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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 5-15

From जैनकोष



असंख्येय भागादिषु जीवानाम् ।। 5-15 ।।

लोकाकाश के असंख्येय भाग आदि में जीवों का अवगाह―इस सूत्र में भी लोकाकाशे अवगाह इन दो पदों की अनुवृत्ति ली जाती है और अर्थ वश से लोकाकाश का विभक्ति परिणमन हो जाता है षष्ठी विभक्ति हो जाती है । तब इस सूत्र का अर्थ होता है कि जीवों का लोकाकाश के असंख्याते भाग आदिक में अवगाह है । असंख्यात असंख्याते प्रकार के होते हैं । इसलिये लोकाकाश का असंख्यातवां भाग भी अनेक प्रकार का होता है । कोई जीव सर्व जघन्य शरीर वाला हो नित्य निगोदी उसका अवगाह लोक के असंख्यात भाग प्रमाण असंख्यात प्रदेश में है और किसी जीव शरीर का अवगाह ऐसे दो असंख्यात भागों में है, किसी का ऐसे तीन आदिक असंख्यात भागों में है । कोई भी जीव शरीर अथवा जीव किसी भी पर्याय में असंख्यात प्रदेशों से कम प्रदेश में नहीं ठहरते । कितने से छोटे आकाश के हिस्से में असंख्यात प्रदेश पाये जाते हैं इसका अनुमान इस तरह कर लेना चाहिये कि आगम में बताया है कि सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग में भी असंख्याते उत्सर्पिणी अवसर्पिणी के समय से अधिक प्रदेश विद्यमान हैं । गणना की अपेक्षा उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल में जितना समय होता और वह भी असंख्याते उत्सर्पिणी अवसर्पिणी का उतने से अधिक प्रदेश तो सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग की जगह में हैं ।

छोटे-बड़े जीव शरीरों का दिग्दर्शन―सब से छोटी जघन्य अवगाहना कब होती है जीव की सो सुनो सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीव जब उत्पन्न होते हैं तो उसके तीसरे समय में घनांगुल के असंख्यातवें भाग रूप सबसे छोटी जघन्य अवगाहना है, फिर इस अवगाहना से एक प्रदेश, दो प्रदेश संख्यात प्रदेश असंख्यात प्रदेश बढ़-बढ़कर बड़ी अवगाहना बनती है । केवली समुद्धात में लोकपूरण समुद्धात के समय ऐसा अवसर होता है कि जीवों के प्रदेश समग्र लोकाकाश में व्याप्त हो जाते हैं । इस अवसर के अतिरिक्त किसी भी अवसर में जीव के प्रदेश समग्र लोकाकाश में नहीं व्याप पाते । इन जीवों के शरीर में भी ऐसी अवगाहने की योग्यता है कि थोड़े से स्थान में कहिये सर्व जघन्य शरीर रह रहा है उसी स्थान में अनंत निगोदिया जीव समा जायें । जब साधारण नामकर्म प्रकृति का उदय होता है तो वहाँ ऐसे साधारण जीव होते हैं कि जिनका शरीर तो एक है और उस आश्रय से अनंत जीव बस रहे हैं । उन अनंत जीवों का आहार, श्वांस उच्छवास जन्म मरण साधारण है अर्थात् एक साथ होता है । इस लोक में ऐसा स्कंध देह असंख्यात लोक प्रमाण है जिन एक-एक स्कंधों में असंख्यात लोक प्रदेश के बराबर अन्डर होता है और एक-एक अन्डर में असंख्यात लोकप्रमाण आवास होते हैं और एक-एक आवास में असंख्यात पुलवियाँ होतीं हैं और एक-एक पुलवी में असंख्यात लोकप्रमाण निगोद शरीर होते हैं और एक-एक शरीर में सिद्ध राशि से अनंत गुने निगोदिया जीव रहते हैं । तो अब ध्यान में लाओ कि थोड़ी सी जगह में कितने अनंत जीव बसे हुये हैं । यद्यपि मोटे रूप में यही कहा जा रहा है कि सर्व जीवों का स्वरूप सर्व जीव लोक के असंख्यातवें भाग में रहता है किंतु इसमें सब जीवों का देहों का परिमाण एक सरीखा न समझना चाहिये । असंख्यात तो असंख्यात प्रकार के होते हैं और इस शरीर में थोड़ा-थोड़ा बढ़-बढ़कर इतने भेद हो जाते हैं कि सर्व जघन्य शरीर तो घनांगुल के असंख्यातवें भाग में है और सबसे बड़ा शरीर 1000 योजन का लंबा, 500 योजन का चौड़ा और 250 योजन का मोटा मच्छ का शरीर है जो कि स्वयंभूरमण समुद्र में पाया जाता है और इस बीच संख्यात प्रदेश बढ़-बढ़कर असंख्यात प्रकार के हो जाते हैं ।

सब द्रव्यों के प्रदेशों के परिणाम के कथन की समाप्ति का संकेत―यहाँ तक काल द्रव्य को छोड़ कर सभी द्रव्यों का अवगाह और प्रमाण ज्ञात हुआ है और उन सब वर्णनों से निष्कर्ष रूप यह समझ लेना चाहिए कि लोकाकाश के एक-एक प्रदेश पर एक-एक कालाणु का अवगाह है, क्योंकि अन्य द्रव्यों का भिन्न-भिन्न रूप में अवगाह बताया जा चुका । जैसे धर्म अधर्म द्रव्य का अवगाह संपूर्ण लोकाकाश में है । पुद्गल का अवगाह एक प्रदेश आदिक में है । जीवों का अवगाह लोकाकाश के असंख्येय भाग आदिक में है तो उससे अब और क्या बचता है? सो वह अपने आप सिद्ध हो जाता है कि काल द्रव्य का अवगाह लोकाकाश के एक प्रदेश पर है । ऐसे असंख्याते काल द्रव्य हैं और उन सबका एक-एक प्रदेश पर ही अवगाह है ।

लोक प्रदेश प्रमाण असंख्यात प्रदेशी अनंत जीवों का असंख्यात प्रदेशी लोकाकाश में कैसे अवगाह हो जाता है की जिज्ञासा―इस अध्याय में पहिले यह बताया गया था कि एक जीव लोकाकाश के बराबर असंख्य प्रदेश प्रमाण वाला है और ऐसे जीव अनंतानंत हैं । तब एक ही जीव का प्रदेश प्रमाण लोकाकाश के बराबर है और ऐसा ही प्रमाण है समस्त अनंत जीवों का तो वे सभी जीव एक लोकाकाश में कैसे समा जाते? जीवों को साधारण रूप से संख्या इस तरह समझ लेना चाहिए कि सबसे कम जीव मनुष्य गति में पाये जाते हैं लेकिन वे भी असंख्यात हैं । जो पर्याप्त मनुष्य हैं उनकी संख्या तो करीब 21 अंक प्रमाण है, किंतु लब्ध्यु पर्याप्तक मनुष्य है कर्म भूमिज महिलाओं के कांख आदिक अवयवों में उत्पन्न होते रहते हैं । एक श्वांस में 18 बार जन्म मरण करते हैं ऐसे लब्ध्युपर्याप्तक मनुष्य असंख्यात हैं । इस तरह मनुष्य गति के जीव हैं तो अधिक किंतु अन्य गतियों से सबसे कम हैं । उनसे अधिक जीव नारकियों में हैं । नरकगति के जीव मनुष्य गति से अधिक हैं । उनसे अधिक देवगति में हैं । उनसे अधिक त्रस जीव है, उनसे अधिक निगोद को छोड़कर शेष स्थावर जीव हैं । उनसे अनंतगुने सिद्ध जीव हैं और उनसे भी अनंतगुने निगोदिया जीव हैं । इतने अनंतानंत जीव एक लोकाकाश में कैसे ठहर जाते हैं? यह एक आशंका होती है । उसके समाधान में अब सूत्र कहते हैं ।


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