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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 26

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व्यतीत-सामान्य-विशेष-भावाद् विश्वाऽभिलापाऽर्थ-विकल्प-शून्यम् ।

ख पुष्पवत्स्वादसदेव तत्त्वं प्रबुद्धतत्त्वाद्भवत: परेषाम् ।।26।।

(97) शून्याद्वैतवाद में सामान, विशेष, निरपेक्ष सामान्यविशेष सभी की अमान्यता―यहाँ तक पृथक्-पृथक् एकांतवादों का मंतव्य बताते हुए उनमें आपत्ति दिखाई गई थी । अब उपसंहाररूप हुए वक्तव्य में कहा जा रहा है कि हे प्रभो ! आपसे भिन्न पुरुषों का जो वक्तव्य है उसमें कोई शिष्य नहीं है और इस कारण से वे सब आकाश-फूल के समान अवस्तु ही हैं । क्योंकि सभी मत वाले इन्हीं दो-तीन बातों के चक्र में ही अपनी मंतव्य दिशा खो बैठे हैं । कोई सर्वथा सामान्यभाव से रहितमात्र विशेष को ही तत्त्व मानता है तो कोई सर्वथा विशेषभाव से रहित तत्त्व को ही वास्तविक मानता है, तो कोई परस्पर सापेक्षरूप सामान्यविशेष दोनों से रहित को तत्त्व मानता है । तो कोई मानता दोनों को ही तत्त्व है, मगर निरपेक्षरूप से मानता है । इसका निष्कर्ष यह निकला कि कोई एकांतवादी सिर्फ सामान्य को ही तत्त्व कहता है, कोई दार्शनिक मात्र विशेष को ही तत्त्व कहता है तो कोई दार्शनिक सामान्यविशेष दोनों से रहित को तत्त्व कहता है तो कोई दार्शनिक परस्पर निरपेक्ष कभी सामान्य को, कभी विशेष को तत्त्व कहने लगता है । उसका यहाँ प्रकरण चल रहा है । शून्याद्वैत का, जो न सामान्य मानते हैं, न विशेष मानते हैं, निरपेक्ष और सापेक्ष की बात अत्यंत दूर है ।

(98) सामान्यविशेषरहित शून्याद्वैत तत्त्व की असिद्धि―जो सामान्यविशेष दोनों से रहित कोई शून्य ही तत्त्व हैं, ऐसा मानते हैं उनकी यह मान्यता किसी प्रकार सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि उसमें वे अर्थ विकल्प कुछ मानते या नहीं मानते? नहीं मानते तो निर्णय क्या और मानते हैं तो शून्य कहां रहा? ऐसे ही उस शून्य तत्त्व को शब्दों द्वारा सिद्ध करते हैं या नहीं? अगर नहीं करते हैं तो शून्य भी कैसे समझा जाये और अगर करते तो फिर शून्य रहा कहाँ? तो समस्त शब्दों से शून्य है वह तत्त्व और समस्त अर्थ-विकल्पों से शून्य है वह तत्त्व । तो वह आकाश-पुष्प के समान अवस्तु ही कहलायेगी । वास्तविकता यह है कि सामान्य और विशेष का परस्पर में अविनाभाव संबंध है, सामान्य के बिना विशेष का अस्तित्व नहीं रह सकता और विशेष के बिना सामान्य का अस्तित्व नहीं बन सकता । जैसे मनुष्य सामान्य और बच्चा, जवान, बूढ़ा आदि विशेष । यदि मनुष्य सामान्य नहीं है तो बच्चा, जवान, बूढ़ा आदि विशेष कहाँ विराजेंगे? और यदि बच्चा, जवान, बूढ़ा आदिक कोई अवस्था ही नहीं है तो ऐसा मनुष्य सामान्य किसने देखा? तो सामान्य रूप का परस्पर में अविनाभाव संबंध है ।

(99) मात्र विशेषवाद, मात्र सामान्यवाद व द्वयरहितशून्यवाद तीनों की सिद्धि की असंभवता―

जो भेदवादी बौद्ध सामान्य को नहीं मानते और विशेष को ही मानते याने पदार्थ में परस्पर व्यावृति है, पर समानता नहीं, यह इसमें अलग है, यह इससे अलग है, बस यह ही भर निरखता जाये, पर कोई किसी के समान है यह निरखने की गुंजाइश इस भेदवाद में नहीं रखी गई, तो उनके यही वह विशेष पदार्थ भी सिद्ध नहीं हो सकता । जब समानता नहीं है तो विशेष भी सिद्ध न होगा । सामान्य से विशेष क्या सर्वथा भिन्न है? सर्वथा भिन्न तो है नहीं । तो सामान्य न रहे तो विशेष भी कहाँ रहेगा? फिर तो तत्त्व नीरूप मिलेगा याने उसका कुछ ठिकाना ही नहीं है, कोई मुद्रा ही नहीं रहती । यों तो केवल विशेष को हो मानने वाले भेदवादी बौद्धों की गति नहीं है और जो केवल सामान्य को ही मानते हैं; ऐसे अभेदवादी सांख्य, उनके भी सामान्य तत्त्व की सिद्धि नहीं हो सकती । ये सामान्यवादी कहते हैं कि तत्त्व तो एक सामान्य प्रकृति है, विशेष कोई तत्त्व ही नहीं है । तो वे ही स्वयं बतलाये कि अहंकार, इंद्रिय, भौतिक पदार्थ ये सब विशेष कहां से आ गए? और खुद इन सांख्य जनों ने इन विशेषों को माना है तो सामान्य के बिना विशेष नहीं बन सकता और विशेष के बिना सामान्य नहीं बन सकता । इसलिए केवल सामान्य मानने वाले भी मिथ्या कहते हैं और केवल विशेष मानने वाले भी मिथ्या कथनी करते हैं, फिर जो इन दोनों को ही नहीं मानते उन शून्यवादियों की तो कहानी ही क्या कहना?

(100) सामान्य के एकांत में सर्व शून्यता की आपत्ति―जो एक सामान्य को ही तत्त्व मानते हैं वे अभेदवादी हैं याने उन्होंने विशेष तो कुछ माना ही नहीं है जिससे कि एक वस्तु से दूसरी वस्तु में भेद स्वीकार करते । तो ऐसे जो अभेदवादी दार्शनिक हैं वे सामान्य को ही एक प्रधान मानते हैं, और बतलाते हैं कि भले ही महान् अहंकार आदिक विशेष होते हैं, पर उनका पृथक् अस्तित्व नहीं, वे सामान्य के बिना नहीं होते, ये अवक्तव्य के ही व्यक्त रूप हैं । तो इस तरह उस प्रधान में सामान्य में समस्त विशेषों का अभाव माना है । लेकिन उनका यह मंतव्य इस तरह सिद्ध नहीं होता कि यदि समस्त विशेषों का अभाव माना जाये तो सामान्य तो विशेष का ही अविनाभावी है, जैसे कि महान् अहंकार आदिक विशेष न माने जाये तो प्रधान का क्या अस्तित्व रहा? तो विशेष का अभाव मानने पर सामान्य का अभाव बन बैठता है और जब न विशेष रहा, न सामान्य रहा तो कोई पदार्थ भोग्य रहा ही नही तो भोक्ता आत्मा भी नहीं सिद्ध होता । सांख्य सिद्धांत में भोक्ता तो चेतन है और भोग्य प्रधान है सो जब भोग्य की ही सिद्धि नही है तो भोक्ता कहा से ठहरेगा? तो भले ही ये सामान्यवादी न चाहें कि हमारे सामान्य का भी अभाव हो जाये सो न चाहते हुए भी सर्व क्षण की आपत्ति इन सामान्यवादियों की आती है । यदि ये सामान्यवादी यह कहें कि प्रधान के जो दो रूप हैं―व्यक्तरूप और अव्यक्तरूप, इनमें कथंचित भेद है, तो ऐसा मानने पर स्याद्वाद न्याय का ही अनुसरण हुआ और फिर केवल सामान्यमात्र ही तत्त्व है यह वचन उनका असंगत हो गया । तो इस प्रकार हे वीर जिनेंद्र ! आपके शासन से बहिर्भूत होकर दार्शनिक अपना ही अस्तित्व खो देते हैं ।

(101) सामांयैकांत व विशेषैकांत के असंगत होने की तरह निरपेक्षोभयैकांत व अनुभयैकांत को असंगतता―जैसे न केवल विशेष तत्त्व रहा और न केवल सामान्य तत्त्व रहा, इसी प्रकार निरपेक्ष सामान्य-विशेष भी तत्त्व नहीं हैं । हैं ऐसे दार्शनिक जो कुछ को सामान्य और कुछ को विशेष मानते हैं, पर एक ही वस्तु में सापेक्ष सामान्यविशेष नहीं मानते हैं । जैसे परमाणु दो प्रकार के माने हैं―(1) कारण-परमाणु और (2) कार्यपरमाणु और इनको भिन्न-भिन्न मानते हैं तो ऐसे ही सामान्य अणु, विशेष अणु । ऐसे भिन्न-भिन्न मानते हैं । उनकी परस्पर में कोई अपेक्षा नहीं है, लेकिन यह मंतव्य भी सही नहीं है । लो, इन्होंने जो सामान्यविशेष दोनों का उल्लंघन कर दिया । किसी भी एकवस्तु को सामान्यविशेषात्मक नहीं माना यों ही जो सामान्यविशेषरहित शून्य तत्त्व मानें वे भी जिनशासन से बहिर्भूत हैं और उनका भी वह तत्त्व शब्द और अर्थ विकल्प से शून्य है निरपेक्ष सामान्यविशेष तथा सामान्यविशेषरहित तत्त्व ही जब कुछ नहीं तो इसका वाचक शब्द कही से आये? और अर्थ ही जब कुछ नहीं तो इसका जाननहार विकल्प भी कहां से बने? तो निरपेक्ष सामान्यविशेषवाद तथा अनुभयवाद में आकाशपुष्प की तरह अवस्तु ठहरती है । तो जैसे शून्यवाद का तत्त्व अवस्तु है । केवल सामान्यवाद अवस्तु है केवल विशेषवाद अवस्तु है, उस ही प्रकार निरपेक्ष सामान्यविशेषवादियों का तत्त्व भी अवस्तु है ।


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