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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:नियमसार - गाथा 176

From जैनकोष



आउस्स खयेण पुणो णिण्यासो होइ सेसपयडीणं।

पच्छा पावइ सिग्घं लोयग्गं समयमेत्तेण।।176।।

आत्मा के चरमविकास का संकेत—हम आप जीव वर्तमान में मलिन हैं, देह के अधीन हैं, कर्मों के उदय के अनुसार परिणमन कर रहे हैं, भव-भव में जन्म-मरण करते आये हैं, ऐसे ये अशुद्ध जीव किस प्रकार अपनी इस अकल्याणमय स्थिति को त्यागकर शुद्ध स्वाभाविक कल्याणमय स्थिति में पहुँचते हैं इसका अंतिम संकेत इस गाथा में किया गया है। जीव की प्रकृतिबद्धता—यह जीव सूक्ष्म कर्म-पुद्गल से बँधा हुआ है। निमित्तनैमित्तिक बंधन इस जीव के साथ प्रकृति का है। अन्य लोग भी कहते हैं कि इस आत्मा के साथ प्रकृति का बंधन है और जब प्रकृति का और आत्मा का भेद ज्ञात हो जायेगा तब यह मुक्त हो जायेगा। वह प्रकृति क्या चीज है? इस संबंध में जितना स्पष्ट विवेचन जैन सिद्धांत में है प्रकृति के बारे में, वह समझने के योग्य है। प्रकृति को अनेक पुरुष कुदरत कहते हैं। यह तो प्रकृति की चीज है। यह तो कुदरती बात है। प्रकृति का लोग अनेक प्रकार से उपयोग करते हैं, पर प्रकृति है क्या? उसके जानने के लिए कुछ मूल से उठकर पहिचानिये। अविरुद्धसंपर्क में बंधन की असिद्धि—हम आप जीव हैं, जीव का जो निजी स्वरूप है वह स्वरूप जीव के बंधन के लिए नहीं बनता। वस्तु का स्वरूप वस्तु के विनाश के लिए नहीं होता। वह तो वस्तु के विकास के लिए होता है। तो हम स्वयं अपने आपके लिए बंधन के कारण पड जायें; बरबादी के, विनाश के हम ही मात्र एक कारण हों यह तो बात नहीं है। पदार्थ का स्वरूप पदार्थ के विनाश के लिए नहीं होता। तब यह मानना पड़ेगा कि मेरे साथ कोई अन्य चीज लगी हुई है, जिसका बंधन है, जिसके कारण मलिनता है, बरबादी है, उस ही चीज का नाम प्रकृति है। अब वह उपाधिभूत प्रकृति किस ढंग में होती है? यह एक समझने की बात है। जो भी प्रकृति उसके साथ लगी है वह उसकी ही तरह स्वरूप वाली तो हो नहीं सकती। जैसे काँच में काँच का प्रतिबिंब नहीं झलकता, काँच में गैर काँच का प्रतिबिंब झलकता है, क्योंकि काँच भी पूर्ण स्वच्छ है, दूसरा भी पूर्ण स्वच्छ है, एक जाति का है, तो काँच के कारण से काँच की छाया नहीं बनती। काँच से विरुद्ध चीज हो तो उसके निमित्त से काँच में दृश्य बनेगा। ऐसी ही बात जीव के स्वरूप की है। प्रतिपक्ष से बंधन की सिद्धि—प्रकृति का स्वरूप मेरे ही जैसा हो तो मुझमें कलुषता न बन सकेगी। इस कारण यह भी मानना होगा कि मैं जीव चेतन हूँ तो प्रकृति जड़ है। मैं जीव अमूर्त हूँ, रूप आदिक से रहित हूँ सो प्रकृति मूर्त है, रूप आदिक से सहित है। हाँ, साथ इतनी बात अवश्य है कि वह प्रकृति स्थूल न होगी। वह सूक्ष्म है, इसी प्रकृति को लोग कर्म शब्द से कहते हैं। उस जड़ प्रकृति उपाधि का निमित्त पाकर जीव में जो राग द्वेषादिक कलुषताएँ बनती हैं, उन कलुषतावों का भी नाम प्रकृति है। जीव की मलिन प्रकृतियों का नाम है भावप्रकृति और कर्म-पुद्गल का नाम है, द्रव्यप्रकृति। हम आपका जो यह शरीर बना है, इस शरीर के बंधन में द्रव्यप्रकृति तो निमित्त है और इस मुझ आत्मा में जो अनेक मनुष्यों के योग्य विचार और रागादिक होते हैं वे सब भावप्रकृति हैं। इस ही का नाम कुदरत है। जैसे लोग पहाड़, नदी आदि को देखकर कहते हैं कि देखो कितना सुहावना यह प्रकृति का दृश्य है तो प्रकृति के मायने क्या? जिसका दृश्य बताते हो? वह प्रकृति यह है। सुनिये—द्रव्यकर्म-प्रकृति का उदय पाकर यह जीव पेड़, पानी आदि के रूप में आया है। बस यही प्रकृति का अर्थ है। ज्ञानावरण, दर्शनावरण व वेदनीयरूप प्रकृति—इस जीव के साथ 148 प्रकृतियाँ लगी हुई हैं, किसी के दो एक कम भी हो सकती हैं। इन 148 प्रकृतियों के मूल प्रकार 8 हैं। जीव के साथ इस प्रकार की एक प्रकृति लगी है जिसके कारण यह जीव ज्ञान में ठहर नहीं पाता है, इंद्रियों द्वारा ही कुछ जानकर रह जाता है। उस प्रकृति का नाम है ज्ञानावरण। इस जीव के साथ एक ऐसी प्रकृति लगी है जिसके कारण यह सर्व विश्व के जाननहार अपने आत्मा को सामान्य प्रतिभास नहीं कर सकता, दर्शन नहीं कर सकता। उस प्रकृति का नाम है दर्शनावरण। इस जीव के साथ एक ऐसी प्रकृति लगी है जिसका निमित्त पाकर यह जीव इंद्रियों के द्वारा कभी सुख का अनुभव करता है और कभी दु:ख का अनुभव करता है। उस प्रकृति का नाम है वेदनीय। विभाव की अस्वभावता—भैया ! साथ ही साथ यह भी निरखते जाइये कि इन प्रकृतियों के निमित्त से जो वारदात उत्पन्न होती है वह जीव का स्वरूप नहीं है। जीव का स्वरूप है पूर्ण ज्ञानस्वरूप रहना। उसमें भंग पड़ा है प्रकृति के कारण। जीव का स्वरूप है समस्त विश्व को, पदार्थों को दृष्ट कर लेना, उसका दर्शन करना, इसमें बाधा आयी है दर्शनावरण कर्म-प्रकृति के निमित्त से। जीव की प्रकृति है निर्बाध सुख, शुद्ध भय रहित, किसी प्रकार की बाधा वेदना न हो, किंतु उसमें बाधा आयी है वेदनीयकर्म-प्रकृति के निमित्त से। मोहनीय व आयुकर्मरूप प्रकृति—जीव के साथ चौथी प्रकृति एक ऐसी लगी है जिसके कारण यह जीव वस्तुस्वरूप का यथार्थ श्रद्धान नहीं कर सकता और जड़ पदार्थों को विषय बनाकर क्रोध, मान, माया, लोभ कषाय करता रहता है। इस प्रकृति का नाम है मोहनीय कर्म। इस जीव के साथ एक ऐसी प्रकृति बँधी हुई है जिसके कारण यह जीव शरीर में रुका रहता है। शरीर में रुका रहना जीव का स्वरूप नहीं है, जीव को क्लेश नहीं है; किंतु यह कलंक है, दु:ख है, परतंत्रता है। जिस प्रकृति के निमित्त से जीव शरीर में रुका रहता है इस प्रकृति का नाम है आयुकर्म। आयुकर्म को बहुत से लोग ऐसे बोलते हैं—इस जीव का आयु रुका रहता है इस प्रकृति का नाम है आयुकर्म। आयुकर्म को बहुत से लोग बोलते हैं—इस जीव का आयुकर्म इतना ही था। जब तक आयुकर्म बलवान है तब तक मरण कैसे होगा? वह आयुकर्म भी प्रकृति है। नाम, गोत्र व अंतरायरूप प्रकृति—एक प्रकृति है नामकर्म, जिसके कारण जीव का भव त्याग होने पर, मरण होने पर फिर नई देह की रचना होने लगती है। देह की रचना की कारणभूत प्रकृति जीव के साथ लगी है इसलिए कभी ऐसी भूल नहीं हो सकती कि कोई जीव मरने के बाद बिना शरीर का रह जाय या कुछ दिन यहाँ वहाँ घूमता फिरे या कोई बनाने वाला खबर न ले, क्योंकि अनंत जीव हैं, किसी की लिखा-पढ़ी में चूक हो जाय तो वह जीव बिल्कुल शरीररहित हो जाय, ऐसा तो इस संसार में नहीं होता, क्योंकि शरीर का रचना का निमित्तभूत नाम कर्म की प्रकृति जीव के साथ लगी है। 7 वीं प्रकृति है ऊँचे नीचे कुल की संज्ञा दिलाने वाली। यह मनुष्य है उच्च कुल का, यह नीच कुल का है। तिर्यंच सब नीच कुल के हैं। नारकी सब नीच कुल के हैं, देव सब उच्च कुल के हैं। मनुष्यों के ही ये दो भेद पड़े हुए हैं कि कोई मनुष्य उच्च कुल में है और कोई नीच कुल में है। यह एक प्रकृति भी जीव के साथ लगी है। 8 वीं प्रकृति है अंतराय प्रकृति, जिसके उदय के निमित्त से यह जीव दान नहीं कर सकता, चीज की प्राप्ति नहीं कर सकता, भोग-उपभोग भी नहीं कर सकता, अपने पुरुषार्थ का उपयोग भी नहीं कर सकता। प्रकृति के विनाशक्रम में प्रथम दर्शनमोहप्रकृति का विनाश—जीव के साथ मूल में 8 व उत्तररूप 148 प्रकृतियाँ लगी हुई हैं। उन सब प्रकृतियों में से यह जीव कुछ विवेक बुद्धि का अवसर पाकर मोहनीय प्रकृति विनाश करता है। इस मोहनीय की दो प्रकृतियाँ हैं एक तो श्रद्धा विपरीत कराना, दूसरी प्रकृति है कषायों में लगाना आदि। तो सबसे पहिले यह जीव मोक्षमार्ग के उद्यम में श्रद्धा उल्टी करने वाली प्रकृति को विनष्ट करता है। जहाँ इसकी श्रद्धा सही बन गयी, मैं आत्मा परमार्थत: सहज चिदानंदस्वरूप हूँ, मेरा मात्र मैं ही हूँ, मेरा किसी अन्य पदार्थ से कुछ संबंध नहीं है, मेरे में सबका अत्यंत अभाव है, ऐसी श्रद्धा बनाकर जब यह जीव समस्त परपदार्थों की उपेक्षा करके अपने आपमें निरत होता है, अपने शुद्ध ज्ञान का अनुभव करता है तो दर्शनमोहनीय पर विजय हो जाती है। दर्शनमोह के विनाश से मोक्षमार्ग का अपूर्वकदम—अब यहाँ से उसका प्रोग्राम बदल गया। इससे पहिले तो यह संसारियों में रुलने मिलने वाला था, अब उसका उपयोग मुक्त जीवों में, प्रभु में, मोक्षमार्गी जीवों में रहने लगा है। संगति का परिवर्तन हो गया। सम्यक्त्व जगने से पहिले तो इसकी मोहियों की संगति थी। सम्यक्त्व होने के बाद अब इस ज्ञानी पुरुष के ज्ञानियों की सत्संगति हो गयी। यह गृहस्थ ज्ञानी चाहे मोही पुरुषों के बीच में ही रहे लेकिन जिसके संग की हृदय में भावना, प्रवृत्ति और ध्यान रहे, संगति उसकी ही कहलाती है। कोई पुरुष व्यसनी पहिले किसी प्रसंगवश धर्मसभा में भी बैठ जाय तो भी उसके चित्त में पाप की ही बातें बसी हैं इसलिए वह सत्संगति में नहीं बैठा है, ऐसा समझिये। जिसका हृदय सत्संगति से सुवासित है ऐसा ज्ञानी गृहस्थी भी मोक्षमार्गी है। आत्मगुणघातक प्रकृतियों का विनाश—जब यह ज्ञानी गृहस्थ विशेष वैराग्य वृद्धि के कारण समस्त परिग्रहों से विरक्त हो जाता है, सर्वपरिग्रहों का त्याग करके साधु होकर केवल एक आत्मध्यान में ही रत रहता है तब इसके प्रकृतियों के विनाश का तीव्र पुरुषार्थ जगने लगता है। यह अब मोहनीय की शेष प्रकृतियों का नाश करने में लग गया। यों जब इस जीव के मोहनीयकर्म का पूर्ण विनाश हो जाता है तब अंतर्मुहूर्त में ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अंतराय—इन तीन मूल प्रकृतियों का भी नाश हो जाता है तब इस जीव को स्वभावपरिणति प्राप्त होती है, शुद्ध ज्ञान प्रकट होता है जिसके द्वारा समस्त लोक को वे प्रभु यथार्थ स्पष्ट जानते हैं, अनंत दर्शन प्रकट होता है जिससे अनंत पदार्थों को जानने वाले इस आत्मा को अपने प्रतिभास में ले लेते हैं। मोहनीय कर्म का नाश होने से शुद्ध सम्यक्त्व जग गया, अमिट क्षायकसम्यक्त्व बना हुआ है और कषायरहित प्रवृत्ति हो गयी है, अंतराय का क्षय होने से अनंत सामर्थ्य प्रकट हो गया है। सकलप्रकृतियों का विनाश—अब यह पावन आत्मा सकल परमात्मा कहलाता है। प्रभु के जब तक आयुकर्म मौजूद है तब तक वह शरीर सहित है और अंतिम कुछ समय को छोड़कर शेष प्रभुता के समयों में उनका विहार होता है, उनकी दिव्यध्वनि खिरती है। वे चलते, उठते, बैठते भी हैं लेकिन ये सब प्रवृत्तियाँ प्रभु की इच्छा के बिना होती रहती हैं। इच्छा होना, रागद्वेष का भाव करना, यह दोष है, आत्मा का गुण नहीं है, यह तो अवगुण हैं, जो संसारी जीवों में होते हैं। प्रभु निस्पृह, परमउपेक्षा से सहित सारे लोक का जाननहार, अपने ही शुद्ध आत्मीय आनंदरस में लीन आराध्य भगवान हैं। जब इस सकल परमात्मा के आयु का क्षय होता है तो उसके ही साथ समस्त बाकी बची हुई प्रकृतियाँ नष्ट हो जाती हैं। भगवंतों की निष्कलंकता—अब यह प्रभु सिद्ध भगवान प्रकृतिरहित शुद्ध ज्ञानानंदस्वरूप हो गया है। सिद्ध भगवान के शरीर तक का संपर्क नहीं है, इनका अब जन्म-मरण भी न होगा। ये प्रभु इस मनुष्यलोक से ही तो सिद्ध बने हैं। ये सकल परमात्मा, सशरीर प्रभु एक समय में शीघ्र ही लोक के अंत को प्राप्त हो जाते हैं। शुद्ध जीव अपनी स्वाभाविक गति को यों प्राप्त कर लेता है। इसका संकेत इस गाथा में किया है। स्वाभाविक गति है उनकी, यह जीव मरण करके जन्म ले तो पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण, पश्चिम से पूर्व, दक्षिण से उत्तर, नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे—यों 6 प्रकार की गतियों से गमन करता है। प्रभु की एक दृष्टि से गति भी न समझिये। एक ही समय में शीघ्र ही सीध में ऊपर जाकर लोक के शिखर पर विराजमान हो जाते हैं। अरहंत प्रभु के ध्यान-ध्याता-ध्येय का विकल्प नहीं है। अब ये सिद्धक्षेत्र के अभिमुख हैं। इनके कोई प्रयोजन नहीं, अपने स्वरूप में अविचल स्थित रहते हैं, ये अरहंत प्रभु परम शुक्लध्यान के प्रताप से ज्यों ही आयुकर्म का क्षय करते हैं त्यों ही वेदनीय नाम गोत्र आदि का भी विनाश होता है। यों चार घातिया कर्मों का नाश होने पर शरीर सहित परमात्मा होते हैं और चार अघातिया कर्मों का भी नाश हो जाय तो सिद्ध भगवान होते हैं। सिद्धस्वरूप का अभिवंदन—सिद्ध भगवान का अर्थ है केवल आत्मा रह जाना। जहाँ न धर्म का संबंध है, न शरीर का संबंध है, केवल ज्ञानानंदपुंज है। शुद्ध निश्चयनय से यह भगवान अपने ही सहज महिमा में लीन हैं, पर व्यवहारदृष्टि से इनका सिद्ध लोक में जाना कहते हैं। संसारी जीव 6 दिशावों में गमन करते हैं मरने पर, किंतु सिद्ध ऊर्ध्वगामी ही होते हैं। भगवान ऊपर ही विराजमान रहते हैं, लोग जब भगवान का नाम लेते हैं तो जमीन में आँखे गड़ाते हुए नाम नहीं लेते हैं, प्रकृति से ऊपर ही आँखें उठाकर हाथ जोड़कर नाम लेते हैं। यह लोगों की प्रकृति भी सिद्ध करती है कि प्रभु का निवास लोक के शिखर पर है। बंध का विनाश होने से जिनके अनंत महिमा प्रकट हुई है ऐसे सिद्ध भगवान अब देव और मनुष्यों के प्रत्यक्ष स्तवन से भी परे हो गये हैं। अब उनकी एक परोक्षभक्ति ही रह गयी है। जैसे वे अपने शुद्धस्वरूप में विराजमान है, सर्वज्ञ सर्वदर्शी अनंत आनंदमय हैं ऐसे ही वे सदाकाल रहेंगे। अब इनका संसार में भ्रमण न होगा। ऐसे सिद्ध प्रभु को मैं अपनी विभाव प्रकृतियों के क्षय के हेतु, अपनी रागादिक बाधावों के विनाश के हेतु वंदन करता हूँ। उपासनीय तत्त्व के दर्शन का पुरुषार्थ—हम आपको उपासना करने योग्य दो ही तत्त्व हैं। एक तो प्रभु का स्वरूप जो सच्चिदानंदमय है और एक आत्मा का स्वभाव जो सच्चिदानंदमय है। केवल ज्ञानभाव का चिंतन, स्वभाव का मनन हम आपमें निर्मलता को बढ़ाने वाला है; इस कारण अनेक यत्न करके हम ज्ञानस्वरूप की भावना को प्राप्त करें। कुछ भी करना पड़े, बाहर के कामों को महत्त्व न दें, उनसे अपना हित और अपनी महिमा न आँकें। ये सब स्वप्नवत् दृश्य हैं, एक अपना ज्ञान बढ़े, अपने में निर्मलता जगे, ऐसा भावपुरुषार्थ अपना बनाना चाहिए।



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