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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:योगिभक्ति - श्लोक 12

From जैनकोष



ठाणी मोणवदोए अब्भोवासी य रुक्खमूली य।

धुबकेसमंशुलो में निप्पडियम्मे यवंदामि।।12।।

कायोत्र्गासनयोगी का अभिवंदन- जो योगी पुरुष कैसे होते हैं उनका कुछ वर्णन इसमें किया है। योगी का अर्थ है आत्मा के स्वरूप को उपयोग में जोड़ने वाला। आत्मा का स्वरूप है सहजज्ञानानंद। उस स्वरूप में उपयोग जोड़ना अर्थात् ज्ञान में ज्ञान और आनंद का स्वरूप समाये रहना इसको कहते हैं योग। ऐसा जो कार्य है वह कैसा होता है? उसकी विशेषतायें बतायी जा रही है। कोई कायोत्सर्ग से ध्यान कर रहे हैं खड़े निश्चल, जैसे बाहुबलि महाराज एक वर्ष तक निश्चल खड़े रहे। आश्चर्य की बात है कि एक वर्ष तक निद्रा भी न लगी, जरा मुडे़ भी नहीं, बैठे भी नहीं, ऐसा कैसे होगा? तो आजकल भी तो हीन संहनन के धारी पुरुषों में ऐसे साहसी अब भी पाये जाते है जो 11-12 खड़े रहकर ध्यान कर सकते हैं, एक दो रात्रि दिन जागरण करते हुए ध्यान कर सकते हैं। जो विशेष उत्कृष्ट संहनन के धारी हैं उनकी बात तो अनोखी ही है। तो जो स्थानी हैं, कायोत्सर्ग से खड़े हुए हैं ऐसे योगीश्वरों का मैं वंदन करता हूं।

मौन योगियों का अभिवंदन- मौन व्रत से रहने वाले योगीयह योगियों की खास विशेषता है। न रखे वे योगी मौन तो वे बहुत कम बोलते है और जब बोलते हैं तो हित, मित, प्रिय वचन बोलते हैं। गृहस्थों को भी तो अपने आत्मस्वरूप में अपना उपयोग लगाने की बात रुचा करती है, तो उनको अपना जीवन इतना गंभीर बनाना होगा कि कम बोलें। और जब बोले तो दूसरों के हितमित प्रिय वचन बोले तो ये योगी अधिकतर मौन व्रत में रहते हैं। तीर्थंकर जब योगी होते हैं तब वे केवलज्ञान प्राप्त होने तक तो मौन व्रत से ही रहा करते हैं। ऐसे भी अनेक योगी हैं जो योग के प्रसंग में एक अपने आपको निरखते हैं, अपने आपके निकट रहते, अपने ही स्वरूप में बात करते। वे सब अंतरंग योगी हैं। तो जो मौन व्रत के धारी हैं ऐसे योगीश्वरों का हम वंदन करते हैं।

योग्यविहारी योगियों का अभिवंदन- जल तट के निकट रहने वाले अथवा आकाश में विचरने वाले ऐसे योगी एक उत्कृष्ट आत्मबल रखते हैं कि जल के तट पर शीतकाल में यत्र तत्र ठंड के दिनों में निष्कंंप होकर विराजें यह उनका बुद्धि बल है, आत्मबल है। और ऐसे ही अनुपम आत्मबल से उनके ऋद्धियां उत्पन्न होती हैं जो कि आकाश में विहार करते हैं, निर्मलता जिनके स्पष्ट विदित होती है। जो रहते हैं आकाश में या विहार करते हैं, उनके निर्मलता स्पष्ट विदित हो रही है कि इस मायामयी दुनिया से कुछ काम था ही नहीं, तो अब स्पष्ट दिखता है कि आकाश में विहार करते हैं, ऐसे तपस्वी योगीश्वर को मैं वंदन करता हूं। वृक्षमूल में विहार करने वाले योगीश्वर कितने आत्महित में निष्णात हैं। जैसे कोई पुरूष वृक्ष के नीचे रातदिन रहता है तो उसकी कैसी मुद्रा रहती है? गृहस्थ भी अगर कोई कहीं आसरा न होने से वृक्षों के नीचे रहता हो तो उसके कितना परिग्रह है, कितनी खटपट है और उसको 1 जगह छोड़कर दूसरी जगह जाना हो तो विकल्प नहीं करना पड़ता। थोड़ा उस वृक्ष के नीचे ठहरा। उसको एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष के नीचे जाने में कोई तकलीफ नहीं होती है। वह अनायास ही एक वृक्ष के नीचे से दूसरे वृक्ष के नीचे चल देता है। अथवा जैसे पक्षीगण रैनबसेरा किया करते है, अभी किसी वृक्ष पर बैठे हैं उड़कर किसी दूसरे वृक्ष पर बैठ गए। उन्हें एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर जाने में कुछ भी तकलीफ नहीं होती है। वे पक्षी अनायास ही उड़ जाते हैं। इसी तरह ये योगीश्वर हैं जो कि जंगलों में वृक्षों में निवास करते हैं। इन्हें एक जगह से दूसरी जगह जाने में रंच विलंब नहीं लगता। जब चाहे अनायास ही चल देते हैं। तो लोक में सारभूत काम यही है- अपने आत्मस्वरूप की संभाल करना, अपने आपके निकट रहकर संतुष्ट रहना। अन्य समस्त परवस्तुवों का परित्याग करें वे योगीश्वर किसी भी प्रकार की इच्छायें नहीं किया करते।

केशश्मविरक्त श्रूयोगियों का अभिवंदन- उनके योगियों केश श्मश्रुबाल आदिक भी बढ़ जाते हैं तो वे कितने निस्पृह विदित होते हैं कि जब वे बढ़ गए तो अधिक से अधिक 4 महीने तक ही रखते हैं। उसके बाद केशलुन्च करते हैं। यदि किसी साधु को चार माह का पता ही नहीं रहा, 6 माह या एक वर्ष हो गए, तो उतने दिनों में उनके बहुत बढ़ जाते हैं, तो बढ़ जाने पर कुछ व्यवहार में आयें हों तो वे उतने बड़े बाल नहीं सख सकते हैं, उन्हें केशलोंच करना होता है। तो उनमें एक कितना उच्चवैराग्य है। भले ही कोई केशलोंच करता है, लोग जुड़ गए हैं, देख रहे हैं, बड़ा साहस बताकर केशलोंच करे, लेकिन फर्क है उस एकांत में केशलोंच करने व लोगों के बीच केशलोंच करने में। यहाँ अनेक लोगों के बीच केशलोंच करते हुए में यद्यपि अंदर से उतना वैराग्य नहीं है, फिर भी लोगों को दिखाने के लिए, लोगों में अपने वैराग्य का प्रदर्शन करने के लिए वे थोड़ा कष्ट सहन करके भी बड़ी जल्दी केशलोंच करते हैं, अपनी मुखमुद्रा को प्रसन्न भी दिखाते हैं, यों उसमें बनावट की भी अनेक बातें आ जाती हैं, एकांत में जो केशलोंच होता है उसमें बनावट नहीं आ सकती है। और उस एकांत स्थान में केशलोंच करने में वीतरागभावों की पुष्टि होती है। तो ऐसे योगीश्वरों का मैं वंदन करता हूं।

निष्प्रतिकर्म योगियों का अभिवंदन- ये योगीश्वर निष्प्रतिकर्म होते हैं। उनमें कोई श्रृंगार नहीं। उन योगीजनों को जब किसी से कोई प्रयोजन नहीं रहा तो वे घर में कहाँ तक रहें, परिजनों में भी राग न रहेगा तो वे परिजन क्या उन योगीजनों के साथ चिपके रहेंगे, वस्त्रों में भी उनके राग न रहा तो वस्त्र भी उनसे चिपके न रहेंगे। राग न रहने के कारण निवृत्ति होती है तो वहाँ वही निर्ग्रंथ मुद्रा रह जाती है। उनकी मुद्रा में कोई श्रृंगार नहीं, वे निष्प्रतिकर्म हैं। वे योगीश्वर इतना भी नहीं करते कि अगर देह में मैल चढ़ा हुआ है तो खूब मलकर उस मैल को छुटाते हों। उनको शरीर को साफ रखने की दृष्टि ही नहीं है। वे जानते हैं कि यह शरीर तो एक दिन जला दिया जायगा, इसकी अधिक खुशामद करने से क्या लाभ है? हाँ चूँकि इस शरीर से धर्मसाधना का कुछ काम लेना है इसलिए इसकी थोडी़ सी संभाल रखनी चाहिए, पर इसे तैल साबुन क्रीम पाउडर वस्त्राभूषण आदि से सजाना, यही तो एक मूढ़ता भरी बात है। तो जहाँ इस शरीर को सजाने की कोई आवश्यकता ही नहीं रही वहाँ ठूठ जैसा पड़ा है। जैसा चाहे मलिन शरीर हो गया हो तो पड़ा रहने दो जैसा का तैसा, उससे तो यह मैं आत्मा बिल्कुल निराला हूं। इस देह को छोड़कर तो जाना ही है। उस देह से उन्हें ममता नहीं है, ऐसा उनका अंतरंगभाव स्वच्छ है, जिनको लगन लगी है अपने ज्ञानस्वरूप का ज्ञान करते रहने की उनको ये सब बातें फीकी लगती हैं। तो जो योगीजन श्रृंगार रहित हैं उनका मैं वंदन करता हूं।





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