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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:योगिभक्ति - श्लोक 20

From जैनकोष



आयासतंतुजलसेढिचारणे जंघचारणे वंदे।

विउवणइड़ढिपहाणे विज्जाहरपण्णमवणे च।।20।।

अनेक चारण ऋद्धियों के धारक योगियों का अभिवंदन- जो संसार, शरीर, भोगों से विरक्त हैं केवल ज्ञानस्वरूप मैं हूं- इस प्रकार की जिनकी दृष्टि और धुन बन गयी है, इसी कारण जिनमें क्षमा, मार्दव आदिक दस प्रकार के धर्म उत्कृष्टरूप से प्रकट हो रहे हैं उन योगियों का ऐसा प्रताप है, ऐसा परम तपश्चरण प्रसिद्ध है कि इनमें अनेक ऋद्धियाँ उत्पन्न हो जाती है। अभी ऊपर के छंद में ज्ञानऋद्धि का वर्णन था। अब यहाँ अन्य ऋद्धियों की बात बता रहे हैं। ऐसी ऋद्धियाँ पैदा हो जाती हैं कि वे आकाश में विहार करने लगते हैं। कोई योगी आकाश में कदम रखकर चल रहे हैं और कोई बिना कदम रखे यों ही चल रहे हैं, ऐसी ऋद्धियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। कोई योगी तंतुचरण ऋद्धि के धारी हैं। एक सूत पर चलते हैं, अथवा सूत पर ही क्यों, कमल की डंडी तोड़ने पर जो उसमें से अत्यंत पतले तार निकलते हैं उन पर वे योगी चलते हैं पर वे तार टूटते नहीं। यों ही समझिये कि वे आकाश में भी चलते हैं, ऐसी ऐसी विशेष ऋद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं। कुछ योगी जलचारण ऋद्धिधारी होते हैं। पानी पर चलते जायें पर पानी का स्पर्श भी न करे, ऐसे भी जलचारण ऋद्धिधारी योगी होते हैं। कुछ योगी आकाश श्रेणियों में यों ही चले जाते हैं। कोई जंघा के बल से ही चले जाते हैं, कदम भी नहीं रखते आकाश में। जैसे कुछ लोग मानते हैं कि हनूमान जी ऐसे पहाड़ लिए हुए उड़े चले जा रहे थे, ऐसे ही वे योगी जंघा के बल से आकाश में उड़ते रहते हैं। देखिये ऐसे नाना प्रकार की ऋद्धियों के धारी योगी हैं जिनमें बुद्धिक बल भी अतिशय प्रकट हुआ है। चाहे थोड़ा पढ़े अथवा न भी कुछ पढ़े फिर भी उनका ज्ञान अपने आप विकसित होता जाता है। ऐसे अनेक प्रकार के ज्ञानों को भी जिन्होंने प्रकट किया है ऐसे योगियों की हम वंदना करते हैं।

योगियों के योग की उपासना- योगियों की वंदना करते समय हमें उनके योग पर अधिक ध्यान देना चाहिए। धन्य है वह योग जिसके प्रताप से ये योगी इतने उत्कृष्ट विकास वाले हैं। वे योगी क्या हैं? कि बाह्यपदार्थों से मोह छोड़कर परपदार्थों की उपेक्षा करके रागद्वेष हर्ष विषाद की परिणति में न उलझकर एक अपने सहज ज्ञानस्वरूप की आराधना करना इसका नाम है योग, जो बिल्कुल सुगम है, सीधा है। यह आत्मा खुद ही तो धर्म करने वाला है और खुद का ही ध्यान किया जाना है। तो यहाँ कुछ अंतर तो नहीं है जो हमारे उपयोग से कुछ सरकना पडे़, कुछ कहीं जाना पडे़, जानने के लिए यह उपयोग ज्ञानस्वरूप है ही हमारा और ज्ञानस्वरूप को ही हमें जानना है। तो यह ज्ञानयोग की हम खुद को जान जायें, इसमें कुछ कहीं जाना नहीं, श्रम करना नहीं। एक भाव भर भी बात है। तो ज्ञान के द्वारा ज्ञान के स्वरूप को जानते रहना यह योग किया है इन योगियों ने। जिस ज्ञानयोग के प्रताप से ऐसी महिमा प्रकट हुई है, ऐसी ऋद्धि उत्पन्न हो जाती है तो इन योगियों की वंदना करते समय हमें उस योग की महिमा पर ध्यान देना चाहिये, वह योग मेरे द्वारा भी किया जा सकता है, जैसा उन योगियों का आत्मा है ऐसा ही मेरा आत्मा है बल बढायें और इन विषयकषायों को असार जानवर इनकी उपेक्षा करें तो हम अपने ज्ञान का योग बना सकते हैं और अपने इस दुर्लभ मावनजीवन को सफल कर सकते अन्यथा तो जैसे संसार में रुलते आये वही रुलना बना रहेगा। संसार का रुलना पसंद न करें, मोक्ष पाने की बात पसंद करें और उसका ही यत्न करने का भाव रखें।


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