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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 72

From जैनकोष



जे रायसंगजुत्ता जिणभावणरहियदव्वणिग्गंथा ।

न लहंति ते समाहिं वोहिं जिणसासणे विमले ।꠰72।।

(150) रागसंगयुक्त सम्यक्त्वरहित द्रव्यलिंगी मिथ्यादृष्टि जीवों को बोधि समाधि के लाभ की असंभवता―जो राग के परिग्रह से रहित हैं, जिन में राग भरा हुआ है, जिन में स्त्री आदि के प्रति प्रीति के परिणाम पैदा होते हैं अथवा राजा महाराजाओं के संग की जो भावना रखते हैं, स्वयं की भावना को छोड़ देते हैं वे पुरुष सम्यक्त्वरहित हैं, भले ही बाह्य निर्ग्रंथ हों । जिनको जिनेंद्र के ध्यान में, आत्मा के स्वरूप में, सम्यग्दर्शन भाव में रुचि नहीं है वे पुरुष बोधि को नहीं पा सकते, समाधि को नहीं पा सकते । यह जैनशासन इतना निर्मल है कि, जहाँ हिंसा का काम नहीं । जैनधर्म धारण करने वाले लोग अंत: पवित्र होते हैं । अभी-अभी की एक घटना है मेरठ की, वहाँं कई एक सन्यासी रुद्र यज्ञ करने आये थे । उसमें बहुत से बर्तनों की आवश्यकता थी, सो सन्यासीजनों ने यह मांग की कि हमको इस रुद्र यज्ञ के लिए जैनियों के बर्तन चाहिए क्योंकि उनके बर्तन बड़े पवित्र होते हैं । तो भाई जैनशासन की निर्मलता देखिये वहाँ हिंसा का कोई काम नहीं, अनेकों जगह तो ऐसा देखने को मिलता है कि लोग यज्ञ कराते हैं तो उसमें पशुओं की बलि करवाते हैं, पर जैनशासन में हिंसा की कोई बात देखने में नहीं आती । वे तो अपने धार्मिक स्थान में फल फूल वगैरह भी तोड़कर चढ़ाना पसंद नहीं करते, क्योंकि उनमें भी जीवहिंसा होती हैं । तो जिनका मंदिर पवित्र, जिनका परिवार पवित्र ऐसा बड़ी सच्चाई और पवित्रता का यह शासन है । जहाँ न्याय की भावना देखने में आती है, अन्याय की बात नहीं दिखती, किसी को नाजायज सताने का परिणाम लोगों में नहीं दिखता, जो असली चीज में नकली चीज मिलाकर बेचने में पाप समझते हैं, किसी को धोखा देने में पाप समझते हैं, जो सबके सुख की भावना रखते हैं, जो आत्मा के निर्मल स्वरूप की दृष्टि रखते हैं ऐसे उपासक इस जैनशासन में रहा करते हैं ।

(151) निर्मल जैनशासन में पापमलिन मुनिवेशी मुनियों की संभवता पर खेदप्रकाशन―इस निर्मल जैनशासन में कोई मुनिपद धारण करके राग और परिग्रह सहित बने तो वह अपना कल्याण नहीं कर सकता । भले ही कभी कोई मुनि कह दे कि हम नहीं परिग्रह रखते, मगर बताओ तो सही कि मान लो साथ में जो सामान लेकर चलने का ठेला रखा है उसमें कुछ टूट फूट जाये, बिगड़ जाये तो फिर उसके पीछे खेद मानते कि नहीं? जिनको खेद होता समझो उनके नियम से परिग्रह है । अगर परिग्रह न होता तो खेद क्यों होता? राग है तब खेद होता और राग का ही नाम है परिग्रह । तो जो णमोकार मंत्र में पंच परमेष्ठियों के नाम लेते हैं तो उनमें साधु परमेष्ठी जिन्हें कहते हैं वे इतने उच्च और पवित्र होते हैं कि उनके पास आये हुए हिरण और शेर खड़े हों तो उनमें परस्पर में विरोध नहीं रहता । न तो सिंह को हिरण की हिंसा करने का भाव रहता है और न हिरण को भय रहता है, ऐसे निर्ग्रंथ भेष को धारण कर अगर रागमोह सहित हो जाये तो वह सम्यक्त्वरहित है, वह अपना कल्याण नहीं पा सकता ।

(152) भावश्रमण के सतत सद्भावना―मुनि के निरंतर सद्भावना रहती है । उस सद्भावना में सबसे बड़ी भावना तो सहज आत्मस्वरूप को दृष्टि में लेना है । मैं यह हूँ ज्ञानस्वरूप, यह दृष्टि में रहे, यह हैं ऊंची भावना, फिर अन्य जीवों पर दृष्टि जाये तो सब प्राणियों पर क्षमा की भावना, मित्रता की भावना, गुणीजनों के प्रति प्रमोद की भावना और कोई दुःखी हो तो उनमें करुणा की भावना ज्ञानी के होती है । जगत के जीव कैसे कल्याण पाये, उनका अज्ञान दूर होवे, वे अपने ज्ञानस्वरूप में रहे, ऐसी भावना, और भी षोडश कारण भावनायें, दशलक्षण भावनायें, इन सब भावनाओं से जो ओतप्रोत रहते हैं, वे मुनि आदर्श है, पूज्य हैं, और णमोकार मंत्र में 5वें पद के द्वारा वे भक्ति से नमस्कार किए जाते हैं । कोई पुरुष द्रव्य से तो निर्ग्रंथ हो गया मायने शरीर से तो नग्न हो गया, पर रत्नत्रय से पूर्ण नहीं है धर्मध्यान जिसने पाया नहीं है वह पुरुष मोक्षमार्ग को प्राप्त नहीं कर पाता । आत्मस्वरूप की भक्ति करें, जिनेंद्र देव के स्वरूप की भक्ति करें तो अविकारता वीतरागता दोनों दृष्टि में आते हैं । भगवान वीतराग हैं, रागद्वेष रहित हैं, ऐसे जिनेंद्रदेव की भक्ति बड़ी-बड़ी दुर्दशाओं को नष्ट कर देती है, पुण्य को भर देती है, मुक्ति लक्ष्मी को प्रदान करती है । यह मैं आत्मा ज्ञानस्वरूप हूँ, इसका ज्ञान ही ज्ञानस्वरूप है । इस ज्ञान में विकार नहीं है, क्योंकि आत्मा में अपने आप विकार ही नहीं आते, किंतु जब कर्म का उदय सामने होता तो विकार आते ।

(153) विकारमूर्ति में जिनभावना की असंभवता―व्यक्त विकार के प्रसंग तीन चीजें होती हैं―(1) उपादान (2) निमित्त और (3) आश्रयभूत कारण ꠰ उपादान तो हमारा आत्मा है, अगर रागीद्वेषी बना तो आत्मा ही तो बना । निमित्त कारण कर्म का उदय है, कर्म का उदय होने पर रागद्वेष बनते और आश्रयभूत कारण ये सब पदार्थ हैं, जिनको ख्याल में लेकर क्रोध जगता है, घमंड जगता है, कपट जगता है लोभ जगता है । यह सब है आश्रय भूत कारण । तो क्या करना? यह समझना कि आश्रयभूत कारण जो है वह भी मुझसे न्यारा है जो निमित्त कारण है वह भी मुझसे न्यारा है, मैं तो केवलज्ञानस्वरूप हूँ । अपने आपमें अपने सहज स्वरूप की भावना जिसके नहीं है वह निर्ग्रंथपद भी धारण कर ले तो भी उसे बताया है नटश्रमण । एक ऐसी घटना है कि कोई एक मुनिराज थे, वह किसी नदी के तट पर एक शिला पर बैठकर ध्यान करने लगे । एक दिन की बात कि वह आहारचर्या को गए, और यह नियम लेकर गए कि आहार करके वापिस आयेंगे तो इसी शिला पर बैठकर ध्यान करेंगे । आहार करके वे मुनि वापिस आये और उस शिला पर बैठ गए, उसी समय एक धोबी आया तहमद पहने हुए बहुत से कपड़े लेकर और उस ही नदी के किनारे उसी शिला पर वह कपड़े धोता था तो वह उसके किनारे आ गया और मुनि से कहा कि आप दूसरी जगह बैठ जावो हम इस शिला पर कपड़े धोयेंगे । तो मुनि बोले कि तुम कैसे कपड़े धोवोगे, हम यहाँ पर बैठकर ध्यान करेंगे । धोबी बोला महाराज यह हमारी रोज की कपड़ा धोने की शिला है, हम इस पर रोज-रोज कपड़े धोते हैं । तो उनमें आपस में बहुत कहा सुनी हो गई, यहाँ तक कि हाथापाई भी हो गई, एक लड़ाई-सी होने लगी, उस समय उस धोबी का तहमद खुल गया, अब दोनों नंगे हो गए ꠰ वह मुनिभेषी तो नंगा था ही । जब तेज लड़ाई हो गई तो उस समय तहमद खुल जाने से धोबी भी नंगा हो गया । उस समय मुनि कहता है कि ए देवताओं तुमको कुछ खबर नहीं है कि यहाँ मुनि पर संकट आ रहा है, क्या हमको तुम बचा नहीं सकते? तब उसे देवता कहते हैं कि हम तो तुम्हारी सेवा के लिए खड़े हैं मगर हमें यह भ्रम हो गया कि इनमें मुनि कौन है और धोबी कौन है? तो मुनिपद बहुत ऊंचा पद है, अरहंत के बाद का पद है । यह पद कैसा निर्दोष होना चाहिए, कैसा समता से भरा हुआ होना चाहिए ज्ञानामृत का निरंतर अनुभव करते हुए होना चाहिए । जिस मुनि के दर्शन से पाप ध्वस्त हो जाते हैं, ऐसे मुनि का भेष रखकर भी यदि कोई पुरुष क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषायों में बढ़ा हुआ है और विषय पोषने के खातिर ही खाने पीने या आदर के खातिर ही वह सब कुछ कर रहा है व्यवहारं धर्म की बातें, तो ऐसे मुनि के लिए कह रहे हैं कि वह न तो ज्ञान प्राप्त कर सकता है और न समाधि प्राप्त कर सकता है ।

(154) बोधि समाधि के लाभ में ही जीव का कल्याण―लोक में दुर्लभ रत्नत्रय है । आप लोग प्राय: पढ़ते होंगे―धन कन कंचन राज सुख सबहि सुलभ कर जान, दुर्लभ है संसार में एक यथारथ ज्ञान । यह यथार्थ ज्ञान अत्यंत दुर्लभ है, पर ऐसा मोह जीवों पर छाया है कि ये बाहरी पदार्थ ही इन्हें रुचते रहते हैं । आप ज्ञान के लिए क्या करते हैं सो बताओ, तन, मन, धन, वचन यह सब कुछ परिवार पर न्यौछावर कर देंगे, मगर अपने आपके कल्याण के लिए, अपने आपके बोध के लिए समय भी नहीं है, श्रम भ नहीं है, मन भी नहीं है, फुरसत भी नहीं है ꠰ भाई यह मनुष्य पर्याय बड़ी दुर्लभता से प्राप्त हुई है, इसको यों ही न खो देवें, किंतु कैसे मेरे को मेरा ज्ञान हो, इस धुन में रहें ꠰ अगर ज्ञान हो गया तो आगे का भव भी अच्छा गुजरेगा और अगर ज्ञान नहीं हुआ तो आगे दुर्गति होगी ꠰ अज्ञानभाव से वास्तविक दुर्गति तो अपने अंत: ही हुई है फिर निमित्तनैमित्तिक योगवश बाह्य दुर्गति होती है ꠰ जो जीव अपने को ज्ञानस्वरूप के रूप में न अनुभव सके और पौद᳭गलिक विकाररूपों में अपने को माने उस जीव की तो बड़ी दुर्गति है, मोहांधकार से आच्छन्न है, सतत आकुलता को अनुभवता है ꠰ यह सब दुर्गति ज्ञानस्वरूप में नहीं है ꠰ सहज अविकार ज्ञानस्वरूप की प्राप्ति में आत्मसर्वस्व पा लिया जाता है ꠰ यह सम्यग्ज्ञान अतीव दुर्लभ है ꠰ इसकी उपासना में ही इस दुर्लभ मानव जीवन की सफलता है ꠰

(155) खुद की अपनी बात―यह अपनी खुद की बात कही जा रही है, ऐसा ध्यान में रखकर सुनो । जो भी बात चलेगी वह खुद की है, उसे खुद में परखना चाहिये । निरखिये―अपने में मैं क्या चाहता हूं ? शांति आनंद, ऐसा सुख जो कभी नहीं मिला । सबकी एक ही अंदर की आवाज है मुझे शांति और आनंद चाहिए । यहाँ दो बातें आयी ना, मुझे शांति चाहिए तो पहले यह ही निर्णय करें कि वह मैं क्या हूँ जिसे शांति चाहिए, और वह शांति क्या है जो हमें चाहिए । मैं हूँ कोई जाननहार वस्तु, जो जानता रहता है सदा । जाने बिना कभी एक क्षण भी नहीं रहता । अपने में परखते जाइये―हूं ना मैं ऐसा जो सदा जानता रहता हूँ । चाहे कैसा ही जाएं ? पर जाने बिना नहीं रहता । उल्टा जाने, सीधा जाने, मोक्ष मार्ग की बात जाने, संसार की बात जाने, जाने बिना नहीं रहता । तो मैं हूँ एक जाननहार पदार्थ, और शांति क्या है, जहाँ रंच भी आकुलता न हो । तो एक बात यह समझिये कि मुझमें अगर शांति का स्वभाव नहीं है तो कितने ही उपाय कर लिए जायें, पर शांति न मिलेगी । जैसे तिल में तैल है तो तैल वहाँ से मिल जायेगा, पर बालू में तैल नहीं है तो कितना ही पेलो तैल वहाँ से न मिल पायेगा । ऐसे ही मुझे शांति चाहिए, मैं हूँ एक जाननहार पदार्थ और यह मैं स्वयं शांतस्वरूप हूँ । सिर्फ जानूं, बाहरी विकल्प न बनाऊं, अन्य का ख्याल न बनाऊं तो अपने आप शांति है और जगत के बाहरी पदार्थों का ख्याल बनाऊं तो अशांति है । तो यह जरूरत पड़ी अब कि मेरे में ऐसा ज्ञानप्रकाश हो कि दुनियाभर के ख्याल मुझमें न जगे और मैं केवल एक अपने ज्ञानस्वरूप को ही जानता रहूं, इसकी आवश्यकता है, यह ही जिन्होंने किया वे भगवान हुए, जिनकी मूर्ति का हम पूजन करते हैं, आराधना करते हैं उन्होंने यह ही काम किया था कि बाहर के सारे विकल्प दूर किये और अपने ज्ञानस्वरूप आत्मा में मग्न हुए, ऐसा किए बिना वास्तविक शांति नहीं मिलती ।

(156) समस्त माया को पर व असार जानकर उससे दूर होने का प्रथम कर्तव्य―भैया, शाश्वत शांति के लिये हमारा पहला काम क्या है कि इन बाहरी पदार्थों के विकल्प मेरे से दूर हों । उसका उपाय क्या? तो देखिये―ये बाहरी पदार्थ क्या हैं जो हमें दिख रहे हैं? ये सब बाहरी चीजें हैं क्या? ये सब माया है, और जो हम आप बैठे हैं यह सब क्या है? यह भी माया है । जो दिख रहा है वह भी माया है, परमार्थ नहीं है । परमार्थ तो जो प्रकट होता है वह भगवान है । वह परमार्थ हम ही में बसा है । उसे निहारें तो मिल जायेगा, पर हम अपने परमार्थ स्वरूप को नहीं देखते, इस देह को ही देखते हैं । वह परमार्थ हम आपके अंदर छिपा हुआ है । जैसे दूध में घी है, यदि दूध में देखें तो घी नहीं दिखता, पर दूध में घी होता तो है, तभी तो मशीनों द्वारा या प्रयोग विधि से उस दूध में से घी निकाल लिया जाता है । ऐसे ही मुझमें वह परमार्थ परमात्मस्वरूप है जो स्वयं आनंदपूर्ण है, पर उसकी विधि बनायें तो वह मिल जायेगा । हाँं तो यहाँ जो कुछ दिखता है वह क्या है? माया है । माया किसे कहते हैं? जो अनेक पदार्थों के संबंध से बने उसका नाम माया है । माया शब्द का प्रयोग हर एक कोई करता है, पर माया का अर्थ क्या है यह बताना कुछ कठिन हो जाता रहे । आप लक्षण देखो सब जगह घटित होगा । जो चीज अनेक पदार्थों से मिलकर बने उसका नाम है माया । देखो जो यह भींत दिख रही । बताओ वह एक पदार्थ है या अनेक पदार्थ मिलकर बनी है, मोटे रूप से तो कह देवें कि ईंट गारा आदिक बहुतसी चीजों से मिलकर बनी है यह भींत । तो जो चीज अनेक चीजों से मिलकर बनीं उसका नाम माया है । यह माया विघटने वाली चीज है, नष्ट होने वाली चीज है, क्योंकि अनेक मिलकर बनी ना, तो वह बिखर जायेगी । एक हो तो कायम रहे । जो अनेक संयुक्त हो वह चीज कायम नहीं रह सकती । यह ही बात सब जीवों की है, जो ये दिख रहे हैं । हम आप जो बैठे हैं सो ये अनेक पदार्थ मिलकर बने हैं, वे अनेक पदार्थ क्या? शरीर, कर्म और जीव । शरीर में भी अनंत परमाणु हैं, कर्म में भी अनंत परमाणु हैं, और एक जीव है, इनसे मिलकर बने हैं त्रस स्थावर, इसलिए वह सब माया है । तो अब माया से लगाव रखने में फायदा क्या है, यह बात ध्यान में लायें । लोग मानते हैं कि यह वैभव मेरा, यह मकान मेरा, यह परिवार मेरा, यह केवल भ्रम है । जब कोई मर जाता है तो उस समय आवालगोपाल कह देते हैं कि यहाँ कुछ भी किसी का नहीं है । यह सब झूठ है । यह आत्मा तो अकेला है ꠰

(157) निज सहज ज्ञानस्वरूप की ही शरण्यता―यहाँं बात सोचें कि मुझे शांति चाहिए तो उसका ढंग भी तो बनावें । पुण्य का उदय मिले, वैभव सामग्री मिले, इज्जत मिले, उसको देखकर फूला न समाये और अपने को मान ले कि मैं सब कुछ बन गया, यह तो एक अज्ञान अंधकार है । मिला है यह दृश्य कुछ, मगर आपका कुछ नहीं है । आत्मा तो अकेला ज्ञानस्वरूप है । जो देह को मानता है कि मैं यह हूँ, बस यह ही दुःख का बीज है, दुःख का कारण है । देखिये―सब बात सुनना है अपने पर कृपा करके, क्योंकि शांति का मार्ग नहीं मिल रहा । कभी-कभी सोच लेते हैं कि हमको तो बड़ी शांति मिली है, पर सांसारिक समागमों में शांति कभी मिलती नहीं हैं, जिन्हें लोग सुखी कहते हैं उन्हें भी आकुलता है और जिन्हें लोग दुःखी कहते हैं उन्हें भी आकुलता है । दुःख में आकुलता है, यह तो सब लोग जानते हैं, मगर सुख में भी आकुलता है । किसी भी विषय का कोई भोग करता है तो वहाँ आकुलता है या नहीं है । अगर आकुलता न होती तो विषयभोग में कोई न लगता । तो संसार के सुख में भी आकुलता, दुःख में भी आकुलता । निराकुलता है तो एक अपने आपके सत्य स्वरूप को समझने में । तो सब जान रहे हैं कि मैं हूँ और जो मैं हूँ उसे समझ लें । मिलावट को मैं मत समझें । यह सब मिलावट है, शरीर मिलावट है । अजीव कर्म यह मिलावट है, विकार मिलावट है । मैं हूँ ज्ञानस्वरूप, उस पर जिसकी दृष्टि, लगी है उसको होता है सम्यग्दर्शन । सम्यक्त्व के बिना संसार से कोई पार नहीं हो सकता ।

(158) दुःख का प्रथम कारण अंहकार―देखिये―अपने दुःख के कारण चार हैं―(1) अहंकार, (2) ममकार, (3) कर्तृत्वबुद्धि और (4) भोक्तृत्वबुद्धि । ध्यान से मनन कीजिये―खूब समझ में आयेगा कि वास्तव में यह हमारी गल्ती है इस कारण दुःख पा रहे हैं । पहला नाम है अहंकार, जो मैं नहीं हूँ उसको मैं कह डालना यह कहलाता है अहंकार । शरीर मैं नहीं हूँ उसको मान डालना कि यह मैं हूँ, यह अहंकार बन गया । न जाने लोग क्या-क्या सोचते हैं अपने बारे में, परिवार वाले, बाल बच्चों वाले, धनवैभव वाले, इस गांव वाले, इस इज्जत वाले, जो-जो कुछ भी सोचा जा रहा है वह है पर में अहंभाव, याने अहंकार । मैं नहीं हूँ ऐसा, पर मान रहे हैं कि मैं यह हूँ, जैसे सोचिये―लोग सोचा करते हैं कि मैं पुरुष हूँ, मैं स्त्री हूँ, पर जिसका नाम मैं है और जिस आत्मा को पुकारा जा रहा है, वह आत्मा तो अमूर्त है, ज्ञानस्वरूप है । वास्तविक स्वरूप को देखो तो मैं पुरुष नहीं । मैं मनुष्य ही नहीं तो फिर पुरुष अथवा स्त्री कहां से होऊंगा । यदि मैं मनुष्य होऊं, तो फिर सदा मनुष्य रहूं, फिर यहाँ से जाना क्यों हो? मैं मनुष्य नहीं । मनुष्यपर्याय में आया हूँ, आत्मा तो मनुष्यपने से निराला है । मैं पुरुष स्त्री नहीं । इस पर्याय में से गुजर रहा यह मैं आत्मा ज्ञानस्वरूप इन सबसे निराला हूँ, तो जितना कष्ट है वह सब अहंकार भाव से है ।

(159) दुःख का द्वितीय कारण ममकार―दुःख का कारण दूसरा है पर में ममकार याने यह मानना कि यह मेरा है । मेरा वह है जो मेरे साथ सदा रहे, जो मेरे साथ नहीं रह सकता, बिल्कुल भिन्न है, बाहर की चीज है, जिससे कुछ मतलब नहीं उसमें यह मेरा है ऐसी दृष्टि गड़ाई जाये तो उसका फल आकुलता है । वह मेरा है नहीं और मैं मानता हूँ मेरा, तो वह तो कभी मिटेगा, वियुक्त होगा । जो भी होगा उसकी परिणति से होगा, तो मेरा है ऐसा ममकार भाव भी दुःख का हेतु है । जो मेरा-मेरा करता है, मैं-मैं करता है वह बरबाद होता है । हाँं अनुभव करो कि जो ज्ञानस्वरूप है सो मैं हूँ । बाहरी चीजों में जो ममकार करता है वह तो पिटता है । देखिये हम आप भगवान के दर्शन करते हैं और उस शांत मुद्रा को देखते हैं तो देखने में क्या विचारना चाहिये । बाहर की सर्व बातों को असार जानकर, छह खंड की विभूति तजकर महाराज पद तजकर, वैभव पर ठोकर मारकर, निर्ग्रंथ होकर अपने आत्मस्वरूप की उपासना की, यह सारभूत काम किया, इससे आपने मोक्ष पाया । धन्य है प्रभु, यह ही तो मेरा स्वरूप है, मैं क्यों अज्ञान में रहकर संसार में रुलूं । मुझे भी अपने आत्मा की संभाल करना चाहिए यह ध्यान में लाना चाहिए? तो जब जीव में अहंकार और ममकार ये दो दोष बसे हैं तब तक वह शांति से नहीं रह सकता । तब क्या करूँ, अहंकार तजकर ज्ञानस्वरूप में हूँ, उसमें मैं बुद्धि रखूं, हूँ यह मैं, मैं दर्शन ज्ञानस्वरूप हूँ, सहजानंद स्वरूप हूँ, जैसे ऐना (शीशा), उसमें खुद की झलक भी है ना, तो उसमें परपदार्थों की भी झलक आती है । शीशे में दो गुण है―(1) खुद की झलक और उससे बाहर में सामने रहने वाली चीजों की झलक । ऐसे ही आत्मा में दो गुण हैं, खुद का प्रतिभास और बाहर में रहने वाले पदार्थों का प्रतिभास । खुद का प्रतिभास वह तो है दर्शन और बाहरी चीजों का प्रतिभास, वह है ज्ञान । यह मेरा वास्तविक स्वरूप है और मेरा यह ही सर्वस्व है इसके अतिरिक्त मेरा कुछ नहीं है, ऐसा दृष्टि में आये, आत्मतत्त्व की ओर अपना ध्यान जगे तो शांति मिलेगी । तो मोही जीव दुःखी होने के लिये दो ऐब तो ये करते हैं ।

(160) दुःख का तृतीय व चतुर्थ कारण कर्तृत्वबुद्धि व भोक्तृत्वबुद्धि―तीसरा ऐब है कर्तृत्वबुद्धि । मैं करने वाला हूँ । कैसा भाव भरा है कि मैं ही खिलाने पिलाने वाला, करने वाला हूँ । यह बात चित्त में नहीं आती कि जो बालक आज पैदा हुआ है या जो घर में रह रहे हैं उन सबका अपना-अपना भाग्य है, उनके उदय के अनुसार उनका सब कुछ चल रहा है, यह दृष्टि में न रहकर जिनकी शरीर में आत्मबुद्धि है वे ऐसा सोचते हैं कि मैं करने वाला हूँ । यह कर्तृत्व बुद्धि भी इस जीव को बड़ा हैरान कर रही है । चौथा ऐब है भोक्तृत्व बुद्धि, पर पदार्थों में लोगों की ऐसी दृष्टि रहती है कि मैं इनको भोगता हूँ, मैं दूकान भोगता हूँ, भोजन भोगता हूँ, भोग भोगता हूँ,....इस प्रकार की दृष्टि रहती है । पर वास्तविक बात यह है कि बाहर में कोई किसी दूसरी चीज को भोग ही नहीं सकता । वास्तव में स्वरूप से बाहर किसी की कुछ करतूत नहीं । सो ऐसा अपने आपके स्वरूप में अपने को ज्ञानमात्र निरखिये ।

(161) सहजज्ञानस्वरूप अंतस्तत्त्व में आत्मत्व के अनुभव की ही सर्वदुःखापहारात―मैं सिर्फ ज्ञानस्वरूप हूं, अन्य से मेरा कुछ संबंध नहीं । ज्ञानमात्र हूँ, यह बात यदि चित्त में आये तो शांति मिलेगी, वह पथ मिलेगा कि जिस पथ पर चलकर मुक्ति मिली । गृहस्थी में हैं तो परिस्थितिवश करना पड़ रहा है । उसके बिना गुजारा न चलेगा, करना पड़ेगा, मगर यथार्थ बात जानने का इतना महात्म्य है कि कभी आकुलता नहीं जग सकती । चाहे किसी परपदार्थ का कैसा ही परिणमन हो, पर भीतर आकुलता नहीं होती । इसके आत्मा का ज्ञान सही बना लें । यह मोक्षमार्ग का मूल है । जैसे कहते हैं ना कि सम्यग्दर्शन के बिना शुल्क की प्राप्ति नहीं होती । यह सम्यग्दर्शन ही एक आत्महित का मूल तत्त्व है । अपने आत्मा के सही स्वरूप का अनुभव कर लूं कि मैं यह हूँ, ऐसा सम्यक्त्व हो जाये तो संसार से पार हो जायेंगे और सब संकट मिटेंगे और यदि सम्यक्त्व न प्राप्त किया तो जैसे अनादिकाल से अब तक अनंते भव बीत गए वैसे ही यह मनुष्यभव भी व्यर्थ ही व्यतीत हो जायेगा, इस दुर्लभ मानवजीवन को पाकर भी कल्याण का मार्ग न मिल पायेगा ।


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