• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 4-36

From जैनकोष



दशवर्षसहस्राणि प्रथमायां ।। 4-36 ।।

पहली पृथ्वी में जघन्य स्थिति 10 हजार वर्ष की होती है । यहाँ 10 हजार वर्ष एक सागर प्रमाण स्थिति के सामने तालाब के एक बूंद की तरह है, बहुत ही कम है । नारकियों को कम से कम 10 हजार वर्ष तक नरकों में रहकर दुःख सहना पड़ता है । दुःख इतने कठिन हैं कि जिनका समाचार सुनकर हृदय काँप जाता है । वहाँ एक दूसरे के अंग के टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं, इतने पर भी उनका बीच में मरण नहीं होता । वे ही सब अंग फिर इकट्ठे होकर ठीक हो जाते हैं । यों अनेक बार छिदते-भिदते रहते हैं और वे पृथ्वी के दुःख सर्दी गर्मी के दुःख, बहुत प्रकार के दुःख हैं । उनको यह जीव सहता है । नारकियों की जघन्य स्थिति कहकर अब भवनवासियों की जघन्य स्थिति बतलाते हैं ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र_-_सूत्र_4-36&oldid=84959"
Categories:
  • मोक्षशास्त्र
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:35.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki