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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:योगिभक्ति - श्लोक 19

From जैनकोष



आभिणिवोहियसुदओहिणणिमणणाणिसब्बणाणि।

वंदे जगप्पदोवे पग्चक्खपरोक्खणाणी य।।19।।

विशुद्धवृद्ध आभिनिवोधिक ज्ञान के धारक योगियों का अभिवंदन-इसमें ज्ञानसंपन्न योगीश्वरों को नमस्कार किया गया है। योगी आभिनिबोधिकज्ञान के स्वामी हैं ऐसे योगीश्वर होते हैं कि जिन्हें बहुत पदार्थों का ज्ञान हो, कोई ज्ञानाभ्यास नहीं करना पड़ता। यद्यपि आभिनिबोधिकज्ञान इंद्रियजंय है लेकिन सामर्थ्य ऐसी प्रकट होती है कि इसके थोडे़ व्यापार से बहुत से पदार्थों का बोध कर लेते हैं इसका नाम आभिनिबोधिक मतिज्ञान है। आभिनिबोधिक बड़ा उत्तम शब्द है। एक मतिज्ञान तो आभिनिबोधिक का एक भेद है। जैसे बताया है मतिस्मृति संज्ञा चिंता, आभिनिबोध, ये सब मतिज्ञान के अनर्थांतर शब्द हैं, अर्थात् मतिस्मृति आदिक मतिज्ञान के भेद हैं, तो जिनके ये सब मतिस्मृति स्मरण आदिक भेद हैं, उसका शुद्ध नाम है आभिनिबोधिक अर्थात् अभि और नि की पद्धति से जहां बोध होता है उसे आभिनिबोधिक कहते हैं। जो चक्षु इंद्रिय द्वारा जाना जाता है वह चक्षुइंद्रिय से ही जाना जाय, जो जिस इंद्रिय का विषय है वह पदार्थ उस इंद्रिय से ही जाना जाय ऐसा नियम जहां पड़ा है उसे नियमित ज्ञान कहते हैं और जो निमित्तनैमित्तिक पद्धति से जिस सन्निधान की आवश्यकता होती है ऐसे सन्निधान रूप अभिमुखता जहां इंद्रिय और विषय की होती है उसे कहते हैं अभिमुख से उत्पन्न हुआ ज्ञान। तो अभिमुख और नियमित पदार्थ का जहां बोध होता है उसे आभिनिबोधिक ज्ञान कहते है।

विशुद्ध वृद्ध श्रुतज्ञान के धारक योगियों का अभिवंदन- आभिनिबोधिक ज्ञान जाने हुए पदार्थ में फिर तर्कवितर्क द्वारा अन्यधर्मों का जो चिंतन किया जाता है उसे कहते हैं श्रुतज्ञान। जैसे घड़ी को आँखों से देखा तो जो देखने में आया वह तो हुआ मतिज्ञान और उसके संबंध में यह जाना कि यह घड़ी है, यह आकार है, इसमें जो भी और चिंतन चलते हैं वे हुए श्रुतज्ञान। बल्कि यह घड़ी सफेद है ऐसा जाना तो वह ज्ञान भी श्रुतज्ञान है। इसी को पहिले जाना, मगर जाना भर, यह सफेद है यह विकल्प न हो तब तो है आभिनिबोधिक का रूप और इतना भी विकल्प हो कि यह सफेद है तो वह श्रुतज्ञान बन जाता है। यदि इस ही घड़ी को कोई बकरी देखे तो उस बकरी ने जो जाना वह तो मतिज्ञान है, पर यह सफेद है, ऐसा उसने शायद न सोचा होगा या और ढंग से सोचा होगा वह है उसका श्रुतज्ञान। श्रुतज्ञान से संपन्न योगीश्वरों का मैं वंदन करता हूं, जिनका यह ज्ञान श्रुत के संबंध में बेरोकटोक चलता रहता है। यहां साधुवों की भक्ति की जा रही है। साधुवों का दूसरा नाम है योग। योगी पुरुषों के ज्ञान सच्चा रहता है। योगियों के मिथ्याज्ञान नहीं होता, तो वे सच्चे ज्ञान 5 प्रकार के हैं,- आभिनिबोधिक ज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्यायज्ञान और केवलज्ञान। ये 5 प्रकार के ज्ञान के विकास हैं। जहां इंद्रिय और मन से पदार्थों को जाना जाता है उसका नाम तो है मतिज्ञान और मतिज्ञान से जानकर फिर उसमें कुछ और विशेष जानना उसका नाम है श्रुतज्ञान। जैसे आँखों से देखा और देखते ही जान गए वह तो है मतिज्ञान, फिर उसके बारे में जानना कि यह काला है, यह नीला है ऐसे आकार का है, कहां की बनी है, ये सब श्रुतज्ञान कहलाते हैं।

अवधिज्ञानसंपन्न योगियों का अभिवंदन- तीसरा ज्ञान है अवधिज्ञान।

अवधिज्ञान की बात शास्त्रों में सुनने को मिलती है कि फलाने मुनि ने फलाने के पूर्वभव की बातें बतायीं। तो अवधिज्ञान आगे और पीछे दोनों की बातें जानता है, दूर की बात जानता है, नीचे की बात जानता है, ऊपर की बात जानता है, समस्त दिशा की बात जानता है, मगर जानता है म्याद लेकर, पूरब में इतनी दूर तक जाने, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण में इतनी इतनी दूर तक जाने, यों सीमा पड़ी रहती है, लेकिन मोटे तौर से यह जान लो कि अवधिज्ञान नीचे की बातें ज्यादा दूर तक की जानता है, ऊपर की बातें कम दूर तक की जानता है। जैसे मान लो ऊपर की बात एक लाख कोश की जाने तो नीचे की बात अरबों कोशों की जानता है। ऊपर के देव ऊपर की बातें तो बहुत कम दूर की जानते हैं मगर नीचे नरकों तक की बातें जानते हैं, तो अवधिज्ञान से रूपी पदार्थ आत्मशक्ति से बिना इंद्रिय, मन की सहायता से जान लिया जाता है। कोई पूछे कि मैं पहिले क्या था तो अवधिज्ञानी साधु पिछले भव की बातें बता देगा। एक शुद्ध अमूर्त आत्मा हो, आकाश हों, कोईसा भी पदार्थ हो, परमार्थ अमूर्त पदार्थ की बात अवधिज्ञान नहीं जान सकता। उसे तो केवलज्ञान जानेगा। दूसरे के आत्मा को अथवा आकाशदीप पर अमूर्त पदार्थों को अवधिज्ञान नहीं जान सकता है। तो ऐसे अवधिज्ञान के धारी जो योगी है उनको हमारा नमस्कार हो।

मन:पर्ययज्ञानसंपन्न योगियों का अभिवंदन- चौथे ज्ञान का नाम है मन:पर्ययज्ञान, याने तपश्चरण करके उन योगियों में ऐसा अतिशय प्रकट हुआ है कि दूसरे के मन की अत्यंत सूक्ष्म बातों को भी वे जान लेते हैं। यह पुरुष क्या सोच रहा है, कितनी दूर की बात, कितने पहिले की बात, कितने आगे की बात विचार रहा है, इन सब बातों को मन:पर्ययज्ञानी योगी जान जाते हैं। ये सब ज्ञान के विकास हैं। हम उन योगियों की चर्चा सुनकर थोड़ा यह ध्यान में लावें कि जैसा मेरा आत्मा है वैसा ही इन योगियों का आत्मा है। जाति में कुछ अंतर नहीं है जो चेतन हम हैं सो चेतन ये योगीश्वर हैं। ये योगीश्वर उच्चज्ञान के विकास के अधिकारी हो गए, हम आप लोग विषयकषाय के साधनों में पड़े हैं, उनकी अटक लगी है इसी वजह से हम आप ज्ञान का उच्चविकास नहीं कर पाते। पर यह विषयकषायों की अटक हम आपको क्या काम देगी? यह परिजनों का स्नेह, यह धन वैभव की प्रीति यह विषयकषायों की रति, इनसे हम आपका गुजारा नहीं चल सकता है। आखिर ये सब छूटेंगे, बुढा़पा आयेगा, फिर मरण अवश्य होगा, फिर आगे क्या होगा, सो तो बतावो? यदि आप कहें के बुढा़पे के बाद फिर कहीं जाकर बच्चे बनेंगे तो भाई इस भव के बच्चे तो न रहे, यदि चूहा बिल्ली आदिक के बच्चे हो गए तो फिर क्या होगा? अथवा कीट मकौड़े हो गए तो फिर क्या होगा? अथवा मनुष्य बच्चा भी हो गए तो शैथिल्य अज्ञान तो बालवत् ही होंगे, इससे इस शेष रही जिंदगी से कुछ लाभ उठा लें। जो बात इन योगियों में है वही बात हम आपमें है। फर्क इतना पड़ गया कि हम आप तो इन विषयकषायों के प्रेमी हो गए और उन योगियों ने इन विषयकषायों में लात मारी, वे इन विषयकषायों की ओर दृष्टि नहीं करते, उनका ज्ञान अत्यंत स्वच्छ हो गया है और उनमें एक ऐसा अतिशय प्रकट हुआ कि अत्यंत शांत चित्त रहते हैं और यहां हम आप लोग अशांत हैं।

विपुलमतिमन:पर्ययज्ञानी की तद्भवमोक्षगामिता का नियम- मन:पर्ययज्ञान दो तरह के होते हैं- एक ऋजुमन:पर्ययज्ञान और एक विपुलमन:पर्ययज्ञान। ऋजुमन:पर्ययज्ञान दूसरे के मन की सीधी बातों को जान जाता है। यदि वह दूसरा पुरुष मायाचारपूर्ण विचार करे तो उसके मन की बातों को ऋजुमन:पर्ययज्ञानी नहीं जान सकता। जैसे किसी को किसी के प्रति है तो हत्या करने का भाव, पर दिखावे में उससे बड़ा स्नेह दिखाता है, तो ऐसे मायाचारपूर्ण भावों को ऋजुमन:पर्ययज्ञानी नहीं जान सकता। लेकिन विपुलमन:पर्ययज्ञानी दूसरे के हर प्रकार के विचारों का ज्ञान कर लेता है। यह विपुलमन:पर्ययज्ञान इतना ऊँचा ज्ञान है कि दूसरे के मन की कठिन से कठिन बात भी जान लेता है। यह बड़ा निर्मल ज्ञान है। उसके बाद केवल ज्ञान होता है। अवधिज्ञान भी जैसे तीन तरह के होते हैं- एक देशावधिज्ञान, दूसरा सर्वावधिज्ञान और तीसरा परमावधिज्ञान। सर्वावधिज्ञान और परमावधि ज्ञान हो तो नियम से मोक्ष हो जाता है। इसी प्रकार जिसके विपुलमति मन:पर्ययज्ञान हो नियम से वह उसी भव से मोक्ष जावेगा।

केवलज्ञानी परमयोगेश्वराधिपति का अभिवंदन- अब 5 वां ज्ञान आता है केवलज्ञान। यह सबसे ऊँचा ज्ञान है। जिस भगवान को हम पूजते हैं वह केवलज्ञानी हैं। केवलज्ञानी उसे कहते हैं जो तीन लोक तीन काल की समस्त बातों को यथार्थ जान जाय। इस आत्मा में ज्ञान तो सबके उतना ही है जितना कि प्रभु में है। शक्ति देखो तो सबमें सर्वज्ञता की है, लेकिन जब हमारा काम ही विषय संबंधी है, कषायों का आवरण है तो यह ज्ञान ढका हुआ है। प्रकट नहीं हो पाता। ये कषायें मिटें, मोह मिटे तो ज्ञान प्रकट हो। अब आप सोचिये कि आपको प्रभु बनना है या संसार में रुलना है। संसार में रुलने वाले तो हैं अनगिनते तरह के और मोक्ष पाने वाले हैं सब एक तरह के। सबका एकसा ज्ञान है, एकसा आनंद है, एकसी बात है। और संसारी जीवों में देखो- किसी के कैसी कषाय है, किसी के कैसी है, सबकी अपनी-अपनी बात है। पर्यायें भी तो अनगिनते हैं। वृक्ष, पृथ्वी, जल, वायु अग्नि, कीड़ा मकोड़ा, पशु पक्षी, देव, नारकी, मनुष्य आदिक अनगिनते तरह के हैं और ये भी अपने-अपने में अनगिनते तरह के हैं। तो ये सब कई प्रकार के दु:ख भोगते हैं। तो दो बातें हैं संसार में- रुलना और मोक्ष पान। इन दो बातों में तुम्हें क्या मंजूर है? जो भी आप चाहेंगे सो मिल जायेगा, पर दिल से चाहा जाय तो यह बात होगी, इसमें कोई संदेह नहीं। आत्मा में यह रुचि हो जाय कि मुझे तो संसारमें नहीं रुलना है, मोक्ष पाना है तो वह जरूर मोक्ष पा लेगा। मोक्ष का स्वरूप जान लें और संसार का स्वरूप जान लें और इनका अंतर समझ लें कि संसार तो इसका नाम है और मोक्ष इस ज्ञानानंद के विकास का नाम है और उसमें रुचि हो जायेगी तो नियम से मुक्ति प्राप्त होगी जहां केवलज्ञान के द्वारा विशद सकल सत् जाना जाता है सदा को।

परमलाभ के उपाय की अरुचि पर विषाद- देखो तो सर्वाधिक बड़ी समृद्धि का लाभ हम आपको केवल भावों से मिलता है, कोई कठिनाई नहीं है, तो उसमें तो रुचि न जाय और विषयकषायें में ही रमते रहें तो फिर उससे उत्पन्न दु:ख कोई दूसरा तो न भोगने आयेगा। लेकिन हम आप दु:ख भी भोगते जाते हैं और उन्हीं दु:खद कार्यों में लगते भी जाते हैं। ऐसी हालत समस्त संसारी जीवों की है। कैसी शरीर में फंसे रहने में आफत है? कहां तो यह प्रभु के समान ज्ञानानंद वाला आत्मा, जो कि स्वतंत्र रहे, सुखी रहे, निर्विकल्प रहे, किसी प्रकार का क्लेश ही जहां नहीं है ऐसा विशुद्ध ज्ञानप्रकाश रहा करे, और कहां यह देह में फँसा है, बड़े क्लेश भोग रहा है। यह शरीर हाड़, मांस, चाम खून, पीप, नाक, मल, मूत्रादिक महा अपवित्र चीजों का पुतला है, ऐसे महा अपवित्र शरीरों में यह जीव फंसा हुआ है और बड़े बड़े क्लेश सहन कर रहा है। भूख प्यास की वेदनायें भी इस शरीर के कारण हैं। उसी प्रसंग में चूँकि शरीर से मोह है इसलिए रसों के स्वाद में यह जीव आसक्त हो जाता है और अपने प्रभु की सुध भी भूल जाता है। तो बड़ी विपत्ति में पड़ा है यह जीव। सम्मान अपमान के दु:ख भी यह जीव इसी शरीर में बँधे होने के कारण सहन करता है। यद्यपि अपमान है अच्छी चीज, अप हो गया है मान जिसका उसे अपमान कहते हैं। अप के मायने है नष्ट होना। तो जिसका मान बिल्कुल नष्ट हो गया, भगवान बन गया उसका नाम है अपमान, पर इस जीव ने यह बुद्धि की कि जितना ऊँचा मान संपन्न मैं चाहता था उतना नहीं प्राप्त हो सका, उसका नाम अपमान मानता है। तो इस अपमान के क्लेश का कारण भी यह शरीर है। इसी प्रकार ठंड, गर्मी, नाते रिश्ते, कुटुंब परिजन आदिक के समस्त प्रकार के क्लेशों का कारण यह शरीर है। तो इन शरीरों में बँधा होने के कारण यह जीव सदा दु:ख भोगता रहता है। जो जीव अपने से बिल्कुल भिन्न हैं उन्हें भी अपना मानकर उनसे प्रीति करते, कुछ समय तक तो परस्पर में प्रीति रहती हैं पर थोडे़ ही समय बाद वह प्रीति खत्म हो जाती है और एक दूसरे के क्लेश के कारण बने रहा करते हैं। जरा-जरासी बातों में अनेक प्रकार की खटपटें, अनेक प्रकार के विकल्प चलते रहते हैं जिससे यह जीव दु:खी रहता है। तो ये सारे दु:ख इस शरीर में बंधे होने के कारण ही इस जीव को भोगने पड़ते हैं।

अनर्थमूल शरीर की रुचि के कारण श्रेयोलाभ की अरुचि- यह शरीर समस्त अनर्थों की जड है, लेकिन उसी शरीर का इतना आदर रखते कि अपने शरीर को तो खूब आराम से रचाते और दूसरों के प्रति सेवा का भाव भी नहीं जगता। जो अपने घर के लोग हैं उनके यदि कोई प्रकार की शारीरिक वेदना हो जाय तो कहो उनके पीछे बड़ी हैरानी उठा लें पर अन्य लोगों के प्रति जरा भी दया का भाव नहीं उमड़ता। समस्त जीवों में जो यह छाँट कर ली कि ये इतने लोग तो मेरे हैं बाकी सब गैर हैं तो क्या यह जीव पर कम विपदा है? तो ये जीव इन विपदाओं को भोगते भी जाते हैं और इनमें ही चिपटते जाते हैं। बहुत बूढे़ हो गए, नाती पोते भी बहुत तंग करते, उस बूढे़ के सिर पर लदते, मूँछ पटाते, यदि कोई कहे कि अरे बाबा जी तुम क्यों बेकार में कष्ट सह रहे हो, अमुक आश्रम में रहो, अमुक त्यागियों के संग में रहो तो फिर ये नाती पोते तुम्हें हैरान न कर सकेंगे, तो वह बूढा़ यही जवाब देता है कि तुम कौन आ गए हमें बहकाने के लिए? अरे ये हमें चाहे जितना हैरान करें, पर ये हमारे नाती पोते ही रहेंगे और हम इनके बब्बा ही कहलायेंगे। तो ऐसा मान रखा है नाता रिश्ता कि बिल्कुल सच मालूम होता है। तो ये जीव जिन बातों से दु:खी भी होते जाते हैं उन्हीं बातों को छोड़ना भी नहीं चाहते। ऐसा मोह लगा है, ऐसी कषाय लगी है जिसकी वजह से हम आपका स्वरूप भगवान की तरह होने पर भी अपने स्वरूप का विकास नहीं कर पाते। अब मोक्ष पाना है कि संसार में रुलना है- इन दो बातों का विचार करना है। मोक्ष में तो है अनंत आनंद ही आनंद, क्योंकि मोक्ष हो गया, कर्म दूर हो गए, अब शरीर न मिलेंगे, अब कर्म न चिपकेंगे, निरंतर सर्वज्ञ रहेंगे और अनंत आनंद वाले रहेंगे बताओ यह स्थिति पसंद है या मोह करके संसार की विधि बनाने की बात पसंद है? एक बार तो सभी कोई कह देंगे कि मोक्ष पाने की बात अच्छी है, भगवान होने की बात अच्छी है किंतु उसका प्रयोग करने का जब कुछ प्रारंभ करेंगे तो वहाँ ये मोही जीव फिसल जाते हैं। सोचते हैं कि क्या घर में धर्म नहीं बनता। घर में रहकर भी ऊँचे ऊँचे धर्म पाल लिए जाते हैं। बाद में बार बार फिसल जाते है। मोक्ष जैसी ऊँची स्थिति पाने की बात मन में नहीं आ पाती।

केवलज्ञानी प्रभु की सभक्ति वंदना- जिन प्रभु की हम आप पूजा करते हैं उन्होंने कितनी उच्च स्थिति प्राप्त की है, उन प्रभु का पूजन करते समय इस बात का चिंतन करें कि धन्य हैं ये प्रभु, इन्होंने कैसी उच्च स्थिति प्राप्त की है। हमको भी इनकी ही जैसी स्थिति प्राप्त करनी है। यदि ऐसा चिंतन किया जाय तो वह तो वास्तविक भक्ति हुई और यदि अपने परिवार के सुखी रखने के लिए, अर्थ लाभ के लिए, परिजनों के खुश रखने के लिए भगवान की भक्ति की जा रही है तो वह प्रभु की वास्तविक भक्ति नहीं कहलाती। ये प्रभु हैं केवलज्ञानी। केवलज्ञान के द्वारा समस्त लोकालोक को उन्होंने जान लिया है। ऐसे ही केवलज्ञान के धारण करने वाले योगियों को हमारा नमस्कार हो। यद्यपि केवलज्ञानी योगी का नाम अरहंत प्रभु है लेकिन वे भी योगी कहलाते हैं। जहां साधुवों के 5 भेद बताये हैं- पुलाक, बकुश, कुशील, निर्ग्रंथ और स्नातक। तो स्नातक नाम है अरहंत का। साधुवों के भेद में उन्हें योगी कह दिया तो वे परमयोगी हैं। जिन्होंने अपने आत्मस्वरूप में योग किया है, जोड़ किया है उपयोग को ऐसा एक रस लगा दिया है कि केवलज्ञान हो गया है उन्हें परमयोगी भी कहते हैं और अरहंत भी कहते हैं। ये सब योगी जगत को जानने के लिए प्रदीप के समान हैं, जैसे दीप सबको प्रकाशित करता है ऐसे ही यह योगी समस्त पदार्थों को यथार्थ स्पष्ट जानते हैं।

आत्मनिर्णय में ही शांतिमार्ग की प्राप्ति- भैया मैं क्या हूं और जगत क्या है? इस निर्णय में ही शांति का मार्ग पड़ा है। यह निर्णय सोच लो, है या नहीं। यदि वह निर्णय नहीं है तब बेकार है जिंदगी। उन परिजनों के मोह से लाभ क्या मिलेगा? विकल्प किए जा रहे, अपनी बुद्धि खो रहे, अपनी जिंदगी भी खो रहे, लाभ कुछ नहीं मिल रहा। लाभ इसी निर्णय में है और ऐसा ज्ञान बनाने में है कि मुझे तो आत्मलाभ लेना है, गुप्त ही गुप्त, कोई मत जानो मुझे, क्यों किसी को जानना, कोई यदि मेरा नाम लेता है, मेरी प्रशंसा करता है तो यह मैं स्वयं अपनी सुध खोकर अपने से चिगकर विकल्पजाल में उलझ जाता हूं, जहाँ तत्त्व कुछ नहीं, सार कुछ नहीं। इन मोही जीवों ने पर्यायबुद्धि का कुछ परिचय किया है, कुछ मेरा नाम गाया है, कुछ मेरी नामवरी बनायी है तो असार बातें हैं, उन असार बातों को सुनकर, देखकर, समझकर हम अपने स्वरूप से चिगकर अपने सारभूत ऐश्वर्य का विनाश कर डालते हैं। तो उसमें तत्त्व हमें क्या मिला? ऐसी स्थिति बनती है तो बहुत ही उत्तम है कि मैं किसी के परिचय में न आऊँ, किसी का परिचय ही न करूँ। और अगर होती है जानकारी तो वहाँ बल बढ़ाना चाहिये कि जान गए लोग तो किसे जान गए? इस शरीर को जान गए, मेरे को तो नहीं जान गए। यदि कोई लोग भला कह रहे हैं, मेरी कुछ प्रशंसा कर रहे हैं तो वास्तव में वे मेरी प्रशंसा नहीं कर रहे बल्कि उनकी दृष्टि इस शरीर पर है, इस शरीर की वे प्रशंसा कर रहे। यह शरीर मैं हूं नहीं। ये लोग तो इस शरीर की (परपदार्थ की) दृष्टि रखकर कुछ कह रहे हैं। इस प्रकार का ज्ञानबल बढायें, अगर परिचय हुआ है तो ज्ञानबल होना चाहिए और परिचय न करें, अपने में गुप्त रहें तो बहुत ही सहज ढंग से अपने आपके कल्याण की बात मिल जाती है। तो इन व्यासंगों से, इन विकल्पों से हमारा जो यह परमात्मस्वरूप है यह परमात्मस्वरूप ढक गया है। यह उघड़ रहा है इन योगियों के। इसी कारण ये योगी वंदनीय हैं। तो यों उत्कृष्टज्ञान के अधिकारी योगीश्वरों का मैं वंदन करता हूं।


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