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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 62

From जैनकोष



कामं द्विषन्नप्युपपत्तिचक्षु:

समीक्ष्यतां ते समदृष्टिरिष्टम् ।

त्वयि ध्रुवं खंडित मानशृंगो,

भवत्यभद्रोपि समंतभद्रः ।।62।।

(210) आत्महित की अंतर में भावना होने पर स्याद्वादशासन का शरणग्रहण की अनिवार्यता―जो पुरुष स्याद्वादशासन से द्वेष रखते हैं वे कितना ही द्वेष रखते हों, किंतु यदि उनमें कुछ भी आत्महित की भावना हो अर्थात् मात्सर्य का त्याग करके युक्तिसंगत समाधान की भावना हो तो वह गर्वरहित होकर इस स्याद्वादशासन की शरण ही गहेंगे । एक कथानक है विद्यानंदि स्वामी का जो कि अब से करीब 700-800 वर्ष पहले हुए थे, वे जैनशासन के तीव्र विरोधी थे, और यहाँ तक विरोध था कि मार्ग में एक पार्श्वनाथ चैत्यालय मिलता था तो उसकी ओर पीठ करके वह चला करते थे । राजदरबार में पुरोहित थे । रास्ते में रोज ही वह जिनमंदिर मिलता था और रोज ही उसकी ओर पीठ करके चला करते थे । एक दिन उन्होंने अपने मन में विचार किया कि आखिर जिससे हम घृणा करते हैं, क्या चीज है वहां, कुछ देखना तो चाहिए । वह मंदिर के अंदर गए तो क्या देखा कि वहाँ एक मुनिराज बैठे थे, वह देवागम स्तोत्र का पाठ कर रहे थे । विद्यानंदिजी ने उस पाठ को सुना और उसको सुनकर उनकी कुछ आंख खुली । आखिर वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान् थे । तो वह मुनिराज से बोल उठे―महाराज ! इस पाठ का आप अर्थ कर दीजिए । तो मुनिराज बोले कि हम विशेष ज्ञाता नहीं हैं, हम अर्थ नहीं कर सकते । तो इतनी बात सुनकर मुनिराज के प्रति भी उनकी भक्ति जगी । धन्य है इनकी सरलता, कोई बहाना नहीं किया और अपनी अजानकारी सरल शब्दों में बता दी ꠰ तो विद्यानंदिजी ने कहा कि एक बार आप फिर इस पाठ को पढ़ दीजिए । तो मुनिराज ने पुन: वह पाठ पढ़ा और विद्यानंदिजी ने उसे सावधानी से सुना । अब तो विद्यानंदि की सारी समस्यायें हल हो गई । वस्तु अनेकांतात्मक है, स्याद्वाद से ही उसकी सिद्धि है, यह निर्णय उनका पक्का बन गया । घर पहुंचे, तत्त्वमनन होने लगा और उसी बीच उनके मन में एक शंका उठी कि अनुमान का सही लक्षण क्या है? क्या पंचरूपता अनुमान का लक्षण है या त्रैरूप्य अनुमान

का लक्षण है? नींद आ गई, स्वप्न हुआ कि तुम्हारी इस शंका का समाधान पार्श्वनाथ मंदिर में प्रतिमा के पीछे लिखा हुआ मिलेगा । सुबह गए उसका समाधान पाया दो श्लोकों में । जिसका भाव यह था कि जहाँ अन्यथानुपपत्ति है वहाँ पंचरूपता क्या करेगी? जहाँ अन्यथानुपपत्ति नहीं है वहाँ पंचरूपता क्या करेगी और यह ही बात त्रैरूप्य के संबंध में भी है, यह दर्शन का विषय है ꠰ अनुमान का स्वरूप और उसके अंगों का वर्णन बहुत विस्तार से है । कहने का मतलब यह कि विद्यानंदि स्वामी को ऐसी श्रद्धा हुई कि उन्होंने जब राजदरबार में व्याख्यान किया तो स्याद्वादशासन की प्रशंसा की । वैसा व्याख्यान सुनकर वहाँ सभी लोग बड़े आश्चर्य में पड़ गए । वहाँ विद्यानंदि स्वामी ने कहा कि जिसको शंका हो वह मुझसे शास्त्रार्थ करे । आखिर वह विरक्त हुए । सर्व राजपाट छोड़कर 500 शिष्योंसहित मुनि हो गए । उन्होंने अष्टसहस्री जैसे महानग्रंथ की रचना की । तो प्रसंग यह है कि कोई पुरुष स्याद्वादशासन से कितना ही द्वेष रखता हो, पर यदि आत्महित की भावना है, सही समाधान की जिज्ञासा है तो वह पुरुष नियम से तत्त्व का समीक्षण करेगा, आपके इष्ट साधन का अवलोकन करेगा, परीक्षण करेगा और नियम से गर्वहीन हो जायेगा । उसके फिर एकांतवाद का आग्रह न रह सकेगा ।

(212) आत्मविजय बीज आत्महितभावना―मनुष्य के विजय का कारण है आत्महित की भावना । जो आत्महिताभिलाषी है वह संसार के दु:खों से दूर होने का इच्छुक है । वह किसी भी मजहब में उत्पन्न हुआ हो, उसको किसी भी मजहब में आग्रह नहीं होता, क्योंकि मजहबों के आग्रह से संसार में रुलना अभीष्ट है क्या? संसार में रुलना जिसे पसंद न हो वही चाहेगा कि संसरण का विध्वंसक तत्त्वज्ञान प्राप्त हो । तो स्वयं अपने आप में निरखिये कि यह आत्मा एक स्वभावरूप है, फिर भी पर्याय में यह अनेकरूप बन रहा है । सो अनेक रूपता का यह विश्वास रखेगा तो यह अनेक रूप बनता ही रहेगा याने संसार की अनेक पर्यायें इसको मिलती ही रहेगी और यदि अपने अनादि अनंत अहेतुक चैतन्यस्वभाव का आदर करेगा, उस स्वभाव को ही शरण मानेगा तो उसको संसरण से मुक्ति प्राप्त हो सकेगी । सब कुछ निर्णय अपने आपके अंदर है । अपने पर्याय में अनेक रूप से आस्था न रहे कि मैं इस रूप हूँ, पर्याय तो होती ही रहेंगी, क्योंकि यह तो वस्तु की स्वभाव है । पर्याय बिना कोई वस्तु नहीं रह सकती । मगर पर्याय में जो आत्मतत्त्व की श्रद्धा करता है उसको संसार में खोटी पर्यायें चलती हैं और जो अपने एक अंतस्तत्व की आस्था करता है, उसरूप अपने को मानता है उसकी शुद्धपर्याय चला करती है । शुद्धपर्याय में शांति है, अशुद्ध पर्याय से संसारपरिभ्रमण है । तो जो आत्महित चाहेगा वह आत्महित का मार्ग जरूर पा लेगा, क्योंकि यह जिज्ञासा ही एक पवित्र जिज्ञासा है । मेरा क्या हित है और किस विधि से मेरा कल्याण बन सकता है? ऐसा कोई चाहे तो उसे सन्मार्ग अवश्य ही मिलेगा ।

(213) आत्महिताभिलाषी सन्मार्गदृष्टा की समंतभद्रता―सन्मार्ग यही है कि अपनी नाना रूपता का ध्यान छोड़कर सहज एकस्वरूप इस चैतन्यभाव की उपासना करें । मैं ज्ञानमात्र हूँ, चैतन्यमात्र हूँ, ऐसी भावना प्रयोग के साथ जो करे अर्थात् ज्ञान में ऐसा ही अपने को लेगा उसके नियम से अशुद्ध पर्याय दूर होती है । तो आत्महित का अभिलाषी पुरुष किसी कारण से किसी संप्रदाय में जन्म होने से अथवा मिथ्यावादियों का संग मिलने से वह स्याद्वादशासन से मनमाना द्वेष कर रहा हो, इतने पर भी यदि आत्महित की अभिलाषा है, सत्य तत्त्व के समझने का भाव है तो वह अभद्र पुरुष भी सर्व ओर से भद्र बन जाता है । मिथ्यात्व से ग्रस्त पुरुष भी सम्यग्दृष्टि बन जाता है, अपने आपके शासन-तीर्थ का उपासक बन जाता है और उस स्याद्वादशासन में बताये गए मार्ग के अनुसार वह अपनी प्रवृत्ति करने लगता है । निरंतर उसे इस ज्ञानदर्शन सामान्यात्मक अन्य पदार्थ की प्रतीति रहती है । जो अपने आपका ज्ञान करेगा, अपने स्वरूप में रहेगा वह समंतभद्र बन जायेगा ꠰ समंत मायने चारों ओर से, भद्र मायने मंगलरूप । यह जीव अनेकांतशासन का शरण पाकर कल्याणमय हो जायेगा ।


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