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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 12

From जैनकोष



पज्जयविजुदं दव्वं दव्वविजुत्ता य पज्जया णत्थि।

दोण्हं अणण्णभूदं भावं समणा परूविति।।12।।

विस्तृत परिचय से प्रायोजनिक परिचय में स्पष्टता―पदार्थों के स्वरूप की कथनी चल रही है। हम आपको जो संसर्ग मिलता है उस संसर्ग में कभी सुख मानते, कभी दुःख मानते। सो संसर्ग सुख नहीं दे रहा, दुःख नहीं दे रहा, किंतु अपने आपके जो ज्ञान विकल्प हो रहे हैं वस्तुस्वरूप के विपरीत, उनसे सुख और दुःख होता है, यह कैसे समझ में आये? इसके लिए, पदार्थों के स्वरूप का वर्णन किया गया है। बात तो थोड़ी ही है, मगर जानना पड़ेगा बहुत, तब वह थोड़ी जानकारी बनेगी। कोई कहे कि भेदविज्ञान करना है, जीव अलग है, शरीर अलग है, कुटुंब के लोग अलग हैं, मैं अलग हूँ, इतना जान ले तो बेड़ा पार हो जायगा। बात तो ठीक कह रहे, मगर इतनी जानकारी बनाने के लिए बहुत जानना होगा तब इतनी जानकारी बन पयेगी सही तरीके से । एक सेठ के यहाँ एक मुनीम था और कई पल्लेदार थे। तो मानो मुनीम को तो मिलते थे 100) रु0 माहवार तनख्वाह के और मजदूरों को कोई 30-30 रुपये माहवार मिलते थे। तो एक बार वे मजदूर सेठजी से बोले कि सेठजी आप तो हम लोगों के साथ बड़ा अन्याय कर रहे हैं। कैसे? देखिये―मुनीम जो बैठे-बैठे सिर्फ कलम चलाता रहता है, उसे तो आप 100) रु0 माहवार वेतन देते हैं और हम लोग जो रात-दिन बड़ा बोझ ढोते हैं उन्हें सिर्फ 30) रु0 माहवार देते हैं, तो ऐसा क्यों? तो सेठ ने वहाँ सोचा कि इनको इस तरह से समझाने से समाधान न मिलेगा, कोई प्रयोगात्मक घटना बने तब इनको समाधान मिल पायगा। आखिर कुछ ही दिन बाद एक घटना घटी। क्या, कि सड़क पर कोई बारात खूब सज-धजकर जा रही थी तो वहाँ सेठ ने एक पल्लेदार को भेजा कि जावो जानकारी करके आवो कि सड़क पर क्या चीज जा रही है, तो पल्लेदार सड़क पर पहुंचा और पूछकर जान लिया कि बारात जा रही है तो झट वापिस आया और सेठजी से बताया कि बारात जा रही है, और कुछ विशेष विवरण वह न दे सका । उसके बाद मुनीम को भेजा उसी जानकारी के लिए। मुनीम पहुंचा सड़क पर, सब प्रकार की जानकारी कर लिया कि बारात कहां से आ रही है, कहाँ जा रही है, किसके यहाँ से आ रही है, किसके यहाँ जा रही है, कितने बजे फेरे पड़ेंगे, किस सवारी से आ रहे हैं आदि, और आकर सेठजी से सारा हाल कह सुनाया। तो सेठ ने सभी पल्लेदारों को बुलाकर समझाया कि देखो तुम लोगों में और मुनीम में इस बात का अंतर है कि शब्द तो हमने उतने ही दोनों से कहे कि जावो जानकारी करके आवो कि सड़क पर क्या जा रहा है, तो पल्लेदार ने तो सिर्फ इतना ही बताया कि बारात जा रही है और मुनीम ने सारी बात पूरे विवरण के साथ बताई, तो तुम दोनों में बुद्धि का अंतर है। इस कारण तुम्हारी तनख्वाह में भिन्नता है। तो एक भेदविज्ञान करो, इतनी सी बात कह दिया कि द्रव्य भिन्न है, कोई किसी का कर्ता नहीं है, सब अपने-अपने में परिणमते हैं, बस ये बातें जरा करने लगे। दो-तीन दिन की कुल पढ़ाई है, भेदविज्ञान की बात करने के लिए। कौनसे शब्द हैं उन्हें रट लिया और बोलने लगे तो इतने से भेदविज्ञान स्पष्ट आ पाया क्या समझ में? उसके लिए पदार्थों का स्वरूप विस्तारपूर्वक जानना होगा तब इतनी बात समझ में आयगी कि प्रत्येक पदार्थ एक दूसरे से अत्यंत भिन्न है। अभी किसी का झगड़ा घर में ही हो रहा हो भाई-भाई में या पड़ोसी में हो रहा हो और कोई कहे कि देखना, क्या बात है? तो एक व्यक्ति पहुंचा तो वह यह जानकारी करके आया कि भाई-भाई में लड़ाई हो रही है, और कुछ न बता सका, और दूसरा व्यक्ति पहुंचा तो वह सब जानकारी कर आया कि भाई-भाई में लड़ाई हो रही है, किस बात की लड़ाई है, कौन अन्याय कर रहा है, किसका पक्ष सही है आदि। तो इसी तरह समझो कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य से अत्यंत भिन्न है। मैं आत्मा शरीर के अणु-अणु से अत्यंत भिन्न हूँ । मैं आत्मा अपने आपके सहजचैतन्यस्वरूप में हूँ, यह बात कब समझ में आयगी जब तक कि पदार्थ के स्वरूप का विस्तार के साथ परिचय पाये।

सयुक्तिक विस्तृत परिचय और वैराग्यभाव में भेदविज्ञान का सही परिचय―विस्तार से वर्णन भी सुन लिया, समझ लिया, इतने पर भी वैराग्य परिणति हो तो समझ में आयगा कि एक द्रव्य दूसरे द्रव्य से अत्यंत भिन्न है। यह समझ किस प्रकार होती है? तो उसके लिए प्रथमानुयोग का स्वाध्याय करें, करणानुयोग का स्वाध्याय करें, करणानुयोग से जब लोक का, काल का बहुत वर्णन मनन में आये, ऊँची-ऊँची बातें कर्मों की सब मनन में आयें तो कई वजह हैं, ऐसी कि जिन कारणों से इसके वैराग्य बढ़ता है, आचार्यों के प्रति भक्ति बढ़ती है, वे जो कह रहे सो सही है ऐसा भान होता है, ये सब बातें वैराग्य की मजबूत करने वाली हैं। प्रथमानुयोग में बड़े पुरुषों का चरित्र समझें, उसके अनुसार अपनी बुद्धि बने, अपने में वैराग्य भाव बढ़े तब कहियेगा कि इसने भेदविज्ञान को अब समझा। अब समझ लो कितना पौरुष चाहिए कि हम आपके भेद विज्ञान बने, उसी सिलसिले में यह पदार्थों के स्वरूप के विस्तार की चर्चा चल रही है। कोई भी काम हो, जी जान लगाकर करें तब उसमें सफलता मिलती है। इतना तो समझ ही रहे ना। आप दूकान करते हैं तो खूब उपयोग लगाकर, मेहनत करके, कष्ट उठाकर सब तरह के व्यवहार बनाकर चलना होता है, उसके लिए साहस है, उसके लिए संकल्प है, और मोक्ष का काम कितना महान है, कितना महत्त्वपूर्ण है कि हो जाय तो सदा के लिए संकट मिटे। तो मोक्ष क्या है? अपने आपका जो विविक्त सहज चैतन्यस्वरूप है वह यथावत रह जाय, यही तो मोक्ष है। यह पाया जिन्होंने उन्हें अनंतआनंद, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतशक्ति प्राप्त होती है, और मोक्षमार्ग के पाने के प्रसंग में इतना महत्त्वपूर्ण कार्य है कि इसके लिए तन लगे, मन लगे, धन लगे, वचन लगें, प्राण लगें, सब कुछ लगने पर भी यदि ज्ञान में अपने आपके सहजज्ञानस्वरूप का अनुभव बने तो बस बेड़ा पार है, ये सब बातें पदार्थों के स्वरूप की जानकारी में मिलेंगी।

पदार्थों की अखंडद्रव्यपर्यायमयता―सत् में द्रव्य और पर्याय, दो बातें तो माननी पड़ेगी ही। चीज है, सदाकाल रहती है, अच्छा यह बात तो मान ली, पर उसकी अवस्थायें भी बनती रहती हैं। पर्यायें बनती रहती हैं, यह भी बात है कि नहीं। इसी बात को इस गाथा में स्पष्ट किया है कि पर्याय से रहित द्रव्य नहीं, द्रव्य से रहित पर्याय नहीं, इस प्रसंग में एक बात और समझना, बहुत ऊँचे अभेददृष्टि के ख्याल से बढ़कर चले तो एक बार गुणों को तो मना कर सकते हो, गुण नहीं, और मना करके उसके एवज में क्या जाने? स्वभाव। और गुण क्या है कि स्वभाव है वस्तु में अभेददृष्टि से परखा जाने वाला एक अभिन्न लक्षण और गुण है, उसी स्वभाव को समझने के लिए उस स्वभाव के भेददृष्टि से अनेक खंड कर देना। खंड न करना, मत करें द्रव्य है, स्वभाव है उसका। इतना तो मानना ही होगा। इतना माने बिना तो आगे न बढ़ सकेंगे और साथ ही यह भी मानना पड़ेगा कि प्रत्येक समय में द्रव्य की कोई न कोई अवस्था रहती है, उसका नाम है पर्याय। अब इस पर्याय को कोई विशेष न जाने तो परिणमन है सामान्य परिणमन, इतना तो मानना ही होगा और जो एक परिणमन है वह अवक्तव्य परिणमन है, जिस दृष्टि में गुणों को स्वीकार नहीं किया। हमें न चाहिए भेद दर्शन, हम अभेददृष्टि से चलकर अपने में परखेंगे, पर का द्रव्य अभेद है, अवक्तव्य है, अखंड है, हाँ ठीक समझ गए, पर पर्याय बिना नहीं है कुछ। वह पर्याय भी अवक्तव्य अखंड अभेद, यों निरखा जायगा। पर्याय में विशेष तब निरखा जायगा जब गुण मानकर चले। यह अमुक पर्याय है, यह अमुक पर्याय है, यह बात तब कह सकेंगे जब गुण मानकर चलें। हम गुण नहीं मान रहे, हमारी दृष्टि अभेद है, इस द्रव्य और स्वभाव को समझ रहे हैं अखंड अवक्तव्य। तो पर्याय को अखंड अवक्तव्य मानना होगा हर समय। प्रतिसमय वस्तु में प्रत्येक अखंड है, अवक्तव्य है। अगर कुछ बताया जा रहा है तो पूरी बात नहीं कही जा रही, अंश कहा जा रहा। जीव की इस समय भीतर में क्या अवस्था बन रही? उसका पूरा विवरण आप दे सकेंगे क्या? नहीं दे सकते। वह अवक्तव्य है, अखंड है याने तिर्यक् खंड भी नहीं है, और जब यह कहते कि वाह क्रोध है, मान है, लोभ है, शांति, समाधि, ज्ञान दृष्टि लगन ये सब हो रहे हैं, तो इनमें से कोई भी आप एक बात कहें वर्तमान अवस्था की, उसमें से एक अंश ही तो आपने बताया। तो इतना तो मानना ही पड़ेगा―द्रव्य और पर्याय, गुण को छोड़ दो, उसकी चर्चा न करें, पर अखंड कोई वस्तु है शाश्वत और उसका प्रतिसमय परिणमन है, वह परिणमन अभेद है, अखंड है, इन्हीं दो की चर्चा चल रही है कि पदार्थ द्रव्यपर्यायात्मक है। द्रव्य से रहित पर्याय कुछ होती ही नहीं, पर्याय से रहित द्रव्य कुछ होता ही नहीं।

दृष्टांतपूर्वक द्रव्य व पर्याय की अविनाभाविता का निरीक्षण―दृष्टांत लो गोरस, मायने गाय का जो निकला हुआ दूध है वही दही बन गया, घी बन गया, मावा बन गया, छेना बन गया, जो-जो भी बना, यह बताओ कि उन सब अवस्थाओं में गोरस होता कि नहीं? आप घी दिखाओ, दही लावो, लेकिन गोरस न होना चाहिए। तो क्या आप ला सकेंगे? न ला सकेंगे, क्योंकि गोरस तो उन सब अवस्थाओं से व्यापक है। दूध है तो गोरस, दही बना तो गोरस, मट्ठा बना तो गोरस, गोरस बिना इनमें से कुछ भी नहीं है। न दूध मिलेगा, न दही। तो गोरस से रहित दूध दही कहीं मिलेगा क्या? न मिलेगा। और दूध, दही, घी, छाछ, छेना, मावा आदिक इनके बिना गोरस आपको कहीं दिखेगा क्या? न दिखेगा। आप सोना चांदी में यह घटना ले लो। स्वर्ण द्रव्य के बिना डला, बिस्कुट, अंगूठी, करधनी आदिक सारी पर्यायों के नाम ले लो। ये सब मिलेंगे क्या? न मिलेंगे। और इन सबके बिना स्वर्ण मिलेगा क्या? कोई कहे कि देखो न तो पिंड लाना, न कोई आभूषण लाना, सिर्फ सोना लाना, तो वह ला सकेगा क्या? नहीं ला सकता। स्वर्ण द्रव्य बिना ये अलंकार आदिक नहीं और अलंकार आदिक के बिना स्वर्ण द्रव्य नहीं है। स्वर्ण द्रव्य हो तो कोई न कोई अवस्था में होगा। है अवस्था जरूर तो कोई वस्तु की ही तो अवस्था है। इस प्रकार द्रव्य बिना पर्याय नहीं, पर्याय बिना द्रव्य नहीं। ये दोनों ऐसे अनन्यभूत हैं।

वस्तुस्वरूप के परिचय से भेदविज्ञानी की शिक्षा―बात क्या समझनी है कि जो भी वस्तु है वह द्रव्यपर्यायरूप है। सो अपने द्रव्यपर्यायरूप है। मुझ में उसका कुछ नहीं, मैं जो हूँ सो अपने द्रव्यपर्यायरूप हूँ । मेरा अन्य में कुछ नहीं। अब तत्त्व ज्ञान बने और वैराग्य की बढ़वारी बने ये दो ही इस जीव के रक्षक हैं। ये दो बातें न हों तो जीव की कहीं रक्षा नहीं है। झगड़ा-फसाद, लड़ाई आपत्तियां ये नारकीय लीला जहाँ भी हो, जिस घर में हो, जो करने वाला हो, उसका आधार क्या है? वस्तुस्वरूप का ज्ञान नहीं। स्वपर का भान नहीं, सो यह सब गड़बड़ी चल रही। निज को निज पर को पर जान, यह बात नहीं है वहाँ विसम्वाद है। तो सर्व पदार्थ पृथक्-पृथक् है, यह बात कब स्पष्ट झलकी? जब द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव गुण पर्याय सब नजरों से यह ज्ञान होगा कि प्रत्येक वस्तु अपने आपके स्वक्षेत्र में है और उसमें ही उसकी सारी फैक्टरी है, उससे बाहर मेरा कुछ नहीं है। वस्तु के सहज स्वातंत्र्य के ज्ञाता को मिलेगा तत्त्वज्ञान।

निर्वाध हितयात्रा का साधन प्रभुशासनप्रदीप―देखो इस जीवन में क्लेश के गड्ढे बहुत खुदे हैं, एक यात्रा हो रही है अपनी याने समय गुजर रहा और समय-समय में हम पग बढ़ा रहे हैं, परिणमन तो हो ही रहा ना, यही है हमारी यात्रा। इस यात्रा के पथ में जगह-जगह गहरे-गहरे क्लेशों के गड्ढे खुदे हुए हैं। एक तो यह आपत्ति, दूसरे अज्ञान पाप का अंधकार फैला हुआ है। अब लौकिक उदाहरण ले लो कि आपको कहीं बाहर जाना है और अंधेरी रात है, और जिस मार्ग से जाना है उसमें बड़े-बड़े गड्ढे जगह-जगह खुदे हैं, जाना तो आपको पड़ेगा, ऐसी मजबूरी में तो अच्छी तरह आप जा सकें, इसके लिए आप लोगों को कोई उपाय समझ में आया कि नहीं? आप जा सकते हैं किस उपाय से? हाथ में दीपक ले लो, बस बेधड़क चले जावोगे। एक ही तो उपाय है, अगर कठिन उपाय हो तो चिंता करो, क्यों चिंता करते, एक ही सीधी बात है―हाथ में दीपक लो और पार कर जावो उस रास्ते को। इसी तरह हम आपके इस जीवन पथ में बड़े-बड़े कष्ट के गड्ढे खुदे हैं। वस्तुत: अब भी कष्ट की कोई बात भी है क्या? अच्छी तरह बैठे हैं, स्वस्थ भी हैं, सारी बात है, मन में कल्पना जगी तो कष्ट हो गया। कोई छोटा बच्चा है, आपके पास बैठा है, आप उसे अपनी गोद में बैठाये हैं, उसे चिपटाये भी हैं, कोई चीज वह बच्चा मांगे तो आप उसे देने को तैयार हैं, खाना माँगे तो खाना तैयार है खिलौना माँगे तो खिलौना तैयार है। खेल भी रहा है, अब उस बच्चे के मन में आ जाय कि घर जाना है और आप नहीं उसे घर लिए जा रहे तो वह बच्चा बड़ा कष्ट मानता है, रोता है। बताओ उसे किस बात का कष्ट है? कोई उसे मारपीट नहीं रहा, कोई कुछ कह नहीं रहा फिर उसे कष्ट किस बात का? बस दुःख है उसकी कल्पना का, अज्ञानता का । तो जैसी बात उन बालकों की है, ऐसी ही बात हम आप सबकी है। कोई कष्ट नहीं है, आनंद है। दो रोटियाँ खाने को मिल ही जातीं, तन ढकने को कपड़े मिल ही जाते, सब सुविधा है, सारी बात है, मगर कल्पना जगी तो सब कुछ रहते हुए भी आनंद तो पाया नहीं। कष्ट ही मिला। कल्पना जगी, उसकी और दृष्टि बनी जो कल्पना में आया और वर्तमान में जो सुख-सुविधा साधन हैं उनका सब खातमा हो गया। तो क्लेश के गड्ढे कितने खुदे हैं जीवन पथ में और इसके अतिरिक्त पाप अज्ञान का अंधकार छाया हुआ है, कुछ नहीं सूझता, ऐसी विकट परिस्थिति में आप अपना भविष्य ठीक बना सकते हैं क्या? कोई उपाय है क्या आपके पास? उस लौकिक गमन का तो उपाय मिल गया था, वहाँ तो दीपक आप ले लेंगे, पर बतलाओ इस जीवन पथ में जो क्लेशों के गड्ढे खुदे हैं, अज्ञान और पाप का अंधकार छाया है, कुछ सूझ नहीं रहा है, ऐसी हालत में कोई उपाय है आपके पास क्या कि आपकी यात्रा अच्छी बने और आपको सुख शांति संतोष हो? उसका उपाय यह है कि जिनवाणी रूपी रत्न का दीपक तत्त्वज्ञान आप हाथ में ले लें, पदार्थ का सही-सही बोध उस ज्ञान को लेकर चले तो कहीं आपको कष्ट नहीं। सारे काम आप अच्छी तरह निभा लेंगे।

औपाधिक माया से हटकर परमार्थ सहज चित्प्रकाश में आने की भावना―सकल संकटहारी एक मौलिक ज्ञान की बात चल रही है। भेदविज्ञान कैसे बने? अज्ञानअंधकार से हटकर ज्ञानप्रकाश में कैसे आये? करें प्रार्थना, किससे? भगवान से । किस भगवान से? अंतर्भगवान से । क्या करें? तमसो मा ज्योतिर्गमय, हे अंतर्नाथ ! मुझ को अंधकार से तो दूर करो और ज्योति में ला दो। इस अंतर्नाथ का मायारूप जो परिणाम है वह अंधकार है और सहजस्वभावरूप जो भाव है वह परमप्रकाश है। इस ही प्रभु की माया और इस ही प्रभु का ब्रह्मस्वरूप है। माया से हटाकर इस ब्रह्मस्वरूप में ले जावो। यह कब प्रेरणा मिलेगी? कैसे इस और हमारी गति चलेगी? तत्त्वज्ञान से । वह तत्त्वज्ञान है इस जिनवचन में । पदार्थ के स्वरूप के संबंध में कहा जा रहा है कि जो है वह द्रव्यपर्यायात्मक है। द्रव्य नहीं तो पर्याय नहीं और पर्याय नहीं तो द्रव्य नहीं। ऐसा समस्त पदार्थों का स्वरूप निश्चित हो रहा है ताकि यह स्पष्ट रहे कि प्रत्येक पदार्थ अन्य समस्त प्रत्येक पदार्थों से अत्यंत जुदा है। यह बात तब ही तो मालूम पड़ेगी जब उनका वह गठित स्वरूप हमारी दृष्टि में आये। टोकरी में 10 फल रखे हैं तो आपने 10 फल कैसे जान लिया? प्रत्येक फल का अपना-अपना गठित स्वरूप खुद ही में है, दूसरे में नहीं। तब आपने 10 जान लिया। एक दूसरे से अत्यंत भिन्न हैं तब ही तो बनी समझ। तो ऐसे ही प्रत्येक जीव का, प्रत्येक अणु का, प्रत्येक पदार्थ का द्रव्यपर्यायात्मक स्वरूप है। दृष्टि में हो तो यह ध्यान में जगेगा कि प्रत्येक पदार्थ अन्य समस्त पदार्थों से जुदा है।

पर्यायरहित, द्रव्य को तथा द्रव्य रहित मात्र पर्याय को मानने वालों के सिद्धांत की शोधना―प्रकरण यह चल रहा है कि पर्यायों से रहित द्रव्य नहीं होता और द्रव्य से रहित पर्याय नहीं होती। इस बात को सुनकर यह शंका रख सकते हैं कि क्या कोई ऐसा भी पुरुष हुआ जो यह मानता हो कि पर्याय से रहित द्रव्य है और द्रव्य से रहित पर्याय है? जब कोई इस विचार के लोग हों तब तो यह बात कहना भला है, अन्यथा कहने का क्या अर्थ है? सो यह शंका ठीक है। उत्तर यह है कि हाँ, हैं ऐसे लोग जो पर्याय से रहित द्रव्य मानते हैं और द्रव्य से रहित पर्याय मानते हैं। मायने बात दो हैं ना―तीन काल रहने वाली वस्तु और उसकी अवस्था। हर जगह घटा लो। कोई भी अगर पदार्थ है तो वहाँ दो बातें आप समझेंगे―तीन काल में रहने वाला पदार्थ और उसकी अवस्था। तो कोई दार्शनिक ऐसे हैं कि तीनों काल रहने वाला पदार्थ तो मानते हैं, पर अवस्था नहीं मानते। अवस्था कोई होती ही नहीं। ऐसे कौन लोग हैं? नित्य एकांतवादी, ब्रह्मवादी, जो कहते हैं कि है एक ब्रह्म, पर वह परिणमता नहीं है। परिणमन जो है, यह प्रकृति की चीज है। सांख्य भी यही कहते हैं। तो कुछ दार्शनिक हैं ऐसे कि जो पर्याय रहित द्रव्य मानते हैं और कुछ लोग ऐसे हैं कि जो द्रव्य रहित पर्याय मानते हैं याने तीनकाल में रहने वाली वस्तु कोई नहीं होती। जो कुछ है सो तुरंत पैदा हुआ और तुरंत मिट गया। अब समय-समय में जो-जो बात सामने आयी, बस वह एकदम आ गया। उसका कोई लगार पहले न था, वस्तु ही न थी, वह तो नई वस्तु उत्पन्न हुई है और उत्पन्न होते ही मिट जाती है। ऐसे वे लोग कौन हैं? क्षणिक एकांत वाले। तो ऐसे अभिप्राय के लोग हैं और जो प्रकट नहीं हैं अन्य दार्शनिक रूप में ऐसे जैनधर्म के ही शासन में चलते हों उनका भी कभी-कभी ख्याल हो सकता किसी के, इसलिए कुंदकुंदाचार्य ने गाथा में यह बताया कि पर्यायरहित द्रव्य नहीं होता और द्रव्य रहित पर्याय नहीं होती। तो क्या है? जो है वह द्रव्यपर्यायात्मक है, द्रव्य से पर्याय अनन्यभूत है, अलग नहीं है। वही एक पदार्थ परिणमता हुआ चला जा रहा है अब तक। किसी भी भाषा में समझ लो―इस तरह पर्याय और द्रव्य में भेद नहीं। तो जैसे इस गाथा में बताया कि द्रव्य और पर्याय में भेद नहीं, ऐसे ही अगली गाथा में कह रहे हैं कि द्रव्य और गुण में भेद नहीं।


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