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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - गाथा 10-2

From जैनकोष



बंधहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्ष: ।। 10-2 ।।

मोक्ष की उपेयता व संवर निर्जरा की उपायरूपता―इस सूत्र में मोक्ष का लक्षण बताया है कि बंध के कारणों का अभाव होना और निर्जरा होना इन दो उपायों द्वारा समस्त कर्मों से छुटकारा होने को मोक्ष कहते हैं । बंध के कारण बताये गए थे 8वें अध्याय में, मिथ्यादर्शन, अविरति प्रमाद, कषाय और योग, इनका अभाव होने से संवर होता है । जैसे मिथ्यात्व का अभाव होने से मिथ्यात्व जनित कर्म प्रकृतियों का संवर हो जाता है ऐसे ही अविरति आदिक के अभाव से कर्म का संवर होता है, क्योंकि कारण के अभाव से कर्म का अभाव होता ही है । सो आस्रवद्वार जब बंद हो गया तो कर्म का संवर होता है और संवर पूर्वक निर्जरा होने से मोक्ष होता है । निर्जरा के कारण बने तो पहले से इकट्ठे हुये कर्मों का विनाश हो जाता है । सो ऐसा विनाश होते-होते केवल ज्ञान होने के पश्चात् शेष तीन अघातिया कर्मों को आयु के बराबर होने के पश्चात् जब सब कर्मों का विनाश होता है, 14वें गुणस्थान में इनका विनाश है उसके बाद निर्वाण हो जाता है।

मिथ्यात्व के परिहार की अतीव आवश्यकता―बंध के कारणों में पहला कारण बताया है मिथ्यादर्शन । पदार्थों का स्वरूप तो है अन्य भाँति और यह श्रद्धान कर रहा अन्य भाँति तो यह मिथ्यात्व है । जैसे देव का स्वरूप तो है रागद्वेषरहित परिपूर्ण ज्ञानमय पर उस देव को कोई अन्य- अन्य रूपों में माने जैसे कि यह मुझे सुख देगा, दुःख देगा, स्वर्ग भेजेगा, नरक भेजेगा आदि तो इस प्रकार का उल्टा श्रद्धान करना मिथ्यादर्शन है । जो साधु कुटी बनाकर, भस्म रमाकर, जटायें रखकर त्रिशूल लेकर या कोई भी बाहरी रूप रखकर मान ले कि इससे कर्मों की निर्जरा होती है ऐसे गुरूओं को जो गुरु मानकर पूजे वह भी मिथ्यादर्शन है जो आरंभ परिग्रह रहित ज्ञान ध्यान में लवलीन साधुओं को गुरु माने वह सम्यक्त्व है । तो जो वस्तु जिस प्रकार यहीं है उसका उस रूप में श्रद्धान करना यह मिथ्यादर्शन है । आत्मा का स्वरूप चैतन्यमात्र है । अन्य समस्त जीवों से पौद्गलिक पदार्थों से जुदा है, पर ऐसा न मानकर कर्म के संबंध से हुई उन पर्यायों को आत्मा माने तो वह मिथ्यात्व है, मैं सुखी हूँ, दुःखी हूँ, गरीब हूँ, धनी हूँ आदिक अनेक रूपों में जो अपने को मानता है वह मिथ्यात्व है ।

असार संसार में सम्यक्त्व लाभ की साररूपता―एक सम्यक्त्व हो तो उससे अवश्य पार हो पायेंगे, सम्यक्त्व बिना अनेक तपश्चरण कर लिए जायें पर उनसे पार नहीं हो सकते । सम्यग्दर्शन होने पर सब जगह एक ज्ञान सामान्य स्वरूप में नजर आता है और भले संसारी जीवों की अनेक तरह की चेष्टायें होती हैं, पर यह ज्ञान उन चेष्टाओं में न अटक कर सम्यग्दृष्टि स्वरूप को ही निरखता है । जीव का सच्चा साथी धर्म है, और धर्म है आत्मा के स्वरूप को निरखना । सो जो मनुष्य अपने आपमें आत्मस्वरूप को निरखेगा । उसके कर्म ध्वस्त होंगे, इसलिए एक ही कर्त्तव्य है कि अपने को ऐसा अनुभवे कि मैं ज्ञानभाव आत्मतत्त्व हूँ अन्य रूप नहीं हूं । यह शरीर जिससे राग है, जिसमें हम प्रीति रखते और विषयों का सेवन करते, पालन करते, यह शरीर तो एक दिन इन्हीं मित्रों के द्वारा श्मशान में ले जाकर जला दिया जायेगा । एक चेतन के निकलने पर इस शरीर का कुछ भी महत्त्व नहीं रहता । ऐसे शरीर से क्या प्रीति करना? ज्ञान मात्र अंत: स्वरूप की महिमा जानना कि मेरा यह आत्मा अकेला यदि प्रकट हो जाये, इन कर्म बंधनों से यदि हट जाये तो यह अलौकिक आनंद का स्वामी बन जाये । जो मोह में नहीं भटकता, अपने आत्मस्वरूप का कर्त्तव्य निभाता वह पुरुष संसार से पार होगा और जो बीच में ही अटक गया, वहाँ ही अपना हित मान रहा वह पुरुष संसार में भटकेगा । उसे आत्म वैभव कुछ न मिलेगा । मुक्त में दुर्गति और बांध ली । इस थोड़े से मनुष्य जीवन में यदि विवेक से काम लिया जाता तो छूटना तो आवश्यक था ही, छूट रहे हैं, मगर विवेक बल से मोह कम कर लिया जावे और आत्मस्वरूप के ध्यान में लग जावे तो वह पार हो सकता । पर ऐसा कर्म सता रहे हैं इस जीव को कि धर्म के मार्ग में बढ़ने की इसे उमंग नहीं होती । तो जो जैसा करेगा वैसा भरेगा । अपनी-अपनी बात को विचारो कि मुझको आगे खोटा भोग न भोगना पड़े, पवित्र रहें, शांति में रहें । तो मेरा यह कर्तव्य है कि इस जीवन में अपने आत्मा का सहज स्वरूप निरखने में ही सारा समय लगे । जैसे-जैसे स्वानुभव की ओर बढ़ते जायेंगे वैसे ही वैसे अपने आपमें अमूर्त ज्ञानस्वरूप का अनुभव चलेगा । शांति भी बढ़ती चली जायेगी । इससे शांति के लिये एक ही काम है कि हम अपने स्वाभाविक सहज चैतन्यस्वरूप को ही यह मैं हूँ ऐसा अनुभव बनायें, बाहर की चीजों के कर्ता भोक्ता न बनें । मैं तो केवल एक ज्ञान द्वारा जाननहार प्रकाशरूप रहा करता हूँ । इस प्रकार की प्रतीति और निर्णय इस जीव को संसार के संकटों से छुटा सकती है । बस वही मोक्ष है । उस ही मोक्ष के स्वरूप का यहाँ निर्णय चलेगा ।

अनादि होने पर भी कर्मबंध संतति का अंत―यहां एक जिज्ञासु शंका करता है कि कर्मबंध की संतति जब अनादि से है तो उसका कभी अंत न आना चाहिये । जो अनादि है उसका अंत कैसे हो जाता है? समाधान―अनादि भी अंत को प्राप्त हो जाता है । जैसे बीज और अंकुर की संतान अनादि है, जो आज वृक्ष खड़ा है वह बीज से हुआ है, वह बीज वृक्ष से हुआ है, वह वृक्ष बीज से हुआ है । यों यह संतति अनादि से है तो भी कोई बीज को जला दे तो वह संतति खतम हों ही गई ना? तो इसी तरह मिथ्या दर्शन आदिक जो बचे हैं उनको जला देने पर अथवा ध्यानाग्नि से कर्म बीज को जला देने पर विकार और कर्म बंध इनकी संतति मिट जाती है । यद्यपि यह संतति अनादि से चली आई है तो भी यह समाप्त हो जाती है और संतति समाप्त हुई कि जीव अपने असली स्वरूप में आ गया और इस ही को मोक्ष कहते हैं । तो जैसे बीज के जलने पर अंकुर उत्पन्न नहीं हो सकता इसी तरह कर्मबीज के जल जाने पर संसार रूपी अंकुर उत्पन्न नहीं होता । यहाँ दूसरे पद में बताया है कि समस्त कर्मों का छुट जाना मोक्ष है । सो उसका भाव यह है कि कर्म रूप से बँधी हुई कार्माणवर्गणायें हैं । उन कार्माण वर्गणाओं में से कर्मत्व का हट जाना, कर्मरूप से क्षय हो जाना यह यह ही कर्म का क्षय है । कहीं उन कार्माणवर्गणाओं का, पुद्गल का क्षय नहीं हुआ, किंतु उनमें कर्मरूपता नहीं रहती । जो भी द्रव्य है उसका द्रव्य रूप से कभी भी विनाश नहीं होता । पर्यायें उत्पन्न होती हैं और नष्ट होती हैं । तो कर्मों में भी कर्म पर्याय रूप से विनाश की बात समझियेगा । कहीं कर्मरूप हुए पुद्गल का द्रव्य का विनाश नहीं होता । तो पुद्गल द्रव्य का जो कर्म पर्याय है वह कैसे नष्ट होता? यों नष्ट होता कि उस कर्म पर्याय का प्रतिपक्षी विरोधी कारण है संवर और निर्जरा । संवर और निर्जरा के उपायों से पौद्गलिक कार्माणवर्गणाओं में कर्मत्व नहीं रहता । उस समय वह पुद्गल द्रव्य अकर्मपर्याय रूप से परिणत हो जाता है । जब तक कर्मपर्याय रूप से परिणत हो रहा था तब तक संसार था । और जब अकर्म पर्यायरूप से रह गया तो मोक्ष हो गया ।

मोक्षण में मोच्य मोचक तत्त्व तथा प्रकृति मोक्षण की यत्न साध्यता व अयत्नसाध्यता का निर्देशन―यहाँ मोक्ष शब्द भावसाधन में प्रयुक्त हुआ है, जिसकी निरुक्ति है―मोक्षणं मोक्ष:, छूट जाने को मोक्ष कहते हैं । तो यह मोक्ष शब्द दो पर दृष्टि दिलाता है । (1) मोक्तव्य और (2) मोचक याने जो छूटने योग्य है उसे कहते हैं मोक्तव्य अथवा मोच्य और जो छुटाने वाला है उसे कहते हैं मोचक, क्योंकि वियोग दो का होता है ना? जब दो का वियोग होता तो उसमें एक को मोच्य कहियेगा और एक को मोचक कहियेगा । यहाँ जो कृत्स्न शब्द दिया है उससे आगे कर्म का ग्रहण करना । कृत्स्न मायने सब । कैसे वे सब कर्म? जो सत्ता बंध उदय और उदीरणा रूप से चार भागों में बंटे हुए हैं । सो इन समस्त कर्मों का अभाव होने से छुटकारा होने से मोक्ष होता है । कर्मों का अभाव दो प्रकार से होता है । (1) यत्नसाध्य और (2) अयत्नसाध्य । एक तो विशुद्ध भाव रूप पुरुषार्थ के बल से कर्म प्रकृतियाँ दूर होती हैं और कोई कर्म प्रकृतियां बिना यत्न किये दूर होती हैं जैसे कि जिस आत्मा को उसी भव से मोक्ष जाना है तो उस चरम शरीरी के नरकायु, तिर्यंचायु और देवायु का जो अभाव है वह अयत्नसाध्य है । इसके लिए कोई यत्न तो नहीं किया गया । उनकी सत्ता है ही नहीं । तो इनका स्वयं अभाव है और यत्नसाध्य क्या कहलाता है कि विशुद्ध परिणामों के होने से कर्म प्रकृतियों का संवर और संवर पूर्वक निर्जरण हो जाता है । वह यत्नसाध्य कर्मविनाश है ।

यत्नसाध्य कर्मनिर्जरण का उदाहरण―अविरत सम्यग्दृष्टि अथवा अविरत सम्यग्दृष्टि से लेकर 7वें गुणस्थान तक किसी भी जीव के अनंतानुबंधी क्रोध, मान माया, लोभ मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्प्रकृति इन 7 प्रकृतियों का विनाश हो जाता है । जैसे कि विष वृक्षों का वन तीक्ष्ण कुल्हाड़ी से समूल काट दिया जाता है ऐसे ही शुभ अध्यवसायरूप तीक्ष्ण परिणामों से ये 7 प्रकृतियां समूल नष्ट कर दी जाती हैं । यह हुआ यत्न साध्य प्रकृतियों का अभाव । ऐसे ही अनिवृत्तिकरण गुणस्थान वाले जीव एक साथ ही अपने समाधि चक्र से जिन प्रकृतियों को जीतता है और समूल नष्ट कर देता है वे प्रकृतियां ये हैं―निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, नरकगति तिर्यंचगति, एकेंद्रिय, दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चतुरिंद्रिय जाति, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारण इन सब प्रकृतियों के समूल नष्ट होने से यही 9वें गुणस्थान वाला भव्य प्रत्याख्यानावरण और अप्रत्याख्यानावरण संबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ इन 8 प्रकृतियों का समूल नाश कर देता है और इस ही गुणस्थान में नपुंसक वेद, स्त्रीवेद और 6 नोकषाय का क्रम से क्षय कर देता है । इसके बाद पुरुषवेद, संज्वलन क्रोध, मान, और माया इस क्रम से विनाश कर देता है । इन प्रकृतियों का जो अभाव दिया है वह यत्नसाध्य अभाव कहलाता है । कोई पुरुषार्थ किया, परिणाम बढ़े, निर्मल हुए, इन प्रकृतियों का विनाश हुआ । 10वें गुणस्थान के अंत में संज्वलन लोभ नाश को प्राप्त होता है । क्षीण कषाय वीतराग छदमस्थ के उपांत समय में निद्रा और प्रचला नष्ट हो जाते हैं । और अंत समय में 5 ज्ञानावरण 4 दर्शनावरण और 5 अंतराय? प्रकृतियों का विनाश हो जाता है । यह सब नाश, कर्मों का अभाव यत्नसाध्य है । जिस जीव को मोक्ष जाना है उसके मनुष्यायु के सिवाय कोई आयु होती ही नहीं है । किसी भी जीव के अधिक से अधिक एक समय में दो आयु संभव हैं―(1) एक भोगने वाली आयु और (2) दूसरी वह आयु जिससे अगले भव में पैदा होगा, पर अरहंत जो बनेगा उस मुनि के जन्म का तो सवाल ही नहीं है सिर्फ जो आयु भोगी जा रही वही भर है । सों वह तीन आयु का विनाश अयत्नसाध्य कहलाता है । पर इन सब प्रकृतियों का अभाव यत्नसाध्य है । इतनी प्रकृतियों का विनाश होने पर यह जीव केवल ज्ञानी परमात्मा हो जाता है ।

सकल परमात्मा के कर्म निर्जरण का प्रतिपादन―अब 13वें गुणस्थान में तो किसी भी प्रकृति का विनाश नहीं है । अघातिया ही कर्म रह गये । हैं । अब तो उनका नाश मोक्ष हो जाते समय होगा सो यह जीव अयोगकेवली गुणस्थान में पहुंचकर उपांत समय में 72 प्रकृतियों का क्षय कर देता है । और अंत अमय में 13 प्रकृतियों का क्षय कर देता है । वे 72 और 13 प्रकृतियाँ कौन हैं? सो उपांत समय की 72 प्रकृतियाँ ये हैं―कोई एक वेदनीय देवगति औदारिक शरीर, वैक्रियक शरीर, आहारक शरीर, तैजस शरीर, कार्माण शरीर, छहों संस्थान, तीनों अंगोपांग, छहों संहनन, पांचों वर्ण, दोनों गंध, पाँचों रस, 8 स्पर्श, देवगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगीत, अपर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, सुस्वर, अनादेय, अयशकीर्ति, निर्माण और नीचगोत्र । इनके विनाश के बाद ही तुरंत के समय में जिन 13 का क्षय होता है वे प्रकृतियाँ ये हैं । कोई एक वेदनीय मनुष्यायु, मनुष्यगति, पंचेंद्रिय जाति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, त्रस वादर पर्याप्त सुभग आदेय यशःकीर्ति, तीर्थंकर और उच्चगोत्र । समस्त 148 प्रकृतियों का क्षय हो जाने पर जीव का मोक्ष होता है ।


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