवस्था के नाते साधारण विकल्प करके भी गृहस्थी का निर्वाह कर सकते हैं, किंतु भीतर में आशय कर्तृत्व का पड़ा है। मैं मालिक हूँ, मैं करने वाला हूँ, इन विकल्पों के कारण गहरी चिंता बन जाती है। मोह से बढ़कर दुनिया में विपदा कुछ नहीं है। शरीर पर कितने ही संकट आ जायें तो उन्हें झेला जा सकता है, पर मन के अंदर कोई विकल्प, अनुराग, मोह जग जाय तो उसकी विपदा झेलना कठिन हो जाता है। संकटमुक्ति का उपाय—सर्वसंकट एक ज्ञान से ही समाप्त होंगे। ज्ञानरूप मेघजल ही ऐसा समर्थ उपाय है कि तेज लगी हुई आग को बुझा देने में समर्थ है। खोटा कार्य करने के बाद भी तो बुद्धि सँभलती है ना। वैसी सँभली बुद्धि खोटा कार्य करने से भी पहिले रहे तो अशुभ कार्य कैसे किया जायेगा? यह मैं आत्मा ज्ञानस्वरूप हूँ। इस ज्ञानमात्र आत्मा में कर्मोदयवश रागद्वेष वितर्क, विचार की तरंगे उठती हैं। ये तरंगे भी चलती हैं और ज्ञानप्रकाश भी साथ रहता है और इस तरह कभी-भी ऐसा लगता है कि मेरे में कोई दो बोलने वाले बैठे हैं—एक पापकार्य के लिए प्रोत्साहन देता है और एक पापकार्य को मना करने के लिए प्रोत्साहन देता है। इसे लोग कई अलंकारों में कोई दिल और ज्ञान, कोई पिशाच और विवेक आदि अनेक शब्दों में कहते हैं। है चीज वहाँ क्या? एक तो है अपने आपका सहज विलास और एक है कर्मकृत उपद्रव का आक्रमण। आक्रमण और सहज विलास का अंतर्द्वंद्व है। इस जीव पर ये मोहादि भाव बने हुए है। जब कभी यह जीव अपनी असलियत को जानता है तो उन मोहादिक को दूर करके एक अलौकिक आनंद प्राप्त करता है। विश्राम का अनुरोध—कार्यक्रम करते करते शरीर थक जाता है तो आप पौन घंटे शरीर की मालिश करके थकान दूर करके आप नई शक्ति लेना चाहते हैं और यह आत्मा विकल्प कर-करके इतना थक गया है तो इसकी थकान को मिटाने के लिए क्या उद्यम किया जाता है सो बतावो। आत्मा के विकल्पों की थकान मिटाने के लिए 10-5 मिनट पर को उपयोग से हटाकर उपयोग को बिल्कुल स्वच्छ कर लो, एक अपने आपमें इतनी हिम्मत बनावो कि जिस संग में हम हैं उस संग का विकल्प तोड दें। सभी पदार्थ सुरक्षित हैं, किसी पदार्थ का कभी भी नाश नहीं होता है। हम न भी विकल्प करें किसी के संबंध में तो भी वह जीवित रहता है। अपना यह कार्य कर रहा है। 10-5 मिनट कभी भी सर्वविकल्पों को तोड़कर अपने को अकिंचन ज्ञानमात्र निरखें तो यह बहुत बड़ी कमाई है। सब कुछ वैभव इसमें है। योग्य भावना का निर्णय—धन आदिक जड़ पदार्थ कुछ वैभव नहीं हैं, वैभव तो आत्मा का ज्ञानानुभव है। जिस चित्त में ये तरंगे उठती रहती हैं कि यह मेरा है, मैं ऐसा हूँ, मेरे को यह काम पड़ा है, अभी मुझे अमुक चीज भोगना है और करना है, मैं अमुक हूँ, नाम लेकर, परिवार वाला सोचकर जैसे अपने में नाना विचार उठाया करते हैं, बजाय उन सब विचारों के कि एक बार इतना तो अनुभव कर लें कि मैं केवल ज्ञानज्योतिस्वरूप हूँ, केवल एक सामान्य विलक्षण उजाला ही उजाला हूँ, तन्मात्र ही मैं हूँ, ऐसा कभी भी अनुभव जगे तो उसमें इतनी सामर्थ्य है कि शुद्ध आनंद का अनुभव करा दे। बस यह स्थिति कभी-कभी बना लें तो यह आत्मा में ऐसा बल प्रकट करता है कि विकल्पों की थकान फिर नहीं रहती। बड़प्पन का कार्य—विकल्पों की थकान मिटाने के बाद भी फिर विकल्प बनता है। तब विकल्पों को मिटाने के लिए ज्ञानमात्रभावना का ही उद्यम करो। बड़प्पन इसी में है। धन से बड़ा बन जाय, परिवार से बड़ा बन जाय, गोष्ठी में बड़ा हो जाय, तो क्या है? ये सब स्वप्नवत् हैं, मायाजाल हैं। हित तो इसमें है कि सर्व पर का विकल्प तोड़कर किसी क्षण अपने को ज्ञानमात्र अनुभव कर सके, यही है सच्चा बड़प्पन। जो इस बड़प्पन से रहेगा वह दु:खी नहीं रह सकता। क्या इतने अधिक व्यस्त हैं कि इस ज्ञानमात्र महत्त्व का अनुभव करने के लिए फुरसत नहीं है? कौनसा काम पड़ा है जो रात-दिन कल्पना ही कल्पना करके पूरा किया जा सकता हो? विकल्प क्यों किए जा रहे हैं रात और दिवस? अपने आपको ज्ञानमात्र अनुभव करने का पुरुषार्थ भी साथ में रक्खो। ज्ञानभावना के अभ्यास की आवश्यकता—आत्मोपयोग का पुरुषार्थ ऐसा नहीं है कि अनभ्यास दशा में इसे जब भी आये तब कर लो। ऐसी स्थिति बन तो जायेगी कि कितना ही व्यग्र हों, जब कभी जिस समय चाहे उस समय अपने आपको ज्ञानमात्र अनुभव करने लगें। मेरा कहीं कुछ नहीं है, मैं केवल ज्ञानानंदस्वरूप हूँ, लेकिन इसके अभ्यास के लिए रात-दिवस कुछ परिश्रम करना होगा। हमारा ज्ञानार्जन, गुरुमुख से अध्ययन, तत्त्वचर्चा, अपना बड़ा विनयपूर्ण व्यवहार, सबका संन्यास करने के प्रकृति—ये सब चीजें आवश्यक हैं और अपने लाभ के लिए माने हुए तन, मन, वचन, धन आदि न्यौछावर करने पड़े, किसी को देने पड़े, किसी को संतुष्ट करना पड़े तो भी कोई चीज बड़ी नहीं है और अपना मन प्रसन्न रहे, अपना ज्ञान निर्मल रहे, ज्ञानपथ मिले, यही सबसे उत्कृष्ट वैभव है। अपने स्वरूप की बात—इस प्रसंग में यह बताया जा रहा है कि आत्मा ज्ञानस्वरूप है। यह प्रकरण बहुत भीतरी मर्म का होगा, कठिन भी होगा, लेकिन जिस समय ऐसी तैयारी करके आप बैठेंगे कि मुझे और कुछ नहीं सोचना है। मैं अपने आपके भीतर के मर्म को जानने के लिए तैयार होकर बैठा हूँ तो सब चीजें ध्यान में आयेंगी और उस सुनते-सुनते के बीच थोड़ा भी प्रमाद आयेगा, थोड़ा भी मन को स्वच्छंद बनाकर किसी परपदार्थ में भेजेंगे तो यह बात उड़ जायेगी, यह ज्ञान जीव का स्वरूप है। यह ज्ञान अखंड है। हमारे ज्ञान में जो चीजें आती हैं हम उन चीजों को छोड़-छोड़कर जैसा जानते हैं, इसे जाना, अब इसे जाना, लगता है कि हमारा ज्ञान टुकड़े-टुकड़े में बँट गया है। अब खंभे को जाना, अब चौकी को जाना, यह तो ज्ञान की तरंग है, ज्ञानस्वरूप नहीं है। ज्ञानस्वरूप तो अखंड ही रहता है। अखंड अद्वैत अपने ही स्वभाव में निरत यह ज्ञान है अथवा आत्मा है। अध्यात्म क्षेत्र में सामान्य का महत्त्व—भैया ! इस दुनिया में सामान्य को कोई नहीं पूछता है। विशेष मनुष्य हो तो उसका हर जगह आदर चलता है। साधारण मनुष्य हो, सामान्य हो तो उसका आदर नहीं होता है, लेकिन शांति के मार्ग में, अध्यात्म क्षेत्र में विशेष को ठुकरा दिया गया है और सामान्य को अपनाया गया है। जो विशेष को ठुकराकर सामान्य को अपनाए वह अपने में आत्मा का अनुभव कर सकता है। आत्मा में रागद्वेष होते हैं यह विशेष बात है सामान्य बात नहीं। सामान्य बात समान होती है, ‘समानं व सामन्यम्।’ सामान्य शब्द निकला है समान से, जो समान में रहे उसे सामान्य कहते हैं। ये रागद्वेष क्या समान रहते हैं, कभी बढ़े, कभी घटे, कभी किसी रूप हो यों ये रागद्वेष सामान्य नहीं हैं, उनमें भी घटाव-बढ़ाव है। घटाव-बढ़ाव वाली चीजों में हम दृष्टि रक्खेंगे तो नियम से आकुलता बनेगी। बहुत से पुरुषों के समूह में यदि किसी व्यक्तिगत विशेष पुरुष पर दृष्टि होगी तो आकुलता मच जायेगी। जहाँ सब पुरुषों को सामान्य रूप से निरखेंगे वहाँ आकुलता न जगेगी। तो विशेष पर दृष्टि होने से संसार में रुलना पड़ता है। आत्मा का शुद्ध सामान्य भाव—सामान्य है यह ज्ञानप्रकाश। यह जानन, केवल जानन सदा समान रहता है। मात्र जानन में घटाव-बढ़ाव क्या? जानन के साथ जो हमारा घटाव-बढ़ाव चलता है वह रागद्वेष की तरंग है, जानन नहीं है, जो शुद्ध जानन है वह सामान्य होता है। इसको जानकर जो यह सोचने में आता है कि खंभा है यह रागद्वेष की तरंग का निष्कर्ष है। शुद्ध जानन क्या कि जानन तो हो जाय, पर कोई विकल्प तरंग न आये, न रंग का विकल्प आये, न नाम का विकल्प आये, किंतु जानन हो जाय, ऐसा जानन अरहंत सिद्ध और प्रभु के होता है। निर्विकल्प को जानने को सामान्य कहते हैं। जिसे आनंद चाहिए वह इस सामान्य का प्रतिभास करके आनंदमग्न हो जाय, जो अपने आपमें बसे हुए इस ज्ञानप्रकाश का आलंबन करता है, वह मोक्ष पाता है। सामान्य की सीमा के दुरुपयोग का विघटन—यह आत्मतत्त्व स्वयं ही बाहरी कौतूहल से दूर है, यह है स्वभाव का निरखना, लेकिन कोई पुरुष इस सामान्य तत्त्व की प्रशंसा में सीमा तोड़कर बढ़ जाता है वह पुरुष यहाँ यह तर्क रख रहा है कि ज्ञानी जन इतना तक भी विकल्प क्यों करें, यों ही मानें कि ज्ञान जानता ही नहीं है, ज्ञान अपने आपको समझता ही नहीं है। जैसे अग्नि का स्वरूप उष्णता है। क्या उष्णता अग्नि को जानती है? ऐसे ही आत्मा का स्वरूप ज्ञान है तो क्या ज्ञान आत्मा को जान सकेगा? जैसे उष्णता का काम दूर में होता है, ऐसे ही ज्ञान का काम दूर में होता है। इतनी तेज दौड़ लगाकर यह अलंकार में कह रहे हैं। ज्ञान आत्मा को जानता नहीं है, ऐसा कहने वाला पुरुष यह भूल गया उपमा देने में कि अग्नि की उष्णता अचेतन है, अग्नि अचेतन है। उस अचेतन की उपमा इस चेतन पर लाकर नहीं होती। जैसे दीपक जलता है तो वह पर को भी प्रकाशित करता है मगर खुद को भी तो प्रकाशित करता है। आत्मा में ज्ञान की अव्यतिरिक्तता का प्रकाशन—आत्मा के ज्ञानस्वरूप के प्रतिपादन के प्रसंग में दूसरी चीज यह है कि यदि यह ज्ञान अपने आपमें जानने का काम न करे तो जो काम न कर सके खुद स्वयं, वह भिन्न चीज होती है। जैसे कोई पुरुष कुल्हाड़ी से काठ काटता है तो क्या कुल्हाड़ी स्वयं अपने आप बिना किसी पुरुष के संबंध के काठ को काटने लगती है? काटने में नहीं समर्थ है। इससे ज्ञात होता है कि कुल्हाड़ी भिन्न चीज है। स्वयं काम न कर सके और समय पाकर करने लगे तो कहते हैं कि ये दो चीजें न्यारी-न्यारी हैं, ऐसे ही यह ज्ञान यदि जानने का काम बंद कर दे तो इसका अर्थ यह है कि यह ज्ञान आत्मा से जुदी चीज है। पर आत्मा से ज्ञान को जुदा मान लें तो आत्मा का स्वरूप ही कुछ नहीं रह गया। आत्मा ज्ञानस्वभावी है, अपने ज्ञानस्वभाव का परिचय मिल जाय, यही परमात्मा की प्राप्ति है। प्रभु का अंतर्दर्शन—लोग कहते हैं कि मुझे भगवान के दर्शन मिल जायें, उदाहरण भी देते हैं कि देखो अमुक को भजन करते-करते भगवान सामने आ गये बांसुरी बजाते हुए या हाथ में धनुष बाण लिए हुए। यों प्रभु के दर्शन नहीं होते हैं। प्रभु है ज्ञानमय। तब अपने आपको ज्ञानमय अनुभवा जाय, कुटुंब रूप नहीं, धनीरूप नहीं, कलाकार रूप नहीं, देह रूप नहीं। केवल एक मैं उजेला मात्र हूँ, ऐसा ज्ञानमात्र अनुभवा जाय तो उस प्रभु के शुद्ध स्वरूप का दर्शन होता है। इंद्रियों से प्रभु का दर्शन कभी नहीं हो सकता। समवशरण में भी जाय और वहाँ साक्षात् अरहंत भी विराजे देख ले तो वहाँ भी प्रभु का दर्शन आँखों से न हो सकेगा। आँखों से तो प्रभु का देह दिख जायेगा, पर देह प्रभु नहीं है। भले ही वह परमौदायिक शरीर है, किंतु वह तो अरहंत नहीं है, प्रभु नहीं है। समवशरण में भी प्रभु का दर्शन इंद्रियों का व्यापार बंद करके अपने आपको केवल ज्ञानमात्र अनुभव करने से होगा। यही है सच्चा पुरुषार्थ, यही है अपने आपको प्रसन्न रखने का उपाय। यही है अच्युतपद जिस पद से गिरें नहीं। जिसको अपना यह अविनाशी अच्युतपद पाना हो उसे चाहिए कि निरंतर ज्ञानभावना करे। प्रवर्तन की भावनानुसारिता—देखो—जैसी अपने में भावना बनायी जाती है वैसा परिणमन चलने लगता है। कोई लड़की विवाह से पहिले कैसी स्वच्छंद विचरती है? विवाह होने के कुछ ही देर बाद कैसे चलना, कैसे कपड़े संभालना, कैसे पैर रखना, यह सब चलने लगता है। उसे कौन सिखाने जाता है? अनुभव किया उसने कि अब मैं वधू हूँ, इतनी ही भावना के फल में उसका चाल-ढाल ढंग सब कुछ बदल गया। कोई पुरुष जब तक अपने को यह अनुभव करता है कि मैं अमुक का बेटा हूँ तब तक उस पर भार नहीं मालूम होता, जहाँ यह अनुभव किया कि मैं अमुक का बाप हूँ बस वहीं बोझ लादना शुरू हो जाता है। तो भावना की सारी बात है। जो अपने को माने कि मैं अमुकचंद हूँ, अमुक लाल हूँ, इस प्रकार बाहरी चीजों में जो आत्मारूप से अनुभव करेगा वह दु:खी रहेगा और जो मैं केवल ज्ञानमात्र हूँ, ज्ञान ही मेरा स्वरूप है, मैं इस स्वरूप को न बिगाडूँगा, मैं इसकी उपासना न तजूँगा, मैं निरंतर यही प्रतीति रक्खूँगा कि मैं ज्ञानमात्र हूँ। निरंतर ऐसी भावना बनाए तो उसको यह आत्मपद प्राप्त हो जाता है। ज्ञान जीव का स्वरूप है, वह नियम से अपने आत्मा को जानता है। यदि यह ज्ञान अपने को न जाने तो आत्मा का स्वरूप ही कुछ नहीं रहा। ज्ञान जीव से अभिन्न है। मैं ज्ञानमात्र हूँ, ऐसा अपने को ज्ञानमात्र ही अनुभव करते रहें तो इससे अपूर्व बल प्रकट होता है। और सच पूछो तो यह कठिनाई से पाया हुआ मनुष्यजन्म, श्रावककुल, जैनधर्म—इन सबका समागम सफल हो जाता है। इस कारण अपने को ज्ञानमात्र ही निरंतर मानना चाहिए।


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