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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 36

From जैनकोष



कम्मणि बद्धुवि जोइया देहि वसतुवि जोजि ।

हाइ ण सयलु कयावि फुडु मुणु परमप्पउ सो जि ।।36।।

हे योगी ! यह आत्मा यद्यपि कर्म से बंधा है, देह में रहता है, फिर भी कभी भी यह देहरूप वहीं होता है । जो देह में रहकर भी देहरूप नहीं होता है ऐसा केवल चैतन्यस्वभावमय आत्मा है उसको ही परमात्मा जान । परमात्मा कोई अलग से स्वतंत्र सारे विश्व का अधिकारी नहीं है कि कोई हम आपको जैसा चाहे जब चाहे सुखी बना दें, दुःखी बना दे । इस स्वरूप तंत्र स्वतंत्र जगत में ऐसा न हुआ, न होगा । परमात्मतत्व का अपने घट में स्वरूप देखो तो सब ज्ञात होगा । जैसे इस प्रजातंत्र राज्य में कोई एक अपने ही कुटुंब में राजा बनता ही चला जाय ऐसा क्यों है? इसी प्रकार इस स्वतंत्र जगत में प्रत्येक पदार्थ स्वतंत्रसत् हैं और स्वतंत्र सत् पदार्थों का समूह ही लोक है । तो ऐसा क्यों हो जाय कि किसी एक को अधिकार है कि जैसे चहे जीव को सुख और दुःख दे, अनेक आत्माओं को बंधन में रखकर सुख और दुःख भोगना पड़े ऐसा क्यों हो?

परमात्मा क्या है? इसका दर्शन अवश्य करणीय है । देखो भैय्या आप लोग भी सब धर्मरुचिक हैं, विवेकी हैं, श्रद्धालु हैं, प्रेमी हैं, प्रभु की भक्ति के लिये सदा उद्यमशील रहते हैं । इतने बड़े महीनों के बाद यह मंदिर बना । धर्म के लिए व्यय करना यह धर्मरुचि का द्योतक है । प्रभु के भक्त कितने ही अब भी है, लाखों रुपये व्यय करके विशाल मंदिर बनवाते हैं एक ही पुरुष लाखों करोड़ों रुपये खर्च कर स्कूल, कालेज अनेक प्रकार की संस्थाएँ बना देता है । यह सब कार्य धर्म-रुचि का ही द्योतक है । अब भैय्या सब ऐसी दृष्टि करें कि हमें तो प्रभु के दर्शन ही साक्षात् करना है । ऐसा प्रत्येक धर्मप्रेमी चाहता ही है । भक्त की आशा रहती है कि इस प्रभु का मुझे दर्शन मिले किंतु प्रभु के दर्शन पाने का उपाय लक्ष्य में नहीं है । हम इंद्रियों को खोलकर और बड़ी उत्सुकता से इन इंद्रिय की ओर से निरखकर चाहते हैं कि प्रभु के दर्शन हों सो यों हम को प्रभु के दर्शन नहीं हो सकते । प्रभु के दर्शन करने की विधि निराली है । अपने आपकी भूमिका को स्वच्छ बनाने से ही प्रभु के दर्शन होते हैं । गंदे हृदय से विषयकषाय से मलिन आत्मा से, परिवार के ममता वाले उपयोग से प्रभु के दर्शन नहीं सकते हैं ।

यद्यपि गृहस्थ अवस्था में अनेक प्रकार का संयोग है । नाना समागम जुटा हुआ है । चित्त की चंचलता के साधन हैं, अनेक उलझनों से संबंध इतना है कि उलझनों के कार्य सामने आते हैं, किंतु भैय्या! ज्ञान में भी तो ऐसा बल है, कितने ही झंझटों में फंसा हुआ मनुष्य हो, ज्ञानबल के द्वारा उन सब झंझटों को एक साथ भूलकर, छोड़कर अपने आपमें एक क्षण को तो निर्दोष चेतन्य स्वभावी निजप्रभु के दर्शन कर सकता है । उत्तम गृहस्थ वही है, उसका जीवन सफल है, धन्य है ज्ञानी गृहस्थ की प्राप्त सर्व समागम को भी एक साथ भूलकर इस देह में बसने वाले, देह से निराले शुद्ध ज्ञान भावात्मक स्वरूप के दर्शन कर लिया करते हैं । परमात्मा अपने आपमें ही दर्शन देता है । उसके दर्शन के पाने योग्य अपना उपयोग बनाना पड़ता है । हे योगी ! देखो, इस देह में बसता हुआ देह से निराला एक ज्ञानस्वरूप को देखो । इन कर्मों में बसते हुए कर्म से निराले इस ज्ञानस्वरूप प्रभु को देखो । इन राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभादि अनेक प्रकार के विकारों में उलझे हुए होने पर भी इन विकारों से रहित स्वभाव वाले शुद्ध ज्ञान स्वरूप में देखो यह ज्ञानानंदमात्र एक अमूर्तिकतत्त्व अनुभूत होगा । उस ही को तू परमात्मा जान । एक इस परमात्मा को जाने बिना इस जीव ने अनंतकाल संसार में जन्म मरण के दुःख उठाए । यह हजार लाखों की विभूति अपना क्या हित करेगी? इस जन्म के बाद फिर भी तो और जन्म लेने होंगे । अगर कोई जन्म बेतुका मिल गया, कीड़े मकोड़े वृक्ष आदि में चला गया तो फिर इसकी क्या पोजीशन रही? क्या बड़प्पन रहा? इन प्राप्त विभूतियों को अपने में मिला मत दो । इसको जड़ ही जड़ निरख । इसमें रहकर इससे निराले, अपने ज्ञान ज्योतिमात्र को देख और तो क्या रागद्वेष में रहकर भी रागद्वेष से निराले केवलज्ञानस्वरूप को देख । यही परमात्मा है इसही परमात्मा के दर्शन से यदि राग अवशिष्ट है तो इतना तीव्र पुण्य होता है कि इसके फल में महाराज राजाधिराज इंद्र चक्री आदि हुआ करता है । अपने शुद्ध परिणाम का भरोसा रख और इस हड्डी, चाम वाले हाथ, मुंह, नाक, कान का भरोसा न रख । इसका बड़प्पन नहीं है । तेरे धन संपदा के कमाने वाले हाथ पैर नहीं हैं । लोकों में अपना महत्व जाने वाला नहीं है । अपने परिणामों को निर्मल रख । इस प्रभु के प्रसाद से, प्रसाद कहते हैं निर्मल परिणामों को, इस प्रभु के निर्मल परिणामों से ही इस लोक के सुख, परिवार के सुख, निर्वाण के सुख प्राप्त होते हैं । हे आत्मन् ! तुझे सुख ही इष्ट है । उस सुख का उपाय निर्मल परिणाम है । इस जगत में यह बात देखी जा रही है कि कोई नेता है, राष्ट्रपति है, मिनिस्टर है, करोड़पति है और कोई तुच्छ है, निर्धन है, यह जो देखा जा रहा है, सब धर्म और अधर्म का प्रसाद है । इस मांस चमड़े वाले नाक आरव का काम यह वैभव नहीं है । पूर्व समय में जिस जीव ने धर्म किया, दया की, क्षमा की, तपस्या की, समस्त जीवों को सुखी होने की भावना की उनको इसही प्रकार का पुण्यबंध हुआ कि जिसके उदय में जो ऊंची-ऊंची स्थितियां उपस्थित हैं । क्या चाहिये तुझे सुख? कोई तो सुख यों चाहता है कि धन खूब आने लगे कि लोग मुझे बड़ा-बड़ा कहें, चलो यह भी सुख धर्म के प्रसाद से मिलेगा । अर्थात् धर्मसाधन करते हुए जो राग रहता है उस राग के प्रसाद से मिलेगा । जैसे बड़े मिनिस्टर के चौकीदार का भी महत्व है । केवल चौकीदार के चौकीदारी के कारण नहीं है किंतु एक मिनिस्टर के प्रसंग में चौकीदारी करते हुए है, वह इससे उसका महत्व है । उस राग का भी बड़ा महत्व है । देखो तीर्थंकर चक्रवती राजा महाराजा इंद्र को जो इतना भी भव मिलता है वह राग के प्रसाद से मिलता है, धर्म के प्रसाद का है । धर्म का जो अंश है उसका फल तो मोक्षमार्ग है और जो यह लौकिक वैभव प्राप्त हुआ है, ये सब राग के फल हैं परंतु किन रागों के फल हैं जो राग धर्मपालन के कार्यों में जीव के साथ लगा हुआ है उन रागों में इतना बल हो जाता है कि चक्री और तीर्थंकरके उत्पन्न करने वाले कर्म बंध जाते हैं । क्या चाहते हो सुख? यह सब सुख, धर्म के संबंध से मिलेगा । ये परिवारी लोग मेरे बहुत सुंदर हैं यह सब सुख जो कुछ है, परिवार लोगों से मिलेगा―यह सोचना गलत है । वह भी धर्म के प्रसंग में मिलेगा । कभी-कभी इस लौकिक सुख से विलक्षण सहजशुद्ध आनंद में रहा चाहते हो तो यह सुख भी धर्म के प्रसाद से मिलेगा । निर्वाण का सुख चाहें तो यह भी धर्म के प्रसाद से मिलेगा । सुख नाम की चीज चाहे वह लौकिक सुख हो चाहे निर्वाण का सुख हो, धर्म के संबंध से मिलता है । अंतर इतना है कि लौकिक सुख तो धर्म करते हुए के साथ जो शुभ राग रहता है उसके कारण हुए कर्म के उदय में मिलता है और निर्वाण का सुख केवल धर्म के कारण मिलता है उसके साथ रागद्वेष तनिक भी नहीं होने चाहिये । धर्म के संबंध के बिना सुख नहीं मिलता और न किसी को कभी भी मिला । हे योगी ! अपनी देह में बसता हुआ भी जो देहमय नहीं होता है उसको तू परमात्मा जान ।

एक पांच सेर शुद्ध निर्मल पानी में कोई पीले रंग की पुड़िया डाल दी जाय । वह पानी सारा पीला हो गया, पीला दिखता है । किनको, जो भेदविज्ञान के उपयोगी नहीं हैं । जैसी दशा बाहर में है वैसी ही अंदर में समझते हैं । उन अभिलाषी जीवों को वह पानी पीला दिखता है । इस समय इस पानी को यदि पीयेंगे तो वह पीला रंग भी पेट में चला जायगा पानी को स्वच्छता पीले रंग की स्थिति से अभी अलग नहीं है, फिर भी पानी पीला नहीं हुआ, पानी वैसा का वैसा ही स्वच्छ निर्मल अब भी है । तुम पानी के शुद्ध अस्तित्व को देखो । पानी की ही सत्ता के कारण पानी पीला जो कुछ हुआ है वह देखो ! यह जितना पीलापन है पीले रंग का पीलापन है, जल का पीलापन नहीं है । तभी तो 3-4 घंटे वह भगोनियां में निश्चल रखा रहा तो रंग नीचे बैठ जाता है और पानी बहुत कम पीला रह जाता है । ऐसा ही कुछ और देर उस पानी को यथावत् ही रखा जाय जैसा कि था, तो वह निर्मल रह सकता है । देखो! मनुष्य जन्म पाया है, श्रेष्ठ मनुष्य जीवन पाया है यदि इसको वैभव का हिसाब ही लगाने में लगा दिया तो इस उपयोग को फंसाने से लाभ नहीं रहेगा । धर्म के लिये बहुत अधिक काम पड़ा है । धर्म का काम कहीं बाहर में नहीं, मंदिर में नहीं, प्रजासमूह में नहीं, ठाटबाट में नहीं आपकी अपनी ही आत्मा के प्रदेशों में करना है । अपने ही अंदर बहुत अधिक काम पड़ा हुआ है । धर्म करने के लिये दृष्टि लगाकर अपने में देखो कि कितना काम पड़ा हुआ है । पहिले तो एक यही बड़ा काम पड़ा हुआ है कि ऐसी वासना बसी हुई है कि उनमें एक, दो, चार को अंदर में अपना माना जा रहा है । यह मेरी स्त्री है, यह मेरा पुत्र है, यह जो एक भूल है वासना है, उस वासना को समाप्त करना है । कितना बड़ा काम पड़ा है अंदर में । अंदाज लगावो । शं का हो जाती है कि मेरी यह वासना भी समाप्त हो सकती है घर में रहते हुए क्या? हां, क्यों नहीं? हो सकती है । अगर स्त्री पुत्र का कोई झगड़ा हो जाय या मेरे साथ छल-कपट पूर्ण व्यवहार किसी स्त्री पुरुष ने किया, ऐसी बात समझमें आ जाय, उनके अन्याय, दुर्व्यवहार आदि यदि ज्ञान में आ जायें तो पहिले ही उस वासना को मिटा डालता है । अब ऐसी बात उसके ध्यान में नहीं है कि यह मेरा ही है । जाते, सोते, जागते, पूजा करते, धर्म करते जो यह बात बनी रहती थी अब वह बात नहीं रही । उसके स्थान में कुछ द्वेषरूप उपयोग ही आ जाय, ऐसे छली लोग हैं, ये घर के मेरे साथ भी ऐसा कपटपूर्ण षड्यंत्र रच रहे हैं । यह जानकर चाहे द्वेषरूप उपयोग हो जाय किंतु वह रागवासना तो नहीं रहती, फिर ज्ञानी संत को जिनको प्रत्येक पदार्थों के शुद्ध अस्तित्व का बोध हुआ तो जिसके उपयोग में यह स्पष्ट हो गया है कि सर्व पदार्थ अत्यंत जुदे-जुदे सत् हैं । ये अपने परिणमन से परिणमते हैं । इन जीवों के साथ इसके पुण्य और पाप कर्म लगे हैं । यह जो कुछ भोगता है अपने कर्म के अनुसार भोगता है । यह जो कुछ करता है यह खुद अपने में अपने ही द्वारा अपने ही लिये अपने परिणाम को करता है । इनमें अपने का रंच भी संबंध नहीं है । यह बात वस्तु के यथार्थस्वरूप की है । इसको कोई मना नहीं कर सकता । ऐसी वस्तु का जैसा स्वरूप है तैसा ही ज्ञान में आ गया तो परजीव में परिवार की, जो आत्मीयता की वासना लगी यह नष्ट नहीं हो जायेगी क्या? पदार्थ का जैसा स्वरूप है उसको उल्टा बनाने में दिक्कत होनी चाहिये, कठिनाई होनी चाहिये । यह चौकी है । हम आपको कहें भैय्या ! थोड़ी देर के लिये इसको घड़ी मान लो तो आपको मानने में परेशानी होगी । कृपा कर आप इस चौकी को ही 45 मिनट के लिये घड़ी मान लें, जब तक प्रवचन चल रहा है और आपकी दृष्टि इस ओर है कि जल्दी प्रवचन पूरा हो जाय, कितने बजे हैं? अच्छा आप इस चौ की को घड़ी मान लें, तो जो चीज नहीं उसको उस अन्य वस्तुरूप मानने में, उल्टा मानने में, बड़ी दिक्कत हो जाती है । इस खिलौने के रिक्शे को तुम सच्चा रिक्शा मान लो । जाना है कहीं, कोई सवारी नहीं मिल रही है फिर इसी में बैठने का काम कर लोगे क्या? इसको मानने में बड़ी दिक्कत जान पड़ रही है कि जो चीज जैसी नहीं है वैसी माननी नहीं चाहिये, जो चीज जैसी है वैसी ही मान लो । सर्व जीव स्वतंत्र सत् हैं । अपने-अपने स्वरूप को लिये हैं । वे जो कुछ करते हैं अपने कषाय से, अपने कषाय की पूर्ति के लिये अपने ही परिणमन करते हैं । उनका किसी भी कार्य से संबंध नहीं है । वे आपमें प्रेम नहीं कर सकते । वे अपने कषाय से अपने कषाय की पूर्ति के लिये अपने में अपने काम करते हैं । बात यह सही है ना, पर ऐसा मानने में बड़ी कठिनाई हो रही है । बस जो कुछ जैसा है तैसा जान लो तब सुगम हो जाये तब समझना कि अब हमने धर्म किया । अंदर में तो अधर्म बस रहा है । पदार्थों का सत्य स्वरूप अपने में नहीं पाया जा रहा है, सही ज्ञात नहीं हो रहा है । जान रहा है उल्टा ही उल्टा और जाप, सामायिक, पूजा स्वाध्याय, भजन सब कुछ प्रभु के किये जा रहा हूं तो वह स्थिति तो है कि जैसे ‘ऊपर अमल मल भरा भीतर कौन विधि घट शुचि कहे ।’ यह कर्म हमारे हाथ, पैर, मुंह की चेष्टा नहीं देखा करते कि भाई ! यह आरती में हाथ फैला रहा है । इस आत्मा में अपन मत बंधो । कर्म में ज्ञान नहीं है कि वह धोखा खा जाय । जाननेवाला ही धोखा खा सकता है । कर्मबंध का निमित्त कारण तो विषयकषाय का भाव है । जिसमें विषयकषायरूप परिणाम हुए कि तुरंत कर्मबंध हो जाता है । इस 50-60-70-80 वर्ष की पाई हुई आयु में जो किया, हमें करना क्या है? मुख्य काम मेरा क्या है? इसका क्या समाधान किया? मुख्य काम मेरा यही है कि मैं अपने में अपने बसे हुए अपने अस्तित्वमात्र स्वभाव को पहिचानूं और यह मान लूं कि मुझमें तो मैं हूँ, अन्यरूप में नहीं हूँ, न अन्य वस्तु से मेरा संबंध है । ऐसा अंतरदृष्टि द्वारा सत्यस्वभाव ज्ञात हो जाय, बस, करने को यही एक काम है । बाहर की चिंताएँ अधिक न करो । अर्थात् वैभव को केवल उदय के ऊपर छोड़ दो । बाहिरी पदार्थ में अपना अधिकार नहीं है । परवस्तु के प्रसंग का हमने विचार किया है, हित कुछ नहीं होता है, इस बारे से तो ऐसे दृढ़ हो जाओ कि मैं अपनी इच्छा के अनुसार यहाँ कुछ भी नहीं करता, कुछ नहीं देखता, कुछ व्यवस्था बनाने की नहीं सोचूँगा किंतु इस गृहस्थ अवस्था में जो बाहिरी समागम है उसके अनुकूल व्यवस्था बनाऊँगा । मेरी व्यवस्था जिस चाहे पद्धति से बन सकती है । करोड़ के वैभव के योग्य भी व्यवस्था बन सकती है । लाखों, हजारों, सैकड़ों रुपये के योग्य भी व्यवस्था बन सकती है । यह सब भ्रम है । मैं जान चुका हूँ कि मैं तो केवल अपना शुद्ध अस्तित्वमात्र हूँ । मेरा काम केवल जानन और आनंद दो ही अपने काम हैं । ये मेरे काम भावात्मक हैं? मैं भावात्मक हूँ । मैं सर्व वस्तु व्यवस्था को जान सकता हूँ पर मुझे तो प्रधानतया अपनी ही व्यवस्था बनाने की पड़ी अपने आपमें ब से हुए इस परमात्मतत्व को देखो जो स्वतंत्र है अरहंत के रूप में पूजा जाता है, सिद्धत्व के रूप को पूजा जाता है । हे योगी ! इस देह में बसे हुए इस शुद्धज्ञान प्रभु में देख । इस प्रकार योगेंदुदेव इस आत्मतत्व के स्वरूप को प्रभाकरभट्ट को समझा रहे हैं ।

परमात्मतत्व का विकास परमात्मतत्व की भावना में होता है । शुद्धनिर्दोष ज्ञानमात्र की स्थिति चाहते हैं तो शुद्धनिर्दोष ज्ञानमात्र आत्मतत्व की भावना करनी होती है । शरीररहित होना चाहते हैं तो अपने शरीररहित निजस्वरूपास्तित्वमात्र आत्मा को देखो और शरीरसहित मानने का संस्कार रहा तो शरीररहित होने की स्थिति कभी नहीं आसकती । लक्ष्य को शुद्ध करलो यही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है और सर्वकार्यों से मिलकर तो लक्ष्य की सिद्धि नहीं है । मेरा लक्ष्य इतना महान् है कि मुझे इन झंझटों से काम नहीं है । 10-5 जीव का परिवार मिल गया तो उससे कोई मेरा कल्याण होने का नहीं है । मेरा कल्याण तो मेरा स्वयं स्वरूप ही है । मैं कल्याण मूर्ति हूँ । अपने ज्ञान को अपने आपमें बहुत अंदर ले जाकर देखें । इन विकल्पों से भी पार होकर अपने-अपने अस्तित्व के कारण जो अपना स्वरूप है उसके निकट जाकर देखो, कल्याण की मूर्ति तो यह आत्मा स्वयं है । इसकी भावना करो तो कल्याण का विकास होगा । हम अपने को बहुत-बहुत जैसा सोचा करते हैं, वैसे हम नहीं हैं । अपने को निज सहजस्वरूपमय जान लें तो सब विह्वलता समाप्त हो जायगी । एक उधम करनेवाला बालक को यदि कोई बड़ा यह कह दे कि अरे राजा भैया । तू तो बड़े कुल का है, तुझे उधम नहीं करना चाहिये । बारबार यह जानकर कि अरे मैं राजा भैया हूँ तो वह अपने में जिस प्रकार राजा भैया, सत् व्यवहार होता है वह व्यवहार कर रखेगा । आपको किसी के प्रति भ्रम हो जाय कि यह तो मेरा बुरा चाहता है तो बार-बार इस भावना में रहने पर आप ऐसा व्यवहार कर डालेंगे जिससे तनातनी हो जायगी । यदि आप अपने में अनुभव लगाएं कि मैं कितने बच्चों का पिता हूँ तो इस भावना में आपको उन बच्चों के प्रति ऐसा बर्ताव करना होगा जिससे पितृत्व सही कहलाने लगे । आप एक जीव हैं, केवल ज्ञानस्वरूप हैं, ज्ञानभाव के अतिरिक्त और कुछ स्वरूप नहीं है, भले ही यह मनुष्य देह में बंधा हुआ है तिस पर भी यह तो ज्ञानमात्र है । यह जीव जब ज्ञानमात्र निजस्वरूप की भावना नहीं करता है और अपने को मैं मनुष्य हूँ, मैं मनुष्य हूँ ऐसा मानता रहता है तो वह मनुष्य जैसा व्यवहार करता है । यदि यह अपने को ज्ञानमात्र ही मानें मैं ज्ञानमात्र हूँ, जानन ही मेरा काम है और जानने में जो कुछ गुजरता है उसको ही भोगना मेरा काम है, मैं ज्ञान के अतिरिक्त और कुछ नहीं करता हूँ, मैं तो ज्ञानस्वभाव हूँ, जाननभाव हूं―यदि ऐसी भावना बन जाय तो ज्ञाता दृष्टा रहने का व्यवहार बनेगा । यह जीव अपने को जैसा मानता है तैसी भावना करता है । उसरूप ही इसका व्यवहार हो जाता है । यदि संसार से मुक्त होना है, यह कुटुंब वैभव सारा असार जँच गया है सो इससे छूटकर, शरीर से मुक्त होकर अपने आपके शुद्ध आनंद में मग्न रहना है तो ऐसी भावना करनी चाहिये कि मैं ज्ञानमात्र हूँ । जानन से ही मेरा संबंध है, जाननभाव के अतिरिक्त मुझ में कुछ नहीं है । यह मैं ज्ञानस्वरूप सर्वपदार्थों से निराला हूँ, केवल अपना स्वरूपमात्र हूँ । सबसे निराले अपने आपका अनुभव करो तो वह परमात्मपन की स्थिति हो लेगी । क्यों अन्य-अन्य रूप अपने को मान मानकर हम अपना समय व्यर्थ गुजार रहे हैं?

इतना तो श्रम किया इस आयु तक सभी जानते हैं अपना-अपना परिश्रम किया, आज संतोष है क्या? शांति है क्या? न शांति है, न संतोष है । किसी भी क्षण आदमी को संतोष, शांति नहीं है । यह विडंबना क्यों हो गई? इसका कारण है कि पदार्थ है अपने-अपने स्वरूप चतुष्टयरूप और हम मानते हैं उसको अपनी इच्छानुसार अदृश्य स्वरूप में बस । इतनी ही भूल इतने बड़े विषवृक्ष का कारण बन गई । बड़ का पेड़ कितना बड़ा होता है कहीं-कहीं तो आधे फरलांग तक फैल जाता है, किंतु उसका बीज कितना? सरसों से भी छोटा । उस बीज का परिणाम इतना बड़ा वृक्ष है सो यह चाहे सरसों से भी छोटा है किंतु है तो कुछ । लेकिन इस भ्रम में तो कुछ है भी नहीं, और झगड़ा सांचा बन गया । पशु बनेगा, पक्षी हो जाना, कीड़े-मकोड़े हो जाना, पेड़ बन जाना और नाना कषाय और अविषय का भाव उत्पन्न हो जाना । झगड़ा देख लो सच्चा खड़ा हो गया ।

यह भ्रम कोई सत्य चीज नहीं है किंतु इस जरा सो भ्रांति में इतना सारा संसार विषवृक्ष खड़ा हो गया । यह जीव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के, आकारों में बंध गया है । यह तो ज्ञानस्वरूप है । ज्ञान का कोई आकार नहीं है । वह तो ज्ञेय ग्रहण स्वरूप है । यह इन आकारों में बंध गया इसका कारण क्या है? इसका कारण कर्म का उदय है । ऐसा कर्म क्यों हो गया? क्यों बंध गया? कर्म का जाल भी बहुत विस्तृत है । करणानुयोग के जानने वाले समझते हैं कि एक जीव के साथ अनंत स्पर्धक लगे हुए हैं । एक वर्गणा में अनंत वर्गणाएँ होती हैं । एक वर्गणा में अनंत वर्ग होते हैं । इतने कर्मपरमाणुओं का जाल एक-एक जीव के साथ लगा हुआ है । फिर उनमें अनुभव शक्ति का तो कहना ही क्या है? एक-एक वर्ग में अनंत-अनंत अनुभव शक्ति होती है । ऐसा कर्मों का यह विचित्र जाल इस जीव के साथ लग क्यों गया? यों लग गया है कि इसके कषाय का परिणाम हुआ था? इस जीव के कषाय का परिणाम क्यों होता है? यों होता है कि इसका परद्रव्य में यह मैं हूँ, यह मेरा है, इस प्रकार का भ्रम हो गया । देखो―इतना बड़ा पहाड़ देखकर इसको पूरा खुदवाया तो यों था कि इसके नीचे धन मिलेगा । इतना बड़ा पहाड़ सरकार ने खुदवाया पर उस पहाड़ को खोदने पर मिला क्या? निकला एक चूहा तो जैसे यह सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर देती है पर तत्त्व कुछ नहीं निकलता, इस प्रकार इस चिकने चोपड़े मकान सोना चांदी वैभव आदिक मायामय चीजों का तो कुछ पार पाना चाहिये, विवरण लेना चाहिये । यह क्यों हुआ है? कैसे हुआ है? क्या कारण था? खोजते-खोजते अंत में निकला क्या? एक तुच्छ बात गलती केवल इतना ही परिणाम कि किसी परद्रव्य के प्रति यह उपयोग बन बैठा यह मैं हूँ, यह मेरा है । इतने भ्रम के ऊपर यह इतना बड़ा जगजाल खड़ा हुआ है । हम घबड़ाते हैं इस दुःख को देखकर, संकट में हम अधीर हो जाते हैं । संकट तो सचमुच का हो गया पर उनका बीज कारण केवल भ्रम निकला । देखो ना शरीर में फंस गया । यह सच तो हो गया है । झगड़ा तो सच हो गया मगर इस झगड़े का आधार भ्रम एक हंसी के आधार पर इतना बड़ा झगड़ा बन गया । कई कोर्टों में जाना पड़ रहा है, दोनों पक्ष का धन बरबाद हो गया । इतने बड़े झगड़े की मुख्य नींव का कारण एक मामूली हंसी है । तुम को बड़ा संकट लगा है । इस संकट का कारण केवल एक दृष्टि का भ्रम है । लो, दृष्टि का श्रम नहीं रहा तो जहाँ खड़े हैं वहां पर भी मोक्षमार्गी हैं । जो निराकुल है उसके कोई संकट नहीं है । कितना बड़ा यह संसार का रूप, कितनी बड़ी विपत्ति? यह जन्म मरण का चक्र है किंतु यह भ्रम पर खड़ा है ।

और साधारण संकटों की तो चर्चा ही क्या करें । घर के हिलाना बातचीत के कितने ही संकट तो ऐसे हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर उसके आधार पर है जिनमें कोई सार नहीं है । खाली इतने बड़े संकट उनको मानते हैं कि उनको दूर करने में अपने कषाय का प्रयोग करना पड़ता है । पर हे दयावान् आत्मन् ! तू संकटों की चिंता तो करता है, किंतु जन्म मरण के चक्र के लगा जा रहा है, इसकी कुछ चिंता नहीं है । इस मनुष्य जीवन के और अपने कल्पना में माने हुए संकटों को दूर करने में परिश्रम कर रहा है । अरे सारा जहाँ मेरे से उल्टा चलता है तो चल ले । वह जहाँ का परिणमन उस परवस्तु में समाप्त हो जाता है । इससे बाहर मेरे में कुछ नहीं आता । परिवार तो क्या सारा, परिचित वर्ग भी मेरे प्रतिकूल हो जाय तो भी उनसे मुझमें कोई आपत्ति नहीं आती है । मैं ही अपने कल्पनाजाल रचता हूँ तो, मैं स्वयं दुःखी होऊँगा । किसी की कुछ चेष्टा से मेरे को क्लेश नहीं होता है । मैं अपनी स्वयं की कला में पूर्ण सुरक्षित हूँ । यह आत्मा स्वयं अपराधी है और उन अपराधों के कारण ऐसा अयोग्य, अशक्त हो गया है कि बाह्यपदार्थों के परिणमन का अर्थ अपने आपमें हटाता रहता है । तुम्हें क्या बनना है? इसका तो निर्णय कर लें । हम 5-7 लड़के लड़कियों के बाप बन गए हैं, अच्छा बन लो बाप बनने का कितना लाभ लूट लोगे? तुम्हें इस नगर में एक ख्याति प्राप्त बनना है तो ख्याति प्राप्त बन लो, इन मोही कषायवानों मर मिटने वालों में तुम्हें ख्याति प्राप्त बनना है अच्छा बन लो । लेकिन तुम्हें क्या कोई सहारा देगा और भी तुम सोच लो, क्या बनना है तुम्हें । भैया किसी भी बाह्यरूप बनने की मत सोचो । किंतु सहज जो है वही रहना है ऐसा संकल्प करो । मनुष्य होना सहज होने की बात नहीं है । इसलिये ज्ञानी आत्मा मनुष्य भी होना नहीं चाहता । नेता, पिता, गुरु, शिष्य आदि बनना भी आत्मा की सहज बात नहीं है, इसलिये यह सब भी नहीं बनना चाहता । कुछ बनना ही नहीं चाहता । जैसे कोई ज्ञानी संत जब अपने वैराग्य में पड़ता है तो उससे पूछते कि तुम क्या बनना चाहते हो? क्या उत्तर मिलेगा? एक साधु बनना चाहता हूँ, यह उत्तर नहीं । यह बनने की बात है साधु बनने में लाभ नहीं है । तो क्या बनना चाहिये? अरे ! वह कुछ बनना ही नहीं चाहता है, न साधु, न गृहस्थ और न गुरु, न शिष्य । मैं तो जैसा सहज हूँ वैसा रहना चाहता हूँ । अच्छा तो तुम जैसे सहज हो वैसे रहने की योजना कर लो, हां वह यत्न करता है, करता है कर ले, बाहर में आपने क्या देखा, कुछ नहीं केवल शरीरमात्र नग्न । अच्छा अब हम समझ गये हम कल्याण के लिये नग्न बने । न, न, हम नग्न नहीं बने मुझे तो कुछ बनना ही नहीं है किंतु वैभव को रखने में बहुत विकल्प होता है तो वैभव से छुट्टी पाई है । परिवार में रहने से बहुत विकल्प होता है तो परिवार से छुट्टी पा ली है । पैसा, वस्त्र रखने से बहुत विकल्प होता था तो पैसा और वस्त्रों से भी मुक्ति पा ली है । हम नग्न नहीं बनते पर निवृत्ति करते-करते ऐसा रह गया तो क्या? मैं तो चाहता हूँ कि यह भी रूप नहीं बने । मैं तो ज्ञानमात्र रहूं । यह बात मेरे अंदर में ज्ञान से उत्पन्न हुई परिणति की बात है । साधु रह जाता है पर साधु बनता नहीं है । बनना तो सब कुछ ही खराब है । बनने में लाभ नहीं । इस गृहस्थ को किसी अन्य चीज में प्रयोजन नहीं रहा सौ सब चीजों को छोड़ता गया तो छोड़ने की कला में यह शरीरमात्र रह गया । इसको कहते हैं साधु अवस्था, जैसे कोई संन्यासी स्थिति है कि हमें संन्यासी बनना चाहिये तो लाल कपड़े रंगवा लो । एक डंडा, एक चीमटा और भस्म भी शरीर में रमा लो । तुम्हें संन्यासी बनना है तो यों कोई यह कहे कि मुझे साधु बनना है । मेरे लिये बंबई का अच्छा कमंडल बुला दो । मेरे लिये अमुक चीज बुला दो हालांकि यह सब बात रहेगी । किंतु भैया साधु बनना और बात है, रह जाना और बात है, दोनों का अंतर बतलाते हैं । बन जाने के भाव से जो कुछ खटपट की जायेगी उसका फल व्यामोह है । जिस ओर से यह संत विरक्त है उसका प्रयोजन न रहने से साधुता हो जाने का फल शांति है । इसको वस्त्रों का प्रयोजन नहीं सो वस्त्र छूट जाते हैं । वस्त्र को छोडूँ नग्नरूप रहूं और साधु बनकर जीवन सफल करूँ यह विकल्प साधु बनने के हैं साधुता रह जाने के नहीं । यह अंदर की बात है बाहर में तो देखो तो दोनों का वही रूप है जो साधु का रूप होता है पर बनने और रहने के आशय में जमीन और आसमान के जितना अंतर है । बनना तो एक गाली है । किसी से कहते हैं कि वाह ! तुम तो बड़े बन गये हो । सुनने वाला जानता है कि समझ गया है यह कड़ी-कड़ी बात बोल रहा है, उल्टा जान बूझकर बोल रहा है । वाह ! तुम तो बड़े बन रहे हो । एक कथानक है कि एक बार गुरु और शिष्य चले जा रहे थे । एक राजा के बाग के पास सायंकाल हो गया तो राजा के बाग में चले गये । उस बाग के दो कमरे बहुत अच्छे साफ सुथरे थे । कमरे में एक पलंग पर या अच्छे से तख्त पर शिष्य बैठ गया और एक कमरे में गुरु बैठ गया । गुरु ने शिष्य को समझा दिया कि रे शिष्य यहाँ पर कुछ बनना नहीं, बनोगे तो बुरी तरह पिटोगे । कुछ देर बाद राजा 4 सिपाहियों के साथ घूमने बाग में आया । राजा ने नौकरों को कहा कि कमरे में कौन है? महाराज इस कमरे में कोई दो आदमी बैठे हैं । अच्छा जाओ उनसे पूछो । सिपाही शिष्य के कमरे में गया और सिपाही शिष्य से कहता है कि तू कौन है तो शिष्य कहता है कि तुम निरे अंधे हो क्या? जानते नहीं कि मैं संन्यासी हूँ । सिपाही ने राजा से कहा कि वह इस प्रकार कह रहा है कि तुम अंधे हो दिखता नहीं कि मैं संन्यासी हूँ । राजा ने कहा कि उसे कान पकड़कर निकाल दो । सिपाही ने कान पकड़कर निकाल दिया । एक कमरे में बैठा था गुरु । सिपाही ने उससे पूछा तुम कौन हो ? उसने कुछ उत्तर नहीं दिया और वह गुरु मौनपूर्वक प्रभु के भजन में लगा रहा । सिपाही आया और बोला कि महाराज वह आदमी मौनपूर्वक बैठा है । निश्चल बैठा है, न हिलता है, न डुलता है । राजा बोला अच्छा वह कोई योगीश्वर होगा । उसके दर्शन करके वह राजा वापिस चला गया और सिपाही भी चले गये । जब भजन काल पूरा हुआ तब शिष्य गुरु से कहता है कि अच्छे ठहरे इस कमरे में । तब गुरु ने शिष्य से पूछा कि शिष्य ! तुम कुछ बने तो नहीं थे । शिष्य बोला महाराज मैं कुछ नहीं बना, मैंने सिपाही से तो सिर्फ यह कहा कि अरे अंधे हो, दीखता नहीं कि मैं साधु संन्यासी हूँ । गुरु बोले यही तो बनना हुआ, साधु भी बनना अच्छा नहीं । करना क्या है? बनना क्या है? कुछ नहीं बनना । बनने का तो यह प्रसाद है कि आज जन्म मरण के, इतने चक्कर लग गए हैं । महाराज बनने का नाम मत ले । बनना बहुत बुरा है । मैं क्या-क्या नहीं बना? कीड़ा बना, मकोड़ा बना, मनुष्य बना अथवा साधु सब कुछ बना मगर वह सब नाटक रहा । ज्ञानी की दृष्टि इस ओर है । साधु होकर भी ज्ञानी अपने को ज्ञानमात्र निरखता है जबकि बने हुए साधु अपने शरीर पर दृष्टि देकर और चाहे वह दिगंबर संप्रदाय का साधु क्यों न हो? सत्य साधु, ज्ञानी साधु अपने को दिगंबर साधुरूप भी अनुभव नहीं करता । इस कारण ज्ञानमात्र, अपने आपके अस्तित्व के कारण जो सहज ज्ञान और आनंद स्वरूप है, तन्मात्र अपने स्वरूप की श्रद्धा रखता है । यही तो बड़ी बात है जिसके कारण शत्रु और मित्र दोनों में समान दृष्टि रहती है । शरीर को साधु न मानने पर इतना परिणाम हो सकता कि शत्रु को शत्रु नहीं मानना और मित्र को मित्र नहीं मानना । अन्यथा किसीने नमस्कार नहीं किया, कुछ प्रतिकूल व्यवहार किया तो इस प्रकार की बुद्धि हो जाती है कि उसके प्रति क्रोध आ जाता है । पर्याय बुद्धि का भी अजब चमत्कार है । गृहस्थों में भी जो यह जानता है कि बाल बच्चों से, वैभव से मेरी पूर्ण सही-सही इज्जत पोजीशन वाला मैं एक गृहस्थ हूँ, ऐसी श्रद्धा करने वाले संकट में पड़ जाते हैं । जरा-जरासी बात में अपमान महसूस करने लगते हैं, उन्हें आराम नहीं मिलता । ज्ञानी गृहस्थ तो यह सोचता है कि मैं हूँ तो ज्ञानमात्र, मेरा कार्य तो केवल जानन देखना है, किंतु इस स्थिति के लायक मेरी अंदर की योग्यता, नहीं है सो उस स्थिति के योग्य बनने के लिये मैं सब गृहस्थी के सदाचार का नियम लिये हूँ । मैं काला, गोरा बाल बच्चा धन वैभव वाला नहीं हूँ । मैं इस स्थिति से सम्यग्दर्शन, ज्ञान, आचरण में रहने का अवसर बना रहा हूं । मैं एक चैतन्य हूँ, ऐसी श्रद्धावान् गृहस्थ बड़े संकट में भी अधीर नहीं होता । उसने तो अपना पथ चुना, वह इस धर्म को पालने की ही धुनि रखता है । यह प्रकरण यहाँ चल रहा है कि परमात्म विकास का साधक परमात्मस्वरूप की भावना है और परमात्मस्वरूप की भावना का बाधक राग, द्वेष, मोह है । इस रागद्वेष-मोह के कारण जो कर्मबंध होता है उससे यद्यपि यह बंधा है और देह में स्थिति है फिर भी यह आत्मा, परमात्मा देह सहित नहीं होता है । हे प्रभाकर भट्ट ! हम निर्दोष ज्ञानमात्र अपनी आत्मा के संवेदनरूप ज्ञान को अनुभव कर लें कि मैं भी ऐसा ही परमात्मा हूँ । यह परमात्मा वीतराग, निर्विकल्प समाधि में रत होने वाले को उपादेय है । ज्ञानीजनों का यह ध्येय रहता है । इसके अर्थ परमात्मतत्व की भक्ति ज्ञानी करते हैं । ज्ञानी परमात्मा की भक्ति अन्य लौकिक प्रयोजन के लिये कभी कर ही नहीं सकते । जो कोई पुत्र समृद्धि की उन्नति के लिये पूजा करे तो वह भगवान् की पूजा कर ही नहीं रहा । वह तो पुत्र और धन की पूजा कर रहा है । मुंह से कहता है जन्मजरामृत्युविनाशनाय, किंतु उस अज्ञानी का अंतर यह कह रहा है कि पुत्र स्त्रीधन विकासाय । प्रभु के पूजक तो ज्ञानी होते हैं । अपने आपको परमात्मस्वरूप देखो तो परमात्मत्व प्रकट हो सकता है ।

आत्मा का सर्वस्व उपयोग है । इस उपयोग के द्वारा सत्य का उपयोग करके जीव अपने को निर्बाध रख सकता है और असत्य का उपयोग रखकर अपने को बाधाओं में और उलझनों में डाल सकता है । खैर इसके पास साधन तो एक उपयोग ही है, जो कुछ करता है वह उपयोग के द्वारा ही करता है । इसका उपयोग तक ही दम है, काम है । जो जीव मोही है परवस्तु का सुधार करने का यत्न करता है वह भी वास्तव में उपयोग ही कर पाता है पर मैं कुछ कर नहीं सकता, मैं सर्वत्र केवल अपने उपयोग को ही करता रहता हूं―ऐसी श्रद्धा होना, ऐसा विषद्ज्ञान होना यह बड़े भवितव्य की बात है अन्यथा प्राय: सभी अनंते जीव पर कर्तृत्व बुद्धि में और स्वामित्व बुद्धि में पड़े हुए हैं । यह आत्मा कर्म और शरीर के बीच पड़ा हुआ है फिर भी यह जुदा है । दूध और पानी को एक गिलास में मिला देने पर भी दूध जुदा है और पानी जुदा है । समझने वाले तो उस मिले हुए को भी समझ सकते हैं और न समझने वाले को प्रयत्न करके, अग्नि में तपाकर पानी को उड़ाकर समझा सकते हैं । उस दूध पानी की बात अलग रही । असली दूध में भी जो दुग्धत्व का अंश है और पानी का अंश है वह भी परीक्षकों के द्वारा भिन्न-भिन्न पहिचाना जा सकता है । बध हम आप सब पर एक पूरी आफत बैठी हुई है । इस आफत में भी उपयोग का ऐसा प्रताप है कि हम आफत को अलग जान सकते हैं और निरापद को अलग जान सकते हैं । अज्ञान में तो यह सारा संसार जुआरी है । पुण्यकर्म के उदय में जीत मानने वाले और पाप कर्म के उदय में हार मानने वाले ये सारे जीव हैं । जुआ में भी यही तो हुआ करता है जीत और हार । हम आप संसार के प्राणी यही तो कर रहे हैं । पुण्य का उदय आया, जीत मानने लगे और पाप का उदय आया तो हार मानने लगे । इस जुआरी के बीच में हम आप भी जुआरी बैठे हुए हैं । इन जुआरियों के संग में रहकर हम अपना यह बल नहीं उत्पन्न कर पाते कि पुण्य के उदय में हम जीत नहीं मानें और पाप के उदय में हम हार नहीं मानें―ऐसा नहीं कर सकते । पर मुख्य तो हमारी कमजोरी है साथ ही यह सारा जीवलोक भी ऐसा ही है । जैसे कोई जुआरी जुआरियों के बीच में बहुत लुट पिटने के बाद भी यह चाहता है कि मैं इस अड्डे से हट जाऊँ तो बैठे हुए जुआरी लोग इस प्रकार की बातें करते हैं कि वह वहाँ से उठ नहीं पाता । कहते हैं कि बस इतनी ही दम थी, खतम हो गया, खोखला हो गया ऐसी ही ओंधी सूँधी बातें कर देते हैं जिससे उस लुटे पिटे जुआरी को उस अड्डे में और लुटने के लिये बैठना पड़ता है । इसी तरह यह समस्त जीव लोक परमार्थ से जुआरी हैं । इनमें से कोई पुरुष किसी प्रकार वैराग्य से सन रहा हो, विरक्त हो गया हो और इस अड्डे से हटना चाहता हो तो उसे कठिनाई मालूम होती है । हटने वाले हट जाते हैं पर कठिनाई बहुत मालूम होती है । स्त्री, पुरुष, मित्र इतनी भली-भली बात कहकर मोह लेते हैं और उस संकट को सहन नहीं कर सकने की योग्यता वालों को यह तूफान आकर संकट हो जाता है । भूल यह होती है कि ऐसे निर्मल दुर्लभ जीवन को पाकर भी हम अनेक कारणों से उत्थान की ओर नहीं बढ़ पाते हैं और इस सीमा के अंदर ही घूमते रहते हैं । निकलने का तो अंदर में ही एक सरल तरीका है । बाह्य का संकोच छोड़ो । जिससे कि संकट नजर आया है । उसकी ओर दृष्टि तो कितने ही समय से हो रही है । इस संकोच के कारण भी अपने मन में आये हुए सन्मार्ग पर यह नहीं चल पाता । उदय सुंदर के बहनोई की कथा है । उदय सुंदर का बहनोई वज्रभानु नाम का था । वह स्त्री के साथ ही स्त्री के मायके चला, भाई लेने आया था । एक दिन का वियोग नहीं सह सकता था । इतना मोही वह उस मार्ग के जंगल में एक युवक को शांत आनंद मग्न जब निरखता है तो उसका मोह दूर हो जाता है कितना विचित्र आनंद है इस आत्मा को । वैसा ही तो यही मैं हूँ । वह अपने मोह को देखकर मुनिराज की ओर एकटकी लगाकर देखता है । पर ये दो जीव साथ में हैं स्त्री और साला । इनसे क्या कहकर छुट्टी मांगे । देखो भैया बड़े प्रोग्राम में बंधे हुए आये थे, जाना कहीं है और हो क्या रहा है? अवसर ने साथ दिया कि उसका साला दिल्लगी करता है कि क्या तुम मुनि बनना चाहते हो? बस संकोच मिटने का उपाय बन गया । मैं इनसे कुछ कहता, कष्ट करता अब इन्होंने कह दिया तब बोला कि हम मुनि बनेंगे तो क्या तुम भी बनोगे? साला उसके अंतर का सही भाव नहीं जान सका और अब भी वह दिल्लगी करता है हां तुम बनोगे तो हम भी बन जायेंगे । वहतो लो मुनि बन गया । जो कि इतना तीव्र मोही था कि अपनी स्त्री को एक दिन भी नहीं छोड़ सकता वह सदा के लिये मोह मुक्त हो गया । यह देखकर उदय सुंदर का भी मोह टूट गया । कुछ विचित्र आनंद आ गया सो वह भी मुनि हो गया । दोनो की दशाओं को देखकर स्त्री को भी वैराग्य आ गया । भैया देखो ना, कठिन अवस्था, कठिन संकट उपकार के लिये होते हैं । मोही उन संकटों से तनिक भी लाभ नहीं लेता परंतु ज्ञानी उन संकटों से लाभ उठा लेते हैं । आज सब चिल्लाते हैं, कहते हैं कि सदाचारी बनो, योग्य नागरिक बनो, सद्व्यवहार वाले बनो किंतु जो कुछ अच्छापन निर्बाध चलता है उस सबका मूल है आत्मस्वरूप का सत्य ज्ञान । आत्मस्वरूप के सत्य ज्ञान के बिना कोई सदाचार टिक नहीं सकता । आत्मज्ञान बिना सदाचार बनने की धुन कोरी उफान है । यह समझते कि एक लौकिक वृत्त की अंर्तधुनि सवार है कि ठीक-ठीक काम करो । अज्ञानियों को उन सदाचारों

को पालने से भी आत्मसंतोष नहीं हो सकता है । क्योंकि आत्मज्ञान होने से सदाचार तो होता ही है किंतु आत्मसंतोष भी होता है । जिसे अपने स्वरूप का परिज्ञान हो गया, यह मैं आत्मा केवल ज्ञान-आनंद भाव मात्र हूँ । अन्य पदार्थों में न मेरा कर्तृत्व है, न स्वामित्व है, न भोक्तृत्व है और मुझमें उपाधि का निमित्त पाकर उत्पन्न होने वाले विकार भी स्वयं नहीं आते हैं, ये उपाधि की झलक है । ऐसा सही ज्ञान जिन्हें हो गया वे पुरुष दूसरों पर कैसे अन्याय करेंगे? उन्हें इस अपने आप पर अपनी भूल में हो रहे अन्याय को करने की क्या गरज पड़ी है । वह दूसरों पर अन्याय क्यों करेगा? दूसरों पर अन्याय न करना ही सदाचार है । सबसे अमूल्य वैभव और पुरुषार्थ आत्मा की सहज ज्योति की झलक है । आज इस आध्यात्मिकत्व के रुचिक कम हैं । समस्त संसार में अपने मंडल पर ही दृष्टि न देकर सब मनुष्यों पर दृष्टि करके देखो । जैसे आज मांस न खाने वालों की गिनती की जाय तो उसकी हुई गिनती में मांस त्यागी लोग शायद एक प्रतिशत भी न बैठने पायें । सौ में एक निकलेंगे जो मांस का त्यागी होगा । यह सुनकर त्यागी को अचरज होता है कि ये सब तो मांस न खाने वाले हैं, फिर बतलाते हैं कि एक प्रतिशत मांस त्यागी हैं । दुनियां में दृष्टि लगाओ तो यह सत्य निकलेगा कि एक प्रतिशत मांस त्यागी हैं । अपनी ओर को ही न देखो । सारा बंगाल, सारा उड़ीसा, पंजाब और विदेश चीन वगैरह सब पर दृष्टि लगाकर देखो तो एक प्रतिशत भी मांस त्यागी मुश्किल से निकलेंगे । वहाँ तो लाखों पर अनुपात पर सोचा जायगा । सर्व जनता पर दृष्टि देकर देखो । आध्यात्मिकत्व रुचिक कितने हैं । अपनी ही गोष्ठी परदृष्टि देकर न विचारो । यहीं देखो आप पर किसी का बोझ है कि शास्त्र में आना ही पड़ेगा, रुचि है ना, धर्म की आध्यात्मिकत्व की । स्वाध्याय, पूजा पाठ रोज करते हो तो किसी का डंडा पड़ रहा है क्या कि ऐसा तो करना ही पड़ेगा । आपकी रुचि है आत्मतत्व के वर्णन में परमात्मतत्व की, वही की वही बात रोज हो जाती है । होओ अध्यात्मरुचिकों को उससे ऊब नहीं आती । जैसे भोजन रोटी दाल वही रोज-रोज मिलता है, किंतु भोजन में रोज नई रुचि बनती जाती है । जो आध्यात्मिकत्व का रुचिया है वह उसही-उसही चीज को रोज-रोज सुनकर नहीं अघाता । जैसे मनुष्य वही दाल रोटी रोज-रोज खाता है, वहाँ यह हिसाब नहीं लगाता कि इसे तो महीना भर हो गया खाते-खाते, अब क्या रवाना? नहीं उसे तो वही रुचि है । रुचि होने से वही उर्द की दाल और रोटी नये-नये स्वाद की मालूम होती है । इसी प्रकार आध्यात्मिक रुचिक पुरुषों को आत्मा की वही-वही बात रोज-रोज नवीन-नवीन स्वाद वाली मालूम होती है और हम यदि उस आध्यात्मिक बात में लग जायें तो इतनी यह सही होगी कि हम वहाँ से हटेंगे नहीं । जब हम उस महल से च्युत हैं, अलग हैं तो हमें तो यह कथन, यह चर्चा रोज-रोज तो क्या प्रतिक्षण चाहिये । बहुत बुरा संकट बीमारी है । जैसे डाक्टर तेज बीमारी में 2-2 घटे में दवा बतलाते जाते हैं । मामूली बीमारी है तो सुबह शाम दवा बतलाते हैं । हम विकल्पों के इतने भयानक रोगी हैं । हाय रे मन ! तू एक मिनट भी आराम से नहीं बैठ सकता । किस-किस जगह विकल्प बन रहे हैं, कैसी-कैसी मन में उड़ान आ रही है । मरणासन्न है, मरणासन्न नहीं प्रतिक्षण मर रहा है । जो आयु के इतने क्षण हमारे निकल गये वे क्षण अब नहीं आते हैं । इसलिये वह मरण हो गया । हम प्रत्येक समय मरते चले जा रहे हैं और तद्भव मरण तो इस भव के अंत में आयेगा जहाँ कि मनुष्य की आयु का अंत हो जायेगा । वह तो है तद्भव मरण, पर प्रति समय इस मनुष्यायु का निषेक खिर रहा है वह क्या मरण नहीं है? प्रत्येक समय मरण है और वह मरण भी चला रहा है विकल्पों के भयंकर रोग के साथ, इसकी निरोग अवस्था तो शुद्ध ज्ञातादृष्टा रहना है । जब भी हम केवल साक्षी होंगे, ज्ञातादृष्टा होंगे, जाननहार मात्र होंगे तो वह हमारी स्वस्थ अवस्था है । वहाँ कैसे पदार्थों में राग और द्वेष का विकल्प करेगा, वह क्षोभ नहीं करेगा । जब वह क्षोभ नहीं करेगा तो समझ लो कि वह अवस्था निरोग उत्तम स्वास्थ्य की अवस्था है । किंतु वर्तमान में देखो तो सही कि जो जैसी पदवी में है जिनको धन का समागम लगा है उन-उन धनी को अपने-अपने अनुकूल विकल्प जाल लगा हुआ है । ऐसे जाल वालों को शुद्ध आनंद निधान परमात्मा की चर्चा प्रतिक्षण करने योग्य है, प्रतिक्षण पढ़ने योग्य है और उसी प्रकार की जरूरी है जैसे कि मरणासन्न रोगी को आध-आध घन्टे में दवा देने की जरूरत है । यों आचार्यदेव उसही आत्मा की बात को वर्षों तक लिखते हुए भी नहीं ऊबे क्योंकि उसमें नया-नया आनंद मिलता है । आपका पुत्र से पत्नी से प्रेम है तो आप प्रेम भरी बात कह-कह कर वर्षों तक भी पत्नी से नहीं ऊबते । रोज-रोज प्रेमभरी बात कहकर कैसा (कल्पित सही) मजे का रस लिया करते है, क्योंकि आपकी पुत्र में, पत्नी में रुचि है । इस प्रकार शुद्ध ज्ञायक स्वरूप में जिन्हें रुचि हो गई है वे पुरुष इस ज्ञायक प्रभु की बात सुनकर उत्साही होकर उछलते हैं । इस असार संसार में जन्म मरण के चक्र में भटकने वाले हम आपकी शरण हैं क्या? किसी की शरण में रहें जिस वस्तु की आप शरण में रह रहे हैं उस ही वस्तु के कारण आपको अभी या अंत में विकट चोटें आयेंगी और यदि विवेक से काम लिया तो ढंग से उनका साझा निबटा लिया जायेगा । परिवार में रहना है । परिवार ऐसा भला है तो प्रेमरस में आनंद लिये जा रहा है । जब कुछ समय तक किसी को बुखार आयेगा तो विषाद में पड़ जायेगा । यह तो दुकानदारी है । कभी नफा हुआ, कभी टोटा हुआ और अंत में मृत्यु तो होगी जब उस इष्ट से मिलन न होगा, तब उस पागल को खूब मना लो कि यह तो हाथ के बाहर हो जायगा ।

भैया ! संयोग का हर्ष मनाने का तो यह फल ही है । उन फलों को चखने में क्या खेद करना? प्रयोजन यह है कि संसार में कोई भी परवस्तु ऐसी नहीं है कि जिसको शरण कहकर हम अपने संकटों से बच लें और आराम पा लें । पुण्य के उदय में कुछ बड़ा हुआ तो क्या हुआ? गृहस्थ के झंझटों में ऐसा ही तो हुआ करता है । बड़प्पन तो यह है कि विवेक का कार्य करे, सत्यस्वरूप को समझे, परमात्मतत्व आत्मतत्व की शरण गहे, निर्मोह रहकर सबसे प्रेम का व्यवहार करे । यह तो है विवेक की बात, किंतु स्वच्छंद होकर मोही बनकर परवस्तु की ओर झुके तो यह तो प्रकट अविवेक है । दुःखी तो मोही को, अविवेकी को होना ही पड़ेगा । जंगल में एक साधु महाराज ग्रीष्मकाल में कहीं विहार करते हुए जा रहे थे । एक राजा वहाँ से निकला । राजा बोला महाराज तुम बड़े दुःखी हो । ऊपर भी धूप और नीचे भी धूप आई हुई है तो हम आपके पैरों के लिये जूतियां बनवा दे । कम से कम नीचे की गर्मी तो मिटेगी । साधु बोले अच्छा बनवा देना । पर नीचे की गर्मी तो मिट जायेगी, ऊपर की गर्मी कैसे निकलेगी? राजा बोला महाराज हम बढ़िया छतरी दे देंगे । साधु बोला फिर लू जो गर्मी में सताएगी ना, उसका क्या होगा? राजा बोला कि बढ़िया रेशमी कपड़े बना देंगे आप किसी बात की परवाह न करो । अब साधुजी बोले, इतने सजधज के बाद पैदल चलने में आलस्य आयेगा तो राजा बोला कि आपको एक कार दे देंगे और कार के खर्च के लिये 4 गांव लगा देंगे । साधु बोला कि राजन् फिर मुझे पड़गाहेगा कौन? मेरे लिये रोटी कौन करेगा और जब रोटी करने वाली ही नहीं होगी तो फिर क्या भूखे मरेंगे । राजा बोला―नहीं महाराज हम आपकी शादी कर देंगे । फिर आपकी स्त्री खाना बनायेगी और आपको बढ़िया-बढ़िया भोजन खिलायेगी । साधु बोला कि बच्चे होंगे, खर्च बढ़ेगा । राजा बोला महाराज हमारे 500 गांव लगे हैं आपको और चार गांव दे देंगे । साधुजी बोले कि बच्चे फिर बड़े होंगे । उनमें से कोई लड़का अथवा लड़की गुजर जायेगी तो फिर रोयेगा कौन? साधु ने सोचा कि शायद राजा यह कह दे कि हम रो लेंगे । पर राजा साधु से क्या कहता है कि और तो सब कुछ कर देंगे मगर रोना तो तुम को ही पड़ेगा । जो भी विकल्प करेगा, मोह करेगा रोना तो उसको ही पड़ेगा । यह ठाट बाट मिला है, सब कोई चाहता तो यह है कि इसमें मस्त रहा करें, बड़े सजधज से बनकर रहें किंतु ऐसा अधिकार तो किसी का है ही नहीं । हां, अपने पर अपना अधिकार है, आत्मज्ञान तत्त्वज्ञान की चर्चा से आध्यात्मिकता से अपनी आत्मा को पुष्ट बना सकें । पुण्य के ठाठों में मस्त रहने वाले से कई गुणा आनंद आत्म-ज्ञान तत्त्वज्ञान में होता है । किसी से पूछो मीठा क्या है? प्रत्येक कोई कहेगा कि दूध मीठा है, दही मीठा है, गुड़ मीठा है, शक्कर मीठी है । अरे ! मीठा क्या है? जिसका जहाँ मन लग गया उसको वही मीठा है । क्या नमक कम मीठा है? यदि नमक कम मीठा है तो बिना नमक के रसोई बनाकर देखो आनंद नहीं पावोगे । आनंद तो क्या, खाया भी न जायगा । जिसका जहाँ मन लग गया, वहाँ उसको आनंद प्राप्त है, जो चीज मेरे पास सदा नहीं रह सकती और जब रहती है तब भी मेरी इच्छा के अनुकूल परिणत नहीं होती हो तो भी नहीं रुच सकती, उसमें मन लगाना व्यर्थ है । यदि कोई यह निर्णय देता है कि हमें जो भोग कभी नहीं मिटेंगे, सदा रहेंगे और जो हमें इंद्रियां मिली है ये भो कभी नहीं मिटेगी, सदा रहेंगी । सो निःसंदेह ऐसा कह सकते हैं कि धर्म ढूंढना व्यर्थ है किंतु ऐसा तो हुआ ही नहीं है । और भी इसके कारण हैं कि सदा क्लेश बने रहते हैं।

भैया ! सत्य बात की ओर आचार्यदेव प्रेरणा करते हैं, यह बहकाने की बात नहीं है । आचार्य को बहकाने की बातों में क्या था? जो किसी को अदृश्य की ओर ले जाएँ । बात ऐसी है कि यह दृश्यमात्र पदार्थों में सार कुछ नहीं इसलिये परमार्थ सार है, परमार्थ शरण है जो निजचैतन्य स्वभाव है उसकी ओर उपयोग के लिये उपदेश किये जा रहे हैं । भूख लगती है और भूख को हम खाना खाकर मिटाते हैं किंतु अगर ऐसी अवस्था हो जाय कि भूख लगे ही नहीं तो इससे सुख है कि नहीं? कोई ऐसे भी रोगी हैं जिनको कोई भूख नहीं लगती, हम उनकी कथा नहीं कर रहे हैं । वे मोही हैं । भूख बिना उनका गुजारा नहीं है । ज्ञानी चाहता है कि मेरी आत्मा की शुद्धि हो जाय । अरहंत बन करके शुद्ध होगा । जब अठारहों दोष नहीं रहते तब तो आनंद की पूरी स्थिति हो जायगी । जहाँ विकल्पजाल नहीं रहा वहीं आनंद की उत्कृष्ट अवस्था है । विकल्पजाल नहीं रहे इसके लिये उपाय आत्मस्वरूप का परिचय करना है । स्वपरिचय बिना विकल्पजाल मिटने का उपयोग कैसे होगा? अपनी शुद्ध आत्मा की सत्ता के कारण सहज स्वतःसिद्ध जो भाव हैं वह निर्विकल्प है, जन्ममरण से रहित है, शरीर से रहित है, कर्मों से रहित ज्ञायकमात्र है । उस ज्ञायकस्वभाव का परिचय इतने उत्थान का आधार है । हम अपने में गड़ते जायें और किसी ऐसी गुप्त जगह पहुंच जाय कि जहाँ पहुंचने के बाद इस जीव को रच भी अशांति नहीं रहती है । परमात्मतत्व का परिचय कर लें और उस परमात्मतत्व के ज्ञान में सुदृढ़ रह लें तो यह बड़े वीर पुरुषों का कार्य है । कायरजन तुरंत बह जाते हैं । रच भी धैर्य नहीं रख सकते । वे गृहस्थ परिवार धन्य हैं जहाँ सबके सब बच्चे भी पुत्र भी उस आत्मतत्व की चर्चा करते हैं । वह गृहस्थ जीवन सफल है ।

भैया ! जो शांति का सत्यमूल है ऐसे अपने परमात्मतत्व के परिचय के लिये तन क्या? मन क्या? धन क्या है? वचन क्या? सब कुछ न्यौछावर करना पड़े, सब कुछ त्याग भी करना पड़े, यह सब न्यौछावर करके भी एक इस सहज परमात्मस्वरूप का परिचय पा लें तो सब कुछ पा लिया और फिर यह तन, मन, धन के त्यागने की भी बात नहीं है । एक दृष्टि पड़ने की बात, लगन लगने की बात है । यदि आत्मज्ञान की उत्सुकता हो गई तो भैया ! बहुत बड़ी निधि पा ली ।


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