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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:योगिभक्ति - श्लोक 11

From जैनकोष



वहुविहपडिमट्ठाई णिसिज्जवीरासणेक्कवासीय।

अणीट्ठिवकंडुवदीवे चत्तदेहे य वंदामि।।11।।

नानाप्रतिमायोगस्थ योगियों को नमस्कार- कहते हैं कि जो बहुत प्रकार के प्रतिमायोग से स्थित रहते हैं। जैसे कोई यह नियम ले ले कि मैं आज रात्रि भर कार्योत्सर्ग मुद्रा में खड़े रहकर ध्यान करके अपना समय बिताऊँगा अथवा गर्मी के समय में इस पर्वत पर इस शिला पर इतने पहर तक एक आसन से ध्यान में समय लगाऊँगा, ऐसे नाना प्रकार के कठिन तपश्चरण के योग को जो धारण करते हैं ऐसे योगीश्वरों को मैं वंदन करता हूं। जो नाना विशुद्ध आसनों में रहकर अधिक समय तक ध्यान किया करते हैं अथवा अनेक योगी एक मृतकासन से( मुर्दे की भाँति) पड़े हुए ध्यान करते हैं, एक करवट से लेटे हुए ध्यान करते हैं, जो एकांत में बसकर किसी का सहारा न तक कर निरपेक्ष होकर ध्यान करते है, जिन्होंने इस ममता को त्याग दिया है, देह से निराला अपना आत्मतत्त्व जिन्हें विशद ज्ञात हो रहा है, यह हूं मैं इनसे निराला। होता है कोई ऐसा विशुद्ध ज्ञान कि जिस ज्ञान में यह बात समायी रहती है कि यह मैं हूं सबसे निराला एक ज्ञानमात्र। ऐसे ज्ञानमात्र योगीश्वरों की मैं वंदना करता हूं।

योगियों का योग- योगी कहते हैं उन्हें जो अपने अंतस्तत्त्व के योग में लगे रहते हैं। कहाँ जुड़ना है? अपने आत्मा में। किसे जुडा़ना है? अपने उपयोग को प्राय: लोग जानते हैं कि हमारा उपयोग दुकान में गया, मकान में गया, घर में गया। तो यह गया- ऐसा जिसे कहते हैं वही तो उपयोग है। लोग कहते हैं कि मेरा दिमाग घर में है, वहाँ अपना क्या कुछ रह रहा पर में? अरे वह है एक ज्ञान की दशा। ज्ञान पर की ओर अभिमुख होकर पर में खींच रहा है इसको कहते हैं ज्ञान पर में चला गया। तो क्या ज्ञान बाहर में जाता है? अरे अपना उपयोग ही तो अपना वैभव है, वही अपने में से बाहर दृष्टि करके घटा दिया तो यहाँ घटी आयी कि नहीं? यही उपयोग जब आत्मस्वरूप में जुड़ जाता है, इस उपयोग का योगस्वभाव में हो जाता है तब यह समृद्धिशाली हुआ। जोड़ देने पर निधि तो बढ़ती है। उपयोग जब अपने ज्ञानस्वरूप में ठहरता है तो अपनी समृद्धि बढ़ जाती है। तो अपना उपयोग, अपना अंत:ज्ञायकस्वरूप आत्मा में जुडे़ इसका नाम है योग। ऐसे योग जो बनाये रहते हैं उन निर्ग्रंथ साधुवों को योगी कहते हैं।

सिद्ध और योगी दोनों की आराध्यता- साधु और सिद्ध दो ही तो आराध्य हैं। एक तो सिद्ध हो गये, मायने आत्मा का प्रयोजन पूर्ण हो गया, मिल गया, अब कुछ करने को बाकी नहीं रहा, वे तो हुये सिद्ध, जिसकी हम पूजा करते हैं। अरहंत के बाद सिद्ध होते हैं अरहंत भी सिद्ध ही हैं, विकास उनका भी पूर्ण है। और एक होते है साधक, जो कि सिद्ध दशा को प्राप्त करने की साधना किया करते हैं। इन ही साधकों का नाम है योगी। संसार में बस दो ही सारभूत आत्मा हैं। ऐसी वृत्ति ही सार है, परपदार्थों में लगने का काम तो असार है, उससे आत्मा का गुजारा नहीं चलता। अपने आपमें उपयोग जुडे़ तो इसमें आत्मा की भलाई है। ऐसे योगी पुरूषों का मैं मन, वचन, काय की संभाल करके वंदन करता हूं।




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