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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 4-41

From जैनकोष



तदष्टभागोऽपरा ।। 4-41 ।।

ज्योतिष्क देवों की जघन्य स्थिति―ज्योतिषी देवों की जघन्य स्थिति पल्य के 8वें भाग प्रमाण है । इनमें भी चूंकि ज्योतिषी देव 5 प्रकार के हैं अतएव भिन्न-भिन्न प्रकारों में भिन्न-भिन्न प्रकार की स्थितियाँ होती हैं, और जैसे जघन्य स्थिति में विभिन्नता है इसी प्रकार उत्कृष्ट स्थिति में भी विभिन्नता है । जैसे चंद्र की उत्कृष्ट स्थिति एक लाख वर्ष अधिक पल्य प्रमाण है, ज्योतिषों देवों में चंद्र इंद्र होता है और सबसे अधिक इनकी स्थिति प्रभाव आदिक होते हैं । सूर्य देवों की स्थिति एक हजार वर्ष पल्य प्रमाण है । सूर्य प्रतींद्र कहा जाता हैं । शुक्रों की उत्कृष्ट स्थिति 100 वर्ष अधिक पल्य प्रमाण है, वृहस्पतियों की उत्कृष्ट स्थिति पूर्ण एक पल्य प्रमाण है, अधिक नहीं है । शेष जितने भी ग्रह हैं बुध आदिक उन सबकी उत्कृष्ट स्थिति आधे पल्य प्रमाण है, इस प्रकार इन ज्योतिषी देवों की उत्कृष्ट स्थिति विभिन्न-विभिन्न है, इसी प्रकार नक्षत्रों की भी आधे पल्य प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति होती है । यद्यपि 40वें सूत्र में ज्योतिषियों की उत्कृष्ट स्थिति सामान्य रूप से कह दी गई थी, पर उनके जो 5 भेद हैं और उनमें भी जो कोई विशेष है उन सबकी उत्कृष्ट स्थिति विभिन्न प्रकार की होती है । ज्योतिषी देवों में तारागणों की उत्कृष्ट स्थिति एक पल्य के चौथे भाग प्रमाण है । अब जघन्य स्थिति का वर्णन करते हैं । तारा और नक्षत्रों की जघन्य स्थिति पल्य के 8वें भाग प्रमाण है और शेष बचे समस्त ज्योतिषों देव सूर्यादिक सभी कीं जघन्य स्थिति पल्य के चौथे भाग प्रमाण है । अब लौकांतिक देवों की स्थिति कितनी होती है इसका समाधान करते हैं ।


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