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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 35

From जैनकोष



जो समभाव परिट्ठियइ जीइह कोई फुरेइ ।

परमाणंद जणंतु फुडुं सो परमप्पु हमेइ ।।35।।

यह परमात्मा उनको दृष्ट होता है जिनको जीवन और मरण आदि में समता परिणाम हो । कोई अलौकिक निधि है यह जिसके देख लेने पर मरण की भी यह उपेक्षा कर जाता है । मरण आता हो तो आए यदि मैं अपने शुद्ध ज्ञानस्वरूप को उपयोग में लिये हुए हूँ तो चाहे मरण आये उस समय भी समाधि परिणाम में रहूं, मृत्यु होने का फल तो उत्तम है । मरण का भय उन्हें होता है जिन्हें इन समागमों में लोभ है, तृष्णा है, रुचि है, मेरा इस जगत् में कहीं कुछ नहीं है, मेरा तो मात्र यह मैं आत्मा हूँ और यह शुद्धआत्मा मेरे उपयोग में रहे ऐसी स्थिति में मैं इस दुनियां को छोड़कर किसी भी दुनियां में चला जाऊं तो मेरी हानि नहीं है । विकल्प करते हो, राग और द्वेष की परिणतियां बनी हों तो चाहे डाक्टरों के बीच में हो, लड़का लड़कियों के बीच में हो तो भी हानि ही हानि है । ये लोग क्या साथ दे देंगे? इसलिये ज्ञानी संतों का ऐसा दृढ़ चित्त रहता है कि समता परिणाम में रहूं । मेरा कुछ भी बना रहे अथवा न रहे, कुछ भी हुआ करे उसमें मेरा लाभ ही है । जीवन और मरण इन दोनों में से जरा सोचो कि अनर्थ कार्य कौन है? जन्म है अनर्थ कार्य कि मरण है? मरण के बाद मुक्ति होती है और मलिन जीव से संसार की गतियां होती हैं । पर जीवन के बाद मुक्ति किसमें हुई? निर्विकल्प का पूर्वरूप जन्म है कि मरण है? जब आयुकर्म का क्षय होता है तो वह जीव मुक्ति को प्राप्त होता है । आयुकर्म का क्षय कहो या मरण कहो, एक ही बात है । अरहंत भगवान् के मरण का नाम पंडितपंडितमरण है । मरण शब्द को लोग असगुन बताते हैं । भगवान् के मरण का नाम मरण नहीं कहा उसको निर्वाण कहते हैं, किंतु मरण का नाम यही है ना, आयु का विनाश । आयु का विनाश अरहंत भगवान् के भी होता है । सभी कर्मों का विनाश मरण के बाद में होता है पर जन्म के बाद किसी का निर्वाण होता है । दूसरी बात यह है कि जन्म का समय कोई समता परिणाम को लिये हुए नहीं होता पर मरण के समय में समतापरिणाम हो सकता है, और समतापरिणाम जिस स्थिति में रहता है वह तो है उपादेय और जिसके समतापरिणाम नहीं रहता है वह है अनुपादेय । जन्म के समय में समतापरिणाम किसी में हो, पुराणों में पाया हो या कहीं समझा हो तो बतलावो । जन्म में समतापरिणाम होता ही नहीं है । चाहे तीर्थंकर का भी जन्म हो मगर जन्म के समय भी तीर्थंकर के भी समता आत्मसमाधि परिणाम नहीं होता है । मरण के समय में हो समाधि परिणाम होता है । समाधिमरण तो लोग कहा करते हैं पर समाधि जन्म भी कोई कहता है क्या? अच्छा जन्म और मरण में से भला कौन है? मरण । मगर ये मोही लोग इस मरण से भय खाया करते हैं, सो भय खाने की चीज मरण नहीं है । भय जो उत्पन्न होता है जीव के वह मोह रागद्वेष के कारण होता है । कोई भी पुरुष मर रहा हो ऐसे मरण के समय उसके घर में राग नहीं है, परिवार में राग नहीं है, किसी का विकल्प नहीं है और अपने एक शुद्धज्ञानस्वरूप को ही तक रहा है तो उसको कोई संकट नहीं । साधुजन जीवन और मरण, इनमें समतापरिणाम रखते है । लाभ और अलाभ में भी जिन योगियों में समतापरिणाम होता है उन योगियों में परम शुद्ध आनंद उत्पन्न करते हुए यह शुद्धआत्मा प्रकट होता है । एक जगती की टीका में दृष्टांत दिया है कि नई बहू के जब उसके गर्भ रहा और गर्भ का दिन पूर्ण हुआ तो सास से कहती है सासजी जब बच्चा हो तब मुझे जगा लेना । ऐसा न हो कि मेरे सोते में ही बच्चा हो जाय तो सास जवाब देती है कि बहू डर मत । बच्चा पैदा होगा तो तुझे जगाता हुआ पैदा होगा । यह कारणपरमात्मा शुद्धआत्मा जिनको दृष्ट होता है, उनके उपयोग में प्रकट होता है । प्रभु के दर्शन हो चुके, उनका चिह्न क्या है? उनका चिह्न है अनुपम अलौकिक शुद्ध सहज आनंद का अनुभवन । इन लौकिक भोगविषयों के कल्पित सुख को छोड़कर वास्तविक आत्मीय सुख का अनुभव जिसे हुआ उसे प्रभु के साक्षात् दर्शन हुए समझना चाहिये । हम संकल्प विकल्प मचाया करते हैं और चाहते हैं कि मुझे प्रभु के दर्शन हो तो यह नहीं हो सकता है । परपदार्थों की रुचिपूर्वक बैठाते हुए आसन पर प्रभु विराजमान नहीं होता । जब आपके घर कोई मेहमान आफिसर आदि आते हैं तो आप अपने घर को बहुत सफाई किया करते हैं । तो जब हम प्रभु को अपने हृदय में विराजमान करना चाहते हैं तो प्रथम कर्तव्य तो हमारा यह है कि हम अपनी हृदय भूमि को हृदय आसन को स्वच्छ बनाएँ । हृदय की स्वच्छता यही है कि किसी परपदार्थों में राग और द्वेष न बसे । लोग परिवार में मौज मानते हैं, धन वैभव में मौज मानते हैं, हर्ष मानते हैं पर ये सब खाक हैं, विनाशीक हैं, भिन्न हैं, विकल्प उत्पन्न करने के कारण हैं । इन दृश्यमान् मायामय पदार्थों से इस मुझ आत्मा का कभी भी हित नहीं होता है । ध्रुव तो यह बताओ कि मैं आनंदस्वरूप हूँ, मुझमें मेरा सत्य स्वभाविक आनंद प्रकट हो, मुझे इस आनंद की चाह है । मैं अन्य मोजों को नहीं चाहता हूँ । यह आनंद निधान शुद्धआत्मा, परमात्मदेव, कारणपरमात्मा समयसार हम आपमें नित्य विराजमान हैं । पर हम उसकी ओर दृष्टि न करें तो उस आनंदनिधि का हमें अनुभव कैसे हो? हमारी इस ओर दृष्टि नहीं है । इसका कारण है कि अज्ञानवश इसने पंचेंद्रिय की ओर, मन के विषयों की ओर दृष्टि दी है, वे विषयों का ही परिचय पाया करते हैं और उनका ही अनुभव किया करते हैं । पर जो नित्य व्यक्त है अंतरंग में, अंतरंग में प्रकाशमान सदा सत् यह शुद्ध प्रकाशमान् आत्मतत्व कहीं ढूंढा नहीं जाता है, कहीं पैदा नहीं करना है किंतु अपने एक उपयोग नेत्र को निरखना है । यह निरखन जब होगा तब पंचेंद्रिय के भोगविषयों में रुचि न रहेगी । पंचेंद्रिय के विषयों की रुचि न रहे इसके लिये यत्न करना होगा वस्तुस्वरूप का यथार्थज्ञान करने का । हम और आपकी यदि कुछ शरण है तो वह ज्ञानभाव शरण है । भटकते बहुत जिंदगी तो हो चुकी है । कितना तो भटक चुके हैं । जन्म से लेकर अब तक क्या-क्या कल्पनाएँ नहीं की है, किन-किन स्वप्नों में नहीं रहा हूं? इतना-इतना करने के बाद भी आज पूछा तो शांति मुझमें नहीं आई है, शांति यदि अपने में खोजें तो शून्य ही मिलेगी । शांति नहीं पाई, कुछ आनंद नहीं पाया तो हम तो ज्यों के त्यों रह गये । अब रही सहो जिंदगी है । कुछ ही रही सही जिंदगी में कुछ अनोखा काम करने की सोचें । जैसे काम करते आये हैं उन कामों में तो शांति और आनंद अब तक नहीं मिला । अब तो कुछ विलक्षण काम करिये । लगातार 8-10 वर्ष तक जिस दुकान में टोटा पड़ता है उसको बंद करके नया व्यापार करने की सोचते हैं । तो 40-50 वर्ष तक रागद्वेषों का रोजगार करते हो गये, टोटा ही टोटा, क्षोभ ही क्षोभ रहा, नुकसान ही होता चला आया, तो अब हमारा कर्तव्य है कि अपने खोटे रोजगार को बंद करके कोई अनोखा रोजगार करें । खोटा रोजगार है परदृष्टि, अनोखा रोजगार है निजदृष्टि । निज को निज पर को पर जान, फिर दु:ख का नहीं लेश निदान । आप तो यह सोचते होंगे कि ऐसा साधु संत ही कर सकते होंगे, गृहस्थ के बस की बात नहीं है । पर विचारो यह कि आत्म स्वभाव का स्पर्श होना, श्रद्धान् होना यह किस बल पर हुआ करता है? ज्ञान बल पर । जैसे हम अन्य-अन्य चीजों को जाना करते हैं उनको न जानकर कुछ अंतर में ही अपने आपके जानने में लग जायें तो क्या हमें अन्य चीज जानने में न आ सकेगी? आयेंगी । अंतर इतना होगा कि चूँकि हमारी स्थिति गृहस्थी के वातावरण की है सो थोड़ी देर हम उपयोग का ज्ञानस्वभाव का स्पर्श कर लेंगे, मगर स्थिरता नहीं आ सकती है । फिर विकल्प आ पड़ेंगे उन बाधक विकल्पों को दूर करने के लिये जिस तरह के ज्ञानानुभव का उत्कृष्ट आनंद मैंने सदाकाल बर्ता उसको बर्तू । इन भावों से गृहस्थी का त्याग किया जाता है । परिग्रह का संन्यास किया जाता है क्योंकि संन्यास अवस्था से किसी पर परिग्रह में यदि उसकी बुद्धि नहीं लगती है तो ऐसी स्थिति में हम अपने शुद्ध ज्ञान के अनुभव में स्थिर हो सकते हैं । चाहे एक तोला भर रसगुल्ला खा लें, चाहे पावभर रसगुल्ला खालें एकसा स्वाद आता है । यह तो तोला भर खाने वाले लोग जान जायेंगे । छक कर नहीं खा सके इतनी ही बात है और वह स्वाद आये बिना इस स्वाद को निरंतर लेते रहने के लिये उत्सुकता कैसे आ गई? गृहस्थावस्था में भी ज्ञानानंद का अनुभव होता है, यदि न हो ज्ञानानंद का अनुभव तो श्रमण बनने के लिये, परमेष्ठित्व प्रकट करने के लिये उसको उत्सुकता कैसे आ गई? यह शुद्धआत्मा समाधिभाव में स्थित ज्ञानी संतों को एक अलौकिक आनंद देते हुए प्रकट होता है । जिनका जीवन और मरण में समतापरिणाम है, जिनका लाभ और अलाभ में समतापरिणाम है, जिनका सुख और दुःख में समतापरिणाम है, आप बतलावो गृहस्थी में कौनसा सुख भोगा? बीते हुए सुख को आप दुःख ही मान जायेंगे । पर आगामी काल तक भोगे जानेवाले सुख को दुख मानना कठिन पड़ेगा । कितना-कितना तो रोज खाने का सुख लूटा, परिवार में राग करने का सुख लूटा पर आज आपसे पूछें कि बतलावो कितना सुख आपने लूटा? तो आपकी समझ जल्दी आ जायगी कि सुख नहीं लूटा वह दुःख ही था । जब आपके पिता लोग जीवित थे और कितने प्यार से आपको देखते थे पर गुजरने के बाद आप यह कह उठेंगे कि वह भी कुछ सुख न था, वह दुःख ही था । मोह से उनके लाड़ से समझकर मैं उनकी ओर झुक रहा था पर जब वियोग हुआ तो अनंतगुणा कष्ट हुआ । वह सब सुख दुःख ही था । एक पिता की बात क्या? और जितने भी आपको सुख हुए हैं स्त्रीसुख विषयसुख, आज पूछा जाय तो उन भोगों को भी आप दुःख मान जायेंगे । जैसे भोगे हुए सुखों को आप दुःख मान सकते हैं इसी प्रकार भावी काल में जिसकी आशा लगाये हैं ऐसे सुख को भी दुःख मान जायें तो समतापरिणाम में क्या रुचि नहीं हो सकती है? कौनसा सुख वास्तव में है सो बतलावो । ये भोग सुख प्रथम तो कर्माधीन हैं, कर्मों का अनुकूल उदय हो तो ये भोगों के सुख मिल सकते हैं । इतना ही नहीं उदय तुम्हारा ठीक है तो सुख मिल ही जाय । उदय है पर साथ ही नौकर्मों का भी समागम उचित मिला नहीं तो कितने ही कर्मों के उदय योग्य साधनों के न मिलने पर यों ही खिर जाया करते हैं । अभी कुछ गणों में सिलसिला यदि छेड़ा जाय तो नींद लेते होंगे तो उनकी भी नींद खतम हो जायगी और गप्पों के सुनने में बड़ी सावधानी से हाथ पैर कमर को ठीक सीधा करके सुनने लगेंगे । संभव है निद्रा कर्मों के उदय से भी चल रही हो, मगर नौकर्मों के साधन से मौज मिल रही है । गप्पों के सुनने में मौज मिलता हो तो गप्पों का काम खतम हो गया है । इसी तरह कितना ही उदय परिवर्तित हो जाता है तो साधन सब कुछ हो जाने पर आपको कल्पनाओं से सुख मिल भी गया तो वह सुख क्षण में खतम भी हो जाता है, और उस सुख के मिट जाने के बाद दो बातों का पछतावा आता है कि लो बड़ी मुश्किल से सुख मिला और वह भी खतम हो गया अथवा लो वह सुख नहीं था, बड़ा कष्ट था । मैंने अपनी बड़ी बर्बादी की, यों पछतावा होता है । यह सुख विनाशीक है । विनाशीक भी हो किंतु आप कहेंगे कि जब तक सुख मिले हैं तब तक तो मौज से सुख भोगेंगे ना? तब तक भी मौज नहीं है । उन सुखों के बीच में अनेक दुःख आया करते हैं ।

आपको अपने बच्चे की शादी करनी है । एक सुख की बात है ना? शादी के प्रसंग में महीना दो महीना तो लग ही जाते हैं तैयारी करने में, आमंत्रण पत्र छपाने में । कहीं उन रिश्तेदारों को मनाओ, कहीं वे रूठ गये उनको मनाओ । ये पंच रिश्तेदार लोग शादी ब्याह आदि के मौके पर जबकि भोज होता है तब बड़े दांव पेंच करते हैं । तो उस सुख के प्रसंग में भी यह बतलावो कि कितने दुःख भोग रहे हैं, यह नहीं हुआ, वह नहीं हुआ, इधर दौड़ रहे हैं, उधर दौड़ रहे हैं । कितने-कितने दुःख आ रहे हैं । एक कल्पना से मान लिया कि सुख है, पर वास्तविक सुख नहीं है । हुए हैं ये समागम, पर बच्चे की शादी कर देने के बाद आत्मा में वृद्धि क्या हो गई सो बतलावों । है यह काम गृहस्थी का पर श्रद्धा की बात पूछ रहे हैं । कौनसा आत्महित होगा? इस प्रकार के अनेक दुःख देख लिये । अभी लड़के की शादी में यह इच्छा हुई कि मिष्ठान्न भोजन बनवाना चाहिये तो सामग्री जुटवाई, मिठाई बनाने वाले को मनाया, जब मिठाई बन रही है तो ऐसी जो प्रतीक्षा है, टाइम लग रहा है उसमें व्याकुलता मिष्टान्न पक गया । उसके बाद भी व्याकुलता, भोजन करते समय भी आकुलता, भोजन खाने पीने में भी बेहतासा । उसको खाने पीने लग जाते हैं चाहे आप अपने बड़प्पन की वजह से मुख को थोड़ासा चलायें जिससे कि लोग जानें कि ये बड़े पुरुष हैं, खाने पीने के लोभी नहीं हैं पर खाते समय अंतर में जो चक्की चल रही है उसके भोगने वाले जानते हैं कि कितना विह्वल होकर उस सुख को भोगा करते हैं । कौनसा सुख है जो सुख कहा जाय? प्रारंभ में दुःख, मध्य में दु:ख, अंत में दु:ख । जो ज्ञानी संत पुरुष हैं वे सुख और दु:ख दोनों को समान समझते हैं । शत्रु और मित्र दोनों को समान समझते हैं । हे आत्मन् सर्वपदार्थों से निर्मल ज्ञानमात्र हे प्रभु ! तेरा परिणमन क्या जगत के अन्य जीवों के कारण हुआ करता है? नहीं । फिर जगत् के अन्य जीव तेरे साथी कहां और मित्र कहां? जैसे तू अपने विषयकषाय को चाहता है वैसे ही लोक में विषय कषाय चाहने वाले ये प्राणी हैं । इस विचार में यह समझ में आया कि देखो इनकी वजह से हमारी इन विषयकषायों से बाधा हुई । तो वे क्रोधवश दुर्वचन बोलने लगे । पर सच तो बतलावो दुर्वचन बोलने वाला क्या किसी के परिणमन को कर रहा है? वह तो अपने कषायों की चेष्टा करके अपने आपमें समाप्त हो रहा है । तू भ्रम करता और शत्रु मान रहा है । इसी प्रकार क्या तुम्हारा कोई मित्र है? अपना स्वार्थ निकला तो मित्र मानने लगे । नहीं तो कोई शत्रु मित्र नहीं है । सर्वजीवों का स्वरूप एक समान है, ऐसा शत्रु मित्र का जिसके समताभाव जगा इस समतापरिणाम के कारण शुद्धआत्मा का सच्चा विश्वास सच्चा ज्ञान और उसमें ही रमण होता है । इसको ही रत्नत्रय कहते हैं । इसको ही निर्विकल्प समाधि कहते हैं । इसको ही वीतरागभाव कहते हैं । ऐसे पवित्र समतापरिणाम में ठहरकर परमयोगियों को कोई शुद्ध आत्मा से प्रकट करता हुआ व्यक्त होता है । उनके ज्ञान में आता है । हे ज्ञानीसंत समझो वही परमात्मा है । वह परमात्मा मुझमें ही बसा है । उसके ज्ञान बल को देखकर तुम अपने संकटों को मिटा लो बस यही बड़प्पन है और यही विवेक है।

प्रकरण चल रहा है शत्रु और मित्र का । जगत में जितने भी जीव हैं वे सब अपने-अपने परिणामों से अपने कषायों के अनुसार अपने साधनों के पूर्ति की चेष्टा करते हैं । उन जीवों की कोई चेष्टा यदि तुम्हें अपने कषायों के प्रतिकूल मालूम पड़ जाय तो मानने पर वे जीव तुम्हारे शत्रु नहीं हैं । जैसे इसके अपने विषयकषायों की रुचि है इस ही प्रकार सब जीवों को, संसारी प्राणियों को अपने-अपने कषायों की रुचि है । तुम्हारा कोई शत्रु नहीं और किसी को शत्रु मानकर अपने विकल्प ही करोगे, कुछ भलाई न पावोगे । किसी जीव की यदि अपने पर शत्रुता जैसी चेष्टा हो गई है तो तुम उससे क्लिष्ट व्यवहार करके उस शत्रुता को तुड़ा सकते हो । जैसे कोई जगत में मेरा शत्रु नहीं है । इसही प्रकार जगत में कोई मेरा मित्र नहीं है । घर के लोग जो परस्पर प्रेम व्यवहार से रहते हैं, वे लोग कहीं आप पर प्रेम नहीं करते हैं । उन्हें अपना विषय, अपनी साधना, अपना स्वार्थ है, उनकी पूर्ति आपके निमित्त से होती है तो आपको स्नेहभाव दिखाते हैं, यह स्नेह परिणमन उनका ही है, तुम्हारा नहीं हैं । एक चुटकुले में कहते हैं कि एक स्त्री अपने पति से बहुत कहती थी कि हमारा तुम पर इतना अनुराग है कि तुम न रहोगे तो हम जिंदा न रह सकेंगी । भारी और-और बातें करे । एक दिन पुरुष ने परीक्षा लेने की सोची । तो बहुत दिनों से श्वास रोकने की साधना सिद्ध किया कि श्वास रोक लें तो आपको यह पता पड़े कि यह मर गया । रात्रि के 10 बजे के समय खीर हलुवा सब कुछ तैयार हो चुका, खाने की देर थी । खाने के ही समय पुरुष श्वास लेकर मरने जैसी अपनी वृत्ति बना ली । अब स्त्री बुलाती है कि आवो भोजन करो, तो वह देखती है कि ये तो मर गये । सोचा कि 10 बजे रात्रि को मर गये हैं, तीन चार बजे दिन को मर जाते तो रात्रिभर रोना न पड़ता । ये खीर हलुवा आदि बनाया है अगर अभी से रोने लगी तो सारी रात रोना पड़ेगा और खीर हलुवा बेकार हो जायगा । ये मर गये हैं तो मर गए हैं पहिले भोजन करें । छककर भोजन किया, रात्रिभर सोई, सुबह 5 बजे से रोना शुरू किया, लोग जुड़ आये । वह मरे जैसा टांगें पसारकर पड़ा था, मरने का रूपक बनाये हुए । जब उसे दरवाजे से लोग निकालने लगे तो दरवाजा छोटा था । वह टांगें पसारे था इस वजह से न निकल सका । उसे औंधा या, फिर सीधा किया, अनेक उपायों से निकाला पर न निकला । कुछ लोगों ने कहा देर क्यों करते हो? कुल्हाड़ी और कुदाली लाकर दरवाजे को तोड़ दो । स्त्री कहती है पंच लोगों अब तो हम ऐसी हो ही गये । अब दरवाजा न कटाओ इसमें 500) लगेंगे । ये तो मर ही गये, आखिर जला ही दोगे, इनकी एक टाँग कुल्हाड़ी से काटकर निकाल लो । कुछ युवक पार्टी थी, सुधारवादी, उनकी समझ में आया कि ठीक है, ये तो मर ही गये, आखिर जला ही दिये जायेंगे, कुल्हाड़ी से टांग काट लो । वह तो बनावटी था ही । उसने समझ लिया कि अब ऐसे तो काम न चलेगा । जब काटने ही वाले थे तो उसने एड़ियाई ली जिंदा होने का रूपक बनाया । सब लोगों ने समझ लिया कि जिंदा है, चले गए । यों देख लो, जगत में जितने जीव हैं सब अपनी-अपनी कषाय से अपनी-अपनी चेष्टा करते हैं । कोई प्राणी मेरा चाहने वाला नहीं है । कौन मित्र है? और मित्र भी हो तो वह तब तक निमित्त है तुम्हारे सुख में जब तक तुम्हारे पुण्य का उदय है । श्रीकृष्ण नारायणजी का और बलभद्रजी का कितना प्रेम था? होता ही है नारायण और बलभद्र का परस्पर में प्रेम पर जब आपत्ति आई तो बलभद्र ने परस्पर में क्या कर दिया जंगल यह तो सब लोग मानते हैं । सीताजी का और राम का कितना प्रेम था, पर हुआ क्या कि जीवनभर दुःख ही रहा । और वर्तमान में भी देख लो परस्पर में प्रीति भी हो तो भी सुख अपने कर्मों के आधीन है । अभी देख लो हमारे हितैषी ब्र0 जयानंदजी हर एक घर में कह देते हैं कि लाल मिर्च न डालो, सुनने वाले लोग समझते हैं कि लालमिर्च डालो । कहते हैं भले को मगर होता है उल्टा । करें क्या? जब उदय ही ऐसा है । फिर दुबारा कहते हैं क्या कहा? लाल मिर्च-मिर्च । न डालो तो पहिले ही कह दिया था । क्या कहा? यह लाल मिर्च । एक की नहीं घर-घर की बात है । उदय अनुकूल है तो दूसरे साधक है और उदय अनुकूल नहीं है तो कोई साधक नहीं है । कौन आत्मा का मित्र है? कौन शत्रु है? इस कारण वह ज्ञानी योगी संत जीवन मरण में लाभ अलाभ में, सुख दुःख में, शत्रु मित्र में समता भाव से पैदा है । इस कारण अपने शुद्धआत्मा का विश्वास मेरे ही ज्ञान और मेरे ही आचरणरूप भेदरत्नत्रय में रहता है अर्थात् वीतराग निर्विकल्प समाधि में रहता है । ऐसे परमयोगियों को कौन स्फुरित होता है कौन प्रतीत होता है? अपने ज्ञान में आता है क्या? एक कारणपरमात्मा । विश्वासपूर्वक यदि कोई परमात्मा की ओर झुके और अपने उस शुद्धस्वरूप की ओर झुके तो उसका यह यत्न निष्फल कभी न जायगा ।

एक कथा लिखी थी कि एक ब्राह्मण पंडित था । उसकी गाय चराने को ग्वाला रहता था । सो एक दिन पंडित ने उस ग्वाले से कहा कि आज एकादशी है, पावभर आटा ले जावो जंगल में भगवान् का भोग लगाना । भगवान् को खिला देना और स्वयं रवा लेना । ग्वाले ने कहा इतने में क्या होगा? पाव सेर हम खायेंगे, आधा सेर वे खायेंगे तो कम से कम आधा सेर आटा दो तो आधा सेर आटा वह लेकर चला । जंगल में अकन दो मोटे-मोटे टिक्का बनाया । बनाकर बोला भगवान् आ जावो, अब तैयार हो गया । बहुत देर न लगाना, भूख लगी है, कुछ देर तक न आये तो भगवान् पर नाराज होने लगा, बोला भगवान् आप बड़े दुष्ट हो, हमको तो भूख लग रही है और तुम आते नहीं हो । तुम जब आवोगे तब हम खायेंगे । बहुत से व्यंतरदेव रहते हैं । व्यंतरदेव, देवरूप में कपड़े पहिने हुए बंशी बजाते हुए आ गए । बोले हम भी खायेंगे । तो उसने कहा खावो पर ज्यादा न मिल सकेगा हिस्से भर मिलेगा । खाकर चल दिया । ग्वाले ने कह दिया कि दूसरी बार देर न करना । कहा अच्छा देर न करेंगे, मगर हम दो आयेंगे । कहा चाहे जितने आना मिलेगा हिस्से भर ही । दूसरी बार फिर ब्राह्मण ने आधा सेर आटा दिया । उसने तीन रोटियां बनाई । कहा आवो भगवान् वे आ गये । उनको भो उनके हिस्से भर खिला दिया । इस बार देव बोले हम 25-30 आयेंगे । कहा चाहे जितने आना मिलेगा हिस्से भर ही । सो तीसरी बार ब्राह्मण ने आधा सेर फिर दिया, ग्वाला कहता है कि तुम बार-बार आधा सेर देते हो, इस बार 25-30 आवेंगे । ब्राह्मण ने पूड़ियां बनवा दीं, एक सेर आटा भी दिया और ब्राह्मण ने सोचा कि क्या मामला है? ये कौन कहां से आ जाते हैं? वह एक पेड़ के नीचे छुपकर बैठ गया । सोचता है कि व्यंतरदेवों का कौतूहल क्या ऐसा हो सकता है? हमने तो ऐसा नहीं देखा । ग्वाला जब बाटियां बना चुका तो भगवान् को बुलाता है । जब देर हो गई तो आग्रह करके बैठ गया । देव आए 20-25 और खाकर चले गये । तो सत्य का आग्रह करके जो बैठ जायें आप अपने पिता के भी सामने तो चाहे आपका पिता न सुने पर दूसरे सुनने वाले जरूर मिलेंगे । आपका सत्य आग्रह हो तो सर्वपदार्थों के भावों में पदार्थों में जीवों में समतापरिणाम रखने वाले, आत्मस्वभाव के श्रद्धान ज्ञान आचरण में रहने वाले अर्थात् भेदरत्नत्रयरूप परिणमन करने वाले अर्थात् वीतराग निर्विकल्प समाधि में ठहरने वाले योगीजनों को निजपरमात्मा पर स्व शुद्ध आत्मा स्फुरित होता है, प्रतीत होता है । क्या करता हुआ यह कारणपरमात्मा प्रकट होता है? वीतराग सहज परमानंद को उत्पन्न करता हुआ । आनंद का निधान तो यह स्वयं है किंतु अपने आनंद स्वभाव का विश्वास नहीं करता । सो किसी परद्रव्य में अपनी आशा बनाए हैं आनंद पाने के लिये । सो जहाँ परदृष्टि है वहाँ विरुद्धानंद है । आनंद तो मिलेगा क्या, आनंद में बाधा आती है । अब भी जो परदृष्टि से कुछ-कुछ सुख माना जा रहा है वह अपने स्वभाव के विरद का फल है । वह अपने आनंदस्वभाव का रहा सहा प्रसाद है, जो थोड़ा बहुत सुख मिल रहा है । यह शुद्धआत्मा रागद्वेषरहित ही नहीं किंतु सब परद्रव्यों से भिन्न केवल अपने स्वरूप चतुष्टयात्मक सद्भूत यह आत्मा है । इस शुद्धआत्मा की दृष्टि में न राग की दृष्टि है, न वीतराग की दृष्टि है । कैसी भी स्थिति हो तो भी यह शुद्धआत्मा निरखा जा रहा है । वीतराग स्थिति हो तो वहाँ भी यह शुद्धआत्मा निरखा जा रहा है अर्थात् सर्व पर से भिन्न अपने स्वरूपास्तित्व से निवृत्त यह शुद्धआत्मा सर्व समाधि परिणति योग्यता में प्रकट दृष्ट होता है । कैसा भी हो? और ग्रंथों में अर्थात् आत्मा के सहजस्वरूप के अवलोकन में उपयुक्त हो रहा है । इस व्यवहार से मेरी स्थिति अलग रहती है । इस कारण उस योगी की इस समाधिभाव की वजह से कोई उत्कृष्ट आनंद प्रकट होता है । जन्म लिया है, कुछ पढ़ लिख गये हैं, बड़े हो गये, चतुर हो गये, अब भी बहुत आगे पढ़ रहे हैं । अमुक-अमुक विषय का अध्ययन किया है, व्यावहारिक बड़ी-बड़ी चतुराइयां भी जानते हैं । यह इतनी बड़ी प्रगति है । अध्यात्मदृष्टि कहते हैं कि तुमने अपने उपयोग को अपने केंद्र से हटकर इतना दूर जरूर फैला लिया इतना तो तब भी फैला था, जब तुम थोड़ा समझते थे । श्रद्धा भी पुष्ट थी । उपयोग इतना फैल गया है, तर्क वितर्क भी बहुत चलते हैं । यह उपयोग बहुत दूर भ्रम गया था । हां तो आत्मस्वभाव के प्रसंग से आत्मा का स्पर्श हो सकता है । तो उन जीवों के लिये यह बात नहीं कह रहे हैं किंतु आत्मस्वभाव से बहुत हटकर बहुत-बहुत लौकिक ज्ञानपटुता में बढ़ गये हैं, तो क्या बढ़ गये हैं? बढ़ नहीं गये हैं पर जितना बढ़ा प्रतीत हो रहा है उतना हटना है । लौकिक ज्ञान से और ज्ञानों से चतुराई हो जाती है पर वास्तविक ज्ञान तो अध्यात्म से मिलता है । अध्यात्मज्ञान में हमको लगने की आवश्यकता है तब जाकर शांति प्राप्त कर सकते हैं देखिये चारों गतियों में भिन्न-भिन्न कषायों की मुख्यता रहा करती है । नरकगति में क्रोधकषाय की मुख्यता है । तिर्यंचगति में मायाकषाय की मुख्यता हैं देवगति में लोभकषाय की मुख्यता है और मनुष्यगति में मानकषाय की मुख्यता है । मान, पर्यायबुद्धि अभिमान । मैं कुछ हूँ, चार के बीच में मुझे कुछ बनना है । अरे ये चारों भी माया जाल हैं, ये भी एक स्वप्न हैं । ये भी मिट जाने वाले हैं और यह चाहे करने वाले भी मिट जाने वाले हैं । सबसे बड़ा रोग हमारे आत्महित में बाधक है तो यही अभिमान अहंकार पर्याय बुद्धि । धर्म मार्ग में समाज पद्धतियों में, परिवार की योजनाओं में प्राय: कोई बाधक आ पड़ता है तो भूल में यह मान बैठा है । कोई आत्महित मिले और किसी प्रसंग में आकर मान हट रहा हो, मान चूर हो रहा हो, मान न रहता हो तो वह मानहितैषी अपनी ओर से मान को धूल में मिला देने का जोर लगाता है । मान हो रहा हो तो उसे धूल में मिलाता है । मुझे कुछ नहीं चाहिये यदि मैं मनुष्य ही न होता, किसी अन्य भव में होता तो मेरे लिये ये प्रसंग क्या थे? कुछ नहीं । जैसे अनेक संकट ऐसे आये होंगे कि जिनमें मृत्यु की पूरी संभावना थी । यदि उस स्थिति में ही गुजर जाते तब मेरे लिये ये प्रसंग क्या थे? मेरे लिये ये प्रसंग कुछ न थे । जब किसी दोषी की प्रशंसा कर दी जाती है तो वह दोषी उठ खड़ा होता है । किसी क्लास में किसी लड़के ने कोई बदमाशी की हो, कोई बेंत तोड़ डाला हो, जो कुछ किया हो और अध्यापक यदि उस कार्य की तारीफ क्लास भर में करने लगे, देखो तो कितना बढ़िया यह बेंत टूटा है इसे तो बाबू से भी ऐसा नहीं काटा जा सकता है ऐसी प्रशंसा कर दे तो वह दोषी स्वयं उठ खड़ा होगा जिसने बेंत तोड़ा होगा । इसी तरह से ये जगत् के जीव बस में आया करते हैं । प्रशंसा कर दिया तो जिसके लिये प्रशंसा की, उसे क्या नफा हुआ? नफा तो वह था कि मैं निर्विकल्प होता, ज्ञाता द्रष्टा की स्थिति में चलता पर प्रशंसा सुनकर क्षोभ आ गया, अपने आपको भूल गया । उस प्रशंसा से तो महान् विकार हो गया । हां कभी कोई प्रसंग ऐसा होता है कि प्रशंसा में जहाँ कि संभाल है ऐसा कुछ प्रसंग होता है । जैसे बहुत बड़ी पद्धति से किसी विषय में झूठी या सच्ची कोई निंदा फैल गई, उससे शल्य रहा और ऐसा शल्य चुभ जाय जिससे मेरा जीवन भी कठिन हो जाय, ऐसी स्थिति में तो प्रशंसा हित का कारण हो सकती है पर प्राय: प्रशंसा अहित का ही कारण होती है । जगत् में क्या चीज है? दुर्लभ नरजीवन पाया है । इसमें अपने आपमें हम शांति पायें इसकी दृष्टि और करना है । रहा सहा जीवन कुछ स्वयं देने में समाप्त हो जायगा । तो देखो ये सब चीजें अध्रुव हैं । शरीर पाया, वह भी अध्रुव है, मन भी विनाशीक है, वचन भी विनाशीक है, धन पाया है वह भी विनाशीक है । ये तो सब नष्ट होंगे ही, पर विनाशीक साधनों से कोई ऐसा उपयोग कर लिया जाय कि कोई अविनाशी लाभ हो सकता है, अर्थात् अविनाशी लाभ मार्ग में लग सकते हैं तो यह बहुत बड़ी लाभ की बात है । यह व्यवहार धर्म है, हम सबको रमने की व्यवस्था बनाए रखना है ।

जो व्रत तप आदि साधन हैं ये स्वयं निर्जरा के निमित्त नहीं बन पाते हैं किंतु व्रत तप के साधन विषयकषायों से बचने की एक स्थिति बना देते हैं कि ये तीव्र विषयकषायों में न लग पायें । ऐसी तीव्र स्थिति में यह जीव संभाले तो अपने मूल उद्देश्य में सुगमता आ सकती है । ऐसे व्रतों को धर्म कहते हैं । धर्म तो निश्चय से आत्मा के स्वभाव का नाम है । आत्मा के स्वभाव की दृष्टि करने का नाम धर्म का पालन है । और फिर इस धर्म के पालने की योग्यता इस जाननवृत्ति के प्रसाद से बनी रह सकती है । इस ही प्रवृत्ति को व्यवहारधर्म कहते हैं ।

यह योगी आत्मा अनुष्ठानिष्ठ है । इसका व्यवहार अलग है । इसका कोई ऐसा विचित्र आनंद उत्पन्न होता है कि जो आनंद कर्मों के क्षय का कारण बनता है । कर्मों का क्षय आनंद से होगा, क्लेशों से कर्मो का क्षय नहीं होता । सो हे प्रभाकर भट्टजी ऐसा कोई स्फुट होने वाला कारणपरमात्मा तत्त्व है उसको तुम उपमेय समझो । यह कारणपरमात्मा स्वयं वीतराग निर्विकल्प में रत पुरुषों के उपयोग में रहता है । तो यह कारणपरमात्मतत्त्व अज्ञानी जीवों को हेय हो रहा है । वह अज्ञानी उसका त्यागी हो रहा है । एक कथानक है, यों किंबदंती है कि एक बार नारद घूमते हुए नरक में गये तो वहाँ खड़े होने की जगह न थी, इतनी भीड़ थी । वहाँ से झट स्वर्ग में पहुंचे तो वहाँ देखा कि विष्णु महाराज पलंग पर लेटे हुए हैं और सब खाली पड़ा है । नारद बोले विष्णु तुम बहुत पक्षपाती हो, नर्क में इतने जीव भर दिए कि खड़े होने की जगह नहीं और यहाँ स्वर्ग में सब खाली पड़ा है तो विष्णु ने कहा, जावो तुमको मैं पासपोर्ट देता हूँ जितने जीव तुम स्वर्ग में ला सको ले आवो नारद पहुंचे । एक बूढ़े महाराज मिले, कहा―चलो तुम्हें स्वर्ग ले चलें । यह तो सभी जानते हैं कि बिना मरे कोई वहाँ जा नहीं सकता है, तो बूढ़ा बोला कि हमीं तुमको मिले स्वर्ग ले चलने के लिये और किसी को ले जावो । इसी तरह से 5-7 से कहा सबने जवाब दिया । अंत में नारद ने यह निर्णय किया कि बूढ़ों में हमारी दाल न गलेगी, चलो जवानों के पास चले । 4-6 जवानों के पास भी गए, नारद बोले चलो हम तुम्हें स्वर्ग ले चलें । जवान बोले कि अभी कच्ची गृहस्थी है, नई दुकान खोली है, नया-नया काम शुरू किया है हम नहीं चलेंगे । खैर इन्होंने तो ठीक कहा । सोचा कि अब बालकों के पास चलना चाहिये । एक 18 वर्ष का बालक तिलक लगाए पाठ कर रहा था, माला फेर रहा था, उसको नारद ने कहा तो वह चलने को तैयार हो गया, लेकिन थोड़ा सा ख्याल आया कि अभी 4-6 महीना पहिले सगाई हुई थी, तीन दिन बाद में शादी है, कुछ रिश्तेदार भी आ गये हैं सो अभी नहीं चलूंगा । पर महाराज कृपा करके आप 5 वर्ष के बाद में आना, जरूर चलेंगे । नारद 5 वर्ष के बाद में आए । बोले चलो । उसके एक लड़का भी हो गया था । कहा महाराज लड़का हो गया है इसको पैरों के बल खड़ा कर दें फिर चलेंगे । लड़के को पैरों के बल खड़ा होने में कितने साल लगेंगे? बीस साल सो अब 20 साल की हमें छुट्टी दो । 20 साल के बाद में जब नारद आये कहा चलो तो कहा महाराज लड़के की शादी कर दी है, नाती हो गया है नाती का सुख तो भोग लें आप 20 वर्ष के बाद में आना तब जरूर चलेंगे । 20 वर्ष के बाद में फिर नारदजी आए बोले, चलो स्वर्ग में अब तो वह वृद्ध हो गया, कहा महाराज नाती पुत्र कुपूत हो गये हैं । मैंने लाखों का धन बड़े परिश्रम से जोड़ रखा है इसकी कौन संभाल करे? आप इस भव में तो नहीं दूसरे भव में जरूर आना, मैं दया की भीख मांगकर कहता हूँ कि जरूर आना, मैं चलूंगा । सो वह मरकर सांप बन गया धन वाली कोठरी में । सो नारद वहाँ भी आये बोले चलो अब तो स्वर्ग । अपना फन उठाकर कहता है कि इस धन की रक्षा करने के लिये मैं यहाँ पैदा हुआ हूँ, पुत्र नाती कुपूत थे, कहीं कोई धन न उठा ले जाय । नारद बैकुंठ पहुंचे, विष्णु से बोले महाराज हम भी हैरान हो गये मनाते-मनाते । यहाँ कोई नहीं आना चाहता है । सो उपाधि ऐसी लगी है कि जीव के सुगमता से विषय आये पर कारणपरमात्मा जो स्वयं शरणभूत है इसकी ओर दृष्टि रखो और ऐसा होना बड़ा कठिन लग रहा है । किंतु यह साहस तो करना ही पड़ेगा यदि अपने को सुखी होना है, किसी दूसरे के बल के भरो से पर उत्थान नहीं होगा । सुख नहीं मिलेगा । अनंतभवों में सब कुछ भोग भोगा, अनेक पराजय हुए, लेकिन लोगों की निगाह में उल्लू जैसा ही बना रहा । गुरुजी कहा करते थे कि अगर दुनियां में सुखी रहना है तो उल्लू बनकर रहो । चतुर बनकर रहे तो अनेक आपत्तियां आयेंगी । प्रयोजन उनका यह था कि व्यवहार में खटपटे करने में आपत्तियां ही आयेगी । सर्व अन्य की आशा छोड़कर हमें रहना है, बाहर में कहीं हमें लगन नहीं लगाना है, लगन इतना अंतर में होना चाहिये, चाहे मौज हो, चाहे क्लेश हो, पर स्थिति में इतनी आदत रहे, धुन रहे कि निसर्गत: हम वीतराग सर्वज्ञ परमात्मस्वरूप की ओर झुके । हमें अपने वीतराग सर्वज्ञ के स्वरूप में ही झुकना चाहिये । जैसे बालक को कोई पीटता है तो वह भागकर अपनी मां की गोद में शरण पाता है । इसी प्रकार हम आप बालकों पर कोई उपद्रव ढाये तो हम भागकर अपनी अनुभूति और परमात्मतत्व मां की गोद में जाकर बैठ जायें । यही हम आपका शरण है और यही हम आपकी शांति का उपाय है ।

प्रत्येक पदार्थ अपने शुद्ध अस्तित्व में रहता है । शुद्ध अस्तित्व का अर्थ है कि केवल अपनी सत्ता से सत् है । कोई भी पदार्थ किसी दूसरे पदार्थ की सत्ता को लेकर सत् नहीं हुआ । यह आत्मा भी शुद्ध अस्तित्व में है अर्थात् केवल अपने अस्तित्व में है । कर्म का या शरीर का अस्तित्व लेकर सत् नहीं है और जब इस कर्म और शरीर से मिली हुई आत्मा में भी आत्मा को आत्मा के अस्तित्व से देखा जाय तो यह आत्मा कर्म और शरीर से बंधा है तो भी शरीर से रहित और कर्म से रहित यह आत्मा स्पष्ट प्रतीत होता है या शुद्ध आत्मा का विरोधी है कर्म और शरीर सो इन कर्म और शरीर में यद्यपि यह आत्मा बंधा है तो भी निश्चयतया यह आत्मा शरीरसहित नहीं हुआ है । इस तत्त्व का वर्णन करते हैं तथा इस दोहे में आचार्यदेव उपदिष्ट करते हैं―


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