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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 113

From जैनकोष



किं णियदव्वहँ भिण्णु जडु तं परदव्वु वियाणि ।

पुग्गलु धम्माधम्मु णहुं कालु वि पंचमु जाणि ।।113।।

जो आत्मपदार्थों से भिन्न जड़ पदार्थ हैं, उन्हें परद्रव्य जानो और वे परद्रव्य पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल―5 प्रकार की जाति के है, इन सबको परद्रव्य समझो । ज्ञान की रुचि जगना, ज्ञान का ज्ञान होना बड़ी अपूर्व मतलब की बात है । इस जीव ने पंचेंद्रिय के विषयप्रसंगों में गधा, सूकर की गति भी प्राप्त की है और इस मनुष्यभव में उन विषयप्रसंगों के समय जैसा मूर्ख बन जाता है, ऐसी ही मूर्खता वहाँ भी है । इस तरह मनुष्यभव में कोई अंतर नहीं आता । पर मनुष्यभव का पाना तब सफल है, जब कारण परमात्मद्रव्य को निरख लिया जाये, इस ही भव में आलौकिक दुनियां में पहुंच लिया जाये तो यह सर्वोत्कृष्ट पुरुषार्थ है ।

अपनी चर्चा में आधे घंटे का टाइम अपनी दया के लिए नियत रखना चाहिये । चाहे कैसा भी समय आये, कितनी भी उलझने हों, पर अपने आत्मदया के नियत समय पर आत्मभावना किया करें । स्वाध्याय का नियम रखना दर्शन का नियम रखना, ये फालतू नियम नहीं हैं । मान लो कि 10 या 12 दिन आपका दर्शन में, पूजा में, स्वाध्याय में मन नहीं लगता है तो यह नहीं सोचना चाहिए कि दर्शन आदिक में मेरा मन नहीं लगता है; तो यह बेकार काम है, मंदिर जाना बेकार है, वहाँ तो मन ही 10-12 दिन से नहीं लगता है । मंदिर जाते हैं, और चित्त यहां-वहां रहता है―ऐसा सोचकर क्या मंदिर छोड़ देना उचित है? नहीं । अगर छोड़ दिया तो फिर छूट ही गया । फिर यहाँ तो वह अवसर था कि 10-15 दिन मन नहीं लग रहा, न सही । दो-एक दिन में कभी तो फिर चित्त प्रमुदित हो जायेगा, फिर मन लग जायेगा । नियम की परंपरा नहीं छोड़नी चाहिये । जो बात भली है, उस बात का भी तुम सही उपयोग नहीं कर सकते तो बेकार जानकर छोड़ देना, यह विवेक नहीं है । प्रथम तो यह बात है कि जिस आधे घंटे में आप मंदिर में रह रहे हैं, धर्म के काम में लग रहे हैं और मन भी नहीं लगता है; इतने पर भी कषाय तीज नहीं है । इसके बजाय घर में ही उस समय रहते तो वहाँ कषाय तीव्र हो जाती है । तो धर्म करते हुए में मन न लगे, फिर भी जबरदस्ती धर्म करने में बैठ जाओ तो कुछ न कुछ लाभ तो अवश्य है । मंद कषायों का लाभ है ।

तो इन पर-द्रव्यों से जुदा हों―यही हम आपका एक लक्ष्य होना चाहिए । आत्मा-आत्मा तो एक समान हैं । चाहे साधु की आत्मा हो, चाहे गृहस्थ की आत्मा हो, सब एक समान हैं । परिस्थिति का अंतर आ गया है । पर मूल में द्रव्य तो एक समान है और साधु से ही समानता क्या, प्रभु में और हम में समानता है । जैसा चैतन्यस्वरूप परमात्मा है वैसा हो चैतन्यस्वरूप मैं हूँ । इसमें रंच भी अंतर नहीं है । परिस्थिति आज कुछ कमजोर है । यदि मोक्षमार्ग में दृष्टि बनी रहेगी तो मजबूती की स्थिति आ जायेगी । इस कारण इस श्रद्धा को कायम बनाने के लिए मैं सबसे न्यारा केवल चैतन्यस्वरूपमात्र हूँ । ये सब नियम कीजिए । श्रावकों के जो 6 कर्तव्य हैं, देवपूजा, गुरु की उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान; ये 6 काम तो रोज-रोज करने के हैं । इनमें ढील नहीं होनी चाहिए । देवपूजा या देवदर्शन रोज का काम है और गुरुओं की सेवा यथासमय करना, यह रोज का काम है । स्वाध्याय में जो ग्रंथ तुम्हें स्पष्ट ज्ञान का कारण बने, हितकारी हों, सुगम हों, उन ग्रंथों का स्वाध्याय करना तुम्हारा रोज का काम हैं । इस प्रकरण को सुनते हुए सोचते जावो कि हम इन 6 कार्यों में से कौनसा काम नहीं कर रहे हैं, अथवा कौन से काम में अत्यंत कमी कर डाली है । तीन काम हुए देव की उपासन, गुरुओं की सेवा और स्वाध्याय । इनके आगे है संयम ।

अपने मन को मनमाना न बनाना, जो इच्छा हुई खाने में या अन्य संबंध में वह तुरंत होनी ही चाहिए―ऐसा अपना मन नहीं बनाना है । बल्कि ऐसा अभ्यास करो कि आज यदि यह मन में आया कि खोवा के पेड़े खाने हैं तो ऐसा आज मन में क्यों आया? तो आज मैंने खोवा के पेड़े का त्याग किया । इसी तरह जो इच्छा जगे, जिस वस्तु की वांछा हो उस वस्तु का त्याग करके चलें । कभी-कभी ऐसा अभ्यास बनाएँ, संयम करें, अपनी इंद्रियों को अपने काबू में रखें और ज्ञान की वृद्धि करें, परमात्मस्वरूप में उपयोग ले जाएँ । मेरा सहार करने का स्वभाव नहीं है । इसका स्वभाव तो ज्ञाता-दृष्टा रहने का है । ऐसे इस चैतन्यस्वरूप अपने को निरखें तो यही अभ्यास बढ़कर हमारे मोक्ष का मुख्य कारण बनता है । यह सारा परिग्रह, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और कालद्रव्य―ये समस्त परपदार्थ मेरे द्रव्य से अत्यंत जुदे हैं । मेरा स्वरूप तो अनंत चतुष्टयमय है । पूर्णज्ञान, पूर्णस्थिति, पूर्ण आनंद और पूर्णशक्ति है; ऐसे अनंतचतुष्टयस्वरूप निज आत्मद्रव्य से ये 5 प्रकार के पदार्थ बिल्कुल भिन्न हैं ।

देखिए भैया ! जैनशासन में पदार्थों के स्वरूप की और संख्या की कितनी यथार्थता कही गई है । मोटे रूप में तो 2 पदार्थ समझ में जल्दी आते हैं जीव और पुद्गल । पुद्गलशब्द जैनसिद्धांत में अधिक मिलता है । कितना बेजोड़ शब्द है यह? क्या कहेंगे इन सारी चीजों को हिंदी में कोई एक शब्द बतलाओ? ऐसा कोई हिंदी का शब्द बतलाओ जिसमें सारी चीजें आ जायें । इन सब चीजों को भौतिक पदार्थ कहते हैं । इस भौतिक शब्द से सारी मरीजों का अर्थ निकलता है । जो भूतकाल से उत्पन्न हुई हो उसे भौतिक कहते हैं । और भूत का असली अर्थ क्या है? धातु से लो । भूत के मायने जो होते हों उसका नाम भूत है, और होती है, जो चीज है उसका नाम भौतिक है । भौतिक शब्द में जीव नहीं है क्या? भौतिक में यह अर्थ नहीं पड़ा है कि यह चीज ग्रहण में आये और यह चीज न आये । और जैनशासन की व्यापकता देखिए शब्दशास्त्र में, पुद्गल शब्द का क्या अर्थ है जो पूर जाय, गल जाय, संचित हो जाये और बिखर करके अकेला हो जाये उसे कहते हैं पुद्गल । कैसा बेजोड़ शब्द है? प्रसिद्ध नहीं है इसलिए सुनने में अटपटा लगता है । किंतु अर्थ को देखो―तो इन सब पदार्थों का वाचक एक शब्द कुछ बढ़िया हो सकता है तो वह शब्द ‘पुद्गल ही बढ़िया हो सकता है । जीव में ऐसा नहीं है कि कुछ जीव मिलकर पूर जायें । जैसे बहुतसा आटा लेकर एक में मिला लिया, ऐसे 5-7 जीव मिलकर एक हो जायें ऐसा नहीं होता और वे जब पूरते नहीं हैं तो गलने का नाम हो क्या लगाया जाये ? इन समस्त दृश्यमान और इनके आधारभूत जो दृश्यमान न भी हों सबका नाम है पुद्गल । पुद्गल से अपने को भिन्न देखो ।

इसके आगे और अचेतन जाति में चलिये । धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्य । कैसा यथार्थ उपदेश है? इस लोक में धर्मद्रव्य प्रत्येक पदार्थ में व्यापक होकर फैला हुआ है । यहाँ भी है धर्मद्रव्य । उस धर्मद्रव्य का काम क्या है कि जीव पुद्गल चलें तो उनके चलने में सहायक बनता है । जैसे मछली के चलने में जल सहायक है । जल मछली को जबरदस्ती नहीं चलाता है, पर मछली चलना चाहे तो जत का आश्रय पाकर चल देती है । जल न हो तो नहीं चलती है । इसी प्रकार सर्वलोक में धर्मद्रव्य व्यापक है । धर्मद्रव्य न हो । तो जीव पुद्गल चल नहीं सकता । धर्मद्रव्य हम-आपको जबरदस्ती नहीं चलाता है । जब हम चलने की क्रिया में परिणत होंगे तो धर्मद्रव्य हमारी गति में सहायक है । यह धर्मद्रव्य सूक्ष्म है, ईथर है, सर्वत्र व्यापक है, इस भावार्थ की कल्पना में वैज्ञानिकों ने कुछ-कुछ तो सोचा है कि इस आकाश में कुछ सूक्ष्म तरंगें हैं, जिन तरंगों का आधार पाकर हवा चलती है, शब्द चलते हैं । विदेश में रेडियो शब्द के उत्पादक से शब्द बोले जा रहे हैं, मगर वे शब्द गति करते हुए सब जगह व्यापक हो जाते हैं या उनका निमित्त पाकर और-और शब्द परिणमते हुए चले जाते हैं तो ऐसी कोई धर्मद्रव्य नामक भी सूक्ष्म वस्तु है जिसका आश्रय करके जीव और पुद्गल गमन किया करते हैं?

अधर्म द्रव्य जैसा कुछ भी काम हो रहा हो, उससे उल्टा काम अगर हो तो उसमें कोई नई चीज कारण बनती है । किसी अन्य कारण के बिना अनोखी बात नहीं हुआ करती है । चलते हुए जीव-पुद्गल ठहर जायें यह पहले से अनोखा कार्य है और वह कार्य अहेतुक नहीं है, उस ठहरने में अधर्मद्रव्य निमित्त है । यह भी धर्मद्रव्य की भांति समस्त लोकालोक में व्यापक है । आकाशद्रव्य को आप कहेंगे कि आकाश को तो सब मानते हैं । इसका नाम भी प्रसिद्ध है इंगलिश में स्काई बोलते हैं, संस्कृत में गगन बोलते हैं और उर्दू में आसमान बोलते हैं । यह एक पिंड है, एक चीज है । इस आकाश में सर्वत्र परिणमन होता है 1ऐसा यह अखंड किंतु अनंतप्रदेशी है । ऐसा आकाशद्रव्य कल्पना में न आयेगा । यह आकाश द्रव्य भी मुझसे पर है ।

अच्छा देखो―आप आकाश में रहते हो या आपमें आकाश रहता है? इन दो बातों को बतलाओ । आप आकाश में रहते हैं । ऐसा यदि कहेंगे तो यह बात नहीं बनती; क्योंकि जैसे कहा कि कलशे में पानी है तो पानी पहले कलश में न था । कलशा पानी से भरा हुआ रख दो तो आप कहते हैं कि कलश में पानी है और क्यों जी ! जब उस कलश में पानी न हो तो यह नहीं कहा जा सकता कि कलश में पानी है । तब तो यही कहेंगे कि कलश ही ऐसा है । इसी तरह यह मैं आकाश में न होऊँ, आकाश से अलग कहीं ठहरा होऊं और बाद में आकाश में आऊं तो-यह कहना ठीक है कि मैं आकाश में हूं । अरे ! आकाश है वह अपनी जगह और यह मैं आत्मा अपनी जगह हूँ । भले ही यह मेल मिल गया कि आकाश है बड़ा और तुम हैं छोटे । कभी आकाश के इस प्रदेश पर रहते हैं तो कभी चलकर हजार पाँच सौ मील दूर के आकाश प्रदेश में रहते हैं । पर आकाश आकाश में है और मैं अपने आपके स्वरूप में हूँ । दोनों स्वतंत्र द्रव्य हैं । मैं आकाश से अत्यंत भिन्न हूँ । चौथा अचेतन द्रव्य है पुद्गल । पांचवां द्रव्य है कालद्रव्य ।

अब देखो कालद्रव्य को भी, जैनसिद्धांत ने ही बताया है । लोक के एक-एक प्रदेश पर एक-एक कालद्रव्य बैठा है और उसका निमित्त पाकर उस कालद्रव्य पर पड़े हुए अनेक द्रव्यों में परिणमन का वह कालद्रव्य निमित्त बनता है, ऐसी बात कही । ऐसी सूक्ष्म बात जिसका कुछ मुक्ति और दिमाग से बहुत अभ्यास के बाद समर्थन किया करते हैं ऐसा तत्त्व जैनसिद्धांत में अनादि परंपरा से प्रकट होता चला आया है । इन 5 प्रकार के अजीव द्रव्यों से मैं चेतन अत्यंत भिन्न हूं―ऐसा जब इनसे भिन्न अपने आपकी श्रद्धा करते हैं तब यह जीव सम्यक्त्व प्राप्त करता है ।

देखो भैया ! ये सब पदार्थ जीव से चिपटे नहीं हैं । धरती आपसे चिपटी हुई नहीं है, कि आप चलें तो आपके साथ घर भी चल दे । अगर ऐसा होता है तो आपको कोई डर ही न था । देश-विदेश ही क्या कहलाता? जहाँ जाते तहाँ ही घर चिपटा रहता । तो घर चिपटा है क्या? नहीं । परिवार का कोई चिपका है क्या? नहीं । शरीर भी आत्मा से चिपका है क्या? नहीं । अगर शरीर आत्मा से चिपका होता तो कभी मृत्यु न होती । शरीर के साथ ही आत्मा बना रहता है और आत्मा के साथ रागद्वेष विकार चिपके हैं क्या? यदि आत्मा से ये रागादिक चिपके होते तो आत्मा के साथ सदा रहते । तो मैं इन सब परभावों से अत्यंत भिन्न हूं―ऐसे भाव कर्म, द्रव्य-कर्म, नोकर्म से रहित केवल ज्ञानप्रकाश मात्र जो अपने आपकी श्रद्धा करता है, वह जीव सम्यग्दृष्टि है, निकटभव्य है, संसार से पार हो जाने वाला है ।

भैया ! किसी भी, जगह आप जायें, पर लक्ष्य एक ही रखें, घर पर दुकान पर या मंदिर में आप रहें; कहीं भी रहें तो आपका एक अनूठा कोई लक्ष्य होना चाहिए । वह अनूठा लक्ष्य है, प्रभु के स्वरूप को जानकर अपने स्वरूप की ओर दृष्टि दें और सबसे न्यारा केवल ज्ञानमात्र अनुभव करें । इस विधि से ही संकटों से दूर होने का मार्ग मिलेगा ।

इस दोहे में यह बताया है कि जीव से संबंध रखने वाले भावकर्म, द्रव्यकर्म और नोकर्म हैं । वे निजद्रव्य से पृथक् चीजें हैं, हेय है तथा जो जीव से संबद्ध नहीं हैं, ऐसे बाकी के पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल, ये सब भी हेय हैं । कैसा विकट भाव बंधन है कि जिस पदार्थ में अत्यंताभाव है, रंच भी संबंध नहीं है, लाखों विकल्प करें, फिर भी कुछ अपना होता नहीं है, ऐसे बाह्यपदार्थों में भी यह सब विकल्प बनाकर बंधन में पड़ा हुआ है । मगर खुद ही कल्पना करके विकट बंधन में पड़ा हुआ है । हम प्रभु को इसी कारण पूजते हैं कि उन्होंने यह व्यर्थ का बंधन खत्म कर डाला । अब यह दिखाते हैं कि उनके ध्यान में इतनी सामर्थ्य है, वीतराग निर्विकल्प समाधि में इतनी सामर्थ्य है कि अंतर्मुहूर्त में ही कर्म के जाल को जला देती है ।


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