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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 110

From जैनकोष



पुढवी य उदगमगणी वाउवणप्फदिजीवसंसिदा काया ।

देंति खलु मोहवहुलं फासं वहुगा वि ते तेसिं ।।110।।

पंच स्थावरों का वर्णन―पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय और वनस्पति-काय-ये 5 काय जीव से सहित हैं । ये 5 काय स्थावरों के कहे गए हैं जिनके केवल एक ही स्पर्शनइंद्रिय है, मात्र शरीर ही शरीर है । रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र ये भी प्रकट नहीं हैं । जो अंगोपांग से रहित हैं वे स्थावर जीव कहलाते हैं । ये यद्यपि अनेक आवांतर भेद से भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं सो भी ये निश्चय से उन जीवों को मोह गर्भित परविषयक रागभाव उत्पन्न करते हैं और स्पर्शनइंद्रिय के विषयों को देते हैं अर्थात् ये जीव भी स्पर्शनइंद्रिय के द्वारा अपने स्पर्श विषय को भोगते हैं । जैसे पेड़ जड़ों के द्वारा अनेक खाद्य और पेय पदार्थों को ग्रहण करते हैं और उसे शरीररूप कर डालते हैं, ये सब काय पुद्गल के परिणाम हैं जीव के द्वारा ग्रहण किए गए हैं ।

स्पर्शनेंद्रियज्ञान की समानता―आवांतर जाति भेदों से ये एकेंद्रिय जीव यद्यपि बहुत प्रकार के हैं तो भी इन सबका काम एक ही प्रकार का है । पृथ्वी में रत्न, हीरा, सोना, चांदी, लोहा, तांबा, मुरमुर, मिट्टी कितनी ही जातियाँ हैं, वे सब जातियां भी केवल एक स्पर्शनइंद्रिय के विषय को भोगती हैं । जो उनमें मिट्टी पानी आदि का आहार है उसका ग्रहण करते हैं और वे भी स्पर्शन इंद्रिय का सुख भोगते रहते हैं । उन एकेंद्रिय जीवों को कहाँ सुख है? वह सुख उनका उनके ही द्वारा गम्य है । अब क्या बतायें, लेकिन बाहर में जब कुछ यह दिखा करता हे कि यह पेडू खूब हरा-भरा अपनी जोश जवानी पर है, बड़ा पुष्ट है तो उससे अनुमान करते हैं कि यह भी खुश है, सुखी है । कोई पेड़ सूखता नजर आये तो उससे उसको दुःखी अनुभव करते हैं ।

पृथ्वीकाय―एकेंद्रियों के स्पर्शन इंद्रियावरण का क्षयोपशम है जिससे वे स्पर्शन इंद्रिय के द्वारा मात्र वे ज्ञान कर पाते हैं । स्पर्शनइंद्रिय संबंधी ज्ञान ही उनके कहा है । उनके अंगोपांग नहीं हैं इस कारण किसी को ये बाधा नहीं करते । कोई आदमी वृक्ष को काटे तो वृक्ष उसे रोक नहीं सकता है । जैसे के तैसे खड़े रहते हैं । तब सोच लीजिए कितनी निम्न स्थिति है । कितनी पराधीनता है? कोई पेड़ कट रहा है तो वह पेड़ उसका प्रतिरोध नहीं करता । चाहे जो पेड़ को काटे, उखाड़ फैंके, कुछ भी करे, पर वे पेड़ मना नहीं करते । पृथ्वी है, उसे लोग खोदते हैं और पत्थरों में जिनमें जान है छेद करके सुरंग डाल देते हैं, ऐसी कठिन-कठिन बातें इस पृथ्वी पर गुजरती हैं, पर यह पृथ्वी जीव किससे क्या कहे? उसको दुःख सहना पड़ता है ।

जलकाय―जलकाय का जीव है, जल है, उसे लोग गर्म कर दें, उबाल दें, आग पर डाल दें, जैसी चाहे स्थितियां कर दे । जल बेचारा क्या करे? कभी यह जल बाढ़ के रूप में आकर गाँवों को बहा देता है तो वह जल प्रतिरोध नहीं कर रहा है । वह जान करके लोगों को नहीं बहा पा रहा है । वह तो एक निम्न गमन स्वभाव वाला है । जहाँ नीचा स्थान पाये वहाँ वह जाय, ऐसे स्वभाव वाला है यह जल । वह और कुछ नहीं कर पाता । अनेक प्रकार के क्लेश भोगता रहता है । यह एक इंद्रिय जीव । ये ज्ञानहीन होते हैं । अंधकार में पड़े हुए जीव सम्यग्दृष्टि हो ही नहीं सकते । मिथ्यात्व के सिवाय अन्य कोई गुणस्थान भी उनके नहीं है । पूर्वजन्म में यह जीव पंचेंद्रिय हुआ और द्वितीय गुणस्थान में उसका मरण हुआ तो थोड़े समय को पूर्वभव के लगार से द्वितीय गुणस्थान हो जाता है । यह भी किन्हीं आचार्यों ने माना है और किन्हीं ने नहीं माना है । एक दृष्टि में तो अपर्याप्त में भी एकेंद्रिय के द्वितीय गुणस्थान नहीं है, एक दृष्टि में द्वितीय गुणस्थान का पूर्व संबंध कारण है । कैसी निम्न स्थिति है?

अग्निकाय और वायुकाय―अग्नि को रोक दे, उस पर पानी डाल दे, खूथ दे, कितनी ही प्रकार की स्थिति बनाकर यह अग्नि ताड़ित की जाती है । हवा की बात देखो―साइकिल के पहियों में, मोटर के पहियों में भर दी जाती है । महीनों तक वह हवा उन पहियों में भरी रहती है, हजारों मील दौड़ती है, न जाने हवा पर क्या-क्या स्थितियां गुजर जाती हैं? बिजली के पंखे चला देने से न जाने कितने वायुकायिक जीवों की हिंसा होती है? इतनी बात जरूर है कि गृहस्थ वहाँ निष्प्रयोजन स्थावर जीवों का घात नहीं करते, त्रस जीवों का घात नहीं करते, पर वायुकायिक जीवों की जो हिंसा होती है वह तो होती ही है । वनस्पतिकायिक जीवों की बात देखो । कितना-कितना उनको छेदा भेदा जाता । उनपर नमक डाला जाता, आग में पका लिया जाता । कितने-कितने क्लेश ये वनस्पतिकायक जीव भोगते रहते हैं?

एकेंद्रिय के क्लेशों का स्मरण―ये सब क्लेश हम आपने भी भोगे हैं एकेंद्रिय होकर, पर जैसे हम आपको गर्भ के दुःख की भी आज खबर नहीं है, किस तरह से माँ के पेट में रहकर दुःख सहे, इसकी भी खबर नहीं है किस तरह से उस पेट के अंदर पड़े रहे, कैसी क्या स्थिति रही, इसकी ही खबर नहीं है तो पूर्वभव की बातों का क्या ख्याल रहे और तो जाने दो जब हम आप 6 महीना के थे तब की भी तो हम आपको कुछ खबर नहीं है । और 6 महीने की तो बात क्या, साल दो साल की उमर की भी बातें कुछ याद नहीं हैं, हमें कुछ ख्याल नहीं है । इस कारण हम जानते हैं कि आप सबको भी ख्याल न होगा । तो जब इस ही जीवन की बातों का ख्याल नहीं है तो फिर पूर्वभव की बातों का तो ख्याल ही कैसे हो सकता है । एकेंद्रिय जीवों की पर्यायों में रहकर हम आपने कैसे-कैसे क्लेश पाये थे, इसकी कुछ आज खबर है क्या?

क्लेशोपभोग का अनुमान―हम आप सभी आगम के बल से जानते हैं और दूसरे एकेंद्रिय जीवों की हालत को यहाँ देख रहे हैं । साथ यह भी समझ रहे हैं कि ये भी जीव हैं, हम भी जीव हैं । हम लोगों ने भी ऐसे-ऐसे शरीर पाये होंगे । ऐसा अनुमान करके हम आप सब जान जाते हैं, पर खबर कुछ नहीं है । इतने लंबे समय की भी बात जाने दो । जब जाड़े के दिन आते हैं तो 4-5 महीना पहिले जो गर्मी से वेदना हुई थी उस वेदना की भी खबर नहीं रहती है । यह तो एक ही साल के अंदर की बात है । और बातें तो जाने दो । जिन दिनों में खूब तेज लू चलती है, घरों में प्रवेश कर जाती है; खूब प्रचंड गर्मी पड़ती है गर्मी सही नहीं जाती है उस गर्मी में ठंड के दुःखों की खबर नहीं रहती है, हालांकि यह एक साल के अंदर की ही बात है, जब इसका ख्याल नहीं रहता तो भव-भवांतरो में हमने क्या क्लेश पाये, उनका आज हम अनुमान अनुभव नहीं कर पाते हैं । लेकिन जो दूसरे जीव हैं वे सब भी मेरे ही समान तो हैं । तो जो स्थिति उनकी हो सकती है वह स्थिति क्या मेरी नहीं हो सकती है? ऐसे-ऐसे कठिन भोग एकेंद्रिय अवस्था में रहकर जीव ने भोगे ।

एकेंद्रिय, द्वींद्रिय व त्रींद्रियों के ज्ञान―उन एकेंद्रिय जीवों के कर्मफल चेतना प्रधान है । उनके केवल स्पर्शनइंद्रियावरण का क्षयोपशम है जिसके कारण केवल एक बहि-रंग स्पर्शनइंद्रिय ही प्रकट होती है । कुछ वहाँ भी देखने से यों लगता है कि इन पेड़ पौधों की अपेक्षा ये जो रेंगने वाले गेडुवा हैं इनमें कुछ जान कुछ ज्ञान ज्यादा सा दिखता है ।और इन रेंगने वाले गेडुवों की अपेक्षा ठुकुर मुकुर चलने वाली इन गिजाइयों के, इन कीड़ों के कुछ और ज्यादा जान, ज्ञान दिखता है । कोई-कोई कीड़े तो बड़े ही सुंदर रंग के होते हैं ।जैसे किसी कीड़ा को महादेव का पाट कहते हैं । रेशम की तरह लाल और कोमल और वह भी ठुकुर मुकुर चलता है तो ऐसा लगता है कि उन गेडुवों की अपेक्षा इन तीन इंद्रिय जीवों में जान अधिक है, ज्ञान विशेष है ।

नेत्रवाले जीवों का ज्ञान―कीड़ों की अपेक्षा खूब मनमाने उड़ने वाले भंवरा ततैया इनमें कुछ और विशेष ज्ञान मालूम होता है । आखिर इनमें आँखें तो और बढ़ गईं । केवल आंखें हो जाने से बिना आंखों वाले जीवों की अपेक्षा तो एकदम अधिक अंतर वाला बढ़ा हुआ विकास हो जाता है । अभी आप अंदाज कर लो, आँखों में पट्टी न बाँधी जाय और वहाँ कोई प्रकार का ज्ञान करें, यहाँ यह रक्खा है, यह फलानी चीज है, यह फलां चीज खायी, यह इतर सूंघा, यों और-और प्रकार का ज्ञान करे एक तो वह स्थिति और एक आँखों को पट्टी बांध दी जाय, बिना आँखों के देखे हुए ज्ञान करे, यह स्थिति हो तो इन दोनों स्थितियों में अस्पष्टता और स्पष्टता का कितना अंतर है? तो उन तीन इंद्रिय जीवों की अपेक्षा इन उड़ने वाले चार-इंद्रिय जीवों में जान विशेष मालूम होता है । फिर पंचेंद्रिय और मन वाले इन जीवों के उत्तरोत्तर ज्ञानविशेष मालूम होता है ।

एकेंद्रिय जीवों की परिस्थिति―तो इन एकेंद्रिय जीवों के ज्ञान तो सबसे न्यून विदित होता है । ये कर्मफलचेतना प्रधान हैं । दो इंद्रिय के कर्मफल चेतना होने लगी । विक्रिया करते हैं, छुपते हैं, घर बना लेते हैं, आहार खोजते हैं, यहाँ न मिले तो दूसरी जगह मिले । लेकिन ये स्थावर जीव क्या करें? कैसी दयनीय स्थिति है, और कोई यह सोचे कि भाई दुःख तो हम मनुष्यों को अधिक हैं, इन्हें क्या दुःख हैं तो ये मनुष्य भले ही ऐसी कल्पनाएँ करें, क्योंकि इन्होंने अपने सूख के लिए विषयों का विस्तार बढ़ाया है, इनके कल्पनाएँ जगती हैं इस कारण ऐसे भले ही वे अपनी कल्पना में बात लायें लेकिन दुःख तो इन एकेंद्रिय को हम आप से भी विशेष अधिक है, ये बड़े अंधेरे में हैं । इनके भी मोह तीव्र है, पर उस मोह के प्रकट करने का साधनभूत कोई अंगोपांग नहीं हैं । वे स्पर्श विषय के उपलभ्य को उत्पन्न करते रहते हैं, स्पर्शविषयक का सुख भोगते रहते हैं । सुख क्या है, दुःख ही है, लेकिन स्पर्श विषयका वे उपभोग 'करते हैं । यों संसारी जीवों के वर्णन के प्रकरण में सर्वप्रथम 5 प्रकार के स्थावर जीवों का इसमें वर्णन किया है ।


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