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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 4-39

From जैनकोष



परा पल्योपममधिकम् ।। 4-39 ।।

व्यंतर देवों की भुज्यमान उत्कृष्ट आयु स्थिति―व्यंतरों की उत्कृष्ट स्थिति कुछ अधिक एक पल्य प्रमाण है । यहाँ स्थिति का तो प्रकरण ही चल रहा है, किंतु उत्कृष्ट है या जघन्य है, इसके निर्देश के लिये कोई शब्द कहना पड़ता है । तो यहाँ परा शब्द कहा है जो कि स्त्रीलिंग में है । यह स्थिति शब्द का विशेषण है । स्थिति शब्द स्त्रीलिंग में है । तो परा शब्द भी स्त्रीलिंग में कहा गया है । व्यंतरों की उत्कृष्ट से उत्कृष्ट स्थिति कुछ अधिक एक पल्य प्रमाण होती है । यहाँ तक सभी संसारी जीवों की उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति कही जा चुकी है । अब केवल ज्योतिष्क देव ही शेष रहे हैं, उनकी उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति बताते हैं । उसमें से पहले ज्योतिष्कों की उत्कृष्ट स्थिति बतला रहे है ।


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  • मोक्षशास्त्र
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