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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 122

From जैनकोष



जाणदि पस्सदि सव्वं इच्छदि सुक्खं विभेदि दुक्खादो ।

कुव्बदि हिदमहिदं वा भुंजदि जीवो फलं तेसिं ।। 122 ।।

जीव के कार्य व चेतन कार्य―इस गाथा में वे सब कार्य बताये जा रहे हैं जो जीव के सिवाय अन्य जीवों में न पाये जायें । यह जीव सबको जानता है, सबको देखता है, सुख को चाहता है, दुःख से डरता है, हित अथवा अहित को करता है और उन हित अहित क्रियावों के फल को भोगता है । इस गाथा में जानना, देखना, चाहना, डरना करना और भोगना―इन 6 बातों पर प्रकाश डाला है । जीव चैतन्यस्वभावी है । इस कारण कर्ता में रहने वाली क्रिया का याने जानने का देखने का जीव ही कर्ता हो सकता है । उस जीव से संबंधित पुद्गल कर्ता नहीं होता । जैसे आकाश आदिक पदार्थ जहाँ जीव हैं वहाँ आकाश है, फिर भी जानने देखने का कर्ता आकाश आदिक नहीं हैं । इसी प्रकार जीव से संबंधित ये शरीर ये कर्म सब कुछ हैं, फिर भी ये जीव के परिणमन के कर्ता नहीं होते हैं । सुख की इच्छा, कर्मरूप किया और दुःख से डरने रूप क्रिया और अपने आप में समझा गया जो हित अथवा अहित है उसके रचने की क्रिया तथा चैतन्यभाव के विवर्तन रूप संकल्प से उत्पन्न हुई भोगने रूप क्रिया इनका भी कर्ता जीव ही है, अन्य कोई नहीं है ।

सुख की चाहना व दुःख से डरना रूप कार्य―सुख की इच्छा जीव ही कर सकता है, पुद्गल नहीं कर सकता । दुःख से डरने की बात जीव ही कर सकता हैं, पुद्गल नहीं कर सकता है । एक स्वरूप की बात है, इस बात को सुनकर ख्याल तो यह आ सकता है कि हम जीव न होते, पुद्गल ही होते तो भला था । इतने विकल्प, संकल्प, डर, शंकाएँ करने का अवसर तो न होता, किंतु कल्पनाएँ करना व्यर्थ है । जो पदार्थ जैसा है वह वही है । यह तो एक दुःख से भयभीत होने की दृष्टि में कल्पना उठती है । जब जीव के स्वरूप की उत्कृष्टता सोची जाय तो सर्व लोकालोक को सर्व काल से, सर्व देश से, एक सामान्यतया निर्दोष रूप से जानने की सामर्थ्य इस आत्मा में है । समस्त द्रव्यों में सार उत्कृष्ट तो आत्मतत्त्व है । कर्तव्य तो यह होना चाहिए कि हम अपने में से विभावों को दूर करें, मिथ्यात्व को हटाये, अज्ञानभाव को न पनपने दें, सबका जैसा स्वरूप है उस ही स्वरूप के जाननहार रहें तो इस प्रवृत्ति से हमारी विजय होगी ।

जीव का घातक भाव―इस जीव का घातक भाव तो मोह राग और द्वेष भाव है । इन मोहादिक भावों से आत्मा का वह शुद्ध चैतन्यप्राण जो कि स्वयं आनंद का अविनाभावी है, शुद्ध है, सारभूत है वह बरबाद हुआ जा रहा है, और इससे मोह की तरंग जो उठती है उससे यह एकदम परोपयोगी हो गया । इसमें तो कोई संदेह नहीं कि जब यह जीव परोपयोगी होता है, परपदार्थों की ओर अपना उपयोग दौड़ाता है उस समय में यह विह्वल हो जाता है और जब पर से उपयोग निवृत्ति करके एक अपने आपकी ओर ही झुकता है, अपना एकत्व स्वरूप अपनी दृष्टि में रहता है, उस समय संकट सब विदा हो जाते हैं ।

आत्मा के एकत्व स्वरूप के स्मरण का प्रभाव―अभी के वर्तमान विचारों से ही देख लो―देश की विकट स्थिति में यद्यपि बहुत-बहुत संकटोन्मुखी विकल्पों में उपयोग रहता है और विचारणीय बातें भी होती हैं, फिर भी जिस काल में यह दृष्टि जगे कि यह मैं आत्मा केवल निज स्वरूपमात्र हूँ, अमूर्त हूँ, न मेरा कोई देश है, न मेरा कोई घर है, न मेरा कोई शरीर है ये तो क्षणिक समागम हैं । आज यहाँ उत्पन्न हैं, कल दूसरी जगह उत्पन्न हैं । मोही जीव जहाँ उत्पन्न होते हैं मोहवश वहाँ को ही अपनाए रहा करते हैं । यह मैं आत्मा तो एक पक्षी वत् यत्र-तत्र विहार करने वाला हूँ । यह आत्मा आज इस भव में है, पहिले किसी भव में था, आगे किसी भव में होगा । जब इस मुझ एकाकी आत्मा के संबंध में एकाकीपन की दृष्टि जगती है और तब ही इसे कुछ संतोष भाव होता है।

ज्ञानपद्धति पर संतोष की निर्भरता―संतोष बाह्य पदार्थों से नहीं होता, किंतु यह सब ज्ञान की कलावों पर निर्भर है । ज्ञान किस पद्धति का हो कि संतोष मिले, और किस पद्धति का हो कि असंतोष मिले? इसका खूब विश्लेषण कर लो तो अंत में यही सिद्ध होगा कि सब कुछ ज्ञान पर निर्भर है । हमारा सारा भविष्य किस प्रकार का बनेगा, यह हमारे ज्ञान पर निर्भर है । हम अपने ज्ञान का प्रयोग ज्ञानस्वभाव पर करते हैं, अपने को अकेला लखते हैं अर्थात् केवल चैतन्यस्वरूपमात्र सबसे न्यारा । मेरा किसी से कुछ संबंध नहीं, जगत में अनंतजीव हैं, ऐसे ही समागम में आये हुए ये भी जीव हैं । वस्तुस्वरूप में देखो तो सारे जीव मेरे स्वरूप से न्यारे हैं, त्रिकाल भी मेरा और दूसरे जीव का कोई संबंध नहीं हो सकता है, एकता नहीं हो सकती । जब भी अपने एकत्व स्वरूप पर दृष्टि जाय तो वहाँ शांति मिलती है ।

तात्त्विक क्रिया के अवगम का प्रयोजन एकत्वविभक्तदर्शन―इस गाथा में इस जीव का शुद्ध और अशुद्धपने का विभाग न कर के एक सर्व साधारण, अन्य-अन्य साधारण कार्यों को बताया जा रहा है । यह जीव पदार्थों के जाननरूप क्रिया का कर्ता है । इस जीव के साथ जो यह शरीर है, यह कर्म है, ये कोई भी इस जानन क्रिया के कर्ता नहीं हैं, इसी प्रकार देखने रूप क्रिया के कर्ता नहीं हैं, ये हैं, पर ये रूप, रस, गंध, स्पर्श वाले हैं । यह शरीर था कहाँ? जीव तो पूरा का पूरा यह पहिले भी था जिस गति से मरकर आया है, इसने जिस गति में अपना स्थान बनाया, रुक गया, वहाँ जो बीजभूत शरीर के कारणभूत जो थोड़ीसी शरीरवर्गणायें थीं वे हो इस जीव के संबंध को पाकर बढ़-बढ़कर आज अंगोपांग के रूप में इतनी फैल गयी हैं ।यह शरीर था कहाँ मेरा? यह किस संबंध से इस प्रकार से बनकर तैयार हुआ है? मायारूप है । और यह शरीर रहेगा कब तक? जैसे हम दूसरों के शरीर को देखा करते हैं । जीव के चले जाने पर लोग अपने घर में उसे दस-पाँच मिनट भी ठहरने नहीं देते, जल्दी से जल्दी निकालकर जलाने की या जमीन में गाड़ने की कोशिश करते हैं । यह शरीर मेरा है कहाँ? जिस शरीर की ममता कर के सारा जीवन किरकिरा बना दिया जाता है । मैं तो इन सबसे भिन्न एक ज्ञानमात्र त्रिकाल स्थायी तत्त्व हूँ । यह जीव ही जानने और देखने का कर्ता है ।

चाहक्रिया―सुख के परिणमन की ओर लगाव लगाने का जो यत्न है उस ही का नाम इच्छा है । इच्छा भी यह किसकी करता है? मुझे सुख मिले । प्रत्येक जीव सुख चाहते हैं और दुःख से डरते हैं । जिसमें जितनी योग्यता है वह अपनी योग्यता के अनुसार सुख प्राप्त करने का यत्न करता है । दो इंद्रिय जीव भी सुखी रहने के लिए अपने में लिपट जायें, जमीन में बिल बना लें, जिन-जिन बातों को वे करते हैं वे सुख की चाह से ही करते हैं । पशुपक्षी जो-जो भी कार्य करते हैं वे सुख की चाह से ही तो किया करते हैं । हाँ मनुष्य इन सब जीवों से बहुत बड़ा जानवर है । जानवर मायने जो ज्ञान में बड़ा है । यह अपना महल बनाये, वैभव बनाये, ऐश्वर्य बढ़ाये । कितने-कितने साज शृंगार और कलावों से यह सुख पाना चाहता है ।

तृष्णा में निरर्गल अभिलाषा―सर्व सुविधा होने पर भी मनुष्य के सुख पाने की इच्छा की सीमा नहीं होती । क्योंकि जितने भी जो कोई सुख प्राप्त हैं मोह के कारण उसे वह सुख नहीं जंचता है । आगे की दृष्टि होती है, मुझे और भी सुख चाहिए । यों पाये हुए समागमों में जो भी सुख प्राप्त होता है उसमें संतोष नहीं होता हैं । जैसे कोई पुरुष एक लाख का धनी है तो उसे इस एक लाख के समागम का तो संतोष नहीं होता । उसके यह इच्छा रहत कि मैं और धनी बनूँ तो उस तृष्णा में पाये हुए वर्तमान समागम का भी सुख नहीं ले पाता है । तो इच्छा में यह इतना बढ़ा हुआ है । इस इच्छा को यह जीव ही करता है विभाव नहीं करते, शरीर नहीं करते ।

दुःख से डरने का कार्य―दु:ख से डरने की बात तो प्राय: सब संसारी जीवों में पायी ही जाती है । हर एक कोई दुःख से डरता है और उन दुःखों में सबसे बड़ा दुःख माना जाता है मरण का । प्रत्येक जीव मरण से डरते हैं और कोई लोग चाह-चाहकर मरण करते हैं । कोई लोग यह सोचते हैं कि बुरी तरह से जिये तो क्या जिए । इससे तो मरना अच्छा है । वे बुरी तरह से जीने की स्थिति से इतना डरे हैं कि वे मरण को पसंद करते हैं, मगर दुःख से भयशीलता प्रत्येक प्राणी में पायी जाती है ।

हिताहितक्रिया―5 वीं बात कही गई है कि यह जीव हित और अहित को करता है । शुभोपयोग, अशुभोपयोग और शुद्धोपयोग-तीन प्रकार के उपयोग ही तो हैं । कोई जीव शुभोपयोग का कर्ता है । कोई अशुभोपयोग का कर्ता है और कोई शुद्धोपयोग का कर्ता है । पर ये सभी के सभी जीव इस भाव से कर्ता हो रहे हैं, इस पद्धति से कर्ता हो रहे हैं कि यह हित है, इसे किया जाय और यह अहित है, इसे न किया जाय । अज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव अशुभोपयोग से अपना हित मान रहे हैं और शुभोपयोग व शुद्धोपयोग उन्हें विपदा जंच रहे हैं । उनके लिए उनका चित्त नही चाहता है । वे अशुभोपयोग से हित मानते हैं और शुभोपयोग से अहित मानते हैं, पर हित को करना और अहित को न करना, इस प्रकार की जो वृत्ति है, इस क्रिया को करने वाला यह जीव ही हो सकता है, अजीव नहीं होता ।

उपभोगक्रिया―छठवीं बात यह कही गई है कि यह जीव शुभ अशुभ कर्मों का फलरूप जो उपभोग करता है, इष्ट विषयों का भीगना, अनिष्ट विषयों का भोगना अर्थात् सुख भोगना दुःख भोगना इनका भी कर्ता अर्थात् सुख दुःख का भोक्ता यह जीव ही है अन्य कोई नहीं हो सकता । जीव वास्तव में भोगता किसे है? यह अशुद्ध जीव वास्तव में अपने अशुद्धभावों का भोक्ता हो रहा है । अपने परिणमन के सिवाय अन्य पदार्थों के परिणमन को यह जीव भोग नहीं सकता है । पर, व्यवहारदृष्टि से और उसमें भी अनुपचरित असद्भूत व्यवहार से देखा जाय तो यह द्रव्यकर्म का भोक्ता है और उपचरित दृष्टि से देखा जाय तो यह विषयों का भोक्ता है, भोजन का भोक्ता है, पुत्र, मित्र, स्त्री आदिक का भोक्ता है, ये बातें उपचरित दृष्टि से हैं ।

नयविभाग से उपभोग का वर्णन―भोगने के संबंध में ये तीन दृष्टियां लाइए । कोई लोग यह कहते हैं कि यह वैभव का भोक्ता है । तो कोई लोग यह कहते हैं कि यह कर्मफल का भोक्ता है, कर्मों का भोक्ता है, तो कोई लोग यह कहते हैं कि यह तो अपनी कल्पनाओं का भोक्ता है । ये तीन बातें तीन नयों से सही होती हैं । उपचारनय से तो यह जीव विषयो का भोक्ता है, अर्थात् विषयों का और सुख दुःख का कुछ संबंध नहीं है, केवल भोग के परिणाम होने के समय ये विषय ज्ञान के विषयभूत हो रहे हैं । लेकिन चूंकि उनका आश्रय कर-कर के यह अपने परिणाम बनाता है, इस कारण उनका भोक्ता बताया जाता है । कर्मों के साथ इस जीव का निमित्तनैमित्तिक संबंध है । अशुभ कर्म उदय में आते हैं तो इस जीव के अशुभ भाव बनता है, तो चूँकि उन कर्मों का निमित्त पाकर यह विभाव बनता है, अतः कहा जाता है कि यह जीव कर्मो को भोगता है, पर निश्चयनय से देखा जाय तो यह जीव अपने आप में जो सुख दुःखरूप परिणमन होता है उस परिणमन का भोक्ता है । कोई जीव शुद्ध हो तो शुद्ध निश्चय से देखने पर वह केवलज्ञानादिक रूप अनंत चतुष्टय परिणमन को भोगता है । इस प्रकार शुभ, अशुभ अथवा शुद्ध भावों का भोगने वाला भी जीव है, अन्य पुद्गल आदिक नहीं हैं ।

नव पदार्थों में प्रथम पदार्थ का प्रकरण―यहाँ इस गाथा से यह सिद्ध किया गया है कि ऐसे-ऐसे असाधारण कार्य आत्मा के ही संभव हैं, पुद्गल आदिक के संभव नहीं हैं । 9 पदार्थों के अधिकार में यह जीवपदार्थ का वर्णन चल रहा है । इनका संबंध मोक्षमार्ग से है । मोक्षमार्ग जिसके प्रकट होता है उसके प्रयोजनीभूत जिन नव पदार्थों का श्रद्धान चलता है, उनमें से जीवपदार्थ का यह वर्णन है । अब जीवपदार्थ के वर्णन के समय उपसंहार रूप में यह गाथा आ रही है ।


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