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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 14

From जैनकोष



सद᳭व्वरओ सवणो सम्माइट्ठो हवेइ णियमेण ।

सम्मत्तपरिणदो उण खवेइदुट᳭ठट᳭ठकम्माणि ।।14।।

स्वद्रव्यरत के अष्ठकर्मक्षपण―सम्यग्दृष्टिजीव अपने द्रव्य में रत रहते हैं, और यही कारण है कि उसको धर्म में संकट नहीं, क्योंकि वह अपने स्वरूप को देखता है, जानता है कि यह स्वरूप अमर है । इस स्वरूप में किसी अन्य का प्रवेश नहीं है । स्वरूप में स्वयं में कष्ट नाम की कोई चीज नहीं है । यह तो ज्ञानस्वरूप है । जानन-जानन परिणमन इसका चलता रहता है । इस पर क्या संकट आया ? कोई संकट नहीं है । तो ऐसा जो अपने द्रव्य से विरक्त है वह है सम्यग्दृष्टि और इस सम्यक्त्वरूप से जो परिणत हो रहा है याने उपयोग में यह ही निज द्रव्य समाया है । यह ज्ञानस्वरूप मेरे लिए सर्वस्व समाया है वह अष्ट कर्मों का क्षय करता है । कर्म बंधते कैसे हैं ? कर्मों से यह जीव नहीं बंधता । कर्म तो पौद्गलिक हैं, आत्मा चेतन है, चेतन पौद्गलिक को कैसे बांधेगा ? पर यह चेतन अपने स्वभाव को भूलकर जो हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह के भावों में लगता है और नाना मन, वचन, काय की क्रियावों को करता है, अपनाता है, ऐसे कषाय के विकल्प बनाता है तो इसका सामना पाकर पौद᳭गलिक कर्म स्वयं कर्मरूप बंध जाते हैं और इस जीव के साथ बंधन को प्राप्त होते रहते हैं । जैसे―कोई पुरुष मित्र को बांधता नहीं है, पर वह रागभाव करता है तो मित्र अपने आप बंध जाता है । घर का भी कोई प्राणी किसी दूसरे को बांधता नहीं है किंतु वह रागमोहरूप परिणाम करता है जिसके प्रति वह स्वयं आकर्षित हो जाता है । तो जब जीव अपने आपमें विषय कषाय के भाव रखता है तो कर्म अपने आप बंध जाते हैं, तो ये मिटेंगे कैसे ? विषय और कषायों का राग न रहे तो ये बंधे बंधाये कर्म यों ही खिर जाते हैं जैसे गीली धोती सुखाने के लिए खूंटे में बांध दी गई और वहाँ से छूटकर नीचे जमीन पर गिर गई, उसमें काफी धूल चिपट गई । तो समझदार पुरुष उस गीली धोती को झटकाकर वह धूल न हटायेगा, किंतु उस धोती को धूप में सूखने के लिए डाल देगा । धोती सूख जाने पर वह धूल जरा से झिटके से साफ हो जाती है । तो ऐसे ही समझो कि राग के कारण ये कर्म बंधा करते हैं । तो जो स्वद्रव्य से रत मुनि हैं वे सम्यग्दृष्टि हैं और इस सम्यग्दर्शन की परिणति रहेगी तो ये दुष्ट अष्टकर्म सब दूर हो जायेंगे ।

परद्रव्य के लगाव में संकटों का आक्रमण―सभी लोग अपने आप पर संकट का अनुभवकर रहे हैं और वे संकट क्या हैं ? किसी न किसी पर द्रव्य के बारे में ख्याल । वही एकमात्र संकट है । कोई निर्धनता का संकट अनुभव करे तो वह परद्रव्य के ख्याल का ही संकट हे । कोई इष्ट के वियोग का संकट अनुभव करे तो वह भी परद्रव्य के ख्याल का संकट है । कोई अपनी हानि का संकट अनुभव करता तो वह सब परद्रव्य के ख्याल का ही संकट है । परद्रव्य के ख्याल बिना संकट हो ही नहीं सकता । तो अब जो ज्ञानीपुरुष है वह जानता है कि समस्त परद्रव्य मुझसे अत्यंत निराले हैं । घर में रहने वाले जितने जीव हैं, ज्ञानी जीव घर में रहते हुए उस काल भी ऐसा उनको जानते हैं कि जैसे जगत् के अन्य जीव मुझसे भिन्न हैं उसी प्रकार घर में बसे हुए जीव भी मुझसे अत्यंत भिन्न हैं, क्योंकि उनका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, प्रभाव सब अलग है । उनकी किसी परिणति से मेरे को सुख दुःख नहीं । घर में यद्यपि यह होता है कि भाई का या पुत्र का कोई दुःख देखा तो यह भी दुःखी हो गया, मगर पुत्र के दुःख से यह दुःखी नहीं होता, इसने उसके बारे में कल्पनायें करके अपना दुःख अलग बनाया । पुत्र अपने दुःख से दुःखी हो रहा है और उसके दुःख को देखकर मोही ने कल्पना से राग से अपने में एक कल्पना बनायी है, तो यह अपना दुःख और भी बढ़ा लेता है । इसी तरह घर में किसी एक के सुख से सुख नहीं मिल रहा । घर के बच्चे यदि सुखी हैं तो उनके सुखी होने से पिता को सुख मिलता है, यह बात नहीं है । हो ही नहीं सकता । दूसरे का परिणमन मेरे में त्रिकाल आ ही नहीं सकता । किंतु यह उनको सुखी देखकर राग से अपने में कल्पनायें बनाकर कि मेरे घर के लोग कैसा सुखी हैं, इस कल्पना से वह एक नया सुख बनाता है ।

ज्ञानी का चिंतन―घर में जितने भी जीव है, किसी भी जीव के साथ मेरा अत्यंताभाव है, पर ज्ञान जगने पर भी जब तक घर में रह रहा है तब तक उनसे राग किए बिना घर में रह न सकेगा । यदि राग न करेगा घर में तो खाना-पीना भी मिलना मुश्किल हो जायेगा, अगर प्रीति का बर्ताव न करेगा तो उनकी चेष्टा हमारे अनुकूल कैसे हो पायेगी, इसलिए राग करना पड़ता है और राग किए बना घर में रह नहीं सकते । और घर में रहते हैं तो राग करना हमारा कर्तव्य बन जाता है एक दूसरे की देखभाल के लिए मगर मोह करना कर्तव्य नहीं है । राग तो बनेगा घर में मगर मोह नहीं है । तब संकट मुझ पर न आयें उसके लिए केवल एक ही औषधि है, दूसरी है ही नहीं, वह क्या कि अपने स्वरूप को देखें कि यह मैं हूँ, अपने में हूँ, अपने लिए हूँ । जो कुछ होता है वही मेरा कार्य है । वही मेरा सर्वस्व है । मेरे से बाहर मेरा कुछ नहीं । ऐसा स्वद्रव्य में जो रत है श्रमण वह श्रमण सम्यग्दृष्टि होता है और वह सम्यक्त्व से परिणत हुआ अष्ट कर्मों को दूर करता है । यह मनुष्य जीवन बहुत दुर्लभ जीवन है । संसार के प्राणियों की ओर दृष्टि दो । कोई पेड़ है, कोई कीड़ा-मकौड़ा है, कोई गधा है, सूकर है, कैसे-कैसे दुःखी जीव हैं । ये जीव की ही तो परिणतियां हो रही हैं । मैं जीव भी तो ऐसा ही था । आज मनुष्यभव पाया तो इसका फल इस ही में मिल सकता है कि सर्व बातों की उपेक्षा करके एक सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की योग्यता वाले इस ज्ञानस्वरूप आत्मा को अपनी दृष्टि में लें । देखिये, जिनको बड़े-बड़े वैभव मिले हैं, चक्रवर्ती का वैभव, इंद्र का वैभव, सो ये वैभव कमाने से नहीं मिलते कि उन्होंने कोई शरीर का व्यापार किया हो या कमाया हो सो बात नहीं किंतु सम्यग्दर्शन के होते संते जब तक संसार में रहता है यह जीव तब तक इसको ऐसे ऊ̐चे वैभव मिला ही करते हैं । तो सम्यग्दर्शन, अपना अनुभव, आत्मदृष्टि एक ऐसी परम अमृत औषधि है कि जिसके पाने से जब तक संसार है तब तक आनंद में रहेगा और निकट काल में मुक्त होनेपर अनंतकाल के लिए आनंदमय हो जायेगा । बस एक ही धुन हो कि मेरे आत्मस्वरूप का ज्ञान यह मेरे से कभी अलग न हो । यह सदा सुध बनी रहे कि मैं सबसे निराला दर्शन ज्ञानस्वरूप हूँ । स्वरूप क्या है ? जैसे कि एक दर्पण है उस दर्पण में खुद की झलक है तो बाहर में रहने वाले पदार्थों की फोटो भी आ जाती है और जिस पदार्थ में खुद की झलक नहीं है उसमें बाहरी पदार्थ की फोटो नहीं आ सकती है । बस, यह ही दर्शन और ज्ञान का उदाहरण है । आत्मा की खुद की एक झलक है । वह तो है दर्शन और दर्शन है तब बाहरी पदार्थ की झलक भी यहाँ होती है । यदि आत्मा में दर्शनगुण न होता तो ज्ञान भी न होता । इस कारण आत्मा दर्शन-ज्ञानस्वरूपी है और यह दर्शन-ज्ञानस्वरूप सहज आनंद से भरपूर है । तो ऐसे दर्शनमय, ज्ञानमय, आनंदमय अपने स्वरूप को निरखना बस इसी से ही इस जीवन की सफलता है, और जो होना होगा बाहरी संयोग वह होगा, पर उसमें तृष्णा न जगे, उसमें मोह न जगे तो इस आत्मा का मोक्षमार्ग में निर्बाध गमन होता है । तो स्व द्रव्य में जो रत है वह सम्यग्दृष्टि है । जो सम्यग्दृष्टि है वह अपने ज्ञानबल से दुष्ट अष्ट कर्मों का विनाश कर लेता है ।


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