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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षपाहुड - गाथा 4

From जैनकोष



तिपयारो सो अप्पा पर भिंतरवाहिरो दु हेऊणं

तत्थ परो झाइज्जइ अंतोबाएण चयहि वहिरप्पा ꠰꠰4꠰।

छह प्रकार के द्रव्यों से पूरित लोक का निर्देश―जगत में जो कुछ भी है वह अपने आप है । अपने आप सत् है, किसी भी पदार्थ की सत्ता किसी दूसरे के द्वारा बनाई गई नहीं है । है तो है, नहीं है तो कभी वह है नहीं हो सकती । सत् का विनाश नहीं, असत् का उत्पाद नहीं । तो जगत में जितने भी पदार्थ हैं वे सब 6 जाति के हैं, कोई पदार्थ जीव है उसमें चैतन्य असाधारण गुण है, कोई पदार्थ पुद्गल है उसमें रूप, रस, गंध, स्पर्शगुण है, कोई धर्मद्रव्य है जो जीव पुद्गल के चलने में उदासीन सहायक है । कोई अधर्मद्रव्य है यह भी गति और स्थिति में उदासीन निमित्त है । आकाशद्रव्य है, एक जीव और पुद्गल आदिक सभी पदार्थों की अवगाहना में उदासीन निमित्त है । कोई काल है जो उस कालद्रव्य के स्थान पर रहने वाले पदार्थों के बदलने में उदासीन निमित्त कारण है । यहाँ यह बात जानना कि जो निमित्त-कारण कार्य के लिए व्यापार नहीं करते, निष्क्रिय से रहते हैं वे कहलाते हैं उदासीन निमित्त और जो पदार्थ कार्य के अनुरूप व्यापार कर रहे हों वे कहलाते हैं प्रेरक निमित्त । तो चाहे उदासीन निमित्त हो चाहे प्रेरक निमित्त हो, निमित्तभूत पदार्थ का द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, प्रभाव कुछ भी अंश उपादान में नहीं पहुंचता । इस दृष्टि से दोनों ही समान हैं, पर जो प्रेरक निमित्त होता है वही व्यापारशून्य होने पर निमित्त नहीं बनता । जैसे घड़े के बनने में काल द्रव्य उदासीन निमित्त है और कुम्हार जो कि उस अनुरूप व्यापार कर रहा है वह प्रेरक निमित्त है, यदि व्यापार करता हुआ कुम्हार नहीं है वह तो खाली बैठा है, जैसे कि अन्य लोग, या गधा, घोड़ा आदि बैठे रहते हैं उनकी ही तरह बैठा है, सोया है, तो वह निमित्तभूत नहीं होता । व्यापार करता हुआ कुम्हार घड़े के उत्पाद में निमित्त है, पर जिसको उदासीन निमित्त कहा है वह कुछ व्यापार नहीं करता है कार्य के अनुरूप, किंतु उपस्थित मात्र है, वह उदासीन निमित्त होता है । तो छहों द्रव्यों से भरपूर यह लोक है और परस्पर एक दूसरे के यथायोग्य निमित्तभूत हैं ।

आत्मावों के तीन प्रकार―सर्व पदार्थों में जो चेतना जाति के पदार्थ हैं वे जीव कहलाते हैं । उस जीव की यह चर्चा चलेगी क्योंकि मोक्ष कराना किसको ? जीव को । पुद्गल को मोक्ष हो या न हो, उसको कोई हानि लाभ नहीं । जैसे कार्मणवर्गणायें कर्मरूप बन गई । बन गई तो बनी, कभी कर्मरूप हो जायें तो क्या मोक्ष हो गया ? अकर्मरूप हो गई तो उनका क्या नुकसान या कर्मरूप मिट गया तो उनको क्या लाभ रहा ? चेतन नहीं हैं उनकी परिणति से उनको कुछ हानि-लाभ नहीं है, हाँं सत्त्व के प्रयोजक जरूर हैं ꠰ चेतन में हानि-लाभ विकार, दुःख, आकुलता आदि ये सब दिख रहे, उससे उनकी हानि है । अविकारस्वरूप परिणमता है चेतन तो उसको आकुलता नहीं है, शांति है ꠰ यह उसको लाभ है ꠰ इस कारण मोक्ष के प्रकरण में जीव पदार्थ का वर्णन किया जा रहा है । ये जीव 3 प्रकार के होते हैं―(1) बहिरात्मा (2) अंतरात्मा और (3) परमात्मा । इनका लक्षण स्वयं ग्रंथकार कहेंगे फिर भी थोड़ासा यह जान लें कि शब्द के अनुसार ही इनका लक्षण बन जाता है । बहिरात्मा―बाहर के तत्त्व को मानना कि यह मैं हूँ वह बहिरात्मा है । अंतरात्मा―अपने आपके अंत: जो सहजस्वरूप है उसरूप में अपने को मानना यह अंतरात्मा कहलाता है । परमात्मा पर मा आत्मा, उत्कृष्ट प्रमाण जहाँ उदित हुआ है उस आत्मा को कहते हैं परमात्मा । मा का दूसरा अर्थ लक्ष्मी भी है । उत्कृष्ट समवशरण आदिक बाह्य लक्ष्मी । अनंत ज्ञानादिक अंतरंग लक्ष्मी यह जहाँ प्रकट हुई है वह आत्मा परमात्मा कहलाता है ।

त्रिविध आत्मावों में हेय, उपाय, उपेय का निर्णय―इन तीन में से यह जानना कि बहिरात्मा होना अपवित्र दशा है । किसी बाहरी चीज को मानना कि यह मैं हूँ, यह अपने-आप पर अन्याय है, इससे कभी शांति नहीं हो सकती, क्योंकि बाह्य पदार्थ पर हमारा कुछ अधिकार नहीं, और उसकी परिणति देख-देखकर विकल्प करना, बाह्यपदार्थों में अपना स्वरूप स्वीकार करना, यह है हेय दशा । इस दशा को छोड़ना चाहिए, इससे कुछ लाभ नहीं है । मानो एक इस मनुष्य जीवन में बहुत-बहुत आकुलतायें चलीं, वैभव भी बना, कुटुंब परिवार में पुत्रादिक भी हुए, सब लोग आज्ञाकारी भी हुए, इन सब बाह्य पदार्थों के कुछ भी होते रहने से हे आत्मन ! तेरे आत्मा में कौनसा फर्क आ गया ? तू शुद्ध बन गया क्या ? तेरी भविष्य में अब दुर्गति न होगी क्या ? किसी भी बाह्य पदार्थ से अपने आत्मा को कुछ भी लाभ नहीं है, फिर मोह क्यों करना ? मोह बहुत बड़ा कलंक है बड़ा पाप है, व्यर्थ का पाप है, अनर्थकारी है । जैसा जो कुछ है वैसा मान लो ऐसा क्यों नहीं माना जाता । यह अपवित्रता भव-भव में दुःख देने वाली रही और जब तक मिथ्यात्व भाव है, मोह है, अज्ञान है तब तक संसार में रुलते ही रहेंगे । सो यह मिथ्यात्व, यह बहिरात्मापन हेय है, इसको छोड़ना चाहिए । यह बात अपने पर थोड़ा-थोड़ा भी घटित करता जाये तो इसको बड़े लाभ की बात है । सोचियेगा कोई भी जीव है घर में, जो बड़ा आज्ञाकारी है, इष्ट है तो भी क्या उसकी सत्ता आपकी सत्ता एक है? नहीं है । क्या उसकी किसी परिणति से आपमें कुछ आनंद जगता है ? नहीं जगता । मानता है यह मोही कि इन बच्चों का सद᳭व्यवहार मेरे को बड़ा सुखकारी हो रहा है । पर उनके सद्व्यवहार से सुख नहीं हो रहा । खुद ही भीतर में कल्पनायें करते हैं और उसमें भ्रमवश सुख मान रहे हैं, तो किसी भी बाह्य पदार्थ के समागम में, लगाव में रहना यह तो आत्मा के लिए कलंक है । और इसी से यह मोही जीव मानता महत्त्व है । जो पतन का हेतु है, जो कलंकरूप है उस ही को मोही मानता है कि मेरे लिए यह महत्त्व का प्रसंग है । बाह्य पदार्थो में अपना स्वरूप स्वीकार करना यह कलंक त्यागने योग्य है, इसे त्यागें, और अंत: भीतर जो दर्शन-ज्ञानमय आत्मस्वरूप है वह आनंद को साथ लिए हुए है । वह उपादेय है, उसे ग्रहण करना चाहिए । मगर यह अंतरात्मापन जो उपादेय बना है सो इसकी भी अवधि है । जैसे कहते हैं ना पूजा में―‘‘तुवपद मेरे हिय में, मम हिय तव पुनीत चरणों में । तब लौं लीन रहे प्रभु, जब लौ प्राप्ति न मुक्ति पद की हो ।’’ तो यह बात वास्तविक है । यदि यह भावना रहे कि मैं तो भव-भव में तुम्हारा सेवक रहूं और प्रभु तुम मेरे सदा पूज्य रहो, यदि उत्साह से, श्रद्धा से यह ही बात चित्त में समायी हो तो उसके लक्ष्य में अभी सिद्ध का स्वरूप नहीं आया । ऐसी ही इस अंतरात्मापन की बात है, अंतरात्मापन उपादेय है, किंतु किस प्रयोजन के लिए उपादेय है कि वह परमात्मपद मेरे को प्राप्त हो । परमात्मपद होने पर अंतरात्मापन नहीं रहता । सो अंतरात्मा तो एक उपाय है कि बहिरात्मापन छूटता है और परमात्मापना होने का साधन बनता है । तो ये तीन प्रकार के आत्मा हैं, जिनमें बहिरात्मा तो हेय है, अंतरात्मा उपाय है और परमात्मापन उपेय हैं । बहिरात्मापन को इस कारण से छोड़ दीजिए । इन तीन का लक्षण अब कुंदकुंदाचार्य स्वयं कह रहे हैं ।


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