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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 170

From जैनकोष



सपयत्थं तित्थयरं अभिगदबुद्धिस्स सूत्तरोइस्स ।

दूरतरं णिव्बाणं संजमतवसंपओत्तस्स ।।170।।

सूक्ष्म परसमयता―इस प्रकरण में पूर्व की कुछ गाथाओं में सूक्ष्म परसमय का व्याख्यान किया है । जैसा कुछ परसमयपना साधुजनों में भी पकड़ में न आये, ऐसा भी सूक्ष्म होता है । यह तो मोटे परसमय की बात है कि कोई साधु अपनी मुद्रा को निरखकर ऐसा विश्वास रखे कि मैं साधु हूँ, मुझे ऐसे-ऐसे व्रत लेना है, मुझे यों चलना चाहिए, यों बैठना चाहिए, और शिष्यजनों को हम से इस तरह का व्यवहार करना चाहिए, मैं साधु हूँ, मैं मुनि हूँ, आचार्य हूँ । मुझे सही व्यवस्था रखनी चाहिए । इस प्रकार की अगर अपने स्वरूप में श्रद्धान है, अंतरंग में विकल्प बने हुए हैं, तो वह तो मोटा परसमयपना है । सूक्ष्म परसमय की बात तो वहाँ है जहाँ निर्दोष परमात्मा की उपासना की जा रही है, उनके गुणों में भक्ति की जा रही है, और वे उस भक्ति में ही रत और संतुष्ट हो रहे हैं, वहाँ है सूक्ष्म परसमयता । जो बात कहने सुनने में धर्म की लग रही है और व्यावहारिकता में धर्म की बात भी है―प्रभुभक्ति करना, साधु भक्ति करना, गुरुसेवा करना धर्म की बात भी है, फिर भी इस ओर लगा हुआ उपयोग और इस तरह का उपयोग भी लगा है और अपने आपके शुद्ध अंतस्तत्त्व की प्रतीति भी है तो देखो कि धर्म की बात लग रही है, किंतु वहाँ हो रहा है परसमयपना । इसमें भी सूक्ष्म परसमयपना यह है कि सम्यक्त्व होने पर भी शुद्ध प्रतीति होने पर भी पर की ओर जो जितने काल उपयोग लग रहा है उतने काल यह परसमय है ।

परसमयता की हेयता―यों समझ लीजिए कि परसमयपना मिथ्यादृष्टि के और कभी-कभी सम्यग्दृष्टि के भी जगता है, पर सम्यग्दृष्टि के परसमयपने का अर्थ केवल इतना है कि यह सम्यग्दृष्टि उस समय अपने आपके आत्मा की अनुभूति में न रहकर बाह्यपदार्थों के परिज्ञान में और उनकी व्यवस्था में लग रहा है । मोक्ष के प्रसंग में तो परसमयपना रंच भी नहीं होना चाहिए । इस गाथा में यह बात कह रहे हैं कि संयम और तप में भी कोई लगा हुआ हो, श्रुत की, आगम की रुचि भी रखता हो, जीवादिक पदार्थों के और तीर्थंकरों के प्रति भी जिनका बुद्धि लग रही हो, उनमें आदरभाव कर रहा हो ऐसे जीव का भी निर्वाण दूर है ।

परसमयता के विश्लेषण से शिक्षण―इस गाथा में जो अर्थ बताया है, उससे हमें कई बातों की शिक्षा मिलती है । साक्षात् तो यह शुभोपयोगरूप प्रवर्तन मोक्ष का हेतु नहीं है, इस कारण इसका दूर निर्वाण है । इसका भाव यह है कि यह परंपरा मोक्ष का कारण है । जो पुरुष मोक्षमार्ग में उद्यमी हुए हैं और जिन्होंने अचिंत्य विलक्षण महान संयम और तपश्चरण के भार को भी धारण किया है अर्थात् संयम और तपश्चरण का पालन भी जो खूब करते हैं, किंतु अपनी प्रभुशक्ति की, प्रभुभक्ति की जिन्हें संभावना नहीं है जो परम भूमिका में चढ़ाने वाली शक्ति है ऐसी शुद्ध शक्ति की जिनके चित्त में संभावना नहीं जगती है वे पुरुष निर्वाण की रुचि करते हुए भी अरहंतादिक शुद्ध आत्मतत्त्व की भक्ति करते हुए भी उस भक्ति को, उस रुचि को छोड़ने के लिए उत्साहित नहीं होते, वे भी साक्षात् मोक्ष को प्राप्त नहीं करते । थोड़े से शब्दों में इसका भाव यों समझिये कि अर्हद्भक्ति अथवा तत्त्वचर्चा आदिक 9 पदार्थों का श्रद्धान अवगम किए हुए भी चित्त में यह बात नहीं आती कि यह अर्हद्भक्ति भी एक राग का अंश है और यह राग का अंश भी इस जीव का स्वरूप नहीं है, ऐसी बात चित्त में न आये तो वह उस रागांश से दूर होने के लिए उत्साह नहीं कर सकता है ।

शुभ राग के छोड़ने का विधान―भैया ! अर्हद्भक्ति के राग से दूर होने के बाद यदि अभिन्न सहज सिद्ध चैतन्यस्वभाव के सम्वेदनरूप पारमार्थिक भक्ति आती है तो वह तो है शुभराग के छोड़ने का विधान, और इस प्रकरण को सुनकर अर्हद्भक्ति को छोड़ना आसान समझकर छोड़ दे और सहज स्वभाव में उसकी भक्ति न जगे, स्वसम्वेदन न बने तो वह उस शुभराग के छोड़ने का सही विधान नहीं है । शुभराग छोड़कर अशुभ राग में नहीं गिरना है, किंतु शुभराग छोड़कर शुभ अशुभ दोनों से रहित नीरंग निर्मम शुद्ध अंतस्तत्त्व के सम्वेदन में आना है और इस ही लक्ष्यसिद्धि के लिए शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के रागों का त्याग कराया जाता है ।

शुद्ध अंतस्तत्त्व में रति का उत्साह―जो जीव शुभ राग को छोड़कर शुद्ध सम्वेदन रूप परिणति बनाने के लिए उत्साहित भी नहीं हैं वे पुरुष देवलोक आदिक के क्लेश की प्राप्ति में समय गुजारकर परंपरा से भविष्य में कभी मोक्ष पायेंगे, वर्तमान में नहीं पाते हैं, उस समय शुभ राग से होता है पुण्यबंध और पुण्यबंध से प्राप्त होगा देवलोक । उस देवलोक को भी ज्ञानीजीव क्लेश मानते हैं । क्लेशरहित अवस्था तो निर्विकल्प शुद्ध चैतन्यस्वरूप का अनुभव है, यह जिन्हें प्राप्त होता है वे ही वास्तव में अमर हैं । उनको फिर कोई आकुलता नहीं रहती है । यहाँ शिक्षा दी है कि जिसे निर्वाण चाहिए वह शुभ अशुभ रागों से विविक्त शुद्ध अंतस्तत्त्व में रति करे ।

स्वरूपप्रतपन―जो साधु बहिरंग में तो इंद्रियसंयम और प्राणसंयम के बल से रागादिक उपाधियों से रहित निर्विकल्प ज्ञान को अपने शुद्ध आत्मा में संयत करने का यत्न कर रहे हें, ये साधु ख्याति, पूजा, लाभ अथवा अनेक मनोरथ विकल्पजालों की दाहों से जो रहित हैं इसी कारण वे अपने शुद्ध आत्मा में अपने उपयोग का संयम करने के लिए स्थितिकरण कर रहें हैं, संयमी हैं, शुद्ध हैं, सम्यग्दृष्टि हैं और अनशन आदिक अनेक प्रकार की बाह्य तपस्यावों के बल से वे अपना अंतरंग तप भी बढ़ा रहे हैं । अंतरंग तप है सर्व परद्रव्यों की इच्छा का अभाव करना, निरोध करना । ऐसी अंतरंग तपस्या के बल से ये साधुजन नित्य आनंदस्वरूप एक विशुद्ध आत्मस्वभाव में तप रहे हैं, इस अपने आप में विजय पा रहे हैं, अतएव वे तपस्या से भी युक्त हैं । ऐसी विशिष्ट योग्य विजय होने पर भी जब कभी चूँकि उत्तम संहनन आदिक नहीं होने से योग्य प्रकार से शक्ति का विकास नहीं होता तब इस भाव में, निर्विकल्पसमाधि में निरंतर ठहरने के लिए असमर्थ हो जाते हैं । उस समय ये मुनिजन क्या किया करते हैं, इसे सुनिये ।

शुभोपयोगप्रवर्तन का कारण―जिनका लक्ष्य विशुद्ध है और जब कभी अपनी उस लक्ष्मी का आलंबन भी कर लेते हैं, निर्विकल्प समाधि में उत्पन्न हुए सहज शुद्ध आनंद का अनुभव भी कर लेते है, इतनी विशिष्टता होने पर भी विशिष्ट संहनन आदिक शक्तियों का अभाव होने से जब वे अपने इस लक्ष्य में ठहर नहीं पाते हैं उस समय वे कभी तो शुद्ध आत्मा की भावना के अनुकूल जीवादिक पदार्थों का प्रतिपादन करने वाले आगम की रुचि करते हैं । शुद्धरुचिक साधु के वचनों को सुनें तो उस तत्त्व मर्म को जानकर चित्त में हर्ष उत्पन्न करना ये सब शुभोपयोग किया करते हैं और कभी उस शुद्ध आत्मतत्त्व की बात दिखाने वाले, सुनाने वाले, मार्ग बताने वाले साधुजनो का सन्मान दान सेवा आदिक किया करते हैं ।

अनुराग का प्रभाव―जैसे कि किसी पुरुष को अपनी स्त्री से अधिक अनुराग है और उसकी स्त्री अपने माता पिता के घर है, मायके में है, उस स्वसुराल से कोई पुरुष आये हों तो यह पुरुष उन पुरुषों का बड़ा आदर करता है । आदर करता जाता है पर लगन लगी है स्त्री प्रेम की ही ना, अतएव स्त्री की बात भी बीच-बीच में पूछता जाता है । उनका सन्मान इसलिए कर रहा है यह पुरुष, चूंकि उसके प्रेम के एक साधन मात्र स्त्री के ग्राम से आये हुए ये पुरुष हैं, उनसे स्त्री की खबर विशेष मिलेगी आदिक आशय है, अतएव वहाँ से आये हुए पुरुषों का सन्मान करता है, उनकी सेवा करता है । ऐसे ही जिस ज्ञानी संत को शुद्ध अंतस्तत्त्व की तीव्र रुचि जगी है उस शुद्ध अंतस्तत्त्व के नगर के निवासी जो साधुसंत पुरुष हैं उन साधु संत पुरुषों का सन्मान दान पूजन आदिक करते हैं, करते जाते हैं और उनकी मुद्रा को देख-देखकर शुद्ध अंतस्तत्त्व खबर लेते रहते हैं, और कभी तो विनम्र होकर उस शुद्ध अंतस्तत्त्व की कुशलता का समाचार भी पूछते हैं, उस शुद्ध अंतस्तत्त्व के प्रभाव का, चमत्कार का भी वर्णन सुना करते हैं । यों ये साधु संत पुरुष जो निर्विकल्प समाधि में स्थिर नहीं रह पाते हैं वे क्या-क्या किया करते हैं उसका यह वर्णन चल रहा है अर्थात् वे शुभोपयोग से अपने आत्मा को पुण्यरूप कर रहे हैं ।

ज्ञानियों के पुराणपुरुषों की कथा के श्रवण का लक्ष्य―ये भव्य संत कभी इस मुक्तिलक्ष्मी को वश करने के लिए निर्दोष परमात्मा तीर्थंकर परमदेव के चरित्र पुराण भी सुनते हैं ।गणधर देव, सागर, भरत, राम, पांडव आदिक अनेक महापुरुषों के चरित्र पुराणों को सुनते हैं, वे भी ऐसी कुशल उस मुक्ति लक्ष्मी को वश करने के लिए सुनते तो सही उनका कुछ चरित्र, उनकी करामातें, जिन्होंने इस मुक्तिलक्ष्मी को वश कर लिया है अर्थात् मुक्त हो गए हैं, ऐसे पुरुषों की जीवन चर्चा सुनते तो सही, परंतु अपने लिये वे शिक्षा लेते रहते हैं । क्या किया, कैसे रहे, घर में रहे तो किस प्रकार जल से भिन्न कमल की नाई रहे । साधु हुए तो किस प्रकार से पुरुषार्थ प्रकट करके समस्त उपसर्ग संकटों को कैसे उन्होंने दूर किया, कैसे कष्टसहष्णु बने और कैसे उन्होंने ध्यान किया, कैसे निज में गुप्त रहे? अहा, यों-यों, तभी तो आखिर मुक्तिश्री उनके वश हो ही तो गयी । ये भव्य संत ऐसी मुक्तिश्री को जिन्होंने वश में किया है उनका चरित्र भी सुनते हैं, एक तो यह प्रयोजन है महापुराण पुरुषों के चरित्र सुनने का।

अनुराग का योग्य धाम में न्यास―महापुरुषों के चरित्र सुनने का दूसरा यह प्रयोजन है कि अब यहाँ राग का उदय आया तो जैसे कुछ मंत्रवादी ऐसा किया करते हैं कि देखो ये ओले पड़ने ही वाले हैं, ये रुकते नहीं हैं तो उन ओलों को दूसरी ऐसी जगह गिरा देते कि जहाँ नुक्सान न हो और अपनी खेती बच जाय । तो इसी तरह ये रागादिक के ओले पड़ने वाले हैं, ये निवारें नहीं जा रहे, ऐसे प्रवाह से उठने वाला राग है तो अब इस राग को कहाँ पटके, कहाँ लगाये जिससे हमारे शुद्ध अंतस्तत्त्व की रक्षा बन सके, उन्हें ये शुभराग में लगाते हैं, चरित्र सुनें पुराण सुनें । वहाँ यह भाव है कि कही यह राग खोटी जगह लग जायगा, विषयकषायों के साधनों में लग जायगा तो फिर संसार लंबा हो जायगा ।

अंतस्तत्त्व के अनुरागियों की सावधानी―जिन्होंने आत्मा के हित की धुन बनायी है ऐसे साधु पुरुष कैसे सावधान रहते हैं? उनको केवल आत्महित ही प्रिय है, संसार का कोई वैभव उन्हें रुचिकर नहीं है । जो कुछ वे करते हैं इस शुद्ध अंतस्तत्त्व की सिद्धि के लिए करते हैं । ये अशुभ राग से हटने के लिए शुभ धर्म का अनुराग उत्पन्न करते हैं और इस तरह उस अनुरागवश महापुरुषों के चरित्र भी सुनते हैं । जो कोई पुरुष गृहस्थ हो तो वह भेद और अभेद रत्नत्रय की भावना की सिद्धि करने वाले आचार्य, उपाध्याय, मुनिजनों की पूजा आदिक करता है, यह बतायी जा रही है उन ज्ञानी साधकों की बात कि जो लक्ष्यरूप पहुंच तो गए हैं और कभी-कभी लक्ष्य का अनुभव भी कर लेते हैं, अद्भुत विचित्र आनंद का अनुभव भी होता रहता है, किंतु अपनी विशिष्ट संहनन आदिक शक्तियाँ न होने से जब वे इस निर्विकल्पसमाधि में स्थिर नहीं रह पाते तो वे क्या किया करते हैं, इस बात का वर्णन चल रहा है । लो यों शुभोपयोग किया करते हैं यह उसका उत्तर है । इसके फल में उनपर बीतती क्या है, इसे भी सुनो ।

ज्ञानियों के शुभोपयोग का प्रभाव―शुद्धोपयोग का लक्ष्य रखने वाले और कभी-कभी शुभोपयोग में प्रवृत्ति करने वाले ऐसे इन पुरुषों की चूंकि शुभोपयोग में प्रवृत्ति है और शुद्धोपयोग का लक्ष्य है, इन दोनों के समन्वय के कारण, शुद्धोपयोग के लक्ष्य के कारण अनंत संसार की स्थिति का छेद तो हो गया । अब ये संत पुरुष अनंत संसार के पात्र नहीं रहे, निकटभव्य हैं, कुछ काल बाद मुक्ति प्राप्त करेंगे। लेकिन ये तद्भाव मोक्षगामी नहीं हैं। जो शुभोपयोग में प्रवृत्ति रखते हैं उनका उस भव से मोक्ष नहीं है, नहीं है मोक्ष तो भी पापास्रव का भाव तो नहीं, पुण्यास्रव का परिणाम तो है ना । उस पुण्यास्रव के परिणाम से उस भव में ये निर्वाण तो प्राप्त नहीं करते, किंतु इस भव के बाद अन्य भव जो पायेंगे वे देवेंद्रादिक उच्च पद पायेंगे, लो पा लिया देवादिक पद । वहाँ विमान परिवार आदिक अनेक विभूतियाँ मिलीं, तो चूँकि पूर्वभव में इनको शुद्धोपयोग का लक्ष्य था और उसके संस्कार में पले हुए इन जीवों ने देवेंद्र पद पा लिया तो भी उस संस्कार के कारण ये उस विभूति को तृण के समान गिन रहे हैं ।

ज्ञानियों के शुभोपयोग की परंपरया मोक्षहेतुता―इस जीव को इस परिवार और अन्य वैभव परिग्रहों से कौनसी सिद्धि होगी? यह तो केवल अपने स्वरूप मात्र है । इसमें जो कुछ गुजरता है, परिणमन होता है वह सब इसका परिणमन है । उसमें दूसरा पदार्थ क्या करता है? प्रत्येक पदार्थ प्रत्येक पदार्थ से अत्यंत भिन्न है । यह विभूति क्या है, जड़ पुद्गलों का संचय है, परमाणुवों का पुंज है, यह तृणवत् है, हितरूप नहीं है । ऐसी मान्यता में वे ज्ञानी उस देव पदवी के योग्य धर्मसाधन में व्यतीत करते हैं, विदेह क्षेत्र में जाकर, जहाँ कि सदैव तीर्थंकर विराजमान रहते हैं, उन महाविदेहों मे जाकर समवशरण में वीतराग सर्वज्ञदेव के दर्शन करते हैं और निर्दोष परमात्मा के आराधक गंगाधर देव आदिक के भी दर्शन करते हैं और वहाँ परमेष्ठियों के दर्शन करके अपने धर्म में और दृढ़ होते हैं । अवधिज्ञानबल से पूर्वभव की बातों का स्मरण करके अथवा जो कुछ सुना करते थे, जो पूर्वभव में समझा था कि ऐसे-ऐसे अरहंत प्रभु होते हैं, लो अब मैं यहाँ साक्षात् दर्शन कर रहा हूँ, उससे तो और दृढ़ता होती है । तब वे चतुर्थगुणस्थान में जिस स्थिरता के साथ आत्मभावना बन सकती है उस आत्मभावना को अब ये देवेंद्र छोड़ते नहीं हैं । जिस परिणति से, जिस भावना से आत्मा में विशुद्ध आनंद जगा है उस आनंद का अनुभव करने के बाद उसे छोड़ने को चित्त कैसे चाहेगा? चाहे उस आनंद को ही बारबार न पा सकें, देर तक न पा सकें, लेकिन दृष्टि उस भावना की ओर ही रहती है । इस प्रकार धर्म में दृढ़ चित्त होते हुए ये स्वर्ग लोक में अपना समय व्यतीत करते हैं ।

शुद्धोपयोग और शुभोपयोग के समन्वय की स्थिति―यह बात सुनाई जा रही है अंतस्तत्त्व के परिचयी शुभोपयोगी मोक्षमार्गी जीवों की । साधुपद से लेकर कि जहाँ विशुद्ध लक्ष्य समझ में आया था और उस लक्ष्य के अनुसार आत्मीय अनुभव भी जगा करता था । लेकिन उस अनुभव को सदा रखने की सामर्थ्य नहीं जग पायी थी, तब उन्होंने इस स्थिति में क्या किया और उसके फल में क्या मिला? चूंकि वहाँ शुद्धोपयोग का और शुभोपयोग का एक समन्वयसा बना हुआ था, उसके फल में देवेंद्र हुए । देवेंद्रों की शोभा इसी में है, उनका बड़प्पन इसी में हैकि ऐसी बड़ी विभूति पाकर जो मनुष्यों के संभव नहीं है, चक्रवर्तियों के भी संभव नहीं होता ऐसी महर्द्धिक विभूति को पाकर उसे भी तृण के समान समझे । इस थोड़ी-सी विभूति को पाकर उसको चित्त में चिपकाये रक्खे, यह तो मोही जनों का काम है, जिनको संसार में और अनेक कुयोनियों में रुलने का काम पड़ा हुआ है । महंत पुरुष तो वे हैं कि जो कुछ उन्हें मिला है उसे तृणवत् समझते हों । ये देवेंद्र जिनके कई हजार देवांगनाएँ हुआ करती हैं, जिनका शासन असंख्यात देवों पर चल रहा है, जिन में अनेक प्रकार के चमत्कार करने वाली ऋद्धियाँ प्रकृत्या मिली हुई हैं, जिनका शरीर दिव्य है, कई-कई हजार वर्षों में क्षुधा की कुछ वेदना होती है और वह भी कंठ से अमृत झर कर शांत हो जाती है, कई-कई पखवारों में श्वास लेने का कष्ट करना पड़ता है । ऐसे बड़े सुखों से संपन्न ये देवेंद्र उस सारे वैभव को तृण के समान देख रहे हैं और समय व्यतीत कर रहे हैं धर्म के अनुराग में, भगवान की भक्ति में । समवशरण में जाना, प्रबंध करना, गणधर आचार्य आदिक का भी विनय सम्मान बनाना―ये सब शुभोपयोग के कार्य भी देवेंद्र कर रहे हैं ।

पूर्वसंस्कार का प्रभाव―ज्ञानी तपोधन ने देवेंद्रादिपद में जन्म लेकर सागरों पर्यंत का, असंख्यात वर्षों का समय धर्म प्रवृत्तियों में व्यतीत किया, उसके बाद जीवन के अंत में जब देवायुकर्म का क्षय होने को है, उस क्षण के बाद वे स्वर्ग से आकर मनुष्यलोक में चक्रवर्ती आदिक जैसी बड़ी विभूतियों को प्राप्त करते हैं । लोग अपने घर पुत्र के उत्पन्न होने पर बड़ी खुशियाँ मनाया करते हैं । खुशी क्या मनाते हैं, खुशी खुश होकर मनानी पड़ती है । भला ऐसे स्वर्गो में जो बड़े देवेंद्र थे, जिनकी अतिशय ऋद्धियाँ थीं, जिनका बड़ा चमत्कार था, जिन्होंने असंख्यात वर्ष जैसे लंबे समय तक उस धर्म का अनुराग भरा अतिशय पुण्य कमाया, ऐसा जीव यहाँ किसी मनुष्य के यहाँ उत्पन्न हो तो उसका पुण्य क्या यहाँ न करायेगा? उसके पुण्य का यह प्रताप है कि सारे नगर के लोग उसकी खुशी मनाते हैं । भला जो किसी महामंडलेश्वर राजा के चक्रवर्ती होने वाला पुत्र बने या अन्य वैभववान पुत्र बने तो उसे बचपन से ही बड़ा वैभव प्राप्त होगा । इतनी विभूति प्राप्त कर के भी धन्य है वह ज्ञानी पुरुष भले ही वह अभी बालक है, लेकिन पूर्वभव में जिस शुद्ध आत्मतत्त्व की भावना की थी उसके संस्कार मिटते नहीं हैं, वे बने हुए हैं । उस शुद्ध अंतस्तत्त्व की भावना के उपयोग से इतनी बड़ी विभूतियों को पाकर भी उनमें मोह नहीं करते हैं ।

जन्मजात निर्मोहता―ये ज्ञानी पुरुष जब तक यहाँ गृहस्थी में है तब तक भी उस वैभव के बीच रहकर निर्मोह हैं, और अनेक बालक तो ऐसे भी होते होंगे कि जन्म से लेकर अंत तक उन्होंने वस्त्र भी न पहिने हों । 10-12 वर्ष तक तो बालक अब भी नंगे ही फिरा करते थे । कुछ वर्षों के बाद से यह प्रथा चली है कि चाहे 6 माह का भी बालक हो उसे भी कुछ न कुछ पहिना दिया करते हैं । देहातों में अथवा देहातों के जो वृद्ध लोग हैं उनसे पूछो तो वे बतायेंगे कि 10-15 वर्ष के बालक नग्न ही रहा करते थे । हुए हों कोई ऐसे बालक जो 7-8 वर्ष ऐसे ही नंगे रहे और फिर मिल गया सुयोग कहीं मुनिधर्म सुनने का, प्रतिभा विशेष हो, ज्ञान आ जाय और वह निर्ग्रंथ दीक्षा धारण कर ले, यह एक बात कही जा रही है । कभी उन्होंने अगर कपड़े पहिन भी लिये हों तो उसको गौण करके इस बात को सुनो । हुए हैं कोई ऐसे योगिराज । कितने ही लोग गृहस्थावस्था में गृहस्थी के सब कुछ काम करके भी उस विभूति को तृणवत् गिनते हुए उस वैभव से विरक्त रह-रहकर गृहस्थावस्था से विरक्त रहकर विषयसुखों का परित्याग करके जिनदीक्षा को ग्रहण करते हैं ।

निर्विकल्प समाधि की पुष्ट स्थिति―अब ज्ञानी पुरुष की वही स्थिति फिर आ गयी जो स्थिति इनके तीसरे भव पहिले थी । लेकिन उस स्थिति की अपेक्षा अब इस भव में बल विशेष मिला है । तब निर्विकल्प समाधि का लक्ष्य तो था और उस समाधिबल से आत्मतत्त्व का बहुत-बहुत बार स्पर्श भी किया करते थे, लेकिन उसकी स्थिरता न होने से वे शुभोपयोग में अपना समय भी गुजारते थे, लेकिन अब इस भव में उन्हें ऐसा महान बल मिला है कि निर्विकल्प समाधि का अब उत्कृष्ट विधान बन रहा है, उस बल से विशुद्ध ज्ञानदर्शनस्वभावी निज शुद्धआत्मा में वे स्थित हो रहे हैं ।

अंतस्तत्त्व के परिचर्या के अंतस्तत्त्व के अनुभव की सुगमता―जैसे यहाँ जिस करोड़पति को करोड़ों का वैभव मिला है उसे वह सुगम और सस्ता सा दिखता है । जिसे अरबों का वैभव मिला है उसे वह भी सस्ता सा दिखता है, भले ही शतपति, हजारपतियों के लिए वह बड़ी कठिन बात सी लग रही हो, पर जिसका जहाँ प्रवेश है, अधिकार है उसे वह सुगम नजर आता है । इस दृष्टांत के अनुसार क्या कहें, इससे भी विलक्षण बात यह है कि जिसे अपने शुद्ध आत्मतत्त्व का स्पर्श हुआ है, अनुभव जगा है उसे तो यह इतना सुगम मालूम होता है काम, कि कठिन है कहाँ? यह स्वयं ही ज्ञानानंदघन है, ज्ञानस्वरूप है, बस इस निज उपयोग से इस निज ज्ञानस्वरूप को निहारने में कौनसी मुसीबत है? यह तो अत्यंत सुगम काम है ।सुगम काम में स्थिरता अधिक रहती है ।

स्वच्छ ध्यान―इस निर्विकल्प समाधि के बल से यह जीव इस शुद्ध ज्ञानस्वभावी निज शुद्ध आत्मतत्त्व में स्थिर हो गया है । ऐसा स्थिर हो गया है कि अब यह प्रथक्त्ववितर्कवीचार शुक्लध्यान से भी ऊंचा उठकर एकत्व वितर्क अतीचार शुक्लध्यान में स्थित हो गया है । शुक्लध्यान का अर्थ है सफेद ध्यान, निर्दोष ध्यान । राग के रंग की रंच कणिका भी न रहना और राग के संबंध से जो अस्थिरता उत्पन्न हुई थी याने ज्ञप्तिपरिवर्तन हुआ था उस ज्ञप्तिपरिवर्तन कर्म से भी रहित ऐसा सफेद ध्यान शुक्लध्यान परिणाम करके यह जीव शेष समस्त घातिया कर्मों का विनाश करके कुछ समय बाद अघातिया कर्मों का क्षय करके परमोत्कृष्ट मोक्ष अवस्था को प्राप्त करता है ।


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