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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:युक्‍त्‍यनुशासन - गाथा 63

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न रागान्न: स्तोत्रं भवति भवपाशच्छिदि मुनौ,

न चान्येषु द्वेषादपगुणकथाभ्यासखलता ।

किमु न्यायान्यायप्रकृतगुणदोषज्ञ मनसां

हितान्वेषोपायस्तव गुणकथासंगगदित: ।।63।।

(214) रागद्वेष के बिना प्रभु का स्तवन―हे वीर जिनेंद्र ! वो यह स्तोत्र मैंने किया है आपका, सो रागवश नहीं किया अर्थात् आप से कोई स्नेह हो, राग हो, रिश्ता हो या कोई सांसारिक नाता हो और उस राग से आपकी प्रशंसा की हो ऐसा नहीं है, क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता । उसका कारण यह है कि इधर हम तो परीक्षाप्रधानी हैं और उधर आप संसारजाल को नष्ट करके संसार से अलग हो गए, फिर राग का क्या सवाल? कौन आप्त है, कौन नहीं है―इस परीक्षा को लेकर जब हम स्तवन किया करते हैं, जब राग का मेरी ही ओर से सवाल नहीं और फिर आप तो संसारजाल का नाश कर जीवनमुक्त हुए हैं और इस समय मुक्त हैं तो आपको मेरे प्रति कोई आकर्षण नहीं, न आप मेरी ओर अनुराग रखने वाले हैं, आप वीतराग हैं, इस कारण से राग ही नहीं, स्तवन करने का कोई कारण नहीं है और इसी कारण इस स्तोत्र को उपपत्ति का बीज राग नहीं है, किंतु दोषगुण का विचार करते हुए आपके गुणों की रुचि के कारण यह भक्ति स्तवन हुआ है । तो जैसे आपका स्तवन किया जाने का कारण राग नहीं है, इसी प्रकार आपका स्तवन किया जाने का कारण द्वेष भी नहीं है । दूसरे एकांतवादियों से द्वेष हो, इसलिए अनेकांतशासन के प्रणेता भगवान का स्तवन किया जा रहा हो, यह बात नहीं है, क्योंकि कोई किसी से द्वेष रख करके कार्य करे तो उसे खलता (दुष्टता) कहते हैं ꠰ खोटा अभिप्राय है, सो यह अभिप्राय मुझमें है ही नहीं, इस कारण दूसरे में प्रति द्वेषभाव रखकर यह स्तोत्र किया हो, यह संभव नहीं । स्तोत्र की उपपत्ति का कारण द्वेष नहीं हो सकता । लोक में जैसे पक्ष देखा जाता कि जो अपने को न रुचे, उससे जो विरोधी हो तो विरोधी विरोधी के प्रति उसका आकर्षण जगता और जो नहीं रुच रहा उस पर द्वेष जगता । तो ऐसा रागद्वेष संसारी मायावियों में संभव है, पर जहाँ केवल मोक्षमार्ग की अभिलाषा कोई रख रहा हो और जहाँ केवल आत्महित का मार्ग ही ढूंढ़ने की धुन है और उस धुन में ढूंढ़ भी पाया है वीतराग सर्वज्ञदेव को तो उस बीच स्तवन का कारण न राग हो सकता है और न द्वेष हो सकता है ।

(215) आत्महितेच्छुवों को आत्महित का उपाय बताना इस स्तोत्र का प्रयोजन―अब यह एक प्रश्न हो उठता है कि बिना प्रयोजन के कोई भी पुरुष कुछ भी कार्य नहीं करता, तो स्तवन के किए जाने का कारण क्या है? इसके समाधान में आचार्यदेव कहते हैं कि इसका उद्देश्य यही है कि जो लोग न्याय और अन्याय को पहिचानना चाहते हैं और प्रकृत विषय में कौन देव है, कौन नहीं है या कौन से वचन निर्दोष हैं और कौन से

वचन सदोष हैं? इस प्रकार जानने की जिनकी इच्छा है उनके लिए यह स्तोत्र हे प्रभो ! आपकी गुणकथा के साथ कहा गया है । इस ग्रंथ में दो बातें कही गई हैं―एक तो प्रभु के गुणों की कथा और दूसरा वस्तुस्वरूप का विवेचन । वस्तुस्वरूप का जो विवेचन है वह परोपकार के लिए है । जो मनुष्य न्याय अन्याय समझना चाहता है अर्थात् कैसे ज्ञान करें, वह हम पर अन्याय है और कैसे बोध का विचार करें तो वह दूसरों पर न्याय है । और किस तरह बोध करें जो अन्याय बने खुद पर, और कैसे बोध विचार करें जो अन्याय बने दूसरों पर यह बात इस स्तवन में प्रकट हुई है ।

(216) सम्यक् व मिथ्याश्रद्धान में भगवान आत्मा पर न्याय व अन्याय का एक उदाहरण―जो लोग आत्मा को नहीं मानते, शून्यवाद सिद्धांत के अध्ययन से अथवा भूतों से उत्पन्न हुए अध्ययन से जो लोग आत्मा को नहीं मानते वे स्वयं पर अन्याय कर रहे हैं । आखिर ऐसा समझने वाला भी तो आत्मा ही है । उसे कैसे मना किया जा सके और स्वयं अपने आपको मना करे तो अपने हित के उपाय की कैसे जिज्ञासा हो सकती? तो यह स्वयं पर अन्याय है, और ऐसे मिथ्यावाद का प्रचार किया जाये, रचना की जाये तो उसका जो उपयोग करेगा वह भी विभ्रम में रहेगा । यह उन पर अन्याय है । यह बताने का प्रयोजन इस स्तवन में है । और स्याद्वादशासन के अनुसार आत्मा का अन्वेषण किया जाये कि यह मैं आत्मा अनादि अनंत हूँ, इस कारण नित्य हूँ, यही मात्र एक मैं स्वयं हूँ, इस कारण एक हूँ, किंतु प्रतिक्षण परिणमता रहता हूँ, इस कारण नित्य हूँ, और प्रतिसमय के जो परिणमन हैं वे सब अनेक हैं । वो जो परिणमन आज चल रहा है वह दुःखरूप है, वह परिणमन बदला जा सकता है और शांतिरूप परिणमन पाया जा सकता है, और उसका उपाय है अपने आपमें अंतःप्रकाशमान इस नित्य एक आत्मस्वभाव की उपासना करना अर्थात् अपने आपको उस नित्य एक आत्मरूप में ही समझना । स्याद्वादशासन के अनुसार बुद्धि बनाने से खुद को संसार-संकटों से छूटने का अवसर मिला और यह बोध जो पायेगा उसका भी आत्मकल्याण होगा । तो यह दूसरे पर न्याय हुआ, खुद को संसार-संकटों से छुटकारा मिलेगा, यह अपने आप पर न्याय हुआ । तो जो लोग न्याय और अन्याय को पहिचानना चाहते हैं उनके लिए हित की खोज का यह उपाय बताया गया ।

(217) प्रभुगुणस्तवन में आत्महित की प्रेरणा―यह स्तवन प्रभु की निर्दोषता को बताने वाला है । जो निर्दोष होगा उसके ही ऐसे वचन निकलेंगे जो हितरूप हैं, अहित से बचाने वाले हैं । तो आपके गुणों की कथा तो इसमें है, मगर उस गुणकथा के साथ ही जीवों को हित का उपाय बताया गया है, और विशेषतया जो यह समझा गया कि प्रभु जगजाल को तोड़कर मुक्त हुए हैं । तो ऐसा समझकर खुद को भी एक प्रेरणा मिलती है कि हम भी भवजाल में तो जरूर हैं, किंतु जो मार्ग प्रभु ने अपनाया उस पर चलकर हम भी इस संसारजाल को छोड़ सकते हैं ꠰ तो जो आपको इष्ट था संसारबंधन को तोड़ना यह हमें इष्ट है और ऐसा ही सब संज्ञी जीवों को इष्ट है कि यह संसारबंधन टूट जाये । तो हित का मार्ग क्या है? इसका उपाय भगवान की स्तुति के काज से जाहिर होता है अर्थात् गुणकथा तो साक्षात् है, पर संसारबंधन टूटे, यह प्रयोजन भी इसमें पड़ा है । तो जीवों को हित का मार्ग मिले, यह प्रयोजन इस स्तवन की रचना का कारण है । तब इस स्तोत्र में इतनी बातें व्यक्त हो रही हैं―रचयिता की श्रद्धा, रचयिता में प्रभु वीर जिनेंद्र के प्रति उत्कृष्ट श्रद्धा है, यह वस्तु के स्वरूप के निर्णय द्वारा समझा गया । ऐसा निर्णय चूंकि वीर जिनेंद्र ने बताया और उसके निर्णय का पूर्ण समर्थन रचयिता ने किया तो इससे श्रद्धा जानी गई । दूसरी बात गुणज्ञता की अभिव्यक्ति है । समंतभद्राचार्य गुणज्ञ थे । परमात्मा में यह अनंत वैभव है, अनंत गुण हैं, उसके वह जानकार थे तब ही उनका ध्यान एकाग्रता से प्रभु की ओर हो गया । इन दो कारणों के अतिरिक्त तीसरा कारण इस स्तोत्र को उपपत्ति का है लोकहित । आचार्य समंतभद्र को लोकहित को भी भावदृष्टि थी कि जो धर्म को खोज में भटक रहे हैं उनको सुगमतया सन्मार्ग मिले, वस्तु का सत्यस्वरूप ज्ञान आये, ऐसी उनको लोकहित की भावना थी । तो इन तीन कारणों से इस स्तोत्र की रचना हुई है, ऐसा समंतभद्राचार्य स्तवन करके कह रहे हैं ।


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