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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 3

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जं जाणिऊण जोई जो अत्थो जोइऊण अणवरयं ।

अव्वावाहमणंतं अणोव्मं हवइ णिव्वाणं ।।3।꠰

सहजपरमात्मतत्त्व के आश्रय से निर्वाणलाभ―इस परमात्मतत्त्व को जानकर जिसका निरंतर अनुमान कर योगी ध्यानस्थ मुनि बाधारहित अनंत चतुष्टयमय निर्वाण को प्राप्त होते हैं उस अंतस्तत्त्व की बात कहूंगा । सिद्धि जिनने भी अब तक है पायी, तेरा आश्रय ही उसमें हुआ सहायी, जिन्होंने सिद्धि प्राप्त की, मोक्ष प्राप्त किया उन्होंने कौनसा ऐसा कार्य किया जिससे उनको मुक्ति प्राप्त हुई । उन्होने कार्य किया इस शाश्वत शरण सहज परमात्मतत्त्व को ज्ञान में रखना और उस ही रूप अपने को मानना, इस ही की धुन होना, इस ही में रमना, इस सहज परमात्मतत्त्व का, कारणसमयसार का आश्रय करके ही मुक्ति प्राप्त की । बाहर में जितनी बातें करनी होती हैं वे अंतस्तत्त्व के ध्यान में बाधा को मेटने के लिए की जाती हैं । गृहस्थ योग्य और मुनियोग्य जो आचरण होता है उस प्रसंग की बाह्य प्रवृत्ति, शरीरचेष्टा यह स्वयं मोक्षमार्ग नहीं, किंतु मोक्षमार्ग में चलने के लिए जो सहज अंतस्तत्त्व का आश्रय किया जाता है उसमें विश्व आते हैं परिग्रह के कारण, या अज्ञानचेष्टा के कारण, सो उस अज्ञानचेष्टा और उस परिग्रह को दूर किया जाता ताकि हम निर्बाध भीतर में इस सहज परमात्मतत्त्व का आश्रय करें । अब यदि कोई यह जानकर साक्षात् गृहस्थधर्म और मुनिधर्म जो वचनकाय की चेष्टारूप है वह तो मोक्षमार्ग नहीं है निश्चयत: । इसलिए सो इसको करने की क्या जरूरत ? जो निश्चयत: मोक्षमार्ग है भीतर में सहज अंतस्तत्त्व का ध्यान करना, उसको करना, वह क्यों नहीं कर सकते ? क्योंकि परिग्रह में रुचि है और तब ही तो यह बाह्य त्याग बन नहीं पाता । भले ही हम मुख से यह कहें कि परिग्रह का छोड़ना बड़ा आसान है । अरे ! जो बड़ा आसान है वह यों ही क्यों नहीं कर लिया जाता ? तो मालूम होता है कि उनकी बाह्य तत्त्व में रुचि है और बाह्य तत्त्व यश भी है उस यश की रुचि के कारण बड़े ऊंचे इस आत्मतत्त्व के उपदेश करते हैं, सुनते हैं वह भी बाह्य तत्त्व के प्रेम के कारण करते हैं,अंतस्तत्त्व की रुचि से नहीं कर पाते, किंतु अंतस्तत्त्व की रुचि जिनके जग गई है बाह्यपरिग्रह का यथाशक्ति त्याग कर देना उनके लिए आसान होता है ।

यथाशक्ति संयम में चलने का कर्तव्य―कर्तव्य यह है कि इस मनुष्यभव में जबकि संयम की योग्यता मनुष्यों में ही है, अन्य गतियों में नहीं है, सम्यक्त्व की योग्यता चारों गतियों में है, पर संयम की योग्यता मनुष्यभव में ही है । हम आलस्य में आकर और संयम को हेय कह कहकर और उससे ग्लानि पैदा करें और संयम से विमुख होकर आराम से जिंदगी काटें और कुछ थोड़ी धर्म की बात कहकर अपने को एक कीर्तिवान समझकर जीवन बितायें तो यह जीवन ऐसा ही समझिये कि जैसे हमने अनंतभव गुजार डाले वैसे ही एक यह भव भी उसमें शामिल हो गया । जिसके सम्यक्त्व है और व्रत नियम धारण करता है वह मोक्षमार्ग में बढ़ता है । सम्यक्त्व को किसी ने खास जाना नहीं है । जिनके सम्यक्त्व नहीं है और वे व्रत नियम धारण करते हैं तो उस मंद कषाय के प्रताप से अगली सद्गति प्राप्त करते हैं । जो मिथ्यादृष्टि हैं और मंदकषाय और संयम भी नहीं धारण करते हैं उनकी गति क्या होगी, सो इसका अनुमान कर लेना सरल है । तो अपने को जिनागम में श्रद्धा रखना, आत्मा के सहजस्वरूप की रुचि करना और यथाशक्ति नियम व्रत संयम से अपने को वासित करना यह एक मनुष्यभव में कर्तव्य है । मोक्षपाहुड ग्रंथ में अंतरंग की प्रधानता से वर्णन होगा, पर बाह्य त्याग बिना हम अंतरंग में प्रगति नहीं कर सकते । जैसे कि धान का ऊपर का छिलका उतारे बिना हम चावल की ललाई को हटा नहीं सकते । इससे हम अंतरंग में भी प्रगति करें और संयम में भी चरणानुयोग अनुसार संयम नियम के अनुसार चले तो हम जिनागम के अनुसार चल रहे हैं और उसका परिणाम हम अच्छा पायेंगे ।


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