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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 15

From जैनकोष



जो पुण परदव्वरओ मिच्छादिट्ठी हवेइ सो साहू ।

मिच्छत्तपरिणदो उण वज्झदि दुट᳭ठट᳭ठकम्मेहिं ।।15।।

परद्रव्यरत जीव की दुष्टाष्टकर्मबद्धता―जो जीव परद्रव्य में रत होता है वह मिथ्यादृष्टि है, जो साधु परद्रव्य में रत है वह मिथ्यादृष्टि है । यहाँ साधुवों को संबोधन किया जा रहा है मोक्षपाहुड् ग्रंथ में । कुंदकुंदाचार्य कहते हैं कि जिसका उपयोग परद्रव्य में लगता है, जो परद्रव्य से अपना भला-बुरा मानता है वह साधु मिथ्यादृष्टि है और ऐसे मिथ्यात्व में परिणत परद्रव्य के मायने इष्ट कुछ भी वस्तु । जैसे खाने की इष्ट वस्तु अथवा इष्ट स्त्री आदिक या मित्रादिक या जिनसे यश बढ़ता है ऐसे भक्त लोग, ऐसे परद्रव्यों में जो लीन हैं उनके रूपादिक को निरखता है और अपने आपके आत्मा की सुध नहीं कर पाता वह साधु मिथ्यादृष्टि है । और वह जिनलिंग को धारण कर केवल आजीविका अपनी बनाये हैं वह पुरुष मिथ्यात्व से वासित होकर दुष्ट अष्ट कर्मों का बंध करता है । इन 8 कर्मों को दुष्ट इस कारण कहा कि ये अत्यंत मजबूत हैं, स्निग्ध हैं और फल देने में ये भारी वज्र के समान हैं । ये कर्म के विपाक ज्ञानी को भी कुमार्ग में डाल देते हैं तब अन्य प्राणियों की तो कथा ही क्या है ? ऐसे इन अष्ट कर्मों से बेधे जाते हैं । जब कभी कुछ पुण्य का उदय है, और आराम की सामग्री मिली है अथवा मन को स्वच्छंद प्रवर्ताकर सुविधा और आराम मौज माना जाता है, उनमें जो कषाय उत्पन्न होती हैं, विषय अथवा लोभ या अन्य प्रकार की खोटी भावनायें जब उत्पन्न होती हैं तो कर्म बंध जाते हैं । बंधे हुए कर्म आसानी से निकलें यह बहुत कठिन है । उनका उदयकाल होता है और यह जीव उस अनुरूप अपना परिणमन करता है । इससे एक बात यह चित्त में होना चाहिए कि हम अशुद्ध भाव कभी न करें क्योंकि खोटे भाव करेंगे तो उनका ऐसा बंध होता है कि उनका फल भोगना पड़ता है । जो करता है सो भोगता है ।

कर्मविपाकविचयी के पापकर्मपरिहार―चाहे कुछ देर हो जाये कर्म का फल भोगने में, पर अंधेर नहीं होता । नियम से उसको वेदना होगी, दुर्गति उसको प्राप्त होगी । पुराणों में देख लो या वर्तमान के लोगों को देख लो ꠰ जो अन्याय करते हैं, दूसरों को दुःखी करने का प्रयत्न करते हैं, अपने स्वार्थ की साधना के लिए जो चाहे कर सकते हैं उनके कर्म बंधे और उनका फल भोगना पड़ा है । इसीलिए कहा कि देर है पर अंधेर नहीं । एक ऐसा ही कथानक है कि कोई एक पुरुष था जिसके कोई बालक न था । तो किसी ने उसे यों समझा दिया कि तुम किसी दूसरे छोटे बालक की बलि अमुक देव के नाम पर कर दो तो तुम्हें बालक मिल जायेगा । सो उसने वैसा ही किया । किसी का बालक उस देव के नाम पर बलि दे दिया । समय की बात कि उसको बालक भी मिला, काफी धन भी बढ़ गया, बहुत बड़ी संपत्ति का मालिक बन गया । देखिये―कहीं बलि देने से यह सब हुआ ऐसा न समझना किंतु पूर्वकृत कर्म का कुछ ऐसा ही उदय आया कि यह सब कुछ हो गया । यह बात तो कुछ दिन तक चली, पर कुछ ही दिन बीते थे कि उसकी स्त्री मर गई, बच्चे भी मर गए । जायदाद भी सब नष्ट हो गई । यहाँ तक भी उसकी दशा हो गई कि उसके पास जो कुछ पहले साधारण स्थिति थी उससे भी दयनीय स्थिति हो गई । वह एक-एक रोटी के लिए तरसने लगा । अपनी यह स्थिति देखकर वह अत्यंत आकुलित हो उठा । उसे अपनी पुरानी घटना याद आयी । ओह ! मैंने पाप किया था, बालक पाने की इच्छा से दूसरे के बालक की बलि दी थी । उसके फल में मुझे आज इस प्रकार की दयनीय स्थिति देखने को मिली । सो पागलों की नाई उसकी वृत्तियां होने लगीं । वह सर्वत्र यही कहता फिरे―देर है पर अंधेर नहीं । याने मैंने जो पाप किया था उसका फल मुझे देर में मिला पर अंधेर नहीं है । सो देर है अंधेर नहीं, ऐसे शब्द रोज-रोज सुनकर लोग उसे पागल समझने लगे थे । पर एक दिन एक जज साहब के मन में आया कि यह रोज-रोज एक ही बात बोलता है इसमें कोई खास कारण है । यदि पागल होता तो अन्य कुछ भी बोलता, और और भी अटपट चेष्टायें करता, पर ऐसी बात तो नहीं है । सो जज साहब ने उसे प्रेम से अपने घर बुलाया, उसे आदर से रखा और फिर धीरे से सब बात पूछी तो उसने अपनी पिछली सारी कहानी बतायी कि मैंने ऐसा पाप किया था सो उसका फल मुझे देर से मिला, पर अंधेर नहीं है । तो ऐसे ही अपने बारे से सोचना चाहिए कि हमसे कोई अनुचित कार्य हो जाये, पाप के भाव हो जाये तो वह हमारे अनर्थ के लिए ही होगा । उसका फल भोगना पड़ेगा । इस कारण भावों को शुद्ध रखने का सदा ध्यान रखना चाहिए ।


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  • मोक्षपाहुड
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