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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:योगिभक्ति - श्लोक 1

From जैनकोष



प्रावृट्काले सविंधुस्प्रपतितसलिले वृक्षमूलाधिवासा:,हेमंते रात्रिमध्ये प्रतिविगतभया: काष्ठवत्त्यक्तदेहा:।

ग्रीष्मे सूर्यांशुतप्ता गिरिशिखरगता: स्थानकुटांतरस्था

स्ते मे धर्मं प्रदधुर्मुनिगणवृषभा मोक्षनि:श्रेणिभूता:।।1।।

योगभक्ति में योगियों के स्तवनपूर्वक हित की अभ्यर्थना- संस्कृत भाषा में निबद्ध योगभक्ति पहिले हो गयी थी और प्राकृत भाषा निबद्ध योगभक्ति में अभी अभी समाप्त हुई है। अब जिन अवसरों में योगभक्ति करना आवश्यक है और जो अवसर ऐसे माने गए हैं कि बड़ी योगभक्ति न करके लघुयोगभक्ति करके भी अनुष्ठान पूर्ण किया जा सकता है उस अवसर में लघुयोगभक्ति पढ़ी जाती है। इस योगभक्ति में तीन छंद हैं, किंतु तीनों छंदों में शीघ्र ही योगियों के संबंध में क्या विचारा जाना चाहिए, उसका संक्षिप्त और उत्तम वर्णन है। इस प्रथम छंद में कहते हैं कि वे मुनिगण श्रेष्ठ मुझे धर्म प्रदान करें। योगियों की उपासना के उद्देश्य में केवल यह चाहा गया है कि मेरे में धर्म का विकास हो। जिस महापुरुष का जिस पर अधिकार है उससे उसकी वान्छा करे, उस जगह अधिकार करे तो उसकी सिद्धि हो सकती है। पर जो वस्तु है ही नहीं उनके पास अथवा जिस वस्तु का उन्होंने परित्याग कर दिया है उसकी वान्छा करने से कोई सिद्धि नहीं है। योगी धर्ममूर्ति कहलाते हैं। धर्म हम कहाँ देखें, ऐसी यदि चित्त में अभिलाषा हुई हैं तो योगियों को देखने लगें, इनकी मुद्रा में, इनके उठने बैठने में, इनके वचनों में और अनुमान से समझ गए इनके उस चित्तप्रसार में धर्म का विस्तार पड़ा हुआ है, ऐसे धर्ममूर्ति मुनिगण श्रेष्ठ मुझे धर्म प्रदान करें।

वर्षा ऋतु में योगियों का योग- ये मुनिराज तीन ऋतुवों में तीन ऋतुवों के कठिनपरीषह सहकर भी अपनी ज्ञानस्वरूप की उपासना के कर्तव्य से विचलित नहीं होते। वर्षाकाल में जब कि विद्युत् जगह-जगह थोडे़-थोडे़ समय बाद चमक रही है, जहां बिजली की बड़ी गर्जनायें चल रही हैं और मेघों की भी गर्जनायें चल रही है, जहां मूसलाधार जलधारा पड़ रही है ऐसे वर्षाकाल में ये योगीश्वर वृक्षों के मूल में अधिवास करते हैं। यहां अधिवास शब्द लिखा है जो कि एक छंद में तुक पूर्ति के लिए नहीं, किंतु एक मर्म बताने के लिये है। वास प्रवास अधिवास में अंतर है। वास में तो प्राय: स्वामित्व बसा हुआ है, हमारा इस घर में वास है। प्रवास में अपने लौकिक निवास स्थान को छोड़कर किसी अन्य जगह में स्वामित्व बसाया है और अधिवास में किसी प्रसंग को पाकर उस प्रसंग तक ठहरने का अर्थ बसा हुआ है। ये योगीश्वर वर्षाकाल में वृक्षों के नीचे निवास किया करते हैं।

शीत और ग्रीष्म ऋतु में योगियों का योग- ये योगी शीत ऋतु में रात्रि के मध्य निर्भय होकर किसी भी मैदान में कहीं भी इस प्रकार देह का उत्सर्ग करके ठहरे हैं जैसे कि मानो कोई काठ पड़ा हुआ हो। ऐसा शीतकाल जिसमें बंदरों का अभिमान नष्ट हो जाता है। जब बहुत तेज शीत पड़ती है तो बंदर भी उससे हार मान जाते हैं। जहाँ तुषार पड़ रहा है, शीत वायु चल रही है ऐसे समय में रात्रि के समय अति शीत पड़ती है उस समय ऐसे देह का ममत्व छोड़कर साधुजन विराजे हुए हैं जैसे कि काठ पड़ा हुआ हो। शरीर निश्चल और भीतर ही गुप्त ही गुप्त अपने स्वरूप के दृढ़ किले में ठहर कर समता का अनुभव किया करते हैं। ये योगीश्वर ग्रीष्मकाल में सूर्य की किरणों से तप्त हुए और पर्वतों के शिखर पर स्थित हुए, अन्य अनेक स्थानों पर रहकर परीषहों का विजय करते हैं। ये योगी क्या हैं? ये मोक्ष की नसैनी हैं। इनका कर्तव्य, इनका आचरण, रत्नत्रय ये मोक्ष की मानो नसैनी हैं। ऐसे ये मुनिगणों में श्रेष्ठ योगी मुझे धर्म प्रदान करें, एक ज्ञानस्वभाव की उपासना करने की धुनि बनावें। इन योगियों के यही तो है सो उनके इस गुणस्मरण को करके यह भक्त यह भाव भाता है कि मुझमें इसही सत् धर्म का विकास हो।

योगियों के योगसाधना की धुन में संस्थानविचय धर्मध्यान की विशेषता- योगसाधक पुरुष अपनी योगसाधना की धुन में इन ही प्रक्रियावों में आराम मानते हैं और इस ही की साधना में अपना समय व्यतीत करते हैं। जैसे कोई मोही लोभी दुकानदार दुकान की चीजें संभालने में धरने में जोडने में अपना समय व्यतीत करते हैं, तो योगीपुरुष इन योगसाधनों के यत्न में अपना समय बिताते हैं। कभी किसी आसन में बैठकर उस ज्ञायकस्वभाव अंतस्तत्त्व का ध्यान करते हैं, कभी वीरआसन से, कभी कुक्कुटासन से, कभी मृतकासन से काठ की तरह निश्चल पड़े रहकर एक इस अंतस्तत्त्व की साधना किया करते हैं। धर्मध्यान में संस्थानविचय धर्मसाधना का बहुत बड़ा सहयोग है। इस ध्यानसाधना में मुख्य विषय तो यह है कि लोक और काल के आकार का विचार करना। लोक का आकार जितना महान् है, 343 घनराजू प्रमाण है। उसका विस्तार निरखना और इस लोक में जहां जहां जो जो रचनायें बनी पड़ी हुई हैं उनका चिंतन करना, यह लोक के आकार का चिंतन है। इस आकार के चिंतन का यह साक्षात् प्रभाव पड़ता है, यह मन अपनी उद्दंडता छोड़ देता है। मन नामवरी के लिए उद्दंड रहा करता है। नामवरी भी किसकी? इस भवमूर्ति की। जैसे कोई पूछे कि हमें बतावो संसार क्या है? तो ये विचित्र देहधारी प्राणी हैं संसार। स्थावर कीट पतिंगे मनुष्य पशु पक्षी आदिक इनको बता देवे यही है चलता फिरता संसार। इन प्राणियों का जहाँ जहाँ निवास है, जिस जिस प्रकार का उनके देह का आकार है वे सब संस्थानविचय में गर्भित हैं। इनका चिंतन करना। तो जब लोक का इतना विशाल रूप निरखा इस ज्ञानी ने तो सहसा यह विकल्प टूट जाता है कि काहे का नाम, काहे की ममता? कितनी जगह में अपना ममत्व करना, स्थान तो इतना विशाल है। आज यहाँ जीवित हैं। यहाँ से चलकर अन्यत्र कहाँ उत्पन्न हो गए। कितनी जगह उत्पन्न होने के स्थान? ऐसे विशाल लोकाकार का चिंतन करके विकल्प वासना टूट जाती है।

लोक और काल के विस्तार की अश्रद्धा में नामवरी के लगाव की आपतितता-इस जीव को सबसे कठिन विपदा लग रही है और खासकर इस मनुष्य को कि इतने नाम से लगाव रख रक्खा। इस ध्यान में विरले ही पुरुष रहे कि मैं नामरहित शुद्धचैतन्य हूं- ऐसी प्रतीति करना, ऐसा अनुभव जगना, ऐसा अपने को मानना यह है अमृतपान। मैं नामरहित शुद्धचैतन्यमात्र हूं। नाम रखा है मायावी लोगों ने। नाम रखा है मायावी भवमूर्ति का। मेरा कोई नाम नहीं। मैं नामरहित शुद्धचैतन्य हूं। मोहीजन नाम का लगाव रखकर फिर क्षेत्र की ममता किया करते हैं। जितनी भी ममता प्रकट हो रही हैं उन ममताओं का यह नाम आधार बन गया है। बडे़-बडे़ मकान बनाना, यह अमुक का भवन है, इस प्रकार वह एक नाम के लगाव का ही तो श्रम है। बडे़-बडे़ फर्म, बड़े रोजगार, बड़ी कंपनियाँ, करोड़पति अरबपति, जो इतने बड़े आरंभ बढ़ाये हुए हैं पुण्य के उदय में प्राप्त हुए, इसकी चर्चा अभी नहीं कर रहे, किंतु भावों की ओर से चर्चा कर रहे हैं कि इतने बड़े वैभव संपदा में वे पाते क्या हैं? किसे क्या दिखाना? कौन किसका मालिक? केवल एक मायामय संसार में अपनी मायामूर्ति का नाम अपना बनाकर चाहते हैं कि लोग जान जायें कि यह कितना धनी है। अरे वह है क्या? एक अमूर्तआकाशवत् निर्लेप केवल चैतन्यमात्र, और यह प्रभु मायाजाल में गुंथकर इतने कष्ट सह रहा है। तो सब अनर्थों का मूल यह नाम का लगाव है। तो क्षेत्र में जो यह ममता बढ़ी हुई है। मेरा क्षेत्र उतना है जितने में नाम हो, जितने में शासन प्राप्त हो, जितना शासन क्षेत्र हो, जितने में अधिकार हो। यह इस नाम के लगाव पर विडंबना आयी है। ये सब विडंबनायें ही तो हैं। विडंबना कहते उसे हैं कि जहां हाथ तो कुछ न लगे और परेशानी बहुत हो। तो इस संसार में जो श्रम किया जाता है, जो व्यवहार किए जाते हैं उन सब क्रियावों में हाथ कुछ नहीं लगता। इससे और बढ़कर क्या उदाहरण होगा कि ये धर्म के काम- शास्त्र सुनना, शास्त्र बांचना, उपदेश करना, समारोह करना, पूजा करना आदिक इनकी प्रवृत्ति में भी भीतर यह लगाव पड़ा हुआ है कि यदि नाम के लगाव की चर्चा धन क्षेत्र में की है तो यहां भी तो विडंबना हुई। विडंबना कहते उसे हैं कि हाथ कुछ न लगे और परेशानी बनी रहे। यह भावमात्र जीव अपने भावों को, विकल्पों को, विभावों को कर करके इतना परेशान हो रहा है। तो संस्थानविचय धर्मध्यान में जहां लोक के इतने विशाल आकार का चिंतन चलता है वहां फिर यह ममता नहीं ठहरती।

काल के संबंध में यथार्थ विचार- अब काल के आकार पर विचार कीजिए। काल में लंबा चौड़ा आकार नहीं, किंतु उसकी जो भी मुद्रा है भूत, वर्तमान, भविष्य की, उस रूप में निरखना है। भूतकाल कितना गुजर गया? अनंतकाल। जिसकी आदि ही कुछ नहीं। कल्पना में यदि काल की आदि लेवोगे कि काल इस समय से, इस क्षण में शुरू हुआ है, इस दिन से शुरू हुआ है तो क्या यह माना जा सकता है कि उस दिन से पहिले समय ही कुछ न था। समय का प्रारंभ अनुमान में नहीं लाया जा सकता। प्रारंभ है ही नहीं। अनादि है और इस काल की अनादि के परिज्ञान से यह भी जान जायें स्पष्ट कि प्रत्येक सत् भी अनादि से है। जब से काल है तब से प्रत्येक सत् है। जो ये सब पुद्गल आदिक पदार्थों के समुदाय दिख रहे हैं ये पदार्थ के कब से हैं? जब से यह समय है तब से ये पदार्थ हैं। समय कब से हैं? उसकी आदि बन ही नहीं सकती। समय के बारे में वह कल्पना नहीं बन सकती कि इस दिन से पहिले समय न था। इसी प्रकार इन सत्पदार्थों के संबंध में यह कल्पना नहीं बन सकती कि यह जीव इस दिन पहिले कुछ भी न था, इस दिन हो गया। अथवा कोई पुद्गलपरमाणु इस दिन कुछ न था, इससे पहिले कुछ न था, इस दिन हो गया। किसी भी पदार्थ के बारे में आदि की कल्पना उठ नहीं सकती है। तो यह काल अनादि से है।

क्षेत्रकाल के विचार के समय लौकिक वैभव की असारता- देखो अब तक अनंतकाल व्यतीत हो गया, इस काल में कितने चक्रवर्ती हो गए? अनंत चक्रवर्ती कहो तो गलत न होगा। कितनी उत्सर्पिणी व्यतीत हो गयी, अवसर्पिणी व्यतीत हो गयी? इन सभी में चक्रवर्ती उत्पन्न तो होते हैं और एक काल में 12 चक्रवर्ती हो जाते हैं। उत्सर्पिणी में भी और अवसर्पिणी में भी। और ऐसे ऐसे 5 भरत और 5 ऐरावत इन 10 क्षेत्रों में होते हैं, और 5 महाविदेहों में 160 नगरियों में प्रत्येक में तो ये चलते ही रहते हैं। वहां काल विभाग इस प्रकार का नहीं है। यों असीम उत्सर्पिणी अवसर्पिणीकाल व्यतीत हो गए तो क्या कहा जाय, कितने वैभववान पुरुष हो गए? क्या रहा? कुछ भी नहीं रहा। सबने अपने अपने पुण्योदयकाल में विकल्प मचाये। किन्हीं विरले पुरुषों ने विरक्ति भी रखी। हम आप सबने कितने भव धारण किये? जरा उस काल की अनादिता सोचकर स्पष्ट समझ लीजिए, अनंतभाव व्यतीत कर डाले। उन भवों में पाया क्या? विडंबना की। किसी भव में बड़े राजा महाराजा भी हुए कि सब जनता और बड़े बड़े राजा भी चरणों में पड़े रहे। सब पर अधिकार बना, उस समय इस जीव को लगता होगा ऐसा कि मैं प्रभु हूं, मैं इनका मालिक हूं, ऐसी अनेक बार स्थितियाँ पायीं, पर रहा क्या? उस समय भी हमने विडंबना ही पायी। जहाँ मिलेजुले कुछ नहीं, परेशानी ही रहे, उसको कहते हैं विडंबना। तो जब काल का स्वरूप विचारा जाता है तो इसको यह बुद्धि उत्पन्न होती है कि अनादि अनंतकाल के समक्ष ये 10-20-30 वर्ष क्या गिनती रखते हैं, उतने समय के लिए नाम का लगाव रखकर तन, मन, धन, वचन का श्रम करना, यह इस जीव के लिए अहित भरी बात है।

संस्थानविचयधर्मध्यान में पार्थिवी धारणा का योग- इस ही संस्थानविचय धर्मध्यान में धारणावों द्वारा ध्यान की साधना बतायी है। पार्थिवी धारणा में चिंतन चलता है कि एक बड़ा समुद्र है मानों हजारों लाखों योजनों के विस्तार वाले समुद्र में चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देता है। देखिये यह सब कल्पनाओं से सोचा जा रहा है, अब अगर कल्पनायें कर करके जहाँ आत्मा का उपयोग ले जायगा उस क्षण में इस कल्पना से ऊपर चढ़े हुए उन्नत आत्मा में सहजउन्नतभाव हो जायगा। इस विशाल समुद्र के बीच एक मेरूपर्वत के समान विशाल लंबा चौड़ा ऊँचा एक कमल नाल है जिस पर विस्तृत कणिका है, उस पर कमल विकसित है, उस पर एक आसन है, इतना ऊपर अपने को कल्पना में ले जाया गया है। इस मन का भी बड़ा प्रभाव पड़ता है। इतने ऊँचे स्थित यह मैं अरहंत के समान हूं। समान-समान सोचते हुए भूल गए भेद। मैं अरहंत हूं। अपने गुणों को निरखकर उपयोग को इस विशुद्ध स्वरूप में ले जाया गया है। साथ ही इस भूमितल से ऊँचे उठकर इस भाव में जो विराजमान किया गया है सो उससे कितना ही भार, कितने ही विकल्प हट जाने में पूर्ण सहयोग मिलेगा, और ऐसी निर्भार स्थिति में यह प्रभुसम अपने स्वरूप का विचार कर रहा है। अब इसका उपयोग सहजज्ञान दर्शन आदिक गुणों में लग रहा है। वहाँ भेद उपासना टालकर अभेद उपासना का भी अवसर इसे मिल सकता है।

संस्थानविचयधर्मध्यान में आग्नेयी धारणा का योग- पार्थिवी धारणा में चल रहा है चिंतन और इस ही चिंतन के अनंतर जब शरीर का ऐसा फैलफुट आकार भूलकर एक सामान्यतया एकत्रिकोण आकारमात्र रह गया है। जैसे कि पद्मासन में बैठे हुए पुरुष के चारों ओर यदि सीधी लैन लगा दी जाय तो चारों ओर न लगेगी, तीन ओर लगेगी। और वह एक त्रिकोण बन जायगा। इस मूर्ति के चारों तरफ आग्नेय मंत्र के रं रं रं का पंक्तिबद्ध वर्ण प्रसार बना हुआ है। आधार तो शिखा की भाँति ऊपर ही चढ़ा करता है और यदि आकार रहित भी र हो तो भी ऐसा लंबा खिंचकर अपना आकार रखता है। जैसे अग्नि की शिखा जल रही हो और यदि आकाररहित रकार हो तो उसका एक जुड़वा शिखा और एक टुटुमा शिखा ऐसी तीन शिखा के रूप में उसकी मुद्रा बनती है। यह र अग्नि का प्रतीक है। यह बात कुछ सही विदित होती है। तो अपनी इस मुद्रा के चारों और ( ) रं रं रं प्रतीक फैला हुआ है और मध्यस्थान में जहां एक दो कमल की कल्पनायें हुई हैं और कल्पनायें भी क्या? इस शरीर की रचना में भी एक मापदंड में 5-6 स्थान पर ऐसी मुद्रा पड़ी है जो कुछ कमल पंखुडियों की मुद्रा के रूप में हैं। एक उनमें से नाभिकमल देखें जो कि 16 दल का है, सोलह पत्रों का है, जिन सोलह पत्रों पर सोलह स्वर लिखे हुए हैं। व्यन्जनों की अपेक्षा स्वर का महत्त्व विशेष है। ये स्वर स्वयं राजंते। ये स्वयं में ही विराजमान, स्वयं ही उच्चार्यमान, स्वयं शोभायमान हैं। इनकी सत्ता के लिए, प्रयोगात्मक अस्तित्त्व के लिए अर्थात् इन स्वरों के बोलने के लिए किसी दूसरे वर्ण की अपेक्षा नहीं रखी जाती। ऐसे स्वराजित कमल के दलों के बीच की कर्णिका में र्हृं का बीजमंत्र लिखा हुआ है जिनकी रेफ से एक ऐसी चैतन्य प्रतपन शिखा विकसित हुई है कि जिस ज्वाला से यह अष्टदलकमल जल गया है। वह अष्टदलकमल क्या है? अष्टकर्मों का प्रतीक। और उसकी शिखा ऐसी बढ़ी कि उस अष्टदलकमल को जलाकर चारों और शिखा फैल गयी। तो यह भवमूर्ति समस्त भस्म हो गया, अब वहाँ कुछ नहीं रह गया। तो एक भस्ममात्र शेष रह गयी। ये योगी अथवा कोई ज्ञानी इस ध्यान के समय में अपने आपमें आग्नेयी धारणा विधि से आत्मा का चिंतन कर रहे हैं। अब इस धारणा के बाद उसका चिंतन मारुतीधारणा में चलेगा।

संस्थानविचयधर्मध्यान में मारुतीधारणा का योग- आग्नेयी धारणा में उस ज्ञानी आत्मा ने अपने आपको समस्त भारों से रहित ज्ञानमात्र अनुभव किया है। कर्म देह विभाव सब जल गए हैं। अब इस अनुरूप कुछ यहां वहां मानो भस्म पड़ी हुई है, कुछ शेष रह गयी है, नि:सार। तो अब मारुतीधारणा आती है। मारुतीधारणा में वायु बड़े वेग से बह रही है। तो इस धारणा में प्रारंभ तो वायुवेग से हुआ। अब वह वेग विशुद्ध ज्ञानवेग के रूप में आया हुआ है, और इस विशुद्ध ज्ञानवायु के रही सही जो भस्म थी वह सब उड़ रही है। जो किन्चित्मात्र संबंध का भार था, नि:सार भी भस्म का संबंध अथवा लगाव था वह भी उड़ गया है। उस प्रचंड वायुवेग के भस्म उड़ने के बाद यह बहुत ही निर्भार हुआ।

संस्थानविचयधर्मध्यान में वारुणीधारणा का योग- इसके बाद अब वारुणी धारा में यह ध्याता आया है। इस धारणा में यह निरखा जा रहा है कि चारों ओर घनघोर मूसलाधार वर्षा बरस रही है, जिस वर्षा के प्रवाह से बड़े बड़े ढेर भी बह जाते हैं। तो वही वर्षा एक ज्ञान वर्षारूप में भाव में आकर यह वर्षा सूक्ष्मरूप से स्पर्श किए हुए भस्म आदिक शेष नि:सार वे परतत्त्व सब बहे जा रहे हैं। और उस जल से इस ज्ञानजल से अब यह बिल्कुल विशुद्ध हो गया है। इस ज्ञानधारा से इसके आत्मा का मानो अभिषेक हो गया है, पूर्ण रूप से सब कुछ धुल गया है, ऐसे विशुद्ध ज्ञानोपयोग में रहकर यह जीव रूपस्थध्यान में आता है।

रूपस्थध्यान का योग- यह मैं आत्मा अनंत चतुष्टयसंपन्न वीतराग सर्वज्ञदेव की तरह विशुद्ध चित्प्रकाशमात्र हूं। सोहं, जो वह है सो मैं हूं। जो प्रभु का स्वरूप है सो यहाँ यह मैं हूं, इस प्रकार प्रभु के व्यक्त स्वरूप से अपने स्वरूप की तुलना रखते हुए अब रूपस्थ-ध्यान में है। अरहंत प्रभु के ध्यान को रूपस्थ ध्यान इस कारण कहते हैं कि अरहंत से और उत्कृष्ट अवस्था जो सिद्ध प्रभु की है वह औपचारिकरूप से भी रूपी नहीं है, सर्वथा रूपातीत है। उसकी अपेक्षा अभी यह अरहंत प्रभु सकल परमात्मा हैं सो ये रूपस्थ हैं, आकार प्रकार मूर्त देह इनमें वह आत्मा अवस्थित है अतएव हम अरहंत प्रभु को किसी मुद्रा में, आकार में, स्थापना में इस विधि में हम सोच सकते हैं लेकिन जो आकार सोचा जाता है वह अरहंतदेव नहीं। उस मुद्रा में रहकर भी उस मुद्रा से निराला, निराहार, निर्विहार, निर्विकार, निर्नाम वह प्रभु एक विशुद्ध ज्ञानस्वरूप है। इसमें रूपस्थ ध्यान में समस्त ऋद्धि वैभव अतिशय संपन्न प्रभु की तरह अपने को विचारा जा रहा है। कभी रूपस्थ ध्यान का चिंतन करते हुए में चूँकि वह एक तुलनात्मक ध्यान है तो हर्ष और विषाद का एक मिश्रण जैसी भी स्थिति आ जाती है। प्रभु के उस गुण को विचारकर तो प्रमोद छाया हुआ है। कितना विशुद्ध ज्ञानस्वरूप इस लोक में जो सर्वस्व हितरूप है, इससे परमपद और क्या कहा जाय? आत्मा की सुरक्षित अवस्था इसके अतिरिक्त और किसे बतायी जाय? एक परम उत्कृष्ट वैभवसंपन्न है। समयशरण में जो भी अतिशय है अथवा देहादिक संबंधी जो भी अतिशय हैं उनके अंदर आंतरिक जो अतिशय है उस सर्व अतिशय समृद्धियों से संपन्न प्रभु का ध्यान किया जा रहा है।

स्वरूप ध्यान में भक्त की भावुकता- इस ज्ञानी ने ध्यान में अपने को रूपस्थ ध्यान में प्रभु की तरह गुप्त सुरक्षित मजबूत निरखा है, अब उसको क्लेश कहाँ है? पर इसी बीच जब पर्यायकृत वर्तमान हीनता पर दृष्टि पहुंचती है कि प्रभुवत कहाँ तो मेरा स्वरूप, कहाँ यह देह का बंधन, कहाँ तो निष्काम आनंदघन आत्मस्वरूप और कहाँ ये रागांश, ये विपदायें, इन वर्तमान विभाव विपदाओं की ओरकुछ नजर करके यह खिन्न भी होता है और तब रूपस्थध्यान में प्रभुभक्ति में एक हर्ष विषाद से मिश्रित अश्रु बिंदु भी झलक उठते हैं। ऐसे उस परमभक्तिभाव में भी इस ज्ञानी जीव की कितने ही कर्मों की निर्जरा होती है और रागभाव और अनुराग भक्तिभाव के कारण एक विशिष्ट पुण्यप्रकृति का बंध होता है, पर ज्ञानी पुरुषों का ध्येय केवल एक आत्मविशुद्धि का है, सिद्धि की प्रसिद्धि का है।

रूपातीतध्यान में संस्थानविचयधर्मध्यान की संपूर्णता- रूपस्थ ध्यान में अपने आपमें अनंत बल की, अनंत चतुष्टय की भावना करके अपने को सुदृढ़ बनाकर रूपातीत ध्यान में आते हैं, केवल अब चित्प्रकाशमात्र अनुभव करते हैं। इस विशुद्ध श्रद्धा के कारण जो वैभव ऋद्धियां समृद्धियां जगती हैं उन पर अब इनकी रंच दृष्टि नहीं, उनका रंच चिंतन नहीं। केवल एक शुद्ध स्वभाव का चिंतन है, उस चित्प्रकाश का चिंतन है जो अपने ही सत्त्व के कारण सहज रहता है। ये योगीश्वर यों संस्थानविचयधर्मध्यान के इन प्रकारों में ध्यान करते हुए अपनी विशुद्धि बढ़ाते हैं। संस्थानविचय कितना महत्त्वपूर्ण ध्यान है यह कहा जा रहा है और इसकी शीघ्र और सुगम मुद्रा है। लोक का आकार और काल का विस्तार उपयोग में रहता है तो यह जीव बेसुध नहीं होता। नाम, यश, कीर्ति, पोजीशन आदिक समस्त ऐबों को एकदम छोड़ देता हैं। इस विस्तार के विज्ञान में एकसा ही अद्भूत अतिशय भरा हुआ है।

कूपमंडूकवत् लोकविस्तार के अज्ञानियों के मोह का प्रसार- वे जीव अधिक मोही होते हैं, जिन्हें इस दुनिया के विस्तार का पता नहीं। जो आँखों दिखते हैं, जो प्रयोग में आते हैं, जो चलते फिरते परिचय बनाते हैं, बस इतनी ही दुनिया मेरे लिए सब कुछ है और इस प्रकार दृढ़ता से इस अल्पक्षेत्र को सब कुछ मान रहे हैं, जैसे कूपमंडूक। उस कुवे के बीच के उतने क्षेत्र को ही सारी दुनिया समझता है। कोई महासरोवरों में उडकर आया हुआ हंस कुवे के तट पर बैठ जाय और मेंढक पूछे कि तुम कहाँ से आये हो? तो वह बताता है कि हम मानसरोवर से आये हैं। वह मानसरोवर कितना बड़ा है? अरे बहुत बड़ा है। वह मेंढक अपनी एक टाँग पसारकर कहता है- क्या इतना बड़ा है? जैसे कि बच्चे लोग कोई हाथ फैलाकर किसी बात को पूछते हैं- क्या वह इतना बड़ा है। तो हंस कहता है- अरे इससे बहुत बड़ा है। तो दूसरी टाँग पसारकर मेंढक पूछता है, क्या इतना बड़ा है? अरे इससे भी बड़ा। तो तीसरी तथा चौथी टाँगों को फैलाकर भी पूछता है- क्या इतना बड़ा है? अरे इससे भी बड़ा तो मेंढक एक कोने से दूसरे कोने में उछलकर पूछता है- क्या इतना बड़ा है? अरे इससे भी बहुत बड़ा। तो मेंढक कहता है कि सब झूठ। है ही नहीं, इसी प्रकार कूपमंडूकवत् जिनकी दृष्टि है ऐसे मोहीजन कितने अंधेरे में हैं और उसी अंधेरे में दु:खी रहकर ये जीव मोह करते, आकुलतायें मचाते हैं।

मोहियों की परदृष्टि का विस्तार- दुनिया का परिचय न होना, क्षेत्र के विस्तार का पता न पड़ना, यह भी इस जीव की उन्नति में बाधक है। अज्ञान ही तो है। लोक काल विस्तार भी जिन्हें विदित नहीं, जिनकी दृष्टि में नहीं आता कि यह काल अनंत है और यह पर्याय इतने समय की है। ये दोनों बातें जिनकी दृष्टि में नहीं हैं, बिल्कुल इससे उल्टा श्रद्धान है कि मरते होंगे दूसरे लोग। हम तो सदा रहेंगे। मोही जीवों की ऐसी प्रकृति होती है। दूसरों का मरण देखकर तो निरख लेते हैं कि यह मर गया, अब यह असहाय रह गया। पर घर के ये जिंदा रहे हुए पुरूष अब अनाथ हो गए, पर अपने बारे में यह ख्याल नहीं करता कि मैं भी इस तरह गुजरूँगा या मेरे घर के लोग गुजर जायेंगे। मोही जीवों को अपने बारे में इस काल का ज्ञान नहीं है। और न यह ज्ञान है कि यह समय तो अनंत काल तक चलेगा। इसी कारण इन मोही जीवों का पोजीशन, कीर्ति, यश, नाम, मौज आदिक ऐबों का लगाव हो गया है।

ज्ञानबल से भावकलंक का प्रक्षालन- नामवरी, परिजन आदि के स्नेह, ये सब कलंक हैं, ये कलंक धुलेंगे तो इस ज्ञानजल से धुलेंगे। यह भावकलंक है। कोई पौद्गालिक कलंक लगा हो तो उन्हें किसी चीज से धो डाला जाय, खूब जल डालकर मलमलकर धो डाला जाय, और जो कर्मकलंक पौद्गलिक कलंक लगा है वह यों नहीं लगा हैं क्योंकि आत्मा अमूर्त है, मूर्त में मूर्त चिपकता है और उसे धोया जा सकता है, इस पर कर्मकलंक का चिपकाव कुछ और अनोखे ढंग का है। वहां निमित्तनैमित्तिक भावों के रूप में चिपक हो गई है। यह चिपकाव बड़ा कठिन है। अन्य चिपकाव से विलक्षण है।

जैसे शरीर पर कमीज कोट आदिक पहिने हुए हैं तो यह चिपकाव तो झट अलग किया जा सकता है, पर भीतर भाव में जो स्त्री पुत्र का स्नेह बसा है और इस निमित्तनैमित्तिक भाव में आश्रयभाव में जो स्त्री पुत्र का चिपकाव लगा है यह चिपकाव इन कमीज कोट आदिक से कठिन है। जहां जाय, वहीं चिपकाव है, कहीं चैन ही नहीं पड़ती। घर में रहते हैं तो प्रेम अथवा कलहरूप में वह दु:ख दे रहा है। छोड़कर जाते हैं तो अपने को उन बिना अकेला सा समझकर वहां भी दु:खी रहते हैं। कोट कमीज के चिपकाव को हटा देना सरल है, किंतु स्त्री पुत्र वैभव परिजन का चिपकाव चिपक न होकर भी कितना कठिन है। इसी तरह आत्मा मूर्त नहीं है, और मूर्त में मूर्त की तरह कर्म पुद्गल का चिपकाव नहीं है। यदि होता यह ऐसा तो इसका धो देना भी आसान था, किंतु यह चिपकाव तो निमित्तनैमित्तिक रूप में बढ़ा है। यह भावकलंक यह कैसे धोया जायेगा? यह ज्ञानभाव से ही धोया जायेगा। निर्मल विकाररहित विशुद्ध अपने ही सत्त्व के कारण सहज जो चित्प्रकाशस्वरूप है, उसके ज्ञान से, उसके उपयोग से, उसमें ज्ञान को समाया जाने की स्थिति से धोया जा सकेगा। तो ये योगीश्वर यों ध्यान के प्रताप से मोक्षश्रेणी में भी पहुंच जाते हैं। श्रेणी तो अब भी हैं लेकिन जो एक प्रयोगात्मक श्रेणी जिसे क्षपकश्रेणी के रूप में कहा उस पर भी वे अधिकार करते हैं, ऐसे योगीश्वर मुझे धर्म प्रदान करें। उनके स्मरण के प्रसाद से मुझे भी धर्मस्वरूप की प्राप्ति हो।


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