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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 73

From जैनकोष



यानि तु पुनर्भवेय: कालेच्छिन्नत्रसाणि शुष्काणि ।

भजतस्तान्यपि हिंसा विशिष्टरागादिरूपा स्यात् ।।73।।

शुष्क उदंबरफलों के भी भक्षण में हिंसा―और फिर भी जो 5 उदंबर हैं वे सूख भी जायें काल पाकर त्रस जीवों से भी रहित हो जायें तो भी उनका भक्षण करने वालों के विशेष रागादिक भाव उत्पन्न होते हैं इसलिये हिंसा होती है । तो ऐसे निंद्य पदार्थों को जो खाता है वह हिंसक पुरुष है । किसी ने ऐसी शंका की कि ऐसे पदार्थों को सुखाकर खाये तो इनके खाने में तो हिंसा न होगी? उत्तर दे रहे हैं―कि जब वह फल सूखा तो उसके जीव भी सूख गए हिंसा हो गई और सुखाकर खाने में राग की विशेषता बढ़ती है, क्योंकि ये जो पदार्थ हैं ऊमर कठूमर आदिक तो यह साधारणतया कोई जब विशेष राग उत्पन्न हुआ और उसे सुखाकर खाते हैं यह बहाना करके कि इसमें जीव नहीं रहे, तो उसमें भी हिंसा है । तो इन अष्टमूल गुणों में सबसे पहिले इन 8 चीजों का त्याग बताया है । और इन 8 चीजों का त्याग करने की बात कह कर अब अंत में इन आठों गुणों से संबंधित एक उपसंहार करते हैं ।

मद्य मांस मधु पंच उदंबर फलों के त्याग बिना जिनधर्मदेशना की अपात्रता―ये अष्ट प्रकार के पदार्थ दुःखदाई हैं और पापों के साधन हैं, इन अष्ट प्रकार के पदार्थों का त्याग करके जो शुद्ध बुद्धि वाले हैं वे जैन धर्म के उपदेश सुनने के पात्र होते हैं याने मांस भक्षण करने वालों के चित्त में जैनधर्म की बात नहीं समा सकती । जो इन अष्ट प्रकार के पदार्थों का त्याग कर देते हैं वे ही जैनधर्म के उपदेश सुनने के पात्र होते हैं । जो यथार्थ है, वस्तु के स्वरूप की बात, जिसके पालन करने से ज्ञान, करने से इस जीव का मोह दूर होता है । संसार के संकटों से ये अलग हो जाते हैं, इस कारण से मद्य, मांस, मधु वगैरह का जो त्याग करते हैं वे ही जैनधर्म का उपदेश सुनने के पात्र हैं । इस कारण इन 8 प्रकार की चीजों का त्याग करना अष्ट मूलगुण बताया है । जो इन अष्ट प्रकार की चीजों का त्याग नहीं कर सकते उनको उपदेश क्या लगेगा? उनका तो चित्त ही ठिकाने नहीं है । उसके तो घोर अज्ञान अंधेरा बसा हुआ है । ऐसे अंधकार में रहने वाले पुरुष जैनधर्म का उपदेश सुनने के पात्र नहीं होते । बहुत मोटी चीज बतायी जिसे सभी लोग पालन कर सकते हैं । जो इनका त्याग करते हैं वे श्रावक कहलाते हैं, वे ही दया धर्म पालन करने वाले कहला सकते हैं ।

श्रावकों के मूलगुणों का तीन प्रकार में विवरण―अब यहाँ मूल गुण तीन ढंग से बता रहे हैं । जो लोग जैन कुल में उत्पन्न हुए हैं, बड़े कुल में उत्पन्न हुए हैं उनको बताया है कि जो मद्य, मांस, मधु का त्याग करें और 5 अणुव्रत का पालन करें उन्हें ऊंची क्रियाओं की चीज बतायी है । मद्य, मांस, मधु का त्याग और 5 उदंबर फलों का त्याग करना, जीवों की दया पालना, देखकर चलना, शिकार न खेलना―ये पंच मूलगुण हैं, छठा है जल छानकर पीना क्योंकि जल में भी असंख्याते त्रसकाय के जीव रह सकते हैं । जल छान लेने से वे जीव छन्ने से नीचे नहीं आते, बाद में उस छन्ने को भी छने हुए पानी से धोकर उसी अनछने पानी में डाल देते हे । इससे उन त्रस जीवों का घात नहीं होता । 7वां मूल गुण है रात्रि भोजन का त्याग । रात्रि में अनेक जीवों का संचार होता है । रात्रि में भोजन बनाने में बहुत बड़ी हिंसा होती है, मक्खी मच्छर आदि मरते रहते हैं, फिर रात्रि के समय में वे जीव आते रहते हैं, सूर्य की रोशनी में वे जीव नहीं आते हें । कुछ ऐसी ही प्राकृतिक बात है । जो लोग रोशनी करके भी खाते हैं तो उस रोशनी में और ज्यादा जीव आते हैं । तो 7वां बताया रात्रि भोजन का त्याग और 8वां मूल गुण बताया है देव दर्शन । प्रभु के दर्शन करना, मूर्ति के दर्शन करें या प्रभु का ध्यान करें । अपने मन से अर्थात ज्ञान से उनके दर्शन करें तो यह भी एक मूलगुण है । जिसमें अहिंसा की वृत्ति है उसमें अपने आपकी सुध बढ़ती है । अपने में यह दृढ़ता होती है कि प्रभु की तरह मैं भी चैतन्यस्वरूप हूँ, सबसे निराला हूँ―ऐसी अपने अंदर चैतन्यस्वरूप की सुध बनी रहे तो उसमें भी अहिंसा पलती है, हिंसा दूर होती हे । तो इस प्रकार के अष्टमूल गुणों का धारण श्रावकों को करना चाहिए जिससे उनके गुणों में उत्तरोत्तर वृद्धि हो और वे अपने धर्म का पोषण कर सकें । जैन धर्म के शास्त्र सुनने समझने की उनमें पात्रता जगे, इस कारण से ये 8 प्रकार के मूल गुण उन श्रावकों को धारण करने चाहियें । और जो श्रावक इन 8 मूल गुणों को धारण नहीं कर सकते तो उन्हें जो सर्वप्रथम बताये गए मूल गुण हैं―मद्य, मांस, मधु का त्याग और 5 उदंबर फलों का त्याग अवश्य करना चाहिये । जो लोग क्रूर चित्त वाले हैं, जिनका विचार अस्थिर हो गया है ऐसे पुरुषों को बताया है कि उनको भी जरूर इन अष्ट मूल गुणों का धारण करना चाहिये । वे आठ मूल गुण बहुत ही सरल चीज हैं, जिससे न कोई आत्मा का विघात होता हे, न क्षय होता है, ऐसे आठ मूल गुण प्रत्येक प्राणी को धारण करना चाहिये । चाहे वह आगे न बढ़ सके, कैसी ही ओछी जाति का हो, पर ये 8 मूल गुण तो सभी पुरुषों को धारण करना चाहिये । इनके धारण किए बिना धर्ममार्ग में अपना कदम नहीं रख सकते हैं । तो मद्य, मांस, मधु और 5 उदंबर फल ये 5 महापापों के कारण हैं, इस कारण इनका त्याग करे तो तब ही वह पुरुष जैनधर्म का उपदेश सुनने योग्य है । इनका त्याग किए बिना पुरुष विवेकी नहीं कहला सकता । इस प्रकार इन 8 चीजों का त्याग करना अष्ट मूलगुण बताया गया है । इनका पालन अवश्य करना चाहिए । इस प्रकार इस अहिंसा के प्रकरण में सर्वप्रथम यह बताया कि जीव चारित्र में आये तो सबसे पहिले इन आठ मूल गुणों का अवश्य पालन करे ।


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