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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 75

From जैनकोष



धर्ममहिंसारूपं संश्रण्वंतोऽपि ये परित्यक्तम् ।

स्थावहिंसामसहास्रसहिंसां तेऽपि मुंचंतु ।।75।।

हिंसा और अहिंसा का मौलिक स्वरूप―समस्त जीवों को एक यह इच्छा रहती है कि दुःख से तो छूटे और सुख में आयें । तो जो उपाय दु:ख से छुटाये और सुख में पहुंचाये उस ही का नाम धर्म है । संसार के प्राणियों को दुःख से छुटाये, उत्तम सुख में जो ले जाये उसे धर्म कहते हैं । वह धर्म अहिंसा स्वरूप है । अहिंसा का नाम धर्म है । हिंसा का नाम अधर्म है । किंतु किसकी हिंसा और किसकी अहिंसा? आत्मा की अहिंसा हो उसका नाम धर्म है और आत्मा की हिंसा होना उसका नाम अधर्म है । किस आत्मा की? निज आत्मा की अहिंसा का नाम धर्म है और निज आत्मा की हिंसा का नाम अधर्म है । आत्मा का घात रागद्वेष मोह भाव से होता है । यह आत्मा स्वरूपत: ज्ञानानंदमय है और जैसा विलास जैसा परिणमन प्रभु का है, अरहंत सिद्ध भगवान का है वैसा ही प्रताप हम आप सब आत्माओं का है, लेकिन राग द्वेष मोह जो विभाव होते हैं उन विभावों से आत्मा का घात होता है, लौकिक प्रसंग किन्हीं व्यवहार के साधक हे, रहो, लेकिन हम आप सबको ऐसा अंत: अलौकिक प्रसंग बनाना चाहिये जिससे आत्मा की रक्षा हो । हर एक कोई अपनी-अपनी रक्षा अभिलाषी है । जिसमें अपनी रक्षा हो उस काम से चूकना नहीं चाहिये । विवादों में क्या रखा हे और व्यवहार में क्या रक्खा है अर्थात् नाना जीवों से स्नेह बढ़ाना, उनमें घुल मिलकर रहना इन बातों से भी आत्मा की क्या रक्षा है । आत्मा की रक्षा तो निर्विकार ज्ञानानंदस्वरूप जो कुछ मात्र सत्त्व के ही कारण सहजभाव हो उन भावोंरूप में आत्मा की प्रतीति करना, यही है आत्मा की रक्षा । जो जीव जब भी किन्हीं बाह्यपदार्थों में राग और मोह बसाता है, उनकी दृष्टि बनाता है, उनमें रमता है, मौज मानता है, अथवा खेद करता है तो वे सब परिणमन आत्मा की हिंसा हैं, उन परिणमनों अधर्म है और जो परिणमन आत्मा के निर्विकार भावों पर दृष्टि ले जाये निर्विकार सहजस्वरूप में रमने की पात्रता बनाये वह सब परिणमन धर्म है । तो धर्म हुआ अहिंसा ।

अहिंसाधर्म के पालन का अंतर्बाह्यरूप―अब उस अहिंसाधर्म में कदम रखने वाले मुनि की क्या प्रवृत्ति होती है जिससे वह अहिंसा धर्म के पालने का पात्र रह सकता है, उस ही काम का नाम चरणानुयोग है । तो करना क्या है आत्महित के लिए? उसका उत्तर मूल में एक होता है । फिर साधक दशा में तो योग्यता और पद के अनुसार भिन्न-भिन्न उत्तर होते हैं । उन्हें भी समझना सो समझ सच्ची है । मूल में जो उत्तर है आत्महित के लिये केवल उसे ही पकड़कर रहना और अपनी योग्यता पद के माफिक जिन चाहे उन उत्तरों से विमुख रहना, उनमें कुछ भी अपना उपयोग न करना यह तो थोड़ा धोखे वाली बात है और पदों के माफिक परिणाम योग्यता के माफिक ही केवल उत्तर लेना और मौलिक उत्तर को मना करना यह भी धोखे वाली बात है । दोनों को समझना चाहिए तब सर्व समाधान आता है । सो सुनिये―आत्महित के लिये क्या करना है? आत्महित के लिये आत्मा का जो सहज स्वरूप है अनादि अनंत अहेतुक, असाधारण, उस स्वरूप को जानना उसे मानना और उसमें रमण करना, यही हुआ अभेद सम्यक्त्व ज्ञान और आचरण । यही है आत्महित के लिए मौलिक उपाय । लेकिन ऐसा जो नहीं कर पा रहे हैं उनके आत्मा में स्थिरता नहीं हो सकती है । लक्ष्य तो अपना यही बनायें कि जैसा पद है उस पद के योग्य अपना व्यवहार कार्य करें जिससे उसके पात्र बने रहे । उसका ही नाम मुनिधर्म है और श्रावकधर्म है ꠰ तो यह श्रावकधर्म की बात चल रही है । अहिंसा धर्म है निर्विकार आत्मस्वरूप का आलंबन करना सो अहिंसा है । ऐसे ही अहिंसा का पालन करने के लिए उद्यमी पुरुष का अपने पद के माफिक क्या परिस्थिति बनती है, क्योंकि जब रागादिक का उदय है, रागादिक परिणाम होते हैं तो उनका क्या प्रयोग किया जाता है, कैसी परिणति होना चाहिये, उसके वर्णन में सबसे पहिले यह कहा गया कि अष्टमूल गुणों का पालन तो करना ही चाहिये, उसके बिना तो वह श्रावक भी नहीं और जैनधर्म के उपदेश सुनने का भी पात्र नहीं । यह है एक ऐसा मौलिक आचरण जो अनिवार्य है । मध्य, मांस, मधु का त्याग और पंच उदंबर फलों का त्याग, यही मौलिक आचरण है । उसी को ही पुष्ट करते हुए बतला रहे हैं कि अहिंसामयी धर्म की वार्ता सुन करके भी जो पुरुष स्थावर जीवों की हिंसा वर्तमान में सर्वथा नहीं छोड़ सकते हैं वे पुरुष त्रस हिंसा का तो परित्याग करें ।

अहिंसाधर्म के पालन के लिये गृहस्थधर्म व मुनिधर्म का निर्देश―देखिये एक धर्मभाव बनाने के लिये किस शैली से आचार्यदेव ने वर्णन किया है? आत्महित के लिये मूल में एकमात्र कर्तव्य यह है कि एक निर्विकार निज ज्ञानस्वभाव को जानकर उसमें ही रमण करें । कर्तव्य तो यह है, पर इस कर्तव्य को पूर्ण करने की स्थिरता जिनके प्रकट नहीं है, जिनकी रागादिक में प्रवृत्ति है ऐसे पुरुष ऐसा ही कार्य करें जिन कार्यों से अपने लक्ष्य की भूल न हो सके । विरुद्ध कार्य न हो उसही का नाम मुनिधर्म और गृहस्थधर्म है । अहिंसा व्रत के पालन के लिए, निज अंतस्तत्त्व की रक्षा के लिए बाहर में प्रवृत्ति भी ऐसी होनी चाहिए, कोई अहिंसा का पालन तो न करे और यह डींग मारे कि अंतरंग में तो अहिंसाधर्म बना हुआ है तो यह उसकी कोरी डींग है । जो अपनी आंतरिक अहिंसा व्रत का पालन करना चाहता है उसकी आंतरिक प्रवृत्ति में ऐसी हो कि जिसमें बाह्य धर्म का भी पालन करे, अर्थात् दूसरे का दिल न सताना यह ज्ञानियों की बाह्य प्रवृत्ति होती है । तो किन प्राणियों को न सताना, और किनको सताना ऐसा वर्णन जैन शासन में नहीं है । जैन शासन में तो सर्वप्राणियों का न सताना बताया है । किसी भी प्राणी के सताने का संकल्प न जगे, वह है अहिंसा । लेकिन ऐसी अहिंसा को तो वह ही पुरुष पाल सकता है जिसने घर बार कुटुंब वैभव सब चीजों का परित्याग किया और अपने शरीर से भी ऐसा उदासीन है कि ये मुनि किसी भी चीज की याचना नहीं करते । अपने लिए न आहार की याचना करते और न औषधि की, ऐसी परम उपेक्षारूप निर्ग्रंथ गुरुजन ही इस अहिंसा का पूर्णतया पालन कर सकते हैं । क्या गृहस्थों से भी अहिंसा का पूर्ण पालन कराया जा सकता है? घर में रहने वाले लोग क्या आजीविका का साधन न बनावेंगे क्या आरंभ न करेंगे? न करें तो गृहस्थीपना कैसे बने? तो उनके लिए बतला रहे हैं किं अहिंसारूप धर्म में सुनते हुए भी जो सर्वजीवों की हिंसा का परित्याग नहीं कर सकते वे त्रस जीवों की हिंसा का परित्याग तो करें ही करें । क्योंकि त्रस हिंसा का परित्याग कर देने से जीवन में कोई बाधा नहीं पहुंचती । तो गृहस्थ जो घर में रहते हें उनके स्थावरों की हिंसा सर्वथा न छूट सकेगी क्योंकि आग जलाते, पानी भरते, भोजन बनाते, व्यापार करते, ये सब बातें करनी पड़ती हैं गृहस्थों को । हां ज्ञानी पुरुष है इस कारण उसका लक्ष्य विशुद्ध रहता है, उसके अहिंसा धर्म पालने का ही भाव रहता है, लेकिन गृहस्थी में रहकर हिंसा का सर्वथा परित्याग असंभव है, अत: आचार्यदेव बतलाते हैं कि वे हिन्सा को तो छोड़ें ही छोड़ें ꠰

चार प्रकार की हिंसा और उसके त्याग का अनुविधान―संसार में जीव 5 प्रकार के हैं―एकेंद्रिय, दोइंद्रिय, तीनइंद्रिय चारइंद्रिय और पंचेंद्रिय । एकेंद्रिय का नाम तो स्थावर है और दोइंद्रिय से लेकर पंचेंद्रिय तक वे सब त्रस कहलाते हैं । अग्नि की, पानी की, वनस्पति की इनकी हिन्सा तो गृहस्थों से बनती रहती है । किंतु फिर भी उस आरंभी हिन्सा से बचना चाहता है, ऐसे कह रहे हैं कि उन्हें क्या आपत्ति है त्रस हिन्सा के त्याग में, वे त्रस हिन्सा का पूर्ण परित्याग करें । शिकार खेलना, मद्य, मांस भक्षण व किसी जीव का सताना बंद करें । यह तो सभी से बन सकता है । हाँ स्थावरों की हिस्सा छोड़ने में असमर्थ हैं । तो अब ये एकदेश अहिंसक हो गये अथवा यों समझिये कि हिन्सा चार प्रकार की होती है-संकल्पी, उद्यमी, आरंभी और विरोधी । इनमें संकल्पी हिन्सा का तो परित्याग कर सकते हैं, शेष तीन की हिन्साओं का परित्याग करने में असमर्थ हैं आरंभ न करें तो क्षुधापूर्ति का काम कैसे बने? उद्यम न करें, यों ही बैठे रहें तो घर गृहस्थी का काम नहीं चल सकता है । आरंभी हिन्सा छोडने में गृहस्थ असमर्थ है, हां साधुजन आरंभी हिन्सा को छोड़ देते हैं तो उन्होंने इतना बल प्राप्त कर लिया कि अनेक उपवास हो जायें तो भी चित्त में विषमता नहीं आ सकती । वे अहिन्सा का पालन कर सकते हैं, पर गृहस्थी में यह बात संभव नहीं है । उद्यमी हिन्सा में आजीविका न्यायपूर्वक करे, सावधानी से करे फिर भी जो जीवों की हिन्सा हो सकती है उसका नाम है उद्यमी हिन्सा, क्योंकि संकल्प नहीं है कि मैं उन जीवों को मारूं । ऐसे ही एक विरोधी हिन्सा है, यह भी गृहस्थों से बच नहीं पाती । कोई बैरी, शत्रु अपने धन पर अपनी जान पर हमला करने आया है तो उसे उत्तर न दें तो गृहस्थी नहीं निभ सकती है, तो यह है विरोधी हिन्सा । तो जो समस्त हिन्सावों का परित्याग करने में असमर्थ हैं उन्हें संकल्पी हिन्सा का तो परित्याग कर ही देना चाहिये । जितना हम बाहर में प्रवृति कम करेंगे, अपने अंतःस्वरूप में अपनी दृष्टि दृढ़ करने का यत्न करेंगे तो यह तो अपने लिए भला है । यह गृहस्थ एकदेश हिन्सक बना, क्योंकि सर्वप्रकार से हिन्सा का परित्याग करने में असमर्थ है । अब उसी अहिन्सा का साधन जो निवृत्ति है वह निवृत्ति किस ढंग से कहां संभव है? उसके बारे में बतलाते हैं ।


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