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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 13

From जैनकोष



दव्वेण विणा ण गुणा गुणेहिं दव्वं विणा ण संभवदि।

अव्विदिरित्तो भावो दव्वगुणाणं हवदि तम्हा।।13।।

द्रव्य और गुण का तादात्म्य और अविनाभाव―द्रव्य के बिना गुण नहीं होते, इसी प्रकार गुणों के बिना द्रव्य संभव नहीं। यों द्रव्य और गुण में परस्पर अभेद है। बात क्या कही जा रही है? दो बातें―द्रव्य और गुण। द्रव्य क्या कहलाता है? अखंड वस्तु, पूर्ण वस्तु जो त्रिकाल रहता है। अनादि से अनंतकाल तक है, ऐसे वस्तु को कहते हैं द्रव्य। अब जो भी द्रव्य है उसका कोई न कोई स्वरूप जरूर है। स्वरूप न हो तो उसका अभाव हो जायगा। तो जो स्वरूप है वही स्वभाव है। तो द्रव्य अनादि अनंत है। उसका स्वभाव अनादि अनंत है। अब उस स्वभाव को पहिचानने के लिए भेददृष्टि से गुण भेद करके बताया जा रहा है। जैसे आत्मा चित्स्वरूप है, बस बात समाप्त। इसके आगे अब गाड़ी नहीं चल रही। इतने से तो कोई समझा नहीं, गाड़ी तो चलानी पड़ेगी अन्यथा तत्त्व ही न समझा जा पायगा। तो लो अब व्यवहारनय से उस स्वभाव में भेद करके समझाया जा रहा है। जहाँ स्वभाव में भेद किया और भेद करके जो समझ में आया उसका नाम गुण है। देखो यह गुण समझाया तो गया भेददृष्टि से, किंतु असत्य नहीं है। जिस प्रकार बताया है उस प्रकार से वस्तु तक पहुंचा जाता है। अगर कोई बात असत्य हो तो उसके सहारे सत्य पर कहाँ पहुंच जायेंगे, उस अखंड वस्तु तक कैसे पहुंच जायेंगे? इसलिए एक स्वभाव के भेद करके गुण बताये गए कि वे गुण भी अनादि अनंत हैं।

अब यहाँ द्रव्य और गुणों की परस्पर चर्चा है। द्रव्य के बिना गुण नहीं, गुण के बिना द्रव्य नहीं। जैसे कोई समझ लो पुद्गल द्रव्य का दृष्टांत लो―पुद्गल परमाणु का लक्षण क्या है? रूप, रस, गंध, स्पर्श। पुद्गल का लक्षण जिसमें रूप, रस, गंध, स्पर्श हो। पुद्गल द्रव्य न हो तो रूप, रस, गंध, स्पर्श कहाँ से होगा? रूप, रस, गंध, स्पर्श न हो तो पुद्गल द्रव्य कहाँ से होगा? और दृष्टांत लो जीव द्रव्य और उसके गुण क्या हैं? ज्ञान, दर्शन, चारित्र, आनंद वगैरह। अगर एक जीव पदार्थ नहीं है तो दर्शन, ज्ञान, चारित्र भी कहां से हो? अगर दर्शन, ज्ञान, चारित्र आदिक नहीं हैं तो जीव द्रव्य भी नहीं रह सकता। क्या है कोई ऐसा द्रव्य जो गुणरहित हो, जिसमें साधारण असाधारण कोई भी गुण न हो? मायने न अस्तित्व है, न वस्तुत्व है, न द्रव्यत्व है न कोई असाधारण है। पदार्थ हो जाय तो कभी नहीं हो सकता। तो क्या निष्कर्ष निकला? द्रव्य के बिना गुण संभव नहीं और गुणों के बिना द्रव्य संभव नहीं। जैसे कोई फल खरीदा तो उसमें रूप, रस, गंध, स्पर्श चारों हैं कि नहीं? चारों हैं। फल न हो तो ये चारों हैं क्या? नहीं हैं। ये चारों न हों और कोई ऐसा फल लाकर दिखाओ जिसमें रूप, रस, गंध, स्पर्श कुछ न हो। चलो बाजार से आज ऐसा कोई अनहोना फल लाकर दिखाओ। कैसा फल चाहिए, जिसमें रूप, रस, गंध, स्पर्श ये कुछ न हों। ऐसा कोई आर्डर दे सकेगा? हाँ दे सकेगा। कंजूस (हँसी) तो द्रव्य के बिना गुण नहीं और गुण के बिना द्रव्य नहीं। तो द्रव्य गुण ये कोई ऐसे भिन्न-भिन्न नहीं हैं जो अलग-अलग पड़े हों । है बात एक ही, तदात्मक है। गुणमय ही द्रव्य है, मगर अपेक्षा के वश से उनमें भेद किए जाते हैं। तो भेद तो कर दिया कि ज्ञान, दर्शन, चारित्र आदिक गुण हैं और द्रव्य बता दिया, पर उनका अस्तित्व तो एक ही है। ऐसा नहीं कि द्रव्य अलग सत् है, गुण अलग सत् है। इसलिए वास्तव में द्रव्य और गुण में भेद नहीं, किंतु अभेद है।

द्रव्य और गुण को स्वतंत्र-स्वतंत्र पदार्थ की मान्यता की शोधना―उक्त वार्ता को सुनकर यह सोचा जा सकता है कि यह कैसे समझें कि द्रव्य के बिना गुण नहीं होते और गुण के बिना द्रव्य नहीं होते? क्या कोई आदमी ऐसे भी हैं जो ऐसा मानते हों कि द्रव्य के बिना ही गुण हो जाते हैं और गुणों के बिना ही द्रव्य हो जाते हैं? यहाँ गुण और द्रव्य का अर्थ धन का न लेना याने कमाने की कुशलता हो तो उसे कह लो गुण और धन कमाये उसे कह लो द्रव्य, और उसकी पुष्टि में कुछ एक उदाहरण लौकिक दे दो। ‘सर्वेगुणा: कांचनमाश्रयंति।’ सारे गुण धन का आश्रय करते हैं, तो ये तो सब लौकिक मोहियों की बातें हैं। यहाँ गुण के मायने हैं पदार्थों में रहने वाली अनादि अनंत शक्तियाँ और द्रव्य के मायने हैं एक अखंड वस्तु। देखो द्रव्य के बिना गुण नहीं होता और गुण के बिना द्रव्य नहीं होते। तो यह आशंका हुई ना कि क्या कोई लोग ऐसे भी होते जो द्रव्य के बिना ही गुण मान लेते। खाली गुण है द्रव्य कुछ नहीं, पदार्थ कुछ नहीं, और कोई ऐसे भी दार्शनिक हैं क्या कि जो गुण के बिना द्रव्य मान ले? खाली द्रव्य है, पदार्थ है गुण आदिक कुछ नहीं। हाँ, हैं ऐसे दार्शनिक जिनमें मुख्य है मीमांसक। उन्होंने 7 पदार्थ माने हैं―द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय। ये 6 तो भावात्मक हैं और एक है अभाव नाम का पदार्थ, जो अभावात्मक है। तो पदार्थ तो वह ही कहलाता जो स्वतंत्र है। कोई किसी के अधीन नहीं। तो द्रव्य, गुण ये स्वतंत्र हैं ना? गुण की सत्ता अलग है, द्रव्य की सत्ता अलग है मीमांसकों के यहाँ, पर वस्तुतः ऐसा है नहीं, फिर मानने क्यों लगे ऐसा? भाई बुद्धि ही तो है, बुद्धि तो एक में भी बहुत भेद कर देती है। जैसे एक पुद्गल द्रव्य है, उसमें रूप, रस, गंध, स्पर्श समझ में आ रहे हैं, रूप समझ में खूब आ रहा कि इस पुद्गल में रूप है और बल्कि जिस समय रूप समझ में आ रहा, उस समय रस, गंध, स्पर्श ये समझ में नहीं आ रहे। दूर चीज है, भीत है, उसका रूप तो समझ में आ रहा, पर रस, गंध, स्पर्श ये समझ में नहीं आते। जब ऐसी स्थितियां होती हैं लोगों की तो क्यों न वे इस बात पर अड़ जायें कि रूप अलग चीज है, रस अलग चीज है गंध अलग है, स्पर्श अलग है, वह भीत अलग है, ऐसा कोई मनचला सोच नहीं सकता क्या? जब इन बातों का जुदा-जुदा करके ज्ञान बन रहा है तो ऐसा सोचने में क्या दिक्कत? तो भले ही सोच तो डाले वे, पर वास्तविकता नहीं समझे। अरे वह चीज एक ही है, आम एक ही है, उसका जब रसना इंद्रिय द्वारा परिचय किया तो रस समझ में आया, और घ्राण द्वारा परिचय किया तो गंध समझ में आया, छूकर समझा तो स्पर्श समझ में आया और देखकर समझा तो रूप समझ में आया, पर ये रूप,रस, गंध, स्पर्श अलग-अलग हों सो बात नही। आप कहेंगे कि हमें क्यों ज्यादा समझाते? सब जानते हैं कि रूप, रस, गंध, स्पर्श अलग नहीं होते, एक ही आधार है, एक ही प्रदेश है वस्तु में, पुद्गल में, कहीं ऐसा नहीं है कि इस हिस्से में तो रूप है, इसमें रस है, क्या है ऐसा? आम के एक हिस्से में रूप हो और आगे पीछे रस हो, क्या ऐसा है? ऐसी बात नहीं है। जहाँ डंठल होता है ठीक उस जगह रस तो नहीं होता तब ही तो लोग उस आम को मसक कर डंठल वाली जगह से कुछ पानी सा निकाल देते हैं, फिर चूसते हैं। अरे तो उसमें मीठा रस नहीं हैं तो न सही, मगर रस तो है। चाहे कैसा ही हो।

गुणों में भी गुणों को स्वतंत्र-स्वतंत्र मानने की मान्यता का शोधन―रूप, रस, गंध, स्पर्श पुद्गलों के उसी प्रदेश में है चारों के चारों, फिर क्यों समझा रहे? क्यों कोई लोग ऐसे हैं कि रूप, रस, गंध, स्पर्श को एक जगह न मानते हों, अलग-अलग मानते हों और यहाँ परस्पर भिन्न-भिन्न हों, क्या कोई लोग हैं ऐसे? हैं, तब ही तो समझाना पड़ता है, निरंशवादी, जिसका एक भेद बौद्ध भी है। निरंशवादियों के सिद्धांत में यह बताया है कि रूपक्षण पूर्ण वस्तु है, किसी की अपेक्षा नहीं करता। रसक्षण अलग वस्तु है, गंधक्षण अलग वस्तु है, स्पर्शक्षण अलग वस्तु है, और इतना ही नही, नीलक्षण, पीतक्षण, रक्तक्षण, रंगों में भी जितने भेद हैं वे इतने ही स्वतंत्र-स्वतंत्र अलग-अलग पदार्थ हैं। तब ही तो समझाने की जरूरत पड़ती है कि ये रूप, रस आदिक भिन्न-भिन्न नहीं, किंतु एक ही अखंड द्रव्य के गुण हैं, ऐसी ही बात जीव में लगा लो। जीव में ज्ञान, दर्शन, सुख दुःख, आनंद ये क्या अलग-अलग हैं? एक ही जगह हैं। कहीं उपाधि के संबंध से सुख दुःख हों, उपाधि का संबंध नहीं तो आनंद हो गया। कैसे ही हो, चाहे विभाव हो, चाहे स्वभाव हो, रहता तो जीव के प्रदेशों में ही ना? भिन्न-भिन्न कहाँ? अच्छा तो कोई लोग है क्या ऐसे जो ज्ञान को अलग मानते हों, सुख दुःख को अलग मानते हों, आनंद इच्छा को अलग मानते हों? हाँ, हैं। नैयायिक सिद्धांत है ऐसा जो ये अलग-अलग चीज मानते हैं और भी हैं। जैनों में भी कुछ लोग ऐसे ही ख्याल के हो सकते हैं। तो बात यह बतलायी जा रही है कि जितने गुण हैं वे गुण अलग-अलग कुछ नहीं हैं, एक ही अस्तित्व में हैं, एक ही आधार में हैं, वह आधार है द्रव्य का । द्रव्य के बिना गुण नहीं और गुण के बिना द्रव्य नहीं, क्योंकि द्रव्य गुणों में अभिन्नता का भाव है। व्यतिरेक कुछ नहीं है, इसलिए द्रव्यगुण में चूंकि ये अभिन्न सत्व से निष्पन्न हैं, सत्ता इनकी न्यारी-न्यारी नहीं है, इस कारण इनमें अभेद है। द्रव्य और गुण ये अभिन्न प्रदेश में निष्पन्न हैं। द्रव्य के प्रदेश अलग, गुण के प्रदेश अलग, ऐसा नहीं है, इस कारण से इनमें भिन्नता नहीं। द्रव्य का और गुण का एक ही काल है। जब से द्रव्य है, जब तक द्रव्य है तब ही से गुण है, तब ही तक गुण है। सा शाश्वत एक क्षण की भी लहुराई, जेठाई (छोटा, बड़ा) पन नहीं है। सब सहजात हैं, एक ही रूप है। तो एक ही काल में इन सबका उत्पादव्ययध्रौव्य सब कुछ एक ही साथ एक ही प्रदेश में होता है। इस कारण द्रव्य गुण अभिन्न है और एक ही स्वरूप है। तो यों द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से द्रव्य और गुणों में अभेद है। इस कारण से ये भिन्न-भिन्न नहीं हैं। अच्छा, यह वस्तु तथ्य तो जाना जा रहा है, पर ऐसा सब कुछ जानकर हम को शिक्षा क्या मिलती है कि अपने आपके द्रव्य को देखो। मैं आत्मा द्रव्य हूँ, निरंतर परिणमता रहता हूँ,अपना कोई स्वभाव रख रहा हूं, उस ही स्वभाव में इसमें परिणमन चल रहा। उस स्वभाव के भेद करें। अनंत गुण हैं, उन गुणों का, स्वभाव का जो सही परिणमन होना चाहिए याने अपने आप अपने ही सत्त्व से पर की अपेक्षा बिना, पर के संबंध बिना जो उसकी हालत होनी चाहिए वह हालत है निर्विकार, शुद्ध आत्मद्रव्य। जिसे कह लो सिद्धभगवान। उनमें लगा लो द्रव्य गुण पर्याय, सब एक रस रहते हैं और वहाँ द्रव्य, गुण पर्याय को समझना कुछ कठिन है वनिस्वत हम आपके द्रव्यगुणपर्याय के। हम अपनी पर्याय में जल्दी क्यों समझ लेते हैं कि हमारे ये सब उल्टे-उल्टे हैं। देव, नारकी, तिर्यंच, मनुष्य, क्रोध, मान, माया, लोभ, झट समझ में आ जाता है कि परिणम रहा है यह जीव। सिद्ध की बात नहीं समझ में आती जल्दी कि वे परिणम रहे हैं, क्योंकि वहाँ विषमता तो नहीं है। कोई दूसरी चीज डबल पड़ी हो किसी चीज में, जैसे गेहूं में चने मिले हैं तो बड़ी जल्दी समझ में आता है क्योंकि ये भिन्न चीज हैं। ये पड़े हैं, दूर से ही देख लिया। तो वह भगवान एक रस हैं, द्रव्य गुण पर्याय सब एक तन्मय हैं, वह अवस्था प्राप्त है। वहाँ ही अनंत आनंद है। विषमता में लाभ नहीं तो वह चीज प्राप्त कैसे हो? वह शुद्धस्वरूप हम को कैसे मिल जाय? शुद्ध का ध्यान करें तो शुद्धस्वरूप मिल जायगा। अशुद्ध का ध्यान करेंगे तो अशुद्ध ही अशुद्ध बने रहेंगे।

शुद्ध अंतस्तत्त्व की आराध्यता―जिसको शुद्ध बनना है उसको जरूरत है कि शुद्ध का ध्यान करे। अब देखो शुद्ध का कहां ध्यान करना? जो अरहंत सिद्ध भगवान हैं वे शुद्ध हैं ना? उनका ध्यान करने से मिल जायगा क्या मोक्ष? आप लोग कहेंगे कि हाँ मिल जायगा मोक्ष, क्योंकि श्रद्धा बनी है ना, मगर न मिलेगा। देखिये यह बात सुनकर घबड़ाना नहीं। साक्षात् और परंपरा का भेद समझना है। जो अरहंत हैं, सिद्ध हैं वे परवस्तु हैं, उनके निर्विकारता होती रहती है। अब वहाँ ही तुम्हारी आँख गड़ी है, वे भगवान हैं, बल्कि स्थिति में क्या किया तुमने कि अपने ज्ञान को अपने से हटाकर बहुत दूर ले जाकर उस सिद्धक्षेत्र में या उस दूसरी जगह में तुमने ध्यान बनाया―वे हैं सिद्धभगवान, वे हैं अरहंत, वे समवशरण में हैं। देखो इसमें भी फर्क तो आया। अभी आपकी कोई बंबई में मानो दुकान है वहाँ ध्यान दो, वह है दुकान, तो जैसे वहाँ ध्यान दिया, वह है दुकान, ऐसे ही यहाँ ध्यान दिया कि वे हैं भगवान जो लोक के अंत में विराजमान हैं तो एक सीमा तो बनी एक समान, मगर इन दोनों में अंतर बहुत है। वह तो स्वरूप की सुध दिलाने के काबिल रख रहा है वह अनुराग, शुद्धआत्मा का अनुराग। हम को शुद्ध आत्मद्रव्य में प्रवेश कराने के काबिल बनाये रखे ऐसा है वह ध्यान, और जो दुकान के प्रति ध्यान बनाया, उसमें यह बात तो नहीं है। तो इन दोनों ध्यानों में अंतर है। इससे कह सकते हैं कि अरहंत सिद्ध का ध्यान परंपरया मोक्ष का कारण है। जब सिद्धभगवान के स्वरूप का ध्यान करते हैं तो चूंकि उनका स्वरूप एकरस सम है। द्रव्य, गुण, पर्याय सर्व शुद्ध हैं तो वह ध्यान होने से तनिक जरा और दृढ़ता से ध्यान बने तो वह पराश्रय छूटकर अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का भान हो जाता है तो आखिर में निश्चय से सहारा किसका लिया गया? निज शुद्धआत्मा का। इतनी बात सुनकर आप चौंक सकते हैं कि खुद में कहाँ धरा शुद्ध द्रव्य, जिसका हम सहारा ले और बाहर में अरहंत सिद्ध के आत्मा में वह शुद्ध आत्मद्रव्य है। उसके लिए तुम कह रहे कि उसके विकल्प में साक्षात् मुक्ति नहीं है और यहाँ शुद्ध आत्मद्रव्य नहीं है, रागद्वेष मोह भरा है, यहाँ सहारा लें कैसे? तो भाई सुनो―शुद्ध आत्मद्रव्य के मायने यहाँ यह नहीं है कि जहाँ राग नहीं, द्वेष नहीं, मोह नहीं, पवित्रता है, निर्विकार दशा है उसे शुद्ध आत्मद्रव्य कहा जा रहा है। बड़ा ध्यान देने की बात है, किंतु एकत्व, एकाकी, एक, अकेला आत्मा ही आत्मा यह ध्यान में दो, इसका क्या मतलब? उस आत्मद्रव्य के साथ कर्म न सोचें, विभाव न सोचें, नरक, तिर्यंच, मनुष्य, देव पर्याय न सोचें, और की बात तो दूर रहो, जो भीतर जानकारी, अवस्थायें होती हैं उन पर भी ध्यान न दें, उन सब विकल्पों को हटावें। केवल एक आत्मतत्त्व, अब उसके साथ स्वभाव भी आयगा, स्वभाव बिना द्रव्य नहीं होता, स्वभावरूप में ही द्रव्य का परिचय बनेगा, सो स्वभावमय जानो। शब्द नहीं हैं बताने को, परंतु करके जान लो। सारे बाहरी बातों के ख्याल छोड़कर विश्राम से जब आप अपनी ओर झुकते हुये आराम से बैठोगे तो आ जायगा वह शुद्धज्ञान स्वरूप। जिसकी ख्याति के लिये सर्व विशुद्ध ज्ञानाधिकार बनाया गया समयसार में उस शुद्ध आत्मद्रव्य की बात कह रहे हैं। कैसे मिले? कैसे ज्ञान में आये? तो निर्विकल्पसमाधि के बल से, जो एक सहज परमआनंद का अनुभव हुआ, प्रतीति हुई, उस समय किया हुआ स्वसम्वेदनज्ञान। ज्ञान अपने सहजज्ञानस्वरूप को जान रहा है यह स्थिति है, उस ज्ञान स्थिति के द्वारा यह शुद्ध आत्मद्रव्य जाना जाता है। क्या रागद्वेषादिक भाव नहीं, विकल्प नहीं, शरीर नहीं? अरे आंखें खुली तो हैं तो सही, अब नहीं है उसकी दृष्टि में । और क्या है? अनंत आनंद, अनंतशक्ति, अनंतज्ञान। इनसे भरा हुआ सहज अनंतचतुष्टय निज एक शुद्ध जीवास्तिकाय नामक शुद्धद्रव्य है उसे जानें, उसका मन में ध्यान करें, वचन से बोले और उसके अनुसार चले, यह है द्रव्यगुण की अभिन्नता का ज्ञान करने का काम।


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