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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 171

From जैनकोष



अरहंतसिद्धचेइयपवयणभत्तो परेण णियमेण ।

जो कुणदि तवोकम्मं सो सुरलोगं समादियदि ।।171।।

शुभोपयोग की शिवावरोधकता का समर्थन―अरहंत आदिक शुद्ध आत्मावों में भक्ति करने मात्र से भी उत्पन्न हुआ जो राग है वह राग भी साक्षात् मोक्ष का अंतराय रूप हैं । इस विषय का वर्णन पूर्व गाथा में भी किया गया था और अब इस गाथा में भी उस ही का समर्थन कर रहे हैं । जिस किसी प्रसंग में जो बात विशेषतया कही हुई है वह एक बार ही कहे जाने में संतोष उत्पन्न नहीं होता, उसका दुबारा समर्थन किया जाता है और इसी की ही नकल सोसाइटियों में है । प्रस्तावक ने प्रस्ताव किया, समर्थक ने समर्थन किया, इसके बाद बहुसम्मति से पास होता है । प्रथम बार कहना एक प्रस्तावरूप होता है और उसका दुहराना एक समर्थन की चीज बन जाती है । जो चीज उपादेय है, जिस तत्त्व पर अमल करने में हित है उसके वक्तव्य के बाद समर्थन हुआ करता है । यहाँ कोई खास आवश्यकता न थी कि कही हुई बात को फिर पुन: दुहराया जाय, लेकिन धर्म के काम पर धर्मानुराग अथवा शुभोपयोग ही कहीं जीव के अंतिम लक्ष्य की चीज न बन जाय, इस कारण करुणा करके आचार्यदेव साधुसंतजनों को प्रतिबोधित करने के लिए दुबारा भी यही बात कह रहे हैं । जो पुरुष अरहंत सिद्ध चैत्य और प्रवचन की भक्ति में परायण हुए हों, उत्कृष्ट नियम के साथ तपस्यारूप सत् कर्म को करते हैं, तपश्चरण करते हैं वे पुरुष स्वर्गलोक को प्राप्त करते हैं ।

पुराण पुरुषोत्तम―अरहंत कहलाते है―पुराणपुरुषोत्तम । अच्छा बताओ अरहंतदेव मनुष्य हैं या नहीं? कुछ तो झिझक होती है कि हम उन्हें मनुष्य कैसे कह दें, वे तो परमात्मा हैं और मनुष्य न कहें यह भी तो ठीक नहीं है । आखिर मनुष्यगति में ही तो हैं, इसी कारण उन्हें पुराण पुरुषोत्तम शब्द से कहा गया है । अरहंतदेव अब लोकव्यवहार में प्रवृत्ति नहीं करते हैं । मोह रागद्वेष से सर्वथा रहित हो गए हैं, केवलज्ञान केवल दर्शन से संपन्न हो जाने के कारण वे सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हैं । वे हम आप लोगों की तरह किसी की बात सुनें और उसका जवाब दे ऐसी भी प्रवृत्ति उनके नहीं है । जैसे लोग किसी बड़े आदमी का सम्मान सेवा करते हुए अंतर में श्रद्धा और विनयमय भय दोनों रखते हैं, उनका भय दोषरूप नहीं होता किंतु गुणरूप बन जाता है । श्रद्धा के साथ लगा हुआ भय दोषरूप नहीं होता, वह विनय रूप में परिणत हो जाता है ।

प्रभु की छत्रछाया में―प्रभु अरिहंतदेव की भक्ति में उनके विहार प्रबंध में, उनके उपदेश-प्रबंध में इंद्र कुबेरदेव सभी जन सहयोग देते हैं, व्यवस्था बनाते हैं बड़ी श्रद्धा से, फिर भी उनमें से कोई अथवा मनुष्यों में से कोई भगवान के निकट पहुँच जाय, बात करने लगे, ये सब बातें नहीं बन पाती हैं क्योंकि वहाँ सभी जीवो की श्रद्धा और विनयपूर्ण भय अथवा विनय ही बहुत भरा हुआ है और दूसरी बात यह है कि लोग बोलकर करें क्या? उनके राग और द्वेष नहीं है । प्रभु के रागद्वेष नहीं हैं इतने मात्र से इनकी बड़ी भक्ति नहीं हुआ करती, साथ ही वे सर्वज्ञ सर्वदर्शी हैं, गुणसंपन्न हैं इस कारण तीन लोक के इंद्र उनकी भक्ति में रत रहा करते हैं । यही भी तो कोई पुरुष ऐसे होते हैं कि जिन्हें किसी ओर का पक्षपात नहीं होता ।राग और द्वेष से वे अलग रहा करते हैं, लेकिन उनमें कुछ और गुण हों, जानकारी हो, हित की भावना भी हो, हित का कार्य भी करें तो लोगों का आकर्षण उनकी ओर विशेष होता है ।तो प्रभु भगवान में निर्दोषता और गुणसंपन्नता दोनों ही प्रकट हैं, उनकी भक्ति में इसी कारण तीनों लोक के जीव रहकर अपने जन्म को सफल मानते हैं ।

प्रभुदर्शन से नि:संदिग्धता―अरहंतदेव की मुद्रा के दर्शन करते ही जिसके चित्त में जिस प्रकार की शंकाएँ उठ रही हों उन शंकाओं का समाधान उनके ही ज्ञान स्फुरण के कारण हो जाय करता है, और इतने पर भी न हो कदाचित तो प्रभु की दिव्यध्वनि सुनकर जो चित्त में एक हर्ष उत्पन्न होता है जो कि अत्यंत विलक्षण है, उस हर्षातिरेक के समय में ऐसा ज्ञान स्फुरण होता है श्रोताओं के कि शंका का समाधान वे स्वयं प्राप्त कर लेते हैं । भैया! शंका का उठना भी योग्यता पर निर्भर है । जो जितने क्षयोपशम वाला होगा वह उस सीमा के भीतर ही तो कुछ शंका उत्पन्न कर सकेगा योग्यता के भीतर ही शंका उत्पन्न होती है तो उसका समाधान स्वयमेव हो जाता है । कठिनाई तो तब पड़ती है कि कोई पुरुष बड़ी तेज सूक्ष्म शंका कर ले और उतनी योग्यता थी नहीं तो उसका समाधान मिलना कठिन होता है । यों यह अतिशय भी अरहंत प्रभु के दर्शन और दिव्यध्वनि के श्रवण में प्राप्त होता है ।

विरोधियों की विरोधसमाप्ति―तीसरा अतिशय जो एक अंत: प्रभाव पैदा करे वह है बैर विरोध के भाव के समाप्त कर लेने का । समता की मूर्ति सर्वज्ञ सर्वदर्शी प्रभु के निकट पहुँचने पर चूँकि यह भक्तिभाव से प्रभु पादमूल में गया ना, अतएव उसके चित्त में अब बैर विरोध का स्थान नहीं रहता है ।

विपरीतवृत्तियों का, समवशरण में अस्थान―शास्त्रों में यह वर्णन है कि समवशरण में मिथ्यादृष्टि जीव नहीं पहुंचते । उसका अर्थ सभी मिथ्यात्व दृष्टि जीवों से नहीं है, किंतु जिन में उद्दंडता है, जिनका परिणाम विनय से युक्त है ही नहीं, ऐसे मिथ्यादृष्टि जीव समवशरण में नहीं पहुँच सकते । जिनका होनहार भला नहीं है वे मिथ्यादृष्टि क्यों नहीं पहुंचते? उसमें दो कारण हैं जो नहीं पहुँचने देते । प्रथम तो यह है कि ऐसे उद्दंड मिथ्यादृष्टि का भाव ही नहीं हो सकता कि हम समवशरण में जाये, अत: वह स्वयं जाता ही नहीं है । कदाचित कोई उद्दंडता मचाने के लिए जाय तो वहाँ देवशक्ति का इतना उच्च प्रबंध है कि वे जाने नहीं देते हैं । किंतु वहाँ कोई मिथ्यादृष्टि पहुँचता ही नहीं है―यह बात घटित नहीं होती, क्योंकि वहाँ अनेक जीवों को सम्यक्त्व पैदा होता है तो कैसे होता है और यह भी वर्णन आता है कि यह जीव अनेक बार समवशरण भी पहुँचा, किंतु सम्यक्त्व उत्पन्न नहीं हुआ यह भी बात कैसे घटे? हाँ यह बात अवश्य है कि उद्दंड मिथ्यादृष्टि वहाँ पहुँच नहीं सकता ।

अर्हद्भक्ति की बुनियाद व फल―सर्वज्ञ सर्वदर्शी सर्व हितैषी अरहंतदेव, जरा सुनिये, प्रभु वीतराग हैं सो अब तो हितैषी नहीं हो रहे हैं, मगर हित का काम तो कर ही रहे हैं तब हितैषी के एवज में हितोपदेष्टा कहिये । ऐसे प्रभु अरहंतदेव की भक्ति तभी तो बनेगी जब वैराग्य से चित्त ओतप्रोत होगा । यों ही केवल राग-राग में अर्हद्भक्ति नहीं बनती, किंतु किसी अंश में वैराग्य है, किसी अंश में राग है, ऐसी स्थिति में अर्हद्भक्ति बना करती है । इस अर्हद्भक्ति में जो शुभ अनुराग है, धर्म का अनुराग है, अल्प राग है, ऐसे अध्यवसाय भाव से जो जीव के विभाव का वातावरण बनता है वह साक्षात् मोक्ष को प्रदान करने में अंतराय करता है और वह परिणाम देव आयु देवगति का बंद कराता है और इसके फल में यह जीव स्वर्गलोक में अथवा ऊर्द्धलोक में, नवग्रैवेयक आदिक में सर्वार्थसिद्धि तक में यह जीव उत्पन्न हो जाता है । वैराग्य की अधिकता हो तो यह सर्वारिसिद्धि तक पहुंच जाता है, किंतु अर्हद्भक्ति की प्रमुखता हो तो यह स्वर्गलोक में उत्पन्न हो जाता है । वहाँ क्या बीतती है सो इसे भी सुनिये ।

अर्हद्भक्ति का पुण्यफल―स्वर्गलोक में 16 स्वर्गों तक के देव प्रवीचार सहित हैं, केवल ब्रह्मलोक की दिशा विदिशाओं में रहने वाले लौकांतिक देव इस वासना से रहित हैं । लौकांतिक देव देवर्षि कहलाते हैं । देव होने पर भी वे ऋषि तुल्य हैं, द्वादशांग के पाठी हैं, विशिष्ट ज्ञानी हैं और इनको वैराग्य में ही रुचि रहा करती है । यद्यपि ये भी संयम धारण नही कर सकते, क्योंकि शरीरादिक की स्थितियां ऐसी ही हैं, किंतु इन्हें प्रेम होता है वैराग्य से । और इसी कारण तीर्थंकर भगवान के गर्भ में, जन्मकल्याण में, ज्ञानकल्याण में, निर्वाणकल्याण में भी ये सम्मिलित नहीं होते, किंतु तपकल्याण में ये सम्मिलित हुआ करते हैं । इसी कारण तीर्थंकर प्रभु को वैराग्य होने पर ये लौकांतिक देव आते हैं और प्रभु के वैराग्य का समर्थन कर चले जाते हैं । तो लौकांतिक देवों को छोड़कर 16 स्वर्गों तक के देवों में प्रवीचार होता है और जैसे-जैसे नीचे के स्वर्ग हैं वहाँ प्रवीचार की विशेष प्रमुखता है, सो वे देव विषयविषरूपी वृक्ष के सुगंध से मोहित बने रहा करते हैं ।

रम्यलीनता―जैसे कभी कोई पथिक रास्ता चलते-चलते किसी ऐसे बगीचे के निकट से निकलता है जहाँ बहुत ही मीठी सुहावनी सुगंध चल रही है तो वहाँ यह पथिक कैसा मोहित होता है कि कुछ ठिठक जाता है और वहाँ जो कुछ विचार उत्पन्न हुए थे वे सब रुक जाते हैं, उस सुगंध का उपभोग करने में रति हो जाने के कारण अन्य विचार दूर हो जाते हैं । स्वर्गों में ये देव सागरों पर्यंत विषयों में लीन रहा करते हैं । खेद के साथ यहाँ आचार्यदेव बता रहे हैं, इनसे उनका अंतरंग मोहित हो गया है, उनका विवेक भी ज्ञान भी मोहित हो गया है ।

विषयविषरति की अनर्थता―यह मोह, विषयविष का प्रेम जीव का अनर्थरूप है । यहाँ शांति और संतोष का नाम नहीं है । उन समागम और विषयसाधनों में क्या तत्त्व रखा है? जो अशांति और असंतोष को ही उत्पन्न करें । मोही जीव केवल कल्पना में ही तो अपने आपको महान समझ लेते हैं, सुखी समझ लेते हैं, किंतु वे सुखी हैं कहाँ? ऐसी बात बीतती है उस स्वर्गलोक में, यह किस परिणाम का फल है? अरहंत आदिक की भक्ति में बुद्धि जिनकी लगी है ऐसे पुरुष जो परमसंयम प्रधान अति विशेष तप को करते हैं उस तपश्चरण के निमित्त से बंध को प्राप्त हुए विशिष्ट पुण्य का यह फल मिला है, इतने ही मात्र राग से जिसका हृदय कलंकित हो गया है वह पुरुष साक्षात् मोक्ष से तो वंचित है ही, पर ऐसे स्वर्गलोक में उत्पन्न होकर राग ज्वालावों से सागरों पर्यंत पच-पचकर क्लेश पाते रहते हैं ।

अनवधानीय क्लेश―भैया ! एक दुःख तो होता है व्यक्त दुःखी की भी समझ में आने वाला और एक दुःख ऐसा होता है जो उस दुःखी की भी समझ में नहीं आ रहा है, किंतु हो रहा है दुःखी, हो रहा है अशांत व्याकुल । पर अपनी व्याकुलता को वह व्याकुलता नहीं समझ पाता । हाँ उन विषयसाधनों के प्रसंग में कभी कोई अंतराय आये तो वहाँ यह व्याकुलता समझता है । वह व्याकुलता आर्तध्यान में हुई, रौद्रध्यान में कोई पुरुष अपनी व्याकुलता की परख नहीं करता । आर्तध्यान में व्यक्त समझ में आता है दुःखी जीवों को भी कि मैं दुःखी हो रहा हूँ । स्वर्गलोक में रौद्रध्यान की प्रधानता है । जैसे नरकगति में आर्तध्यान की प्रधानता है ।जो जीव सुखपूर्वक रहा करते हैं, बड़े साधन संपन्न हैं ऐसे जीवों में प्राय: रौद्रध्यान की प्रमुखता रहती है । जो विषयों के साधन पाये हैं उनके संरक्षण में उनके उपभोग में वे आनंद माना करते हैं । वह मौज की बुद्धि दुखों से भरी हुई है, अज्ञान से भरी हुई है । वे अंतरंग में बड़े संतप्त रहा करते हैं ।

पुण्य का बंधन―यद्यपि ये पुरुष साधु संत शुद्ध आत्मा को उपादेय मान रहे हैं, यह सम्यग्दृष्टियों की चर्चा है, अज्ञानी तपस्वियों की बात नहीं कह रहे, सम्यग्दृष्टि ज्ञानी साधु संतों के भी जो कि शुद्ध आत्मा को उपादेय समझ रहे हैं वे व्रत तपश्चरण आदिक भी करते हैं और निदान का परिणाम भी उनके नहीं है, वे शुद्ध हैं, निर्दोष हैं, इनके यह भी वांछा नहीं उत्पन्न हुई थी कि मैं देवगति में जाऊँ, इंद्र बनूं, वहाँ का वैभव पाऊँ, यह निदान भी नहीं था, वे विशुद्ध सम्यग्दृष्टि जीव शुद्ध भावों से ही तपश्चरण कर रहे थे, किंतु संहनन आदि की शक्ति न होने से वे शुद्ध आत्मस्वरूप में ठहर तो नहीं सके ना । तो ऐसी स्थिति में प्रथम भव में उनके पुण्यबंध हो रहा है । साक्षात् मोक्ष का काम नहीं बनता है, क्योंकि जो शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थिर नहीं हो पा रहे वे कहीं राग करेंगे ही । चूँकि यह ज्ञानी पुरुष है, अतएव अरहंत आदिक शुद्ध तत्त्वों में राग कर रहा है । उस पुण्यबंध के प्रताप से यह स्वर्गलोक में जाकर देव होता है ।

देशनाभक्ति―शुद्ध तत्त्व की भक्ति के प्रकरण में अरहंतदेव की भक्ति का प्रथम नाम यों लिया करते हैं कि ये अरहंतदेव हमारी सारी उल्झनों के दूर करने में मूल में निमित्तरूप हैं । अरहंतदेव की दिव्यध्वनि से शुद्ध आगम का विस्तार होता है, और इस आगम से ही जाना जाता है कि सिद्धप्रभु यों होते हैं, तीन लोक तीन काल की रचना यों है, सभी बातें जो हमारे ज्ञान और वैराग्य की निर्मलता में साधक हैं वे सब हमें आगम नेत्र से ज्ञात हुई हैं ।

चैत्यभक्ति―चैत्य चैत्यालय और प्रवचन इनका तो संबंध अरहंत भक्ति से है ही । चैत्य की भक्ति करना अर्हद्भक्ति ही है, क्योंकि चैत्य में प्रतिबिंब अरहंतदेव का ही तो है । ऊर्द्धलोक में, मध्यलोक में और जहाँ तक देवों का निवास है वहाँ तक अधोलोक में जो अकृत्रिम चैत्यालय हैं उनमें तीर्थंकर की मूर्ति नहीं है, किंतु अरहंतदेव की मूर्ति है । अरहंतदेव की मूर्ति में चिह्न नहीं हुआ करते । जैसे बैल, घोड़ा आदिक 24 तीर्थंकरों के चिह्न हैं, अरहंत भगवान की मूर्ति के निकट अष्ट प्रतिहार्यों का दर्शन होता है, क्योंकि अष्ट प्रतिहार्यों का संबंध अरहंत परमेष्ठी से है । ऐसे अरहंतदेव की अकृत्रिम प्रतिमाएँ अनुपम विलक्षण रचनाएँ हैं । उस प्रतिबिंब में अनेक परमाणु आते हैं और अनेक परमाणु जाते हैं, यों जहाँ पर परमाणुवों का यातायात होने पर भी वे अकृत्रिम प्रतिबिंब यथातथा ही रहा करते हैं ।

प्रवचनभक्ति―प्रवचन की भक्ति, शास्त्र की भक्ति, अर्हद्भक्ति रूप है । हम इन शास्त्रों से उस शुद्ध ज्ञायकस्वरूप का ही तो स्मरण किया करते हैं । जिन्होंने इस ज्ञायकस्वरूप स्व का अध्ययन नहीं किया उनके शास्त्र पढ़ने का नाम स्वाध्याय कैसे कहा जाय? वह तो बांचना है ।उपन्यास की किताब कोई पढ़े तो उसे कोई स्वाध्याय करना नहीं कहता । कहानी की किताब पढ़ने वाले को कोई यह नहीं कहता है कि यह स्वाध्याय कर रहा है । यदि कहानी की किताब की ही तरह इन ग्रंथों का भी कोई वाचन कर ले तो उसका नाम स्वाध्याय नहीं हो सकता । जिस कथन प्रसंग में स्व का अध्ययन चल रहा हो वह है स्वाध्याय ।

विशुद्ध आशय में शिक्षाग्रहण की योग्यता―जैसे कोई-कोई पुरुष थोड़ी पूंजी वाला हो तो वह चाहता है कि इस पूंजी का मैं पूरा-पूरा लाभ उठाऊँ । कुछ भी रकम बेकार न पड़ी रहे । हर तरह से इससे लाभ उठा लूं । ऐसे ही आज के पंचमकाल में हम आप लोगों को यह ज्ञान की छोटी पूंजी मिली है तो विवेक तो यही है हमारा कि हम इस छोटी ज्ञान पूंजी के द्वारा पूरा-पूरा लाभ उठा लें, मेरा आशय निरंतर विशुद्ध रहे । विषयसाधनों से अंत: प्रीति न रहे, आत्महित का भाव जगे तभी यह आत्महितैषी पुरुष प्रवचन के प्रत्येक वाक्य से, आगम के प्रत्येक वचनों से वह आत्महित के लिए शिक्षा ग्रहण कर सकता है । दृष्टि चाहिए आत्महित की जिसकी दृष्टि आत्महित की नहीं हुआ करती, केवल बाह्यदृष्टि रहती है, हम समाज में रहते हैं इसलिए हमें यह थोड़ा कुछ पढ़ लेने का भी काम कर लेना चाहिए, अथवा कुछ दिल बहलाना है, कहीं दिल नहीं लगता है तो यह कर लें अथवा देखें तो सही और लोगों के मामले, कौन किस तरह का कहते हैं अथवा लोगों में हमारा भी तो कुछ नाम आये, हम भी तो कुछ धर्मसाधना करने वाले हैं, धर्मात्मा है इस भाव से अथवा हमारे कुल में इस तरह की बातें चली आयी हैं वे तो निभाना ही चाहिए, ऐसे ही अन्य कारणों और आशयों पूर्वक प्रवचन का पढ़ना यह स्व का अध्ययन नहीं करने देता किंतु एक ही आशय बना हो, मुझे स्वहित करना है―इस हितभावना से प्रेरित हो तो वह प्रत्येक वाक्यों से हित की शिक्षा ग्रहण कर सकता है ।

शुद्धोपयोग के लक्ष्य का प्रभाव―ये तपस्वीजन अरहंत आदिक में धर्मानुराग के कारण साक्षात् मोक्ष तो नहीं पाते, पर स्वर्गलोक को प्राप्त करते हैं―इसमें यह बात कही गई हैं कि श्रद्धा पूर्ण निर्मल रखना कि यह धर्मानुराग भी साक्षात् मोक्ष का अंतराय है । फिर दूसरी बात यह समझना कि यह परंपरा मोक्ष का कारण है । ऐसी दृष्टि रखकर शुद्धोपयोग के लक्ष्य से चलें तो इससे हमें कल्याण का मार्ग मिलेगा ।


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