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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:योगिभक्ति - श्लोक 10

From जैनकोष



वंदे चउत्थभत्तादि जावछम्मासखवणपडिवण्णे।

वंदे आदावंते सूरस्य य अहिमुहटि्ठदे सूरे।।10।।

चतुर्थभक्तादिक्षपणयुक्त योगियों का वंदन- मैं ऐसे योगियों की वंदना करता हूं जो चतुर्भक्त से लेकर 6 महीने पर्यंत उपवास को धारण करते हैं। चार बार के आहार त्याग का नाम एक उपवास है। जैसे अष्टमी का उपवास किया जा रहा है तो सप्तमी के शाम का भोजन न करना, अष्टमी के दोनों बार का भोजन न करना और नवमी के शाम का भोजन न करना ऐसे चार बार के आहार का त्याग एक उपवास होता है। तो यह संज्ञा एक साधारण लोकव्यवहार की दृष्टि से दी गई है। योगियों को तो एक उपवास योगियों की एक वेला का त्याग होता है, क्योंकि योगी दिन में एक बार ही तो आहार लेते हैं। वेलावों में बताया गया है कि दो वेला एक दिन में होती हैं तो जब से उन्होंने उपवास धारण किया तब से तो 3 वेला का त्याग रहा और एक वेला पारणा के दिन का त्याग में गिन लिया। यों एक उपवास को चतुर्भक्त कहते हैं। ऐसे महीना पर्यंत जो उपवास धारण करते हैं ऐसे योगीश्वरों को नमस्कार करता हूं। उपवास करने की अधिकाधिक सीमा 6 महीने की है। 6 महीने से अधिक का उपवास करना नहीं बताया है पर एक दृष्टांत मिलता है बाहुबलि स्वामी का जो कि 1 वर्ष तक निराहार रहे। तो उन्होंने 1 वर्ष तक निराहार रहने की प्रतिज्ञा न ली थी। वे तो तपश्चरण में ऐसा रत हो गये कि एक वर्ष तक निराहार खड़े रहे, तो यह बात दूसरी है। आदिनाथ स्वामी भी 6 माह तक निराहार रहे, उसके बाद फिर 6 माह तक बराबर अंतराय आते रहे। प्रतिज्ञापूर्वक आहार का त्याग तो 6 महीने तक का होता है। इससे इस वंदना में बताया है कि एक उपवास से लेकर 6 महीना पर्यंत उपवास धारण करने वाले योगियों का मैं वंदन करता हूं।

निराहार आत्मस्वभाव की दृष्टि का बल- देखिये उन योगियों ने अपने आपमें कितना अद्भुत आनंदधाम प्रकाश पाया है जिसके बल पर छह महीने तक वे निराहार रहते हैं फिर भी प्रसन्न रहते हैं। तो उनको इस प्रसन्नता की कौनसी कुन्जी मिल गयी? बाह्य में दृष्टि रखने से तो वह प्रसन्नता की कुन्जी नहीं मिल सकती।बाह्य परिग्रहों में दृष्टि लगाकर यदि शांति के प्रसन्नता के स्वप्न देखें तो व्यर्थ है। परपदार्थों की आशा किए रहने में ही मोहियों का सारा जीवन व्यतीत को जाता है। लोग तो सोचते हैं के हम गृहस्थी में रहकर इतने इतने काम कर लें, ये बच्चे हमारे समर्थ हो जायें, इनको काम में लगा दें, फिर हम पूर्ण स्वतंत्र होकर शांति से अपना जीवन गुजारेंगे। आखिर यही सोचते-सोचते, उन्हीं कामों को करते करते सारा जीवन गुजर जाता है पर शांति का मार्ग नहीं मिल पाता। तो उन योगियों ने ऐसी कौनसी चीज प्राप्त कर ली है जिसके बल पर वे 6-6 माह तक उपवास कर लेने पर भी सदा प्रसन्नचित्त रहा करते हैं? तो उन्होंने अपने आत्मस्वरूप को पहिचाना, आत्मस्वरूप में ही दृष्टि रखी जिसके बल पर वे सदा प्रसन्न चित्त रहते हैं।

मोक्षरुचि का निर्णय- भैया ! थोड़ा यह भी सोचना होगा कि हम आपको मोक्ष चाहिये या नहीं। शब्दों से तो हर कोई कह देगा कि हाँ हाँ मोक्ष चाहिये। भगवान ने मोक्ष पाया, वह मोक्ष मुझे क्यों न मिले? परंतु मोक्ष स्वरूप का वर्णन करें उसे सुनकर हाँ कह दे तब मोक्ष की जिज्ञासा समझना चाहिये। मोक्ष क्या कहलाता है? केवल आत्मा रह गया। शरीर नहीं, परिजन नहीं, वैभव समागम कुछ भी नहीं, केवल आत्मा ही रह गया उसका नाम मोक्ष है। जो विवेकी पुरुष हैं, जिनका संसार निकट है वे भी मोक्ष की बात सुनकर अपनी अभिलाषा रखेंगे कि हां हमें तो मोक्ष चाहिये। तो मोक्ष में हुआ क्या? केवल आत्मा ही रहा। तो अब उसके भोजनपान का प्रसंग तो न रहा, कोई प्रकार का विकल्प न रहा तो वह मुक्त आत्मा अपने आपमें प्रसन्न रहता है। तो ऐसे ढंग से भी सोचें कि हम मुक्त बनेंगे और वहां फिर अनंतकाल तक सदा के लिए भोजनपान का परिहार हो जायेगा। जो बात सदा के लिए दूर हो गई उसे हम क्यों अधिक चाहे ऐसा भी तो अपने चित्त में सोचा जा सकता है। इन योगीश्वरों के उपवास की बात सोचकर और सिद्ध प्रभु के सदाकाल निराहार अनाहार रहने की बात सोकर ही अपने आपमें भी कुछ उत्साह बनायें। ये योगीश्वर बड़ी गर्मी के समय में सूर्य के सम्मुख स्थित होकर आत्मध्यान किया करते हैं, वे अपने ज्ञानसुधारस का ऐसा पान किया करते हैं कि जिस अमृतपान से वे ऐसा तृप्त रहते हैं कि ऐसी गर्मी में सूर्य के अभिमुख बैठे हुए में वे शीतल बने रहते हैं, अमृतपान किया करते हैं। ऐसी गर्मी के समय सूर्य की गर्मी में स्थित वास्तविक शूर ऐसे योगियों की मैं वंदना करता हूं।


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