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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 73

From जैनकोष



भावेण होइ णग्गो मिच्छत्ताई य दोस चइऊणं ।

पच्छा दव्वेण मुणी पयडदि लिंगं जिणाणाए ।꠰73।।

(162) सम्यक्त्वभाव में स्वकीय यथार्थ नग्नता याने ज्ञानमात्रस्वरूप का प्रत्यय―जिसे संसार से छुटकारा पाना है वह पुरुष सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र से युक्त होता है । जाप देने की माला में ऊपर तीन मोती रहते हैं जिन्हें कहते कि ये सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र के मोती हैं और उस पर अंगुली रखकर उपासना में रत्नत्रय को नमस्कार करते हैं । मंत्र कुछ भी जपें, चाहे णमोकार मंत्र जपें, चाहे ॐ नम: सिद्धेभ्य:, जपें, उस माला में 108 बार जपने पर तीन को कहेंगे―सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक᳭चारित्र की बात । सम्यग्दर्शनाय नमः, सम्यग्ज्ञानाय नमः और सम्यक्चारित्राय नम: । मंत्र चाहे कुछ भी जपा जाये उनमें तीर्थंकरों में से किसी एक तीर्थकर का नाम जपा जाये, महावीर, आदिनाथ, चंद्रप्रभु आदि का तो भी वे तीन नाम रहेंगे सम्यग्दर्शनादिक । उसका कारण क्या है कि ये तीन रत्नत्रय तो मूल हैं मोक्ष के, जिन्होंने मुक्ति पायी उन्होंने इन तीनों के धारण से मुक्ति पायी । सो सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्ररूप सहजात्म भाव को नमस्कार हो । वह सम्यग्दर्शन क्या? अपने आप में अपने सहज चैतन्यस्वरूप का दर्शन होना, सम्यग्दर्शन है । एक दोहा प्रचलित है कि ‘‘सबके पल्ले लाल है लाल बिना कोई नहीं । उस बिन सब कंगाल है, गांठ खोल देखी नहीं ।।’’ लाल सबके पल्ले है, एक उदाहरण है―कपड़े में बंधा है लाल, पर मालूम नहीं है और गांठ खोलकर देखेगा भी क्यों? तो यों वह अपने को गरीब महसूस करता है, ऐसे ही हम आप में वह प्रभाव, वह वैभव, वह चमत्कार मौजूद है कि जो प्रभु में है, जिनकी हम वंदना करते हैं, सिद्धप्रभु में जो माहात्म्य है वह सब अपने में बसा हैं, लेकिन मोहांधकार ग्रस्त होने से उनका पता नहीं है तो वह देखेगा भी क्यों? और उसकी धुन भी क्यों रखेगा? इसलिए वह कंगाल हो जाता है, कंगाल बना है ।

(163) परमार्थ शरण के अवलंबन से परमार्थ नग्न होकर मुनिव्रत धारण कर प्रगति के मार्ग की संभवता―भैया, थोड़ा अपने आपमें अपनी दया करके निरखियेगा कि मेरा शरण कौन है? शरण है मेरे आत्मा का मेरा सहज आत्मस्वरूप, दूसरा कोई शरण नहीं है, बाकी सब भ्रम है, और उस भ्रम में रहता है तो फिर रोने के अनेक प्रसंग आते हैं । यह लड़का मेरा बड़ा ख्याल करता था, मेरा बड़ा प्यारा लड़का था, शरण था । अरे निश्चयत: निरखें तो मेरे आत्म का शरण मेरे आत्मा के सिवाय अन्य कुछ नहीं है । सो वह आत्मतत्त्व प्रकट कैसे हो? तो भाई पहले तो भाव से नग्न होइये, मायने सम्यक्त्वसहित होइये । जो हमारा वास्तविक आत्मा चैतन्यस्वरूप हैं वह देह से ढका, कर्म से ढका, विकार से ढका, यह उपयोग बाहर-बाहर को तो तक रहा है, भीतर को नहीं तक रहा । जैसे आप लोग 4-6 कपड़े पहने बैठे हैं―धोती, कुर्ता, बनियान, टोपी, कोट आदिक, फिर भी आप कपड़ों के भीतर तो नग्न हैं ही । हर एक कोई नग्न है । तो ऐसे ही यह देह कर्मं विकार ये सब ऊपर नच रहे हैं, चल रहे हैं, लेकिन इनके भीतर जो हमारा खाली केवल आत्मा है वह तो वही स्वरूप रख रहा है । उस नग्न स्वरूप को देखो, केवल अपने अंतस्तत्त्व को निरखो । तो पहले भाव से नग्न होना है मिथ्यात्वादिक दोषों को तजकर । मोह, अज्ञान, यह सब हटे और सत्य प्रकाश हो जैसा कि मेरे आत्मा का वास्तविक स्वरूप यह चैतन्यमात्र है, यह है भाव से नग्न होना, अपने को अकेला निरख लेना, ऐसा पुरुष पीछे द्रव्य से नग्न होता है तो वस्त्र दूर करता है, मुनिव्रत धारण करता है । दूसरा अर्थ यह भी समझें कि पहले तो वह बाह्य परिग्रहों को त्यागकर द्रव्य से मुनि बना, पश्चात् उसका भीतरी परिग्रह भी हटा और भावों से नग्न हुआ ।

(164) निःसंकट निज सहज स्वरूप का दर्शन―अपने आपको जो सहज स्वरूप में देखेगा उसको संकट नहीं है । संकट नाम किसका ? नाम ले लेकर तो बताओ । कोई कहेगा कि मेरी दूकान में इतना टोटा हो गया वह संकट है, कोई कुछ । जरा अपने आपको तो सोचो, मैं हूँ चैतन्यस्वरूप आत्मा, उसमें क्या घट गया? जितने गुण थे उतने ही गुण हैं, जो शक्तियां थी वे ही हैं । आत्मा का स्वरूप है सो ही है उसमें से क्या घट गया? क्या संकट मानना । मकान नहीं बन रहा, गिर गया कोई बीमार है या कुछ वांछा है, इच्छा है, अमुक पद मिले, हमारी कीर्ति हो, वे नहीं हो पा रहे, संकटों के नाम लीजिए तो क्या-क्या कहलाते? ज्ञानी पुरुष के लिए तो वे हास्य के पात्र हैं । इन बाहरी वस्तुओं से क्या संकट आया आत्मा में ? जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझता है वह अपने को संकटहीन अनुभव करता है । कुछ संकट नहीं । जिसने इस लौकिक कीर्ति और इज्जत को माया समझ लिया उसके लिए अब संकट का कारण ही क्या रहा है तो यह सब प्रताप है सम्यग्दर्शन का । शांति मिले, भव सुधरे, मोक्षमार्ग में लगे, मोक्ष मिले, यह सब सम्यग्दर्शन का चमत्कार है, उस सम्यक्त्व को नमस्कार किया है । ऐसा सम्यक्त्वसहित फिर जो-जो कुछ भी ज्ञान बनना है वह सब ज्ञान बनता है । बाहरी पदार्थों को भी जानेगा तो ये पर हैं, इनसे में निराला हूँ, यह उसके ध्यान में रहेगा, फिर कुछ भी जानता जाये, वह सब सम्यग्ज्ञान है और अपने इस अविकार आत्मस्वरूप में उपयोग को रमायेगा यह है सम्यक्चारित्र । अपने आपकी दृष्टि में अपना सहज आत्मस्वरूप हो तो उसका सर्वस्व प्राप्त होगा ।

(165) द्रव्यलिंग व भावलिंग का समुचित सहयोग―यहाँं यह बात जानना है कि भावलिंग से द्रव्यलिंग होता है और द्रव्यलिंग से भावलिंग होता है, दोनों ही प्रमाण करना चाहिए । कोई ऐसा एकांत नहीं है कि भाव से कोई मुनि बने, पीछे नग्न बने, या पहले शरीर से नग्न बने, पीछे भावों से मुनि बने दोनों का परस्पर एक सहयोग है । निर्ग्रंथता एक वातावरण है और भावों में उन्नति होना यह आत्मा के पुरुषार्थ की बात है । एक प्रकरण यह भी समझ लेना । यह कहने की पद्धति है कि द्रव्यलिंगी मुनि अज्ञान होता, मिथ्यादृष्टि होता, वास्तविक नहीं है । तो उस द्रव्यलिंगी का अर्थ क्या है? सुनें, गुणस्थान 14 होते हैं । पहले गुणस्थान में मिथ्यात्व है, चौथे गुणस्थान में सम्यक्त्व है, व्रत नहीं है । तीसरे में सम्यक᳭मिथ्यात्व मिला जुला अवक्तव्य है । दूसरे गुणस्थान में सम्यग्दर्शन न रहा और मिथ्यात्व आ नहीं पाया उसके बीच की दशा है । 5वें गुणस्थान में श्रावक के व्रत भी हो गये । छठी और 7वां गुण स्थान मुनि का गुणस्थान है। सो कोई महाव्रत नग्नता तो धारण करले और गुणस्थान रहा पहला तो उसे कहते हैं द्रव्यलिंगी मुनि, अथवा शरीर से तो वह द्रव्यलिंगी मुनि है, पर गुणस्थान दूसरा हो, तीसरा हो वह भी द्रव्यलिंगी मुनि है, अथवा चौथा पांचवां गुणस्थान हो वह भी द्रव्यलिंगी । द्रव्यलिंगी में सम्यग्दृष्टि मुनि भी आते हैं और मिथ्यादृष्टि मुनि भी । भावलिंगी वे कहलाते हैं कि शरीर से भी नग्न हैं, मुनि हैं और भावों से छठा, सातवां गुणस्थान है, वे साधु प्रमत्त अप्रमत्त दशा में झूमते रहते हैं । अपने को ज्ञानस्वभाव अनुभवना यह उनका मुख्य ध्येय है । सो अपने को भी यह दृष्टि में रखना चाहिए कि कब वह समय आये कि मैं बाह्य और अंतरंग परिग्रह त्यागकर एक इस अंतस्तत्त्व का अनुभव करूं ।


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