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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 25

From जैनकोष



अभावमात्रं परमार्थवृत्ते: सा संवृति: सर्व विशेषशून्या ।

तस्या विशेषौ किल बंधमोक्षौ हेत्वामनेति त्वदनाथवाक्यम् ।।25।।

(94) निरन्वय क्षणिक अर्थ व विज्ञानाद्वैत से बढ़कर शून्याद्वैत के मंतव्य का प्रयास―अब शून्याद्वैतवादी कह रहे हैं कि परमार्थदृष्टि से देखा जाये तो तत्त्व अभावमात्र ही है । इस प्रसंग में दो मत क्षणिकवादियों के अभी आये थे―एक सौत्रान्विक मत और दूसरा संवेदनाद्वैतवाद । प्रथम मत ने तो यह सिद्ध किया था कि बाह्य तत्त्व भी हैं, अंतरंग तत्त्व भी हैं, किंतु वे सभी तत्त्व निरन्वय हैं, क्षण-क्षण में उत्पन्न होते और नष्ट होते हैं । उनके किसी पूर्व से या किसी उत्तर से कोई संबंध नहीं रहता । इस मत में पदार्थ तो सब तरह के माने गए, मगर क्षणिक निरन्वय अबद्ध माने गए हैं । सो इस मत के निराकरण में बहुत कुछ वर्णन किया गया । दूसरा मंतव्य है ज्ञानाद्वैत का । इनके सिद्धांत से बाह्य पदार्थ कुछ भी नहीं हैं, न परमाणु हैं, न रूपक्षण आदिक हैं, किंतु अंतरंग एक ज्ञानक्षण ही है, जिसका दूसरा नाम चित्तक्षण अथवा कहो जीव । मगर वह जीव ज्ञानमात्र है और क्षण-क्षण में नया-नया होता है, निरंश है, उस ज्ञान को छोड़कर अन्य कोई तत्त्व नहीं है । इस मंतव्य के निराकरण ने भी बहुत कुछ प्रकाश डाला गया है । अब तीसरा सिद्धांत आया है माध्यमिक सिद्धांत ꠰

(95) शुन्याद्वैतवाद का मंतव्य―माध्यमिक मत की मान्यता है कि परमार्थ-वृत्ति से देखा जाये तो शून्य ही तत्त्व है, न चित्तक्षण तत्त्व है, न बाह्यपदार्थ तत्त्व है; ऐसे प्रथम मंतव्य के तो बाह्य और अंतरंग दोनों तत्त्व माने गए हैं । दूसरे मत में केवल अंतरंग तत्त्व ही माना गया था । अब इस तीसरे मत में न बाह्य तत्त्व माने जा रहे और न अंतरंग तत्त्व माना जा रहा, किंतु शून्यमात्र ही तत्त्व माना जा रहा और इस माध्यमिक का कहना है कि परमार्थ-वृत्ति से शून्य तत्त्व तो है, मगर वह परमार्थ-वृत्ति संवृत्तिरूप है, कल्पनामात्र है या व्यवहारमात्र है । वास्तविक नहीं है, क्योंकि शून्य का संवेदन तो हुआ, मगर शून्य का संवेदन कल्पना से ही माना जाये तो शून्य तत्त्व ठहरता है । अगर शून्य का संवेदन तात्त्विक हो जाये, परमार्थत: हो जाये तो सर्वथा शून्य तत्त्व नहीं ठहरता, फिर सर्वथा शून्य का निषेध हो जाता है, तो बात प्रारंभ से यह है कि तत्त्व है शून्य मात्र और वह परमार्थ-वृत्ति से है, तथा परमार्थ-वृत्ति केवल काल्पनिक है और यह कल्पना सर्व विशेषों से शून्य है याने जिस कल्पना से परमार्थतत्त्व समझा गया वह कल्पना समस्त विशेषों से रहित है याने पदार्थ का सद्भाव जिन-जिन दार्शनिकों ने माना उन-उन दार्शनिकों ने जो-जो तत्त्व विशेष माना है वह कुछ भी नहीं है शून्यवाद में, शून्याद्वैतवादी कह रहे हैं कि वह संवृति याने कल्पना अविद्यात्मक है और समस्त वास्तविक विशेषों से रहित है, ऐसी कल्पना में भी जो बंध और मोक्ष होते हैं याने इन विशेषों की कल्पना की है वह वास्तविक नहीं किंतु कल्पना में है, जिन्हें हेत्वात्मक कहते हैं । तो जब यह जीव यह भी एक कल्पना का विषय है । जब यह तत्त्व अपना अभिप्राय बनाता है―मैं हूँ, आत्मा हूँ, इस तरह का जब अभिप्राय बनाता है तो उससे बंध हुआ करता है और जब मैं कुछ नहीं हूँ, शून्य हूँ, ऐसी भावना का अभ्यास करता है तो इसका मोक्ष होता है । तो अब यहाँ देखिये कि बंध की जो हेतुरूप भावना कही और मोक्ष के हेतुरूप जो भावना कही―ये दोनों ही तात्त्विक नहीं हैं, और जब तात्त्विक नहीं हैं तो दोनों का परस्पर में विरोध भी नहीं है ꠰ विरोध तो उनके हुआ करता है कि जो वास्तव में सद᳭भूत हैं ।

(96) शून्याद्वैतवाद के मंतव्य की असंगतता―उक्त प्रकार से शून्याद्वैतवाद में भी जो कुछ निरखा जा रहा है वह सब युक्तिसंगत नहीं है । हे प्रभु ! आप जिनके नाथ नहीं हैं याने अनेकांतवाद का जिनके आदर नहीं है उनकी ही ऐसी विडंबनापूर्ण वाणी चलती है और जिनके आप नाथ हैं याने अनेकांतवाद शासन का जिन्होंने सहारा लिया है वे स्पष्ट समझते हैं कि स्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव की अपेक्षा से जो सत्रूप पदार्थ है वही पदार्थ परद्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव की अपेक्षा से असत् है, अभावरूप है; न कि जैसे परभाव से असत् है, ऐसे ही स्वभाव से भी असत् हो जाये । ऐसा सर्वथा शून्य तत्त्व से पारमार्थिकपना नहीं प्राप्त हो सकता, इस कारण परमार्थवृत्ति से अभावमात्र तत्त्व है यह कहना असंगत है ।


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