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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 114

From जैनकोष



जइ णिविसद्धु वि कुवि करइ परमप्पइ अणुराउ ।

अग्गिकणी जिमि कट्ठगिरिडहइ असेसु विपाउ ।।114।।

कोई भी पुरुष इस शुद्ध, कषायरहित ज्ञानमात्र, परमात्मतत्त्व में रुचि को करता है, अनुराग करता है वह पुरुष क्षणमात्र में समस्त पापों को जला देता है । जैसे अग्नि की कणिका काठ के पहाड़ को कुछ ही समय में जला देती है । जब सड़क पर बहुतसा कूड़ा इकट्ठा हो जाता है, तो भी भंगी लोग कूड़े को उठाकर नहीं फैंकते । वे आग लगाकर खत्म कर देते हैं । आग लगा देने से सब समाप्त हो जाता है । होली के दिनों में कितना काठ का संचय करते हैं, आग लगा दी कि खत्म हो गया । चाहे वह कुछ समय बाद में खत्म हो, मगर अग्नि की कणिका की सामर्थ्य तो देखो कि थोडीसी अग्नि इतने बड़े ईंधन के ढेर को जलाकर समाप्त कर देती है । इसी प्रकार यह निर्विकल्प समाधि क्षणमात्र में ही कर्मजालों को जला देती है । मगर जो यथार्थ काम है, जहाँ झंझट नहीं है, जो सदा के लिए सुख-शांति प्रदान करने वाला है, ऐसा यह आत्मा बंधन के कार्यों में क्यों लगा रहा है? जो बात तुम्हारे अधीन नहीं, कितना ही मनाओ, कितना ही श्रम करो, तब कहीं मेल खा सकता है और यह निजपरमात्मतत्त्व वह तो सदा हाजिर है । बस देखने वाले की देर है ।

बुंदेलखंड में एक राजमाता थी । सो उसका जो राजपुत्र था वह 10 वर्ष का था । मगर हजारों रुपया दान कर देता । जैसे कि आजकल बच्चे को 2 आने चार आने खर्च के दे देते हैं । वैसे ही उस राजपुत्र के हजारों रुपये रोज खर्च होते थे । एक दिन राजमाता ने पूछा, बेटा ! यह जो सामने पहाड़ है, उस पहाड़ जितना स्वर्ण का ढेर तुम्हारे सामने रख दें और कहे कि यह दान में दो तो तुम कितने दिनों मे दान कर दोगे ? तो राजपुत्र बोलता है कि माँ ! मैं तो आधा मिनट में सब दान कर दूँगा । अब दान लेने वाले जितने दिनों में उठा सकें सो वे जानें । दान देना तो एक त्यागभाव का नाम है । इसी तरह परमात्मतत्त्व सदा मेरे में विराजमान है । अब देखने वाले जब देख सकें, तब देखें ।

जैसे अग्नि की कणिका काठ के पहाड़ को जला देती है, इसी प्रकार यह निर्विकल्पसमाधि एक-दो सेकंड को भी अपने शुद्धज्ञानस्वरूप पर दृष्टि जाय तो यह पापों के समूह को भस्म कर देती है । भैया । एक आध सेकंड की कमाई अनंतकाल तक आनंद देगी । और यह बाधक परद्रव्य के विकल्पों की कमाई जिस समय पास में है, उस समय भी दुःख दे रही है । आ चुकी है तो उसकी रक्षा करने के विकल्प का दुःख है । रखे-रखे ही टोटा पड़ जाए, लुटेरा लूट ले जाए या राज्य हर ले तो उसका क्लेश होता है । और कदाचित् कोई बीमार हो जाय तो उसके पीछे 10-20 हजार खर्च हो जायें । खैर, इसमें तो लोग क्लेश नहीं मानते क्योंकि वे समझते हैं कि किसी तरह से जान तो बच गई । परिग्रह संबंधी उपाधि की कमाई, इनका विकल्प यह सब हित का कारण नहीं है । हित का कारण तो वस्तुस्वरूप का यथार्थज्ञान है, जिससे यह आत्मा निर्विकल्प होकर अपने आत्मस्वभाव का आलंबन लेता है ।

अब इस ही अर्थ को स्पष्ट करने के लिए आगे कह रहे हैं कि यह तत्त्व ध्यानरूपी अग्नि की कणिका चिरकाल से संचित किए हुए कर्मों की राशि को जला देती है । इस समय हमारी आपकी आत्मा में जो कर्मबंध पड़े हुए हैं, ये किस समय पड़ गए होंगे? कौन अनुमान कर सकता है? 100 साल पहले पड़ गये होंगे? हजार वर्ष पहले ये कर्म बंध गए होंगे? करोड़ों साल पहले ये कर्म बंध गए होंगे? अनगिनते वर्षों पहले, लाखों, कोड़ाकोड़ी सागरों वर्ष पहले ये कर्म बंध गए होंगे । ऐसे इस संचित कर्मों की राशि को जलाने में समर्थ यह तत्त्वज्ञान की कणिका है । कौन से तत्त्व का ध्यान? निज शुद्ध आत्मतत्त्व का ध्यान । यह अपने स्वरूप से ज्ञानमात्र है, यह स्वयं अपने आपकी सत्ता के कारण जिस स्वरूप वाला है केवल उसका ध्यान उसमें करना है । फिर परद्रव्यों को व परभावों को ऐसे शुद्ध आत्मतत्त्व के ध्यानरूपी अग्नि की कणिका अंतर्मुहूर्त में ही जला देती है ।

अग्नि कणिका एक महावायु के द्वारा प्रज्ज्वलित की जाती है । वह कौनसी वायु है? जो समस्त संकल्प-विकल्पजालों की त्यागरूपी महावायु है । ध्यान बढ़ता है तो विकल्पजालों के त्याग से बढ़ता है । जब ज्ञान सच्चा आयगा तो एक भी विपत्ति न आयगी । शायद कभी हजारों का टोटा पड़ जाय तो भी विपत्ति नहीं नजर आयेगी । शायद कभी किसी इष्ट का वियोग हो जाए तो भी विपत्ति नहीं नजर आयगी । इस ज्ञान की बड़ी महिमा है । यह ज्ञान ही सुख एवं शांति का कारण है तो यह ज्ञान कैसे बड़े? समस्त संकल्पविकल्पजालों के त्यागरूपी महावायु के चलाने से ये ध्यान की, ज्ञान की ज्वाला बढ़ती है ।

देखो तो भैया ! ये विकल्पजाल किस-किस किस्म के हैं? मुनिराज भी बान गए । फिर भी किसी-किसी के विकल्प बने रहते हैं । फिर गृहस्थों के विकल्प तो उनसे भी कई गुणे अधिक हैं उन मुनिराज को ऋद्धि प्राप्त हो जाए, तो उनके मद हो सकता है । अब आप बताओ कि ऊंची तपस्या होकर भी यह विपदा डाइन पीछा नहीं छोड़ती है । उस ऋद्धि का ही बड़ा चमत्कार बताया करते हैं । कुछ मनोज्ञ हो गए, कुछ अच्छा भोजन मिलने लगा या पूछ होने लगी, उसका गौरव होने लगता है । कुछ समझदार हो गये, कुछ कविता बनाने लगे, कवि कहलाने लगे, उसका भी मद हो जाता है । लोगों के बीच में अपनी कुछ महत्ता बताना, इस प्रकार के कुछ घमंड के भी काम होने लगते हैं । बड़े-बड़े व्याख्यान देने लगे, लोगों की बड़ी-बड़ी समस्याओं का और प्रश्नों का समाधान भी करने लगे तो उससे भी कुछ मद हो जाया करता है । अच्छा राग है, अच्छे शब्द हैं, बोलने लगे, उससे भी गौरव होने लगता है । ऐसे ही कितने ही विकल्पजाल बताए जायें । उन विकल्पजालों की त्यागरूपी महावायु से प्रज्वलित शुद्ध आत्मतत्त्व के ध्यानरूपी अग्नि की कणिका अंतर्मुहूर्त में ही चिरसंचित कर्मराशि को जला देती है ।

हम और आप कुछ प्रेक्टिकल काम करें, क्योंकि संसार में आकर मनुष्यभव पाया । यह बहुत बड़ा जीवन है । प्रेक्टिकल काम क्या है? इन 24 घटों में से 10 मिनट तो अपने को सुरक्षित बना लें । ऐसी हिम्मत करें कि जिसका जो होता हो तो हो, उनका उदय उनके साथ है । उन पदार्थों का परिणमन उनके अनुसार होगा । रात-दिन विकल्प आते हैं तो क्या उनसे सिद्धि हो जाती है? नहीं । जैसा विकल्प होता है, क्या वैसी तो बाहर में बात बन जाती है? नहीं । बनती होगी 5 मिनट में, पर विकल्प बनाते हैं 24 घंटे । अरे ! 10 मिनट तो ऐसे सुरक्षित रखो, भगवान् के नाम पर, कि उन क्षणों में कुछ भी हमें परद्रव्यों का विचार नहीं करना है । अपने आपसे उस ख्याल को छोड़ दो कि मैं मनुष्य भी हूँ, मेरा मनुष्यपने का नाता नहीं है । बन गया हूँ मनुष्य । फंस गया हूँ देह में । पहले और भी बुरी देह में फंसा था, अब कुछ अच्छी देह में फंस गया हूँ, पर फंसा ही हूँ । मैं मनुष्य नहीं हूँ । अपने को मनुष्यपने से मना करके स्वरक्षा में अपने 10 मिनट तो गुजर ही जायें ।

भैया ! बाहर में जिस जगह जो है, सो है, रहेंगे, वहाँ जाकर मिल जायेंगे । पर 10 मिनट को तो सबसे उपयोग हटाओ कि कहीं मेरा कुछ नहीं है । मेरा मात्र मैं यह ज्ञानप्रकाश हूँ, आकाशवत् अमूर्त शरीर से अलिप्त हूँ । ऐसे इस चिदानंद भगवान् की सच्चाई के साथ उपासना में 2 मिनट भी बीते, तो वहाँ वैसा आनंद होगा, जैसा कि आनंद भगवान् प्राप्त करते हैं । उसी जाति का आनंद प्राप्त होगा, जिस जाति का आनंद भगवान को मिला करता है । उसी आनंद में, समाधि में, तत्त्वध्यान में ऐसी सामर्थ्य है कि चिरसंचित कर्म क्षणभर में ही जल जाते हैं । इस कथन से शुद्ध आत्मा के ध्यान में सामर्थ्य जानकर, हे भव्यजीव ! उसी शुद्ध आत्मतत्त्व की निरंतर भावना करना चाहिए ।

भैया ! सत्संग से बढ़कर दुनिया में और कोई आनंद वर्द्धक प्रसंग नहीं है । मोहियों के संग से क्या लाभ लूट लोगे? बातें भी कैसे बोली जाती हैं कि जिनका न सिर न पैर । कहीं की बात कहीं ठोक दी । गप्पें ही तो करते हैं । जिन बातों से कोई प्रयोजन नहीं कि भाई ! ऐसी बात बोले बिना हमारा गुजारा ही नहीं होता । ऐसी बातें नहीं बोली जाती हैं । उस गप्पचक्र में तो अंट्ट-संट्ट की बोली बोली जाती है । कोई सच्चाई की और सत्पथ की बातें सुनने से उन मोहियों का दिल नहीं बहलता । अगर एक दूसरे से बढ़कर बात टांगकर जो गप्प मार सके वही तो बढ़िया कहलायेगी और वहाँ ही मौज मिलेगी । मोहियों की गप्पों में ऐसा होता है । मोहियों के संग से क्या लूट लिया जाएगा? अंत में जिसे कहते, हैं, अपनासा मुँह लेकर रोती शक्ल से बस, चारपाई पर जाकर सो गए । उन गणों में तो बज गए 11, सो नींद के मारे रोती हुई शक्ल में जाकर खटिया पर पड़ गये और सो गये । वहाँ मिला क्या? अपना चित्त गंदा किया । कर्मबंध ही किया, मिला कुछ नहीं । केवल अपना ही अपना नुकसान किया ।

एक सत्संग ही धन्य है । इसकी महिमा तो सब जगह सुन ली । कहीं अगर थोड़ी कथा भी होती है तो लोग कहते हैं कि सत्संग हो रहा है । कहाँ जा रहे हो? सत्संग में जा रहे हैं । कोई बड़ा धार्मिक उत्सव हो तो उसको भी लोग बोलते हैं कि सत्संग में जा रहे हैं उस सत्संग का नाम ही बहुत बड़ा है तो मोह छोड़कर अपनी सद्गोष्ठी बनाओ । सत्संगी बनकर अपनी आत्मा को विश्राम देना चाहिए । बुद्धि को विश्राम धर्म की बात ही दे सकती है । ऐसे शुद्ध आत्मतत्त्व का ध्यान, सत्संग व ज्ञानार्जन करना चाहिए और गुरुजनों की उपासना करनी चाहिए । अब यह निरूपण करते हैं कि हे जीव ! तू समस्त चिंताजालों को छोड़कर इस शुद्धस्वरूप को निरंतर देख।


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