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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 175

From जैनकोष



ठाणणि सेज्जविहारा ईहापुव्बं ण होइ केवलिणो।

तम्हा ण होइ बंधो साकट्ठं मोहणीयस्स।।175।।

केवली प्रभु के बंध का अभाव—केवली भगवान के विहार करना, खड़े रहना—ये सब इच्छापूर्वक नहीं होते। इस कारण केवली प्रभु के इस देह की प्रवृत्तियों के कारण बंध नहीं है। इंद्रिय के विषयों के रूप में देह की प्रवृत्ति हो तो बंध होता है। भगवान सकलपरमात्मा जो परम अर्हंत्य लक्ष्मी से सहित हैं उन केवली प्रभु के, उन वीतराग सर्वज्ञदेव के कुछ भी प्रवृत्ति ईहापूर्वक नहीं होती है। कितना शुद्ध स्वरूप है प्रभु का? यद्यपि चार अघातिया कर्मों का उदय होने से शरीर का अभी बंधन लगा है प्रभु के, किंतु निर्दोष हो जाने के कारण उस शरीर की वजह से न बंध होता है न क्लेश होता है। प्रभु की मानुषोत्तरता—प्रभु का शरीर परमौदारिक शरीर है, हम लोगों का शरीर औदारिक शरीर है। ऐसा ही शरीर उनके भी था, पर केवलज्ञान होते ही उस शरीर में अतिशय हो जाता है, वह निर्दोष हो जाता है, कांतिमां हो जाता है। जहाँ भगवान विराजे हों वहाँ अँधेरा नहीं रह सकता। उनका शरीर भी स्वयं देदीप्यमान होता है। धातु और उपधातु मलिन नहीं रहते हैं। उनके शरीर में अपवित्रता नहीं रहती। मनुष्यों के देह से विलक्षण देह उनका हो जाता है। इस कारण उन्हें मानुषोत्तर प्रकृति वाला कहते हैं। वे मनुष्यों से उठे हुए हैं, उनकी कुछ भी प्रवृत्ति इच्छापूर्वक नहीं होती है क्योंकि उनके मन ही नहीं है, मन की प्रवृत्ति नहीं है, इसी कारण प्रभु कुछ नहीं चाहते हैं। इसी निर्दोषता के कारण वे सकलज्ञ हुए हैं व परमौदारिक शरीरी हुए हैं। मन:परिणतिपूर्वक प्रवृत्ति न होने से प्रभु के बंध का अभाव—भैया ! जितना भी बंधन है वह सब चाह में बंधन है। अंतरंग में चाह की दाह होती है उसकी वेदना नहीं सह सकते तो बाहरी चीजों का बंधन बना लिया जाता है। गृहस्थावस्था अनेक चाहों कर भरी हुई है फिर भी इतना विवेक रखना चाहिए कि हम किसी न किसी क्षण समस्त कलंकों से विमुक्त अपने आपके शुद्ध ज्ञानस्वरूप का भान कर सकें। यह पुरुषार्थ ही वास्तविक शरण है, अन्य सर्वसमागम असार हैं। केवली भगवान मन रहित हैं, किंतु वे मनरहित असंज्ञी जीवों की तरह नहीं हैं किंतु द्रव्यमन होते हुए भी भावमन नहीं चल रहा है, यों अमनस्क हैं। वे इच्छापूर्वक न तो ठहरते हैं, न बैठते हैं न उनका श्रीविहार होता है। सोच लीजिए, मनुष्यगति के नाते केवली भगवान का औदारिक शरीर है, हाँ परमौदारिक जरूर है और हाथ, पैर, नाक, आँख जैसे हम आपके हैं वैसे ही उनके हैं। जैसे हम चलते हैं डग भर कर ऐसे ही वे चलते हैं डग भर कर, और फिर भी इच्छापूर्वक न वे चलते हैं, न उठते हैं, न बैठते हैं। इसी कारण तीर्थंकर परमदेव को चारों ही प्रकार का बंध नहीं होता है। बंधन की चतुष्प्रकारता का दृष्टांत—कर्मों बंधन में चार प्रकार के होते हैं। प्रकृति का बंध हो, प्रदेश का बंध हो, स्थिति का बंध हो और शक्ति का बंध हो। हम आप भोजन करते हैं तो उस भोजन किए गये पदार्थ का जो पेट में संबंध हुआ है वह तो, समझिये दृष्टांत में कि, प्रदेशबंध है भोजन का और उस भोजन में जो यह प्रकृति पड़ी है कि इतना अंश रुधिर आदिक द्रव धातु बनेगा, इतना अंश मल आदिक फोक बनेगा, इतना अंश हड्डी आदिक कठोर चीज बनेगा। तो जो उस किए हुए भोजन के विभाग हैं उसे समझिये दृष्टांत में प्रकृतिबंध। यह अमुक पदार्थ इतने दिनों तक शरीर के साथ टिकेगा। खून बनने वाला पदार्थ मानो 10, 20 वर्षों तक टिकेगा, हड्डी बनने वाला पदार्थ 50 वर्ष तक टिकेगा आदिक उन पदार्थों की शरीर में स्थिति बंध गयी। पसेव बनने वाले पदार्थ कुछ मिनट ही टिकते हैं, मल बनने वाले पदार्थ कुछ घंटा टिकते हैं। ऐसी जो स्थिति बँध गयी वह है दृष्टांत में स्थिति बंध और उन पदार्थों में भी शक्ति बस गयी। हड्डी में विशेष शक्ति है, खून में कम शक्ति है, पसेव में बहुत कम शक्ति है। इस तरह उन पदार्थों में जो शक्ति बँध गयी वह है दृष्टांत में अनुभाग बंध। कर्मबंध की चतुष्प्रकारता—ऐसे ही चार प्रकार का बंधन कर्मों के विषय में होता है। कर्म एक पुद्गल भौतिक पदार्थ है, जिसे कार्मण वर्गणाएँ कहते हैं। समस्त लोक में ठसाठस कर्मपुद्गल (कार्मण-वर्गणाएँ) बसा हुआ है और इस प्रत्येक संसारी जीव के साथ अनेक कर्मपुद्गल ऐसे साथ लगे हुए हैं जो कि अभी कर्मरूप तो नहीं बने किंतु बँध सकते हैं। ऐसे ही कर्मपुद्गल, मरने पर जीव के साथ जाते हैं, और जो कर्मरूप बन गए ऐसे कर्मपुद्गल भी जीव के साथ जाते हैं। जब यह जीव कषाय करता है तो अनेक कार्मण-वर्गणाएँ कर्मरूप बन जाती हैं। उन कर्मों का जीव के साथ संबंध होना यह तो है प्रदेशबंध और उन कर्मों में जो यह प्रकृति आयी इतने कर्मपुद्गल जीव के ज्ञानगुण को घातेंगे, इतने कर्मपुद्गल जीव के सुख-दु:ख के कारण होंगे, इतने कर्मपुद्गल जीव के शरीर-बंधन के कारण होंगे। इस तरह जो प्रकृति पड़ गई वह है प्रकृतिबंध। ये कर्म करोड़ों वर्षों तक साथ रहेंगे, ये कर्म सागरों पर्यंत साथ रहेंगे ऐसी जो उसमें स्थिति बँध गयी वह है स्थितिबंध और उनमें फलदान की जो शक्ति आयी है वह है अनुभागबंध। हम आप लोगों की जरासी असावधानी में सागरों की स्थिति के कर्म बँध जाते हैं। इच्छा के अभाव से बंधन का अभाव—भगवान अरहंत केवली के चूँकि रागद्वेष रंच नहीं है, इच्छा का अभाव है इस कारण कर्मों का बंधन नहीं होता। यद्यपि उनके भी दिव्यवचन निकलते हैं; विहार, उठना, बैठना ये सब भी उनके देह से हो रहे हैं, लेकिन इच्छा न होने से बंधन नहीं है। कुछ दृष्टांतरूप फर्क का अंदाज तो यहाँ भी कर सकते हैं। एक मुनीम सेठ की फर्म पर सारा काम सँभालता है, बैंक का, तिजोरी का, हिसाब का। सब कुछ प्रबंध करने पर भी चूँकि उस मुनीम के उस संपदा की इच्छा नहीं है इससे उसके शल्यरूप बंधन नहीं है, केवल जो स्वयं वेतन लेता है उसकी इच्छामात्र का बंध है और बंधन नहीं है, जबकि सेठ को जो कि फर्म पर बैठता भी न हो, अथवा घंटा, आध घंटा ही बैठता हो उसके उसका बंधन है। यह मेरी इतनी जायदाद है यह प्रतीति बनी है। उसके हानि-लाभ में उसे हर्ष-विषाद है। जबकि मुनीम को फर्म के घाटे अथवा लाभ में जो कुछ प्रभाव उसके वेतन पर पड सकता है उतने अंश में उसे खेद और हर्ष है। इच्छा ही एक बंधन है। प्रभु के इच्छा का अभाव है, इस कारण प्रभु के बंधन नहीं है। बंधहेतुता—यह बंधन किस कारण से होता है, किसको होता है? यह बंधन मोहनीय कर्मों के विलास से होता है। मोह-रागद्वेष का जो फैलाव है इससे बंधन है। थोड़ा परिचय हो जाय, वहीं यह बंधन कर लेता है तो जिसका मोह और राग का अंतरंग से संबंध है उनको तो बंधन प्रकट ही है। अच्छा बतलावो, जैसे शरीर वाले त्यागी, साधुसंत होते हैं ऐसे ही शरीर वाले तो ये गृहस्थजन हैं। जैसे वे अकेले हैं ऐसे ही आप सब भी अकेले हैं। क्या साथ लेकर आप बैठे हैं? किंतु अपने नगर को छोड़कर, घर छोड़कर आपका जाना नहीं बन सकता है। साधु के चित्त में आया तो जहाँ चाहे चल दिया। उसको कुछ बंधन नहीं है और गृहस्थजनों को बंधन है। भावबंधनवशता—भैया ! यहाँ भी कोई बँधा नहीं है शरीर से। शरीर ये भी अकेले ही है, किंतु भीतर में जो मोहभाव है उस मोहभाव का बंधन है। यों कहो कि आपको गृहस्थी ने नहीं बाँधा है, परिजनों ने आपको बंधन में नहीं जकड़ा है किंतु आपने ही अपनी मोहमयी कल्पना से परिवार को भीतर से जकड़ रक्खा है और इसी जकड़ाव का बंधन है। यह तो बताया जा सकने वाला बंधन है पर साथ ही जो कर्मों का बंधन लगा है, जो सूक्ष्म है, वह तो और भी विचित्र बंधन है। यह बंधन जो इंद्रियविषयों का प्रयोजन रखते हैं उन संसारी जीवों के होता है। विषय-बंधन, विषयों की अभिलाषा जिसके न हो वह आजाद है, बंधनरहित है। अहा ! वस्तुस्वरूप के यथार्थज्ञान में और कौनसी कला पड़ी हुई है। यही तो कला है कि जहाँ वस्तुस्वरूप का सही ज्ञान हो वहाँ यह मेरा है, यह मेरा है, ऐसी बुद्धि का अवकाश न होने से बंधन नहीं रहता। जो इंद्रियों के विषयोंकर सहित हों उन ही पुरुषों के बंधन है। पुराण पुरुषों के और वर्तमान पुरुषों के भी इन सब बंधनों को परखते जाइए। राग की दु:खममूलता—कोई पुरुष यदि अपने कुछ दु:ख की कहानी कह रहा है तो सुनिये और अर्थ लगाते जाइए कि इस पुरुष को अमुक पदार्थ की अभिलाषा है, इस इंद्रिय विषय का लालची है, इस कारण दु:खी है। इंद्रिय विषयों की लालसा हुए बिना दु:ख नहीं हो सकता है। लालसा से ही दु:ख होता है। मिष्ट सरस पदार्थ खाने को चाहिए, इच्छा लगी है, मिले तो दु:ख न मिले तो दु:ख, मन में यश-प्रशंसा की कल्पना जग जाय तो दु:ख, यश मिले तो दु:ख, न मिले तो दु:ख। यह संसारजाल पूरा असार है। यहाँ अपने भले की बात मिल ही नहीं सकती है। इंद्रियों को सुहावने वाली बात मिले तो उसमें मरे, इंद्रियों को न सुहाने वाली बात मिले तो उसमें मरे। किसी को हुक्म मानने में कष्ट होता है और किसी को हुक्म देने में भी कष्ट होता है। जो हुक्म देते रहते हैं उन कष्टों को वे जानते हैं और जो हुक्म मानते रहते हैं उन कष्टों को वे जानते हैं। इस संसार में कुछ भी स्थिति बने सभी स्थितियों में खेद है। एक सम्यग्ज्ञान हो, आत्मतत्त्व की यथार्थ श्रद्धा हो, सबसे निराले ज्ञानमय आत्मा की अनुभूति हो यही सत्य शरण है, इससे ही जीवों का कल्याण है। शेष समागम तो सब क्लेश के ही कारण हैं। प्रभु के अभ्युदय में—प्रभु का धर्मोदपेश भी एक नियोगवश होता है। जानकर, बनावट करके, रागद्वेष करके प्रभु के देह की प्रवृत्ति नहीं होती है। प्रभु के ऐसा अभ्युदय प्रकट होता है केवलज्ञानरूप जिसके अभ्युदय के कारण देवेंद्रों के आसन कंपायमान हो जाते हैं सूचना देने के लिए। प्रभु जब चार-घातिया-कर्मों को नष्ट करके केवलज्ञान प्राप्त करते हैं तो इसकी सूचना इंद्रों को हो जाय इतने मात्र के लिए उनका आसन कंपायमान हो जाता है, अर्थात् प्रभु में चमत्कार प्रकट हुआ है। तुम आसन पर बैठे हुए अभिमान मत करो, आसन से उठकर विनय करो। वह आसन से उठता है, वहीं ही 7 पग चलकर नमस्कार करता है फिर उत्तर विक्रिया शरीर धारण करके समवशरण में आता है। देवों का वैक्रियक शरीर—देवों का शरीर वैक्रियक शरीर है। जो उनका खास शरीर है वह स्वर्ग से उतरकर यहाँ नहीं आता किंतु यह नवीन वैक्रियक शरीर बनाकर यहाँ आता है। मूल शरीर स्वर्ग में ही रहता है। देवों की भी ऋद्धि देखो। कितने शरीर बना लें और जितने शरीर बनेंगे, जितनी दूर तक उनका शरीर जायेगा, मूल स्थान से लेकर जहाँ तक उन्होंने बनावटी शरीर भेजा है वहाँ तक पूरी जगह में उनका आत्मा रहता है। मानो दूसरे स्वर्ग के देव का शरीर यहाँ आया तो यहाँ से लेकर दूसरे स्वर्ग तक में मूल शरीर तक बीच के क्षेत्र में उनका आत्मा रहता है, क्योंकि आत्मा अखंड है। वह टुकड़ों में बँटकर नहीं, फैलकर वह हजारों शरीर भी धारण कर ले और उन हजारों शरीरों से भी क्रियाएँ करें तो उनका मन क्रम-क्रम में इतनी तेजगति करके उन सब देहों की क्रियाएँ कराता है कि आप यह जान पायेंगे कि एक साथ ही सब काम हो रहा है, किंतु वहाँ क्रम में होता है। इंद्र की प्रभुसेवानिष्ठता—मनुष्य लोक में किसी समय एक साथ 170 तीर्थंकरों का जन्म हो सकता है। इस ढाई द्वीप के भीतर 5 तो भरतक्षेत्र हैं, 5 विदेहों में 32-32 नगरियाँ होने से 160 स्थान विदेहों के हैं। जिस समय चतुर्थकाल चल रहा हो तब भरत और ऐरावत में सबमें एक साथ प्रभु का जन्म हो, विदेह की सब नगरियों में भी जन्म हो तो ऐसी स्थिति में एक ही काल में 170 तीर्थंकर मनुष्य लोक में हो सकते हैं और उन सब तीर्थंकरों की सेवा के लिए मुख्य इंद्र एक ही है सौधर्मइंद्र। वह कैसे सब तीर्थंकरों की सेवा में एक साथ रह सके? इंद्र इतने उत्तरविक्रिया के शरीर रचते हैं और अपनी कलावों से, सेवावों से तीर्थंकर देव को प्रसन्न किया करते हैं। तीर्थंकर का बल—तीर्थंकरदेव के अकेले में भी इतना महान बल है जो सैकड़ों इंद्रों को मिलाकर भी बल न हो सके। लोग महत्ता में इंद्र का नाम लिया करते हैं पुराणों में। इंद्र प्रसन्न हो गये। कोई चीज समझमें न आयी तो इसके भी करने वाले इंद्र को मान लिया। मेघ बरस रहे हैं तो लोग कहते हैं कि आज इंद्र प्रसन्न हो रहे हैं। इंद्र क्या है? देवतावों का राजा। इंद्र भी तीर्थंकर के चरणों की सेवा के लिए आया करता है। ये तीर्थंकर मन से भी बलिष्ठ, वचन से भी बलिष्ठ और काय से भी बलिष्ठ हैं। इनके जब केवलज्ञान होता है तो देवेंद्रों के आसन भी कंपायमान हो जाते हैं। सद्धर्मप्रकाश—भगवान सद्धर्म के रक्षामणि हैं। अहिंसामय मोक्षमार्ग को प्राप्त कराने वाला धर्म इसको प्राप्त करके वे स्वयं पावन हुए हैं और भव्य जीवों को इस ही सद्धर्म का मार्ग बताते हैं। ऐसे केवली भगवान के दिव्यध्वनि भी खिरे, विहार भी हो, खड़े हों, बैठ जायें, सब प्रकार की प्रवृत्तियाँ होने पर भी चूँकि उनके इच्छा नहीं है इस कारण कर्मबंध नहीं होता। इस शुद्धोपयोग अधिकार में शुद्धोपयोग के स्वामी अरहंत और सिद्ध भगवान हैं। सिद्ध भगवान तो निष्क्रिय हैं, उसमें हलना, डोलना प्रदेशमात्र भी नहीं होता। अरहंत प्रभु के विहार अधिक होता है, सो शुद्धोपयोग के प्रसाद से और इच्छा के अभाव से प्रभु के इतनी क्रियाएँ होकर भी उनके बंध नहीं है। हम आप भी जितने अंशों में इच्छा पर विजय पा सकें उतने अंशों में बंध से दूर रह सकते हैं। ज्ञानार्जन का प्रयोजन यह है कि हमारे वस्तु स्वातंत्र्य की दृष्टि जगे और इच्छा का अभाव हो ताकि शुद्ध आनंद का अनुभव कर सकें।


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