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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:योगिभक्ति - श्लोक 8

From जैनकोष



एयारसंगसुदसायरपारगे बारसंगसुदणिउणे।

बारसवितवणिरदे तेरसकिरिया दरे वंदे।।8।।

एकादशांगज्ञाता, द्वादशांगनिष्णात, त्रयोदशक्रियापालक योगियों की उपासना- यहाँ संख्या विशेषण लेकर वर्णन कर रहे हैं। जब 10 संख्या के बाद के ये 11 अंग के श्रुतसागर के पार पहुंचे हैं अर्थात् 11 अंगश्रुत के ज्ञाता हैं, ऐसा कहकर उनकी वंदना कर रहे हैं। 12 वें में कहा कि द्वादशांग श्रुत में जो निष्णात हैं उनकी वंदना कर रहे हैं। जो निज तत्त्व के स्वरूप का बोध है वह तो सबके एक समान है किंतु अन्य जो ज्ञान का फैलाव है वह अपने क्षयोपशम के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार का है। अनेक योगी एक दो ही अंग के ज्ञाता होते हैं। कोई नहीं भी ज्ञाता होते हैं फिर भी वे श्रुत के और श्रुत के मर्म के ज्ञाता होते हैं। ये द्वादशांगश्रुत में पूर्ण निपुण हैं उनकी हम वंदना करते हैं। वे योगी 12 प्रकार के तपश्चरण में रत हैं- 6 प्रकार के बाह्य तप उपवास, ऊनोदर व्रतपरिसंख्यान, रसपरित्याग, एकांत स्थान में निवास, कायक्लेश आदिेक नाना प्रकार के तपश्चरण ये बाह्य तपश्चरण हैं, और अंतरंग तपश्चरण हैं- प्रायश्चित्त ग्रहण, गुरूजनों की उपासना विनय आदिक करना, उनकी सेवा शुश्रूषा करना, स्वाध्याय करना, ममत्व त्यागना ध्यान में बढ़ना आदिक। ये अपने सब प्रकार के तपश्चरणों में शुद्धता को बनाये हुए हैं, ऐसे ये योगीश्वर हैं। योगेश्वर 13 प्रकार की क्रियावों का आदर रखते हैं। क्रियावों का अर्थ है यहाँ चारित्र। 13 प्रकार के चारित्र नहीं हैं किंतु वे अंग हैं। जैसे सम्यग्दर्शन के 8 अंग बताये गए। तो 8 अंगों का जो समुदाय है वह पूरा अंगी है। जैसे- सम्यग्दर्शन के 8 अंग कहे हैं इसी प्रकार ये 13 सम्यक्चारित्र अंग हैं। 5 महाव्रत, 5 समिति और 3 गुप्ति। महाव्रतों में पापों का सर्वथा त्याग है। समिति में सावधानीपूर्वक अपनी सारी प्रवृत्ति है। और गुप्ति में मन, वचन, काय की सर्वचेष्टावों की निवृत्ति है। ऐसे 13 प्रकार के चारित्र का जिनके आदर है वे योगीजन उन चारित्रों की बड़ी संभाल रखते हैं, उन चारित्रों का बड़ा आदर करते हैं - इतना करने से ही यह सिद्ध हुआ कि 12 अंगों के चरित्र के पालनहार हैं। ऐसे चरित्रमूर्ति योगीश्वरों की मैं वंदना करता हूं।


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