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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 171

From जैनकोष



अप्पाणं विणु णाणं णाणं विणु अप्पगो ण संदेहो।

तम्हा सपरपयासं णाणं तह दंसणं होदि।।171।।

ज्ञान की महिमा—आनंद का उपाय मात्र सम्यग्ज्ञान है। एक सम्यग्ज्ञान के पुरुषार्थ को छोड़कर अन्य लौकिक वैभव के लिए अथक प्रयत्न कर लिया जाय तो भी आनंद अथवा शांति प्राप्त नहीं हो सकती है। यह बात अनुभूत व पूर्ण युक्तियुक्त है, इसमें रंच भी संदेह नहीं है। किसी मनुष्य ने लौकिक बड़प्पन पाया हो, वह अच्छे कुल में उत्पन्न हुआ हो, उसके अच्छे आजीविका का भी साधन हों, उसे यश गौरव समाज वांछनीय तत्त्व प्राप्त हों, ऐसी स्थिति में भी इस जीव को जो बड़प्पन है, वह यथार्थ ज्ञान से बड़प्पन है, ज्ञान के सिवाय अन्य समस्त परिश्रम इसके बड़प्पन के कारणभूत नहीं हैं। यथार्थ ज्ञान की ऐसी महिमा है कि उसके होते संते पुण्य रस बढ़ता है, पाप रस घटता है, मोक्ष का मार्ग मिलता है और स्वयं ही जब तक संसार शेष है तब तक ऊँची से ऊँची स्थिति प्राप्त होती है। फल उसका अंत में परमनिर्वाण है। ज्ञानबल के बिना रीतापन—संसार के संकटों से छूटने का अर्थ है मोह और कषायों से छूटना, कारण कि संकट मोह और कषायों का ही नाम है। बाह्यपदार्थों में कुछ घटी बढ़ती हो जाय तो यह कोई संकट नहीं है। बाह्य पदार्थों के प्रति जो ममेदं बुद्धि लगी है, अपने शरीर के प्रति ‘यह मैं हूँ’ ऐसा जो अहंकार बसा है, जिसके कारण मायामयी कर्मबंधन से परतंत्र मोही प्राणियों से कुछ अपने बारे में प्रशंसा की बात सुनने की चाह बनी रहती है, ये हैं सब संसार के घोर संकट। लोक में हम जिन्हें बहुत बड़ा समझते हैं, ये देश के नेता हैं, बड़े हैं, इनका बड़ा ठाठ है, मिनिस्टर हैं, आराम है, सारी जनता जिनका सम्मान करती है, सब लौकिक ठाठ हैं किंतु वहाँ भी संभव है कि कहो वह आत्मवैभव से बिल्कुल रीते हों। यत्न करके मायाचार बनाकर किसी तरह कहो अपना पोजीशन रख रहा हो। पूर्वकृत पुण्य साथ दे रहा है, वहाँ भी वह धुक रहा है यह कोई वास्तविक बड़प्पन नहीं है, और ऐसे-ऐसे ही लोगों से भरा हुआ यह संसार है। तब रीते, दु:खी, परतंत्र, अज्ञान अंधकार में खोये हुए इन लोगों से क्या चाहते हो? अरे ! आपका स्वयं का बल है तो दूसरे भी आपके आराम में निमित्त बनेंगे। स्वयं का बल नहीं है, पुण्य नहीं है, ज्ञान और आचरण नहीं है तो दूसरे भी क्या साहस कर सकते हैं? ज्ञानबल का प्रताप—वस्तुस्वरूप के यथार्थ ज्ञान में यह चमत्कार है कि इसके प्रताप से सब कुछ अभीष्ट प्राप्त हो जाता है। ये जो जड़ संपदा मिली हैं ये क्या कीमत रखती हैं? प्रसन्नता तो शुद्ध ज्ञान के कारण हुआ करती है, परिग्रह और लिप्सा के कारण प्रसन्नता नहीं होती है, मौज भले ही हो जाय, पर प्रसन्नता नहीं रहती। मौज और प्रसन्नता में बड़ा अंदर है। मौज नाम तो है मा ओज, जहाँ कोई कांति ही न रहे, बुझ जाय, ऐसी स्थिति का नाम है मौज। प्रसन्नता का अर्थ है निराकुलता। प्रसन्नता शब्द जिस धातु से बना है उसका अर्थ निर्मलता है। तत्त्वज्ञान में प्रसन्नता होती है। सारी प्रसन्नता का कारण मोह का दूर होना है। जिस क्षण मोह की वासना नहीं रहती उस क्षण आत्मा में अद्भुत आनंद प्रकट होता है। समागम की क्षणिकता—यहाँ सार क्या रक्खा है? कोई जीव कहीं से आया, कोई कहीं से, थोड़ी देर को इकट्ठे हुए, जैसे चारों ओर से रास्तागीर आते हैं, थोड़ी देर को एक चौहटा पर मिल जाते हैं, रामराम करने में जितना संग रहता है, बाद में अपना-अपना स्थान छोड़कर चले जाते हैं, ऐसे ही यहाँ भी चारों गतियों से कोई किसी गति से, कोई किसी गति से आये हुए जीवों का यह संग है, जिसे परिवार कहते हैं। ये थोड़े समय के लिए ही मिले है, पश्चात् सबको अपने-अपने करतब के अनुसार भिन्न-भिन्न गतियों में जाना पड़ेगा। काहे को यह मोह किया जा रहा है, ऐसी स्थिति होने पर भी जो मोह किए जा रहे हों उनको बड़े क्लेश और संक्लेश भोगने पड़ते हैं। ये समस्त संकट मोह के, विपदा के, तत्त्वज्ञान से ही समाप्त होते हैं। सत् स्वरूप—वह यथार्थ ज्ञान क्या है, उसे जानने के लिए जैन सिद्धांत में बहुत ही सुगम ढंग से स्वरूप का प्रतिपादन है। जो उपयोग अनादि काल से मोहवासना से वासित है उसे इस ज्ञान तपश्चरण के लिए कुछ पुरुषार्थ और त्याग तो करना ही होगा, लेकिन थोड़े से भी पुरुषार्थ पर यह ज्ञान प्राप्त हो जाता है। जो बड़े-बड़े लेनदेन, कारोबार, बड़ी-बड़ी व्यवस्थाएँ, हिसाब करने के योग्य हैं क्या उन पुरुषों के ज्ञान में यह योग्यता नहीं है कि अपने आपके निजस्वरूप की बात भी जान सकें? योग्यता है, किंतु थोड़ी रुचि चाहिए और इस ओर पुरुषार्थ चाहिए। कार्य सुगमतया सिद्ध होगा। हाँ, हमें जानना है पदार्थों को। पदार्थ जो ‘है’ सो ही है। जो भी है वह गुणपर्यायात्मक होता है। यदि कुछ है तो वह शक्ति का पुंज है और उसमें निरंतर परिणमन चलता रहता है। शक्ति और व्यक्ति इनका जो समवाय है इस ही को ‘‘है’’ कहते हैं। उसके संबंध में कुछ विशेष कहते हैं उसे सुनिये। वस्तु का असाधारण स्वरूप—कुछ भी हो, वह ‘‘है’’ 6 भागों में विभक्त है—जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। इनमें से किसी भी द्रव्य को पहिचानने का लक्षण कोई असाधारण स्वभाव होता है। वैसे तो सभी पदार्थ हैं और सभी पदार्थों में अनेक शक्तियाँ हैं, पर हम जान जायें कि यह जीव है, उसके लिए कोई ऐसा लक्षण जानना होता है जो जीव में तो सबमें पाया जाय, पर जीव को छोड़कर अन्य में न पाया जाय। ऐसा जीव का लक्षण है ज्ञान। यह जीव ज्ञानस्वरूप है, आत्मा को ज्ञान ही जानो, ज्ञान को ही आत्मा जानो। ज्ञान और आत्मा में अंतर नहीं है, मैं आत्मा हूँ, ज्ञानमात्र हूँ कुछ अंतरप्रवेश करके देखो। इन इंद्रियों का सहारा छोड़ों और बाहरी समस्त पदार्थों को भी भूल जावो और अंदर ही देखो कि मेरा स्वरूप क्या है? अपने स्वरूप के भान के बिना चाहे आप कई मंजिले मकान बनवा लो और कितना भी वैभव एकत्रित कर लो, मगर है क्या इसमें तत्त्व? किसी भी समय यों ही छूट जायेगा। अथवा जब तक भी यह साथ है तब तक भी चैन न मिलेगा। अपने स्वरूप का परिचय कर लो।

    दुर्लभ विभूति—भैया ! धन, वैभव, कुटुंब, परिजन सब सुलभ हैं पर यथार्थ ज्ञान संसार में दुर्लभ है। ज्ञानी पुरुष को कहीं भी चिंता नहीं है, कहीं भी आकुलता नहीं है, प्रत्येक परिस्थिति में वह प्रसन्न है। उसने कोई मर्म की बात जान ली है, अपने स्वरूप को भाँप लिया है, जिसके कारण वह समस्त परपदार्थों से उदासीन है। बाह्य में यों हुआ तो क्या? न हुआ तो क्या? बाहरी चीजों के परिणमन हमें दु:खी नहीं करते। हमारे भीतर में जो मोह, तृष्णा, नाना विभाव तरंगें उठती हैं वे शल्य की तरह हमें पीड़ित कर रही हैं, यह शल्य वैभव के संचय से न मिटेगी। इसके मिटने का उपाय यथार्थ ज्ञान ही है।

संकटमुक्ति के उपाय पर एक दृष्टांत—कोई एक सेठ था। गर्मी के दिनों में बड़े ठंडे सुसज्जित कमरे में पड़ा हुआ था, वहीं सो गया और उसे एक स्वप्न आ गया कि मुझे बड़ी तेज गर्मी लग रही है, सही नहीं जाती। चलो इस गर्मी को मिटाने के लिए थोड़ा समुद्र में सैर कर लें। स्त्री, बच्चे, पहरेदार सभी बोले कि हमें भी गर्मी लग रही है, हम भी समुद्र की सैर करने चलेंगे। सेठ गया सपरिवार, एक छोटे से जहाज पर बैठ गया। यह सब स्वप्न की बात कही जा रही है। जब जहाज एक मील समुद्र में निकल गया तो समुद्र में एक बड़ी भँवर उठी। जहाज डूबने लगा। तो नाविक बोला—अब तो जहाज डूब जायेगा, हमें छुट्टी दो, हम तो किसी तरह तैर कर निकल जायेंगे। सेठ कहता है कि हम लोगों को भी बचावो, तुम्हें 500) देंगे, हजार देंगे, 50 हजार देंगे। नाविक बोला कि देर करने से तो हम भी मर जायेंगे, तुम्हारे रुपया कौन लेगा? वह तो नाव छोड़कर कूद कर चला गया। अब सोचो जिसे ऐसा स्वप्न आ रहा हो उसकी पीड़ा का मिटा देने में क्या मकान, महल, नौकर-चाकर, मित्रजन समर्थ हैं? कोई भी समर्थ नहीं है। उसके दु:खों के मिटने का उपाय यही केवल कि नींद खुल जाय। बस, यही नींद का खुलना ही, जग जाना ही उसके समस्त दु:खों को मिटाने में समर्थ है। सेठ दु:खी हो रहा है, हाय सारा धन, वैभव, कुटुंब के लोग छूटे जा रहे हैं, उस सेठ की तो बड़ी दुर्दशा हुई जा रही है। उसके इस दु:ख को मिटाने में कोई नहीं है। केवल वह जग जाय, वही उसके सारे दु:खों को दूर करने का उपाय है। जहाँ वह जग जाय और यह निरखे कि यहाँ तो कुछ भी संकट नहीं है, कहाँ है समुद्र, कहाँ हम डूब रहे हैं? मैं तो बड़े मौज से इस भवन में बैठा हुआ हूँ। जहाँ उसकी यह दृष्टि हुई वहाँ ही उसका दु:ख मिट जाता है। संकटमुक्ति का मूल सुगम उपाय—ऐसे ही मोह की नींद में सोये हुए संसारी जनों को नाना स्वप्न आ रहे हैं। यह मेरा वैभव है, इतना हमारा नुकसान हो रहा है, यह वैभव यों चला जा रहा है, अमुक मेरे प्रतिकूल हो गया। कितनी-कितनी बातें इसकी कल्पना में आ रही है और उन कल्पनावों के कारण ये संसारी प्राणी दु:खी हैं। इनके दु:ख को कौन मेटे? अरे ! जो दु:ख मिटाने का गम भरते हैं वे ही इसका दु:ख का कारण बन जाते हैं। यह मोही उस मोह के दु:ख को मिटाने के लिए परिजनों से मोह करता है। उससे तो इसके क्लेश और बढ़ते रहते हैं, नष्ट नहीं होते हैं। इस मोही के क्लेश को मिटाने में समर्थ यही जीव है। मोह त्याग दे, मोह की निद्रा भंग कर दे और यथार्थज्ञान से निरखे कि यह मैं तो अरहंत, सिद्ध प्रभु की भाँति केवलज्ञान और आनंद का पिंड हूँ, स्वभावत: मेरे में कष्ट नहीं है, मेरे स्वरूप में दु:ख का नाम ही नहीं है, पर मोह की नींद में कल्पनावों के स्वप्न उसको आने लगते हैं तब इसे कष्ट भोगना पड़ता है। कितना सुगम उपाय है? अपनी बात—भैया ! खुद ही खुद भीतर में सोच लो और भीतर अपने अंत:स्वरूप को छू लो, फिर देखो सारे संकट मिटते हैं, सम्यक्त्व जगता है, मोक्ष पाने का निर्णय और निश्चय हो जाता है। इतनी तो बड़ी सुविधा मिली है हम आपको इस मनुष्य जीवन में और इस सुविधा को सदुपयोग में न लें, धन, वैभव के ही स्वप्न आयें तो फिर भव-भव में इस मनुष्यभव से हाथ धोना पड़ेगा, कीट, पतंग आदि के ही भवों में ही भ्रमण करना पड़ेगा। आज तो सामर्थ्य है, मनुष्य हैं, सोच सकते हैं; कल के दिन कीड़ा-मकोड़ा, पेड़-पौधा हो गए तो इससे तो बरबादी ही होगी। अपने आत्मा के उपभोग को बिगाड़ा जायेगा तो उससे तो पुण्य घटेगा और पाप बढ़ेगा, शुद्ध दृष्टि न रहेगी। अपने आप पर कुछ करुणा करो। प्रभु का शरण, प्रभु की भक्ति, प्रभु का स्वरूप स्मरण यह एक रक्षा का साधन है, बाकी तो कहीं बाहर में, घर देश पडौस आदि जहाँ कहीं भी चित्त लगाया, उपयोग दिया वहाँ क्लेशजाल ही बिछा हुआ मिलता है। जितने क्षण प्रभु के निकट बैठे हों, प्रभु की वाणी के निकट हों उतने क्षण तो इसके सफल हैं और बाकी तो सब व्यर्थ का परिणमन है। आत्मप्रेक्षण—देखो, अपने आत्मा के शुद्धपवित्र स्वरूप को। यह आत्मा ज्ञानमात्र है। जैसे हम किसी खंभे, चौकी में यह खोजते हैं कि इसमें क्या भरा है, देखते हैं कुरेद-कुरेद कर देखते हैं तो मिलता है कि इसमें कुछ ठोस चीज है। जरा अपने आपके स्वरूप को इस प्रज्ञा छेनी से कुरेद-कुरेद कर देखो तो सही कि मैं क्या हूँ? देह तो मैं हूँ नहीं, यह जड़ है, मिट्टी है, इस देह से न्यारा मैं कुछ भीतर में तत्त्व हूँ, इसकी खोज करना कोई मुश्किल बात नहीं है, किंतु इतना यत्न करना जरूर होगा कि समस्त परपदार्थों को भिन्न जानकर, अपने लिए असार जानकर उनकी उपेक्षा करना होगा, उनका उपयोग हटाना होगा। किसी भी परपदार्थ को कुछ क्षण के लिए अपने चित्त में मत बसावो, अपने आप ज्ञान प्रकट होगा। ज्ञानमय तो यह है ही। ज्ञान होने में कौनसी कठिनाई है, पर इतनी सी बात अवश्य है कि परपदार्थों को पर जानकर उनकी उपेक्षा कर जावो और एक विश्राम से बैठ जावो, अंतर में ज्ञान का अनुभव होगा और अद्भुत आनंद का भी अनुभव होगा। निजप्रभुता के असम्मान में विडंबना—मोह और कषाय ही वास्तविक विडंबना है। इनसे परे होने का यत्न करो तो इस ही में सच्चा बड़प्पन है। आत्मा ज्ञानस्वरूप है, आत्मा को ही ज्ञान समझो, ज्ञान को ही आत्मा समझो। यह आत्मा अपने प्रतिभा-स्वरूप के कारण स्वपरप्रतिभासक है और यह ज्ञान, दर्शन भी स्वपरप्रतिभासक है। यही तो एक तत्त्व है, उसको समझने के लिए गुण और गुणी का भेद कर दिया जाता है। यह आत्मा ज्ञानरूप है, निरंतर जानता रहता है और समस्त परपदार्थों से न्यारा रहकर जानता रहता है, यह अपने स्वरूप को जानने में समर्थ है। ऐसा जो सहजज्ञान ज्योतिस्वरूप है, तन्मात्र ही आत्मा को जानो। यह मैं आत्मा सबसे न्यारा, केवल प्रतिभास-स्वरूप, आकाश की तरह निर्लेप, अपने आपमें शुद्ध, समस्त पदार्थों में उत्कृष्ट, प्रभुता से संपन्न, अनंत आनंद का निधान यह मैं आत्मा हूँ। इसका जब सम्मान इसने नहीं किया, यत्न नहीं किया तो यह संसार की दुर्गतियाँ भोगता फिरता है। आत्मतोष में सकलपरितोष—देखो, आत्मा की उपासना कुछ क्षण हो जाय तो बाकी चौबीस घंटे गृहस्थी के कर्तव्य करते हुए भी इसमें ताजगी रहा करती है और एक इस आत्मस्वरूप का भान किए बिना ये सब बातें ऊपर फट्टी कुछ कल्पना से ही मौज रूप मालूम होती हैं। पर मोह में संतोष हो नहीं पाता। जिसको आत्मस्वरूप का अनुभव है, आत्मसंतोष मिला है उसको सर्वत्र संतोष रहा करता है। जिसे अपने आपमें संतोष नहीं रहा उसे बाहर के परपदार्थों में कहाँ संतोष मिलेगा? अपना घर देखो, अपने स्वरूप को निरखो। मैं सबसे न्यारा केवल ज्ञानस्वरूप हूँ, यह आत्मा ज्ञान-दर्शनरूप है, यह अपने को भी जानता है और पर को भी जानता रहता है। बस इतना ही इसका स्वरूप है, इसके आगे रागद्वेष करना, अच्छा सुनना, बुरा सुनना, अच्छा कहना, बुरा कहना, समस्त व्यवहार नाटक हैं। दुनियाँ की उल्टी रीति है। यह नाटक में अटका हुआ है और नाटक शब्द खुद यह कह रहा है कि न अटक। इन दोनों को ही मिलाकर नाटक बना। अरे ! तुम अटको नहीं, पर यह तो वहाँ भी भटक रहा है। हितपंथ—भैया ! कुछ चैन पावो, समस्त परपदार्थों के परिग्रहों का इस ज्ञान से बोझ हटाकर, अपने उपयोग को निर्भार करके विशुद्ध आनंद का अनुभव करो। हमारे इन विजयी पुरुषों ने, पुराण तीर्थंकरों ने यही किया था। इसी से ये विजयी हुए, जिन कहलाये और इसी से ही हम आप उनकी वंदना, उनका स्मरण करते रहते हैं। हित के पंथ पर लगने की धुन बनावो। जिस भी प्रकार ये मोह और कषाय दूर हो सकें उस ही उद्यम में लगो। इसके लिए चाहे तन, मन, धन, वचन सब कुछ भी न्यौछावर करने पड़े और फिर भी आत्मस्वरूप के अनुभव का वैभव मिल जाय तो समझ लो कि इस एक समय के अनुभव के बल पर अनंतकाल के लिए अनंत आनंद रिजर्व कर लिया गया है। विशुद्ध ज्ञानादर्शनात्मक निज सहज आत्मतत्त्व के सम्यक् श्रद्धान्, ज्ञान और इसी स्वरूप में अनुष्ठान करने रूप बोधि की प्राप्ति होना अपूर्व और अनुपम लाभ है। एतदर्थ वस्तुस्वरूप के ज्ञान का अभ्यास बनाओ।


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