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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 9

From जैनकोष



सत्तसुणरयावासे दारुण भीसाइं असहणीयाइं ।

भुत्ताइं सुइरकालं दुःखाइं णिरंतरं सहियं ।।9।।

(16) सप्तसुनरकावास―आत्मतत्त्व की भावना के बिना इस जीव ने कैसे-कैसे दुःख सहे हैं । उनमें से नरकगति संबंधी दुःख बताये जा रहे हैं । नरक के आवास 7 जगह हैं, 7 पृथ्वियों में 7 नरक के आवास हैं । जिस पर हम बैठे हैं, चलते फिरते हैं, यह पहली भूमि है, यह भूमि बहुत मोटी है और इस भूमि के नीचे तीन खंड विभाग हैं । तीन जगह तीन तरह की रचनायें हैं । ऊपर के दो भागों में भवनवासी और व्यंतर देवों के भवन हैं, इन देवों का वहाँ निवास है और नीचे के तीसरे खंड में पहला नरक है । उसमें भी 13 पटल हैं, याने ऊपर से नीचे 13 पटलों में उन नरकों के बिल हैं, जो बिल बहुत लंबे चौड़े हैं, आज के परिचित विश्व से भी बड़े हैं, ये वैज्ञानिक लोग जितनी भी बड़ी दुनिया कहते हैं उससे भी बड़े-बड़े बिल हैं । दुनिया इतनी ही नहीं है । 343 घनराजूप्रमाण लोक है । जितना आज पता है वैज्ञानिकों को यह तो समुद्र के एक बूंद बराबर है, ऐसे नरकों में ये नारकी जीव रहते हैं । इस पहली भूमि से नीचे कुछ आकाश के बाद दूसरी भूमि है, उसमें 11 पटल हैं याने 11 जगह ऊपर से नीचे नारकियों के बिल हैं, उनमें नारकी बड़े कठिन दुःख सहते हैं, ऐसे ही आकाश छोड़कर नीचे तीसरी भूमि में तीसरा नरक है, उसमें 9 पटल हैं, उससे आकाश छोड़कर फिर एक भूमि है, फिर छोड़कर एक भूमि हैं । इस तरह 7 भूमियां हैं और दो-दो कम हो होकर पटल है । उन नरकों में रहने वाले नारकी जीव बहुत कठिन दुःख सहते हैं ।

(17) नरकों में प्राकृतिक दुःख―नरकों में भूमि के छूने से ही इतने दुःख होते हैं कि हजार बिच्छुवों के काटने से भी नहीं होते । वहाँ फिर अन्य दुःखों का तो अनुमान ही क्या किया जा सकता है । ये पुद्गल परमाणुओं के स्कंधों के इस तरह के परिणमन हुआ करते हैं । बिजली भी तो पुद्गल स्कंध है, यहाँ ठीक अगर बिजली का करेन्ट फर्श पर आ जाये तो उस फर्श पर पैर रखते ही कितनी झनझनाहट आ जाती है । भींत में यदि करेन्ट आ गया तो उस पर हाथ पैर नहीं रखे जा सकते, क्योंकि करेन्ट मार देता हें । तो वह भी पौद्गलिक है, नरकों की सारी भूमि इस तरह है कि मानो बिजली जैसी करेन्ट चल रही हो ꠰ वहाँ जो नारकी पहुंचता है सो पहुंचते समय ही घोर दुःख सहता है और देखिये पाप का उदय देवों के नहीं सो जहाँ नरक भूमि पर कोई देव जाता है समझाने के लिए उस देव को दुःख नहीं होता । जैसे कहीं पर करेन्ट लगा हो भींत पर या फर्श पर और कोई रबड़ के जूता पहने हुए खड़ा रहे तो उसको करेन्ट तो नहीं लगता । तो यह भी सब जुदे-जुदे पुद᳭गलों के स्कंधों की परिणति की बात है । जिनके पाप का उदय है उनको सब दुःखरूप हो जाता है । ये नारकी उत्पन्न होते हैं तो इस तरह जैसे कि छत में से कोई चीज गिरी हो । नारकियों का उत्पत्ति स्थान ऊपरी भाग है, समझिये छत जैसा । जहाँ से उत्पन्न होते ही जमीन पर गिरते हैं और गिरकर कई सौ बार गेंद की तरह उछलते रहते हैं । ऐसे नरकों के दुःख इस जीव ने आत्मा की सुध बिना, बाह्यपदार्थों की आसक्ति के कारण सहे ।

(18) नरकों में आघातकृत प्रतिघात―उनके वहाँ भूखप्यास अत्यंत तीव्र है, इतनी है कि कितना ही खायें पियें फिर भी तृप्त नहीं हो सकते । खाने को न तो एक दाना है और न एक बूंद पानी, और ठंड इतनी है नरकों में कि वहाँ मेरूपर्वत बराबर लोहा भी गल जाये । जिन नरकों में गर्मी है, सो इतनी तीव्र है कि मेरु के बराबर लोहा गल जाये । इसके अतिरिक्त नारकी एक दूसरे को देखकर हमला करते हैं । इनका शरीर ऐसी खोटी विक्रिया वाला है कि जो नारकी चाहे कि मैं इसे कुल्हाड़ा मारू तो उसका हाथ ही कुल्हाड़ा बन जायेगा और इसके अतिरिक्त वहाँ भिड़ाने की प्रकृति वाले असुर जाति के देव उन नारकियों को भिड़ाते हैं । जैसे किया था, तू खड़ा क्यों है ? वह दुश्मन सामने तो आ गया । कहीं वह कुछ चैन सी माने, तेरा उस भव में इसने ऐसा माना खूब लड़-लड़कर थक जाता है तो वह थोड़ा गम खाता है । ऐसे ही नारकी भी आपस में लड़-लड़कर कुछ थक जाते हैं तो बैठ भी जाते हैं, पर वहाँ असुर जाति के देव जाते हैं और भिड़ाते हैं । मतलब यह है कि नरकों में अनेक तरह से दुःख हैं और वे दुःख 33 सागर पर्यंत हैं । 1 सागर में अनगिनते अरब खरब वर्ष आ जाते हैं, बहुत काल पर्यंत जीव नरक में दुःख सहते हैं, इसका कारण है कि उन्हें आत्मा की सुध नहीं रहती ।


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