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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 109

From जैनकोष



जीवा संसारत्था णिव्वादा चेदणप्पगा दुविहा ।

उवओगलक्खणा वि य देहादेहप्यवीचारा ।।109।।

जीवप्रकार―9 पदार्थों का नाम और संक्षिप्त स्वरूप बताकर अब उनमें से जीव नामक पदार्थ के व्याख्यान का विस्तार करते हैं । उस प्रसंग में इस गाथा में जीव के स्वरूप का वर्णन है । जीव 2 प्रकार के होते हैं―एक संसारी और दूसरे निर्वृत्त । ये दोनों ही जीव चेतनात्मक होते हैं । इनका लक्षण उपयोग है । और इनमें एक तो देह प्रवीचार है अर्थात् देह सहित है और दूसरा अदेह है । संसारी तो सदेह है और मुक्त जीव देहरहित हैं । जो संसारी जीव हैं वे अशुद्ध हैं और जो मुक्त जीव हैं वे शुद्ध हैं । चेतने का स्वभाव इन दोनों में एक समान है ।समस्त जीवपदार्थ स्वरूपदृष्टि में निर्माण में सब चैतन्यस्वरूप हैं, और वह चेतना परिणमनरूप उपयोग से परीक्षा के योग्य है । उनका लक्ष्य उस चैतन्यस्वभाव की दृष्टि से ही होता है । जिसमें चैतन्यस्वभाव का सद्भाव है उसे जीव कहते हैं ।

उपाधिभेद से जीवभेदप्ररूपण―सब जीवों का सहज सत्व एक ही प्रकार का है । किंतु उपाधि के संबंध से और उपाधि के वियोग से प्रथम तो ये दो भेद हुए हैं―संसारी और मुक्त । संसारी जीवों में उपाधियों की विभिन्नता के कारण नाना भेद हो जाते हैं । इससे जो संसारीजीव हैं वे देह सहित हैं, देह का उनके भोग लगा है अर्थात् वे शरीर को भोगते हैं । अपने ही शरीर को भोगते हैं, और जो मुक्त जीव हैं वे इस देह के प्रवीचार से रहित हैं अर्थात् देह का उनके संबंध नहीं है । इस प्रकार ये जीव दो भागों में विभक्त हैं । सिद्ध हैं मुक्त जीव और यहाँ हैं संसारी जीव । अरहंत भगवान जीवन्मुक्त कहलाते हैं । प्राणों से जीवित होने पर भी वे चार अघातिया कर्मों से मुक्त हैं अर्थात् अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतसुख, अनंतशक्ति रूप चतुष्टय से संपन्न हैं वे जीवन्मुक्त कहलाते हैं, मुक्त ही होने वाले हैं ।

मोक्ष में आनंद―मोक्ष अवस्था में कैसा आनंद होता है, कैसी निराकुलता होती है, वह अपने आपको केवल ज्ञानस्वरूप अनुभव करने के उपाय से कुछ विदित होता है । बाहरी दृष्टि बनाकर या ऊपर से सिद्ध भगवान हैं ऐसा निरखकर भगवान के आनंद का ज्ञान का पता नहीं पाड़ा जा सकता । अपने आप में ही कुछ प्रयोग बनाने पर भगवान के ज्ञान और आनंद का पता पाड़ा जा सकता है । ऐसी बात हुआ करती है । इसका कारण यह है कि जो भगवान का स्वरूप है वही अपने में स्वभाव है । अपने आपके स्वभाव का दर्शन करने से भगवान के उस व्यक्तस्वरूप के विकास का परिज्ञान होता है ।

अंतस्तत्त्व के उपलंभ की उत्सुकता―हम लोग यद्यपि संसारी जीव हैं पर उपादेयता के रूप से हमें अपने आप में इन सब पर्दों को फोड़कर अंतरंग में शुद्ध चैतन्यस्वभावमात्र अनुभव करना है, ऐसी विकट स्थिति में भी जहाँ शरीर का, कर्म का बंधन है, विभावों का मलमा ऊपर छाया है, ऐसी कठिन परिस्थिति में भी यह उपयोग इन सबको पार करके अपने अंतः शाश्वत चैतन्यशक्ति का दर्शन कर सकता है । जैसे कि हड्डी का फोटो लेने वाला कैमरा खून, मांस-मज्जा सबको पार करके, इन्हें न ग्रहण करके केवल हड्डी का फोटो ले लेता है, ऐसे ही यह उपयोग इस शरीर को विभावों को पार करके अपने आपके अंतरंग में विराजमान जो एक शुद्ध चैतन्यस्वभाव है उस चैतन्यस्वभाव का स्पर्श कर सकता है और इस समय की अनुभूति के प्रसाद से फिर विदित होता है कि मुक्त जीवों के कितना सुख है? तब कर्तव्य यह है कि हम अपनी दृष्टि, अपना लक्ष्य, अपना यत्न आपके सहजस्वरूप पर रखने का अधिकाधिक करें ।


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