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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:मोक्षशास्त्र - सूत्र 5-16

From जैनकोष



प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् ।। 5-16 ।।

जीव प्रदेशों का संकोच विस्तार होने के कारण लोकाकाश में अनंत जीवों के अवगाह की सिद्धि―जीव का लोकाकाश के असंख्यात भाग आदिक में अवगाह है इसका कारण यह है कि जीव के प्रदेशों का संहार और विसर्प होता है अर्थात प्रदेशों का संकोच और फैलाव हुआ करता है । जैसे दीपक का प्रकाश । यदि घड़े में दीपक हो तो उतने में रहेगा । कमरे में दीपक हो तो उतने में रहेगा बहुत बड़ी हाल में दीपक हो तो उतने में रहेगा । तो जैसे आधार के कारण दीपक के प्रकाश में संकोच और विस्तार होता है इसी प्रकार जीव के प्रदेशों का निमित्तवश संकोच और विस्तार होता है । वह निमित्त क्या है सो अभी बतायेंगे? यहाँ सूत्र के अर्थ के समय तत्काल यह जानना चाहिये कि जीवों का लोक के असंख्यातवें भाग आदिक में अवगाह होने का विरोध नहीं है । क्योंकि जीवों के प्रदेशों का संकोच और विस्तार हुआ करता है, जैसे कि दीपक । यद्यपि प्रत्येक आत्मा का स्वभाव अमूर्तपना है रूप, रस, गंध, स्पर्श से रहित अमूर्त है यह आत्मा, तो भी अनादि काल से कर्मों का संबंध चला आ रहा है । सो उस पुद्गल कर्म के साथ तथा पुदगल कर्म के विपाक प्रतिफलन के साथ मोही जीव का एकपना हो रहा है । इस कारण आत्मा कथंचित मूर्त बन रहा है सो यह आत्मा यद्यपि लोकाकाश के प्रदेशों के बराबर असंख्यात प्रदेशी है । किंतु कार्माण शरीर के वश से जो सूक्ष्म स्थूल शरीर ग्रहण में आया उस सूक्ष्म शरीर के मिलने पर सूखे चमड़े की तरह प्रदेशों में संकोच हो जाता है जैसे कोई चमड़ा गीला व फैला हुआ है और सूखने पर सिकुड़ जाता है । ऐसे ही छोटा शरीर मिलने पर जीव के प्रदेश सिकुड़ जाते हैं और स्थूल शरीर मिलने पर उसके बराबर फैल जाते हैं । जैसे कि जल में तेल गिरे तो वह तेल जल के बराबर फैल जाता है । इस सूत्र में दृष्टांत दिया है दीपक का । वह बिल्कुल स्पष्ट है । सबको इसमें निर्विवाद ज्ञान है कि दीपक को जैसा आधार मिले वैसा ही संकुचित अथवा विस्तृत हो जाता है ।

आत्मा के आधार का निश्चय व व्यवहार से निर्देशन―इस कथन में यह जाहिर हो रहा है कि आत्मा का आधार शरीर है अथवा आकाश प्रदेश है । पर निश्चयत: देखा जाये तो कोई द्रव्य किसी द्रव्य के आधार में नहीं है । यह सब व्यवस्था व्यवहार से बताई जा रही है और व्यवहार से ही अनेक घटनाओं का बोध होता है । स्पष्टतया एक ही भव में देखा जाता कि जब कोई छोटा बालक है, शिशु है तब उसका आत्मा बहुत छोटे देह प्रमाण है । वही जब बड़ा हो जाता है, युवक हो गया तो उससे चौगुने प्रमाण आत्मा का फैलाव हो जाता है ।

जीव के प्रदेशों के संकोच विस्तार की मीमांसा पूर्वक समर्थन―यहां शंकाकार कहता है कि एक अनुमान प्रमाण से यह सिद्ध होता है कि आत्मा के प्रदेशों में संकोच और विस्तार नहीं हैं । वह प्रमाण क्या है कि आत्मा अपने प्रदेशों के संकोच और विस्तार को नहीं धारण करता, अमूर्त द्रव्य होने से जैसे कि आकाश । आकाश, अमूर्त द्रव्य है तो उसमें संकोच विस्तार नहीं होता । तो आत्मा भी अमूर्त द्रव्य है, अत: उसके प्रदेशों में संकोच विस्तार नहीं हो सकता । इस पूर्व पक्ष के समाधान में कहते हैं कि उनका यह पक्ष अनुमान और आगम प्रमाण से बाधित हो जाता है । देखिये अनुमान प्रमाण । आत्मा अपने प्रदेशों के संकोच और विस्तार को तादात्म्य होकर धारण करता है क्योंकि बड़े परिमाण वाले और अल्प परिमाण वाले देशों में यह आत्मा व्यापक हो जाता है । दीपक के समान । जैसा कि यहाँ ही स्पष्ट हो रहा है कि बालक के शरीर में थोड़े देश में आत्मा रह रहा है । वही जब युवक होता है तो बहुदेश में आत्मा व्यापक हो जाता है । यहाँ कहीं ऐसा नहीं है कि शिशु अवस्था का जीव न्यारा हो और कुमार अवस्था का जीव न्यारा हो । जीव वही एक है, अनुभव सिद्ध है, और जो सत् है वह अनादि अनंत होता है । वही जीव एक ही भव में क्या उसके जितने भी भव होते हैं सभी भवों में वे जीव वही वही एक-एक रहते हैं । अपने आपको व हम आप सभी को भी यह प्रत्यभिज्ञान हो रहा है कि जो उस बालक में था वही अब युवा हुआ । जो पहले पतला था वही अब मोटा हुआ है इसलिए इस ही एक देह में उस ही एक जीव का ज्ञान होता है । सो अनुमान बाधित है―शंकाकार का पूर्वपक्ष तथा आगम बाधित भी है । स्याद्वाद शासन में संसारी जीवों के प्रदेशों का संकोच और विस्तार बताया गया है । उनका यह कथन अप्रमाण नहीं है । आगम की प्रमाणता अनेक प्रमाणों से अनेक बार सिद्ध की जा चुकी है ।

आत्मा के सर्वव्यापकत्व की बात रखकर व वटवृक्षफल की तरह अतीव अल्पत्व की बात रखकर आत्मप्रदेशों में संहार विपर्य न होने के पूर्वपक्ष व उनके समाधान―यहाँ शंकाकार कहता है कि आत्मा तो सर्वव्यापी है । सो सर्वव्यापी होने के कारण प्रदेशों का संकोच और विस्तार नहीं हो सकता । जैसे कि आकाश सर्वव्यापी है तो आकाश के प्रदेशों का संकोच और विस्तार नहीं होता । ऐसा शंकाकार का कथन युक्त नहीं है, क्योंकि आकाश तो सर्वव्यापक है, किंतु आत्मा सर्वव्यापक नहीं है । अब यहाँ दूसरा शंकाकार कहता है कि आत्मा सर्वव्यापक नहीं है । तो यह मानों कि आत्मा वट वृक्ष के फल की तरह अत्यंत छोटा है अथवा हजारों बार टुकड़े किये गए बाल के अग्र भाग प्रमाण अत्यंत छोटा है, फिर भी आत्मा के प्रदेशों का संकोच और विस्तार मानने का कोई अवकाश नहीं रहता । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि ऐसा मानने में तो प्रत्यक्ष विरोध है । सभी जीवों को अपने पूरे शरीर में एक साथ आत्मा का अनुभव होता है । यदि आत्मा अत्यंत छोटा है तो शरीर के जिस हिस्से में आत्मा होगा उतने हिस्से में ही आत्मा का सम्वेदन हो सकेगा । हाथ, पैर, पेट, मस्तक आदिक अनेक अंग हैं । सब जगह आत्मा का संवेदन न हो सकेगा । दुःख-सुख भी शरीर के किसी एक हिस्से में ही अनुभूत हो पायेंगे । पूर्ण हिस्से में अनुभूत न होंगे । जैसे कि इस शरीर में यह पूर्ण आत्मा बना हुआ है उसमें सुख-दुःख का संवेदन न होगा । यहाँ यह शंकाकार यह कहे कि आत्मा तो वटफल की तरह छोटा ही है मगर उस आत्मा का शीघ्र भ्रमण होते रहने से सारे शरीर में दुःख सुख ज्ञान का संवेदन होता रहता है । जैसे कि किसी एक गोल चाक में कोई काली बूंद लगी हो तो उसके भ्रमण के समय काली बूंद सब ओर दिख जाती है । यह कहना भी संगत नहीं है । यदि इतने बड़े शरीर में वट के बीज बराबर आत्मा माना जा सकता है और वही एक आत्मा खूब तेज चक्कर लगाकर सारे शरीर में आत्मा का अनुभव कराता है तो फिर सारे लोक भर में सिर्फ एक ही आत्मा वट बीज की तरह छोटा क्यों नहीं मान लिया जाता? जैसे एक आत्मा इतने बड़े शरीर में तेजी से चक्कर लगाता है तो ऐसे ही उनका एक आत्मा संसार के सब जीवों के शरीर में तेजी से चक्कर लगाता रहे और उससे सब अनुभव चलते रहेंगे । यदि शंकाकार यह कहे कि संपूर्ण शरीरों में एक ही आत्मा का चक्कर लगाना मानने पर जब वह आत्मा किसी शरीर में पहुंचता है तो चूंकि बाकी जितने शरीर हैं वे सब व्यक्त हो जायेंगे, मृतक हो जायेंगे इस कारण एक आत्मा सारे जीव शरीरों में चक्कर नहीं लगाता । वह तो एक ही शरीर में चक्कर लगाता है । इसका उत्तर यह है कि यह ही प्रसंग यहाँ भी आ जायेगा । इस शरीर में भी चक्कर लगाता हुआ आत्मा जिस क्षण हाथ में पहुँचा उस क्षण बाकी शरीर मृतक हो जाना चाहिये । दूसरी बात यह भी देखिये कि जैसे शीघ्र भ्रमण कर रहे हुये चाक पर काली बूंद चारों ओर दिखती है तो रीता स्थान भी तो दिखता रहता है । तो इसी तरह के वे रीते स्थान शरीर के वे रोते अंग चेतन विहीन हो जायेंगे लेकिन सभी जीवों को अपने संवेदन प्रत्यक्ष से यह प्रतीत हो रहा है कि आत्मा शरीर प्रमाण है ।

पर्यायार्थिक दृष्टि से अनित्यभूत आत्मा के प्रदेशों के संकोच विस्तार का समर्थन―अब यहाँ शंकाकार कहता है कि यदि यह जीव मिले हुये विभिन्न शरीरों के अनुसार अपने प्रदेशों का संकोच विस्तार करता है तो जीव अनित्य बन जायेगा । जैसे कि दीपक । उसके आकाश का संकोच विस्तार होता है―तो वह अनित्य होता है, इस शंका के उत्तर में समाधान यह है कि यह बात तो स्याद्वाद में इष्ट ही है पर्यायार्थिकनय की दृष्टि में आत्मा अनित्य है, हाँ द्रव्यार्थिकनय की दृष्टि से आत्मा नित्य है, दीपक की तरह । जैसे वही दीपक पुद्गल द्रव्य की दृष्टि से तो नित्य है, प्रदीप, प्रकाश पर्याय की दृष्टि से अनित्य है । प्रत्येक वस्तु नित्यानित्यात्मक होती है । जो भी सत् है वह नियम से नित्यानित्यात्मक होता है । चाहे उसकी अनित्य पर्यायें सूक्ष्म होने से विदित न हों, पर द्रव्य सदा रहता है और पर्यायें बदलती रहती हैं । यह पूर्व तथ्य है । यदि ऐसा न हो तो वह वस्तु ही न रहेगा ।

जीव के प्रदेशों के टूट जाने व अलग हो जाने की शंका और उसका समाधान―अब शंकाकार एक शंका और कर रहा है कि जीव के प्रदेश माने हैं और प्रदेश मानने के मायने यह हैं कि वह अवयव सहित है । और अभी यह बताया ही है कि वह अनित्य है । तो जो अवयव सहित होता और अनित्य होता है उसके अवयव फैलकर मिट जाते हैं घट की तरह । जैसे घट अवयव सहित है और विनाशीक है तो घट फूटकर खपरियाँ या छोटे-छोटे कण के रूप में उनके अवयवों का टूट जाना हो जाता है । इसके उत्तर में

आचार्यदेव कहते हैं कि यह शंका संगत नहीं है, क्योंकि इस मंतव्य का, हेतु का आकाश के साथ व्यभिचार होता है । आकाश भी तो अनंतप्रदेशी है, याने शंकाकार के शब्दों में अवयव सहित है और साथ ही द्रव्य होने के कारण क्षणभंगुर है―पर्याय दृष्टि से, मगर उसके अवयवों का तो टूटना नहीं होता है, पर्यायार्थिक दृष्टि से आकाश भी कथंचित् अनित्य है और अनंत प्रदेश होने से अवयवों सहित तो है ही मगर आकाश के अवयव तो टूटते फूटते हैं नहीं, इस कारण यह हेतु दूषित रहा कि जो अवयव सहित हो और विनाशीक हो उसके अवयव सब टूटकर खिर जाते हैं । तो जीव अखंड द्रव्य है । असंख्यात प्रदेशी है नित्य है और पर्यायदृष्टि से पर्यायें उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं अतएव अनित्य है, फिर भी जीव के प्रदेशों का कभी टूटना नहीं होता ।

आत्मा के अखंडत्व की सिद्धि―अब आत्मा के अखंड होने का एक अनुमान और सुनो, आत्मा के कुछ भी अवयव विशीर्ण नहीं होते, क्योंकि आत्मा के प्रदेश अकारणपूर्वक हैं जो कारणपूर्वक पिंड बनता हो, अवयव बनता हो उसके अवयव तो खिर सकते हैं मगर जो अनादि काल से बिना ही कारण अनेक प्रदेशी है उसके प्रदेश कभी खिरते नहीं हैं, घटपट, पुस्तक आदिक पदार्थ जो बिखरते देखे जा रहे हैं उनके वे अवयव अथवा स्कंध पिंड तो कारणपूर्वक हुये हैं । मिट्टी का लोंधा बनाया, उसको विधि से घड़ा बनाया तो घट जो अवयवी बना । वह कारणपूर्वक बना है, इस कारण उसके अवयव टूट जाते हैं । मगर आत्मा आकाश की तरह बहुप्रदेशी है । उसके प्रदेश कभी खिरते नहीं हैं अथवा वस्तुत: जीव के प्रदेश अवयव नहीं कहलाते, वस्तु होने के कारण प्रदेश तो कह सकते किंतु उन्हें अवयव नहीं कह सकते, क्योंकि अवयव शब्द का अर्थ है जो चारों ओर से मिले और खिरे उसे अवयव कहते हैं । अवयव शब्द में अब उपसर्ग है और यु धातु है जिसका अर्थ है मिश्रण और अमिश्रण । तो इस यु धातु से ञ्प प्रत्यय हो जाने पर अवयव शब्द बनता है । तो अवयव शब्द की व्युत्पत्ति के अनुसार जिसमें विश्लेषण हो वहां अवयव कहा करते हैं, पर आत्मा आकाश एक परमाणु इनमें अवयव नहीं कहा जा सकता और आत्मा आदिक में जो बहुत प्रदेश मानते हैं सो कहीं स्कंध की तरह मुख्य प्रदेश नहीं हैं, अवयव रूप नहीं हैं किंतु एक अखंड द्रव्य विस्तार में कितना बड़ा है उसके प्रदेशों की नाप से उसे परखा जाये तो जीव असंख्यात प्रदेशी सिद्ध होता है । आकाश अनंत प्रदेशी है, यह व्यवहार बनता है । जीव की अखंडता का साधक एक अनुमान यह भी है कि जीव के अवयवों का विसरण नहीं होता । क्योंकि जीव अविभागी द्रव्य है । जो अविभागी द्रव्य होते हैं उनके अवयवों का टूटना नहीं होता । जैसे आकाश आत्मा त्रिकाल में भी कभी विभाग को प्राप्त नहीं होता । अमूर्तपन होने के कारण यह भी एक अनुमान है कि आत्मा अमूर्त है और अमूर्त जितने भी द्रव्य हैं उनके जितने भी प्रदेश माने गये हैं उन प्रदेशों का विसरण नहीं होता । अत: आकाश के समान आत्मा के प्रदेशों का भी फटना, टूटना, फूटना आदिक प्रसंग स्याद्वादियों के यहाँ नहीं आ सकता है ।

आकाश और अन्य द्रव्यों के आधाराधेयपन का दिग्दर्शन―यहां तक यह सिद्ध हुआ कि धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, जीव आकाश ये बहुप्रदेशी हैं, तिस पर भी ये अखंड हैं, और इनका आधार लोकाकाश है । तो इसका अवगाह आवास लोकाकाश में है । यहाँ कोई शंका करता है कि आकाश और धर्म अधर्म जीवादिक का आधार आधेय संबंध घटित नहीं होता, क्योंकि वह सहभावी है । जैसे गाय के बायें दायें जो दो सींग हैं वे सहभावी हैं । और सहभावी होने के कारण वहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि बायें सींग का आधार दाहिने सींग या दाहिने या आधार बायां सींग है । इस अनुमान से जीव में और आकाश में आधार आधेयता सिद्ध नहीं हो सकती । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि यदि सहभावी होने के कारण उनमें आधार आधेयता नहीं मानी जाती तो नित्य जो गुण गुणी हैं उनके साथ दोष आता है । जैसे आकाश तो गुणी है और आकाश में रहने वाला परम महत्व गुण बताया गया है और हैं वे दोनों सहभावी । जब से आकाश है तब ही से वहाँ महत्त्व है किंतु उनका आधार आधेय विदित होता है । आकाश में परम महत्त्व है, और भी देखिये―आत्मा द्रव्य है, गुणी है और उसमें द्रव्यत्व वस्तुत्व आदिक नित्य गुण सदा ही रहे हैं तो जीव और जीव के गुण ये अनादि से सहभावी हैं, परंतु इनमें आधार आधेय भाव तो विदित हो रहा है इस कारण शंकाकार के द्वारा कहा गया सहभावीपन हेतु दूषित हो जाता है, याने ये जो सहभावी हैं उनमें आधार आधेयता नहीं होती, यह नियम नहीं बनता है । इस प्रकार सिद्ध हुआ कि जीव अखंड है । असंख्यात प्रदेशी है, और उसका लोकाकाश में अवगाह है । इस अनुमान प्रमाण से भी जीव के अवयवों का विसरण नहीं होता । वह अनुमान प्रमाण यह है कि जीव के अवयवों का विसरण नहीं हो सकता, क्योंकि यह अविभागी द्रव्य है, जो-जो अविभागी द्रव्य होते हैं उनके अवयवों का विसरण नहीं होता, जैसे आकाश परमाणु आदिक । आत्मा अविभागी द्रव्य है इसका कारण है कि यह अमूर्त हो रहा है । अमूर्त है आत्मा यह भलीभाँति सिद्ध है । इसमें रूप, रस गंध स्पर्श नहीं । ये तो केवल चेतनामात्र स्वरूप वाले अमूर्त पदार्थ है ।

द्रव्यों के अवगाह, आधार व आधेयपने की प्रसिद्धि―यहाँ तक यह सिद्ध हुआ कि धर्म, अधर्म, जीवादिक द्रव्यों का यथासंभव लोक के एकदेश में अथवा पूर्ण देश में अवगाह है । यहाँ धर्मादिक द्रव्य आधेय है और लोकाकाश आधार है, यह व्यवहारनय के आश्रय से समझना । निश्चयत: तो आकाश आकाश के आधार है, धर्मादिक द्रव्य अपने-अपने द्रव्य के आधार हैं । यहाँ एक शंका हुई थी कि आकाश और धर्मादिक द्रव्यों में आधार आधेय संबंध नहीं बन सकता । क्योंकि ये सहवर्ती हैं, जैसे कि बछड़े के बायें और दायें सींग । वे सहवर्ती हैं इस कारण उनमें परस्पर आधार आधेय नहीं है कि बायें सींग पर दाहिना सींग बैठा हो या दाहिने सींग पर बायां सींग बैठा हो, ऐसे ही जब अनादि काल से आकाश धर्मादिक द्रव्य एक साथ विद्यमान हैं फिर किसको आधार और किसको आधेय कहा जा सकता है? आधार और आधेय का पता तो वहाँ चलता है जहाँ आधार तो पहले रह रहा हो और आधेय बाद में आकर उस आधार में बैठ जाये । ऐसा इन द्रव्यों के संबंध में है नहीं इस कारण आधार आधेय संबंध ठीक नहीं है । इसके समाधान में बताया कि शंकाकार का उक्त कहना इस कारण ठीक नहीं बैठता कि आत्मा और ज्ञान ये दोनों सहभावी हैं, फिर भी इनमें आधार आधेय विदित होता है । आकाश और उसका महत्त्व गुण ये दोनों सहभावी हैं फिर भी इनमें आधार आधेय भाव देखा जा रहा है तो ऐसे ही जीव और धर्मादिक द्रव्य सहभावी हैं फिर भी इनमें आधार आधेय भाव सिद्ध होता है । यह सब व्यवहारनय की दृष्टि से समझना है ।

युतसिद्ध, समवेत, असमवेत, सहभावी पदार्थों में भी आधार आधेयपन की सिद्धि―अब यहाँ शंकाकार कहता है कि चूंकि आकाश धर्मादिक द्रव्य ये युतसिद्ध पदार्थ हैं अर्थात पृथक-पृथक हैं इस कारण इनमें आधार आधेय नहीं बन सकता । जैसे कि अनेक कालद्रव्य । कालद्रव्य असंख्यात हैं और वे एक के पास एक धरे हुए अवस्थित हैं इस कारण वहाँ यह कल्पना नहीं बनती कि इस काल द्रव्य पर अमुक काल द्रव्य बैठा है । ऐसे ही चूंकि धर्म अधर्मादिक द्रव्य ये सब भिन्न-भिन्न द्रव्य हैं, आकाश भी भिन्न द्रव्य है इस कारण आकाश आधार है और यह पदार्थ आधेय है । यह बात नहीं बन सकती । समाधान में कहते हैं कि शंकाकार का उक्त कथन ठीक नहीं है । क्योंकि आघार आधेय भाव का परिचय तो भलीभांति भिन्न-भिन्न द्रव्यों में ही होता है । जैसे बर्तन अलग है, दही अलग है तो यहाँ आधार आधेय विदित हो जाता है कि बर्तन में दही है । गेहूं अलग हैं, बोरा अलग है, बोरे में गेहूं भरने पर आधार आधेय भाव स्पष्ट विदित है । बोरे में गेहूँ हैं । तो जो हेतु दिया है वही हेतु साध्य से विरुद्ध बात को सिद्ध करता है । साधारण शरीर ही जिसका है ऐसे जीवों में भी परस्पर आधार आधेयपना विदित होता है अथवा घोड़े पर मनुष्य बैठा है । घोड़ा जुदी चीज है, मनुष्य जुदी चीज है और वहाँ जुदी दोनों चीजों में आधार आधेय भलीभांति विदित हो रहा है इस कारण युतपने का हेतु देकर आकाश और धर्मादिक धर्मों में आधार आधेय का खंडन करना संगत नहीं है । अब शंकाकार पुन: कह रहा हे कि धर्मादिक द्रव्यों आधार का लोकाकाश नहीं है । क्योंकि सर्वदा समवाय संबंध से सहित नहीं हो रहे ये पदार्थ सदा एक साथ रहते हैं । यहाँ हेतु में दो बातें एक साथ कही गई हैं कि जो पदार्थ समवाय संबंध से न रहे और सदा रहें उनमें आधार आधेय भाव नहीं बनता है । जैसे घोड़े पर पुरुष बैठा है, यहाँ आधार आधेय भाव इस कारण बन रहा कि घोड़े का मनुष्य के साथ समवाय संबंध नहीं है और फिर सहभाव है । समाधान―शंकाकार का यह हेतु देना युक्ति संगत नहीं है । देखिये जो पदार्थ जिस आधार में आधेय हो रहे हैं, वै सभी पदार्थ जिस आधार में सदा समवाय संबंध से रह रहे हों और सहभाव रखने वाले न हों ऐसा कोई नियम नहीं है । आकाश आत्मा आदिक अधिकरणों में महत्त्व संख्या गुण आधेय हो रहे हैं और उनमें ये गुण सदा समवाय संबंध से रह रहे हैं तो ऐसा सदा समवाय की सिद्धि होते हुए भी वहाँ आधार आधेय भाव नहीं होता, ऐसा प्रतीत नहीं होता । सहभाव है और आधार आधेय है । और जैसे मटके में बेर यहाँ एक साथ रह रहे हैं, यों सहभाव तो देख रहे हैं पर मटके में बेर का सदा समवाय से न रहते हुए जो सहभावी हों उनमें आधार आधेय नहीं होता । यह कहना संगत न बन सका और साथ ही इसमें व्यभिचार दोष भी आता है । और पुद्गल इन दोनों में ही बात देख लीजिए । आकाश और पुद्गल का सदा समवाय संबंध है ही नहीं और सहभाव पाया जा रहा है और आधार आधेय भाव का अभाव नहीं है याने आकाश आधार है और पुद्गल आधेय है । ऐसी ही सब लोगों को प्रतीति हो रही है । ये दिखने वाले पुद्गल के बड़े-बड़े स्कंध आकाश में हैं ऐसा सबको ज्ञात हो रहा है । तो आकाश का और इस पुद्गल का समवाय बताया नहीं है । सहभावपना है फिर भी आधार आधेयभाव का अभाव नहीं है । यहाँ शंकाकार कहता है कि हम आकाश और पुद्गल को भी अपने पक्ष कोटि में रख लेंगे तो उसमें भी आधार आधेय भाव नहीं है यह सिद्ध मानेंगे इसलिए कोई दोष नहीं आएगा याने आकाश और पुद्गल में, हेतु भी हो गया कि सदा समवाय नहीं, पर ये सहभावी है । सो इसमें साध्य भी मान लिया जावे कि आकाश और पुद्गल में आधार आधेय भाव नहीं है । इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि यह हेतु बाधित है क्योंकि आकाश और पुद्गल द्रव्य का आधार आधेयपना छोटे-छोटे बालकों तक को भी प्रतीत हो रहा है । कुछ विचारशील पुरुष आकाश और पुद्गल को आधार आधेय से अलग कर देते हैं । यहाँ यह भी शंका न करना कि घट पट आदिक पदार्थ जो आकाश में दिख रहे हैं सो वे अब पुद्गल की पर्याय हैं । हम पुद्गल द्रव्य की बात कह रहे हैं कि द्रव्य का आकाश में आधार आधेयभाव नहीं है । समाधान में कहते हैं कि पर्याय द्रव्य से कथंचित अभिन्न है । पर्याय द्रव्य के प्रदेशों से दूर नहीं होती इसलिये उनमें सर्वथा भेद नहीं है । तो जब आकाश में घट पट आदिक पुद्गल पर्यायें मान रहे हों तो चूंकि पर्याय पुद्गल द्रव्य से सर्वथा भिन्न नहीं है इस कारण पुद्गल ही आधेय कहलाया, इस प्रकार यह भलीभांति कथन सिद्ध है कि लोकाकाश और धर्मादिक द्रव्यों का परस्पर आधार आधेय भाव व्यवहारनय के आश्रय से जान लेना चाहिये ।

निश्चयनय से एक द्रव्य का अन्य द्रव्य में आधार आधेयपने का अभाव―निश्चयनय की दृष्टि से किसी भी द्रव्य में परस्पर आधार आधेयभाव नहीं है क्योंकि सब अपने-अपने स्वरूप से अवस्थित होते हैं । यदि कोई द्रव्य किसी अन्य द्रव्य में स्थित हो जाये । निश्चयत: आधेय बन आये तो स्वरूप संकर का दोष लगेगा अर्थात फिर दोनों का स्वरूप मिश्रित कुछ विचित्र हो जायेगा । सो निश्चयनय से आधार आधेय भाव नहीं है और एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य के साथ आश्रय आश्रयी भाव भी नहीं है । जो पदार्थ स्वयं अपनी स्थिति रखने के स्वभाव को धारण किये हुये हैं उसको अन्य पदार्थ द्वारा स्थिति रखने की बात सोचना व्यर्थ है क्योंकि कोई भी पयार्य अपनी सत्ता रखने किसी भी अन्य द्रव्य की अपेक्षा नहीं रखता । और जो पदार्थ स्वयं अपना सत्त्व रखे हैं उसका सत्त्व दूसरे में नहीं पहुंच सकता । अब यहाँ व्यवहारनय का पक्ष रखने वाले यदि ऐसा कहें कि जो पदार्थ स्वयं स्थिति होने के स्वभाव वाला है उस ही पदार्थ की अन्य अधिकरण द्वारा प्रकटरूप से स्थिति कर दी जाती है याने आधार आधेय भाव जिसका प्रकट नहीं है तो पर्याय रूप से उनका प्रकट कर दिया जाता है अर्थात अप्रकट रूप से तो पदार्थ स्वयं स्थितिशील है, अपने आपमें ही रहता है, पर प्रकट रूप से वह अन्य आश्रय से आधार आधेय भावरूप धारण करता है । तो इस शंका के समाधान में यह दृष्टव्य है कि शक्ति रूप से स्थित पदार्थ को जो कि दृश्यरूप प्रकट स्वरूप सत्त्व कर दिया जाता है तो क्या वह अधिकरण प्रकट स्थिति स्वभाव वाले की प्रकट सत्ता बनाता है या प्रकट सत्ता स्वभाव से रहित पदार्थ की सत्ता बनाता है? अगर कहो कि प्रकटरूप से भी स्वरूप सत्त्व की स्थिति है, ऐसा स्वभाव है पदार्थ का तो फिर अन्य का आधार आधेय बताना व्यर्थ है । यदि कहो कि पदार्थ में प्रकट सत्ता का स्वभाव नहीं है तो वह कभी किया भी नहीं जा सकता । यहाँ बात यह सिद्ध की जा रही है कि व्यवहारनय से तो एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य के साथ आधार आधेय आदिक संबंध देखा जाता है किंतु निश्चयनय से प्रत्येक पदार्थ का सत्त्व स्वयंसिद्ध है, इस कारण उनमें आधार आधेय भाव नहीं बनता । सो जो शंकाकार ने शक्ति और व्यक्ति से स्थिति स्वभाव का भेद करके आधार आधेयपन की बात ला दी है सो वह निश्चयनय की दृष्टि में संगत नहीं होती । अब शंकाकार उसी शंका का संबंध लेकर एक प्रसंग दोष दे रहा है कि स्थितिशील पदार्थ का अन्य पदार्थ के द्वारा नवीन स्थिति नहीं मानी जाती तब तो किसी पदार्थ का उत्पाद विनाश भी किसी प्रकार न बन सकेगा । क्योंकि यहाँ भी प्रश्न किया जा सकता है कि क्या उत्पन्न स्वभाव वाले पदार्थ का उत्पन्न स्वभाव को न रखने वाले पदार्थ को किसी उत्पादक कारण द्वारा उत्पन्न माना जायेगा? तो जो-जो दोष पदार्थों की स्थिति के संबंध में दिये गये हैं वे सभी दोष दोनों पक्ष में आते हैं । कहा जा सकता है कि पदार्थ में यदि उत्पन्न होने का स्वभाव पड़ा है तो उत्पादक कारण द्वारा क्या किया जायेगा? यदि उत्पाद स्वभाव रहित को उत्पादक कारण उत्पन्न करें यह माना जाये तो कितने ही कारण मिल जायें तो भी उत्पत्ति नहीं हो सकती । ऐसे शंकाकर द्वारा दोष दिया जाना बिल्कुल व्यर्थ है, क्योंकि निश्चयनय से सभी पदार्थों का स्वभाव से ही उत्पाद व्यय और ध्रौव्य की व्यवस्था है । व्यवहार नय की दृष्टि से ही पर्याय का उत्पाद व्यय देखा गया है और उन्हें सहेतुक माना गया है कि पदार्थ का उत्पाद व्यय किसी हेतु के द्वारा हुआ करता है तो ऐसे ही यहाँ भी मान लेना चाहिए कि समस्त पदार्थों का स्वरूप सत् अपने आप है और इस कारण निश्चयनय । द्रव्यों का परस्पर आधार आधेय भाव नहीं है किंतु व्यवहारनय से यह सब देखा जा रहा है कि आकाश में घट, पट आदिक का अवगाह है । आधार आधेय भाव व्यवहारनय से परखा जाता है ।

निरंशवादियों की आधाराधेयपन की असिद्धि की शंका और उसका समाधान―अब यहाँ निरंशवादी दार्शनिक शंका करता है कि पदार्थ तो केवल एक समय में जो है सों ही है । यह दूसरे समय में नहीं ठहरता इसलिए उनके आधार आधेय भाव की कल्पना करना व्यर्थ है । शंका का उत्तर यह है कि यदि पदार्थ क्षणक्षय एकांत मान लिया जाये, अर्थात प्रत्येक पदार्थ एक समय को ही रहता है । दूसरे समय में पदार्थ का अभाव हो जाता है । ऐसी हठ करने पर तो पदार्थ का सर्वथा अभाव ही हो जायेगा । कोई भी पदार्थ केवल एक क्षण रहता हो और उसका सत्त्व मूलत: नष्ट हो जाता हो, ऐसा है ही नहीं और फिर क्षणक्षय के एकांत में उत्पाद व्यय ध्रौव्य का अभाव हो जायेगा । जैसे कि जो लोग पदार्थ को सर्वथा नित्य मानते हैं उनके मत में पदार्थ का उत्पाद व्यय संभव नहीं है । कूटस्थ नित्य का उत्पाद और विनाश नहीं होता । यह क्षणिकवादी भले प्रकार मानते हैं और जब उत्पाद विनाश नहीं है तो उसकी धारा में पदार्थ सदा रहे सो ध्रौव्य कहलाता सो ऐसा ध्रौव्य क्षणिकवाद में नहीं बनता । और ऐसे ही क्षणिक एकांतवाद में भी किसकी उत्पत्ति है? जब पदार्थ एक क्षणवर्ती है तो उनका कोई उपादान कारण ही नहीं बन सकता याने पदार्थ किसके उपादेय स्वरूप से परिणमे? जैसे यहाँ देखा जाता है कि घड़े का उपादान कारण मिट्टी है तो घड़ा मिट्टी की ही अवस्थारूप से परिणमता है । अब क्षणिकवाद में उपादान कारण तो कुछ रहा ही नहीं तो वह किस रूप परिणमे और किससे किसका विनाश हो सके? पूर्व आकार का परित्याग करने उत्तर आकार को ग्रहण करने में उत्पाद व्यय सिद्ध होता है सो क्षणिकवाद में उत्पाद व्यय तो बन सका, तो यों ध्रौव्य भी नही बन सकता । ध्रौव्य भी पर्याय अंश है । हाँ जो पदार्थ कालांतर में रह रहे हैं उनके उत्पाद व्यय ध्रौव्य तीनों घटित हो सकते हैं । शंकाकार यदि यह मंतव्य रखे कि हम उत्पत्ति केवल कल्पना से मानते हैं । विनाश तो बिना कारण के हो जाता है । ऐसा पदार्थ का स्वरूप है । पर उसकी उत्पत्ति कारणों की अपेक्षा रखती है किंतु वह सब सम्वृत्ति से है, व्यवहार से है, कल्पना से है । यहाँ समाधान में कहते हैं कि उन क्षणिकवादी दार्शनिकों की अपनी मनमानी कथनी है । जैसी रुचि हुई वैसा वहां कथन हो जाता है । यदि व्यवहारनय से उत्पत्ति का कारण मान लिया जाता है तो स्थिति और विनाश का भी कारणों से ही स्वरूप मानना पड़ेगा । परमार्थत: यदि विनाश और स्थिति को अहेतुक मान रहे हो तो उत्पाद को भी अहेतुक मानना पड़ेगा । इस कारण कल्पनाओं का व्यायाम मिटाकर पदार्थों में जो सीधी बात पायी जाती है उस प्रकार मानना चाहिये । प्रत्येक पदार्थ अनादि से अनंत काल तक है, और प्रति समय परिणमता रहता है । परिणमन की दृष्टि से उनमें उत्पाद व्यय विदित होता है और उत्पाद व्यय करते हुए सभी पदार्थ सदा काल सत्त्व रखते हैं यों पदार्थ का स्वरूप ही उत्पाद व्यय धौव्य युक्त है । सो जब सभी पदार्थ स्वरूप से सिद्ध हैं तो निश्चय से उन पदार्थों में आधार आधेय भाव नहीं हो सकता । इसी तरह निश्चयनय की दृष्टि में कार्य कारण भाव भी घटित नहीं होता । और इतना ही क्यों? गुरु शिष्यभाव, जन्यजनक भाव आदि ये भी निश्चयनय में नहीं हैं । सभी ये संबंध व्यवहारनय के अनुसार हैं । सो व्यवहारनय की दृष्टि से आकाश और अधर्म आदिक द्रव्यों में आधार आधेय भाव है । निश्चय से नहीं है । इस प्रकार इस प्रकरण तक द्रव्य का स्वरूप, द्रव्य के प्रदेश और द्रव्य का अवगाह भलीभांति सिद्ध किया गया है । इन सब परिचयों से अपने आत्मा के स्वरूप की स्थिति जानना यह सब कथनों का प्रयोजन है ।

अनेक गुणों से समान एकत्र अवस्थित पदार्थों में अभेद की आशंका और उसका समाधान करके सूत्रों द्वारा लक्षण भेद की प्रसिद्धि का प्रयास―यहाँ एक शंका होती है कि जहाँ धर्मद्रव्य है वहीं अधर्मद्रव्य है, आकाश है, अन्य पदार्थ भी हैं, उनका देश एक है । आकार भी धर्म अधर्म का एक है, समय भी एक है । तो इन सब बातों के कारण उनमें नानापन न होना चाहिये, अर्थात् वह सब एक ही वस्तु होनी चाहिये । समाधान यह है कि चूंकि इन सबका देश, संस्थान काल आदिक एक समान है इसी कारण ये नाना कहे जाते हैं, जिनकी आपस में समानता हो वे पदार्थ एक नहीं कहे जाते, किंतु वे न्यारे-न्यारे हैं । जैसे गेहूं का ढेर हो तो वे सब दाने एक समान हैं । इस ही कारण से वे नाना कहलाते हैं । इसी प्रकार धर्मादिक द्रव्य ये भिन्न-भिन्न सत्ता रखने वाले हैं और उनके प्रदेश आदिक भी अपने-अपने कहलाते हैं । अब यहाँ एक जिज्ञासा होती है कि ये सब जब एक ही जगह विराजे हैं और उनमें जैसे घटपट आदिक पदार्थ हैं वे भिन्न-भिन्न देखे जाते हैं, सो नानापन सही है पर धर्मादिक द्रव्यों में कुछ भी विशेषता को लाने वाला कुछ समझ में नहीं आता । तो अब इन शंकाओं को दूर करने के लिये पदार्थों का लक्षण कहा जायेगा और यह लक्षण व्यावहारिक ढंग से कहा जायेगा जिसका कि अनुमान प्रमाण से भी यह सिद्धि चलेगी कि हाँ यह पदार्थ है, तो सर्वप्रथम धर्म और अधर्म द्रव्य का लक्षण जाहिर करने के लिये सूत्र कहते हैं ।


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