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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - गाथा 10-3

From जैनकोष



औपशमिकादिभव्यत्वानांच ।। 10-3 ।।

मोक्ष नैमित्तक भावों के अभाव की सूचना―समस्त कर्मों के विनाश से मोक्ष होता है यह बात पूर्व सूत्र में कही गई है । अब इस सूत्र में एक जिज्ञासा का समाधान किया है कि द्रव्य कर्म का नाश हुआ, पर भावकर्म का भी नाश होता है क्या? अर्थात भावों का विनाश होता है या नहीं, उसका उत्तर इस सूत्र में है । उत्तर यह है कि 53 भावों में से कुछ ही भावों को छोड़कर जो पूर्णतया स्वाभाविक हैं । बाकी भावों का भी क्षय हो जाता है । सो इस सूत्र में तो सभी का ही क्षय बताया गया है । फिर आगे सूत्र में जिनका क्षय नहीं होता उनका कथन आयेगा । इस दृष्टि से इस सूत्र में कहा है कि औपशमिक आदिक भावों का और भव्यत्व भावों का क्षय हो जाता है सूत्र बनाने की प्रक्रिया में यह पद्धति भी हुआ करती है कि जहाँ बहुतों को ग्रहण करना हो और उनमें कुछ भी तत्त्व हो कि जिनको ग्रहण न करना हो तो पहले सबको बताकर फिर जिसको छोड़ना है उसके लिए अलग सूत्र बनाया जाता है, जैसे कि पंचम अध्याय में चौथे सूत्र में कहे हुए द्रव्यों के विषय में यह बताया कि ये द्रव्य नित्य अवस्थित हैं और अरूपी है लेकिन पुद्गल दृव्य तो अरूपी नहीं हैं । तो उसकी बात बताने के लिए 5वाँ सूत्र रचा है । ऐसे ही यहाँ कुछ ही भावों को छोड़कर बाकी सब भावों का विनाश हो जाता है । सिद्ध अवस्था में वे भाव नहीं रहते । तो पहले सभी भावों को बता दिया फिर आगे सूत्र में उन भावों का नाम लिया जायेगा जिनका क्षय नहीं होता । सूत्र पद्धति में इस तरह का वर्णन करना लाघव के लिये होता है कि बड़ा सूत्र न बने व सूत्र में अधिक शब्द न डाले जावें । इस सूत्र में औपशमिक आदिक भावों का नाश होता है । इतना ही कह देते तो लाघव हो जाता और भव्यत्व का भी अपने आप ग्रहण हो जाता है । इसका भी नाश हो जाता, सो क्यों नहीं किया? इसका कारण यह है कि औपशमिक आदिक सभी भावों का नाश तो होता है कुछ को छोड़कर मगर पारिमाणिक भाव में जीवत्व भाव का कभी नाश नहीं होता । भव्यत्व का नाश होता इसके कहने से ही यह साबित हो गया कि जीवत्व भावों का नाश नहीं होता । मोक्ष अवस्था में औदयिक भाव तो कोई रहते ही नहीं । क्षायोपशमिक भाव भी कोई नहीं रहते । औपशमिक भाव कर्म के उपशम से हुआ करते । सो कर्म का क्षय होने पर उपशम ही नहीं है, तो औपशमिक भाव कैसे बताया जाये? क्षायिक भाव में ही है भाव ऐसा कि जिसका शुद्ध अवस्था में विनाश नहीं होता ।

निमित्त के हटने से नैमित्तिक भावों के कहने की स्वयं सिद्धि होने से इस सूत्र को कहने की व्यर्थता की आशंका और उसका समाधान―यहाँ एक प्रश्न होता है कि जब दूसरे सूत्र में यह बता दिया गया कि समस्त कर्मों का नाश हो जाता है वहाँ मोक्ष है । तो कर्मद्रव्य का विनाश हुआ तो तन्निमित्तक भाव भी न रहा यह बात तो अपने आप सिद्ध हो जाती है फिर इस सूत्र के बनाने की क्या आवश्यकता? इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि यह कोई एकांत नियम नहीं है कि निमित्त के दूर होने पर नैमित्तिक भावों की निवृत्ति हो ही जाये । जैसे चक्र घुमाया जाता डंडे से तो चक्र घूमने का निमित्त डंडा है ना? और उस डंडे को हटा लिया जाए तो भी चक्र घूमता रहता है । तो यह नियम तो न रहा कि निमित्त के दूर होने पर नैमित्तिक भाव भी दूर हो जाते हैं । हाँ ऐसी कई बातें हैं प्राय: कि निमित्त के दूर होने पर नैमित्तिक भाव दूर हो जाते हैं, पर सर्वत्र नियम तो न बना । जैसे आँखें फोड़ने का निमित्त मान लो सूजा है । सूजा लगने से आंख फूट गई । अब सूजा अलग हो जाये तब तो फिर आँख को ज्यों का त्यों हो जाना चाहिये, क्योंकि निमित्त तो हट गया । तो यह सर्वत्र नियम न बैठेगा कि निमित्त के दूर होने पर नैमित्तिक भी दूर हो जायेगा । एक तो यह बात है । दूसरी बात यह है कि भले ही अपने आप अर्थ से यह सिद्ध हो जाये कि कर्म दूर होने से विभावों का भी विनाश हो जाता है फिर भी एकदम स्पष्ट जानकारी के लिए यह सूत्र कहा गया है और आगे बताया जायेगा कि सभी भाव में अभाव नही हटता है, मोक्ष में । सो कौन से भाव शेष रह जाते हैं । उनका ज्ञान कराने के लिए यह उनके प्रतिपक्षी भावों के विनाश वाला सूत्र कहा है । अब वे भाव कौन से हैं जिनका कि मोक्ष में अभाव नहीं होता, इसके लिये सूत्र कहते हैं ।


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