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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 22

From जैनकोष



आपगासागरस्नानमुच्च्य: सिकताश्मनां ।

गिरिपातोऽग्निपातश्च लोकमूढ़ं निगद्यते ।।22।।

लोकमूढ़ता में नदी समुद्र में स्नान करने में धर्म की मान्यता―अब इस प्रसंग में उन मूढ़तावों का वर्णन करेंगे जिन परिणामों के रहते सम्यक्त्व होता नहीं । उन मूढ़तावों में यह प्रथम मूढ़ता है लोकमूढ़ता । इस शब्द से अर्थ निकलता है कि दुनिया के लोग जहाँ बह रहे है जिन-जिन अधर्म वृत्तियों में धर्म की मान्यता कर रहे उन्हीं के पीछे खुद लग जाना और खुद भी वैसा मान लेना यह लोकमूढ़ता कहलाती है । जैसे लौकिकजन नदी में स्नान करने से धर्म मानते ऐसे गंगा, यमुना, नर्मदा, सिंधु और-और भी ले लीजिए । ये सब बहुत दूर हों तो अपने ही गांव के पास का नाला ले लीजिए जहाँ कहीं भी स्नान करने में धर्म मानना यह लोकमूढ़ता है । भला सोचिये नहाया गया शरीर में धर्म मिलेगा क्या? जो शरीर खुद अपवित्र है । उसको कितना ही धोवो क्या वहाँ धर्म बन जायगा? क्या पवित्रता बन जायगी? जैसे मल से ही तो बनाया हुआ घड़ा हो और उसमें मल ही रखा हो और ऐसे घड़े को धोकर कोई पवित्रता लाना चाहे तो यह कितनी मूढ़ता भरी बात है । तो ऐसे ही देखिये―यह शरीर मल बीज है मल योनि है और झरते हुए मल का घर है । मल से ही तो शरीर बना । क्या सोना चांदी से शरीर बना? अरे माता पिता के रज वीर्य से, और-और भी ऐसे ही आहारादिक से ये सब शरीर की रचनायें हुई । तो पहले तो इनका कारण ही देखिये―गंदा है, और फिर यह बनेगा क्या? यह मल ही बनेगा । मल की ही योनि है । मल का ही उत्पादक है, और निरंतर मल ही झरता रहता है । इस शरीर में कोईसा भी हिस्सा ऐसा तो बताओ जो कुछ लोक में भी ठीक माना जाता हो । लोग चाम, खून, मांस, हड्डी, चर्बी और जो-जो कुछ भी अंदर है वह सब अशुचि है । ऐसे अपवित्र देह को नदी में नहलवा कर जो तृप्त हो जाता कि मैने धर्म कर लिया, यह उसकी कितनी विपरीत बात है । जिसको अपने अमूर्त अविकार ज्ञानस्वरूप की तो खबर नहीं, देह में ही आपा मान रहे हैं और धर्म होगा, मोक्ष मिलेगा, इस आशा से नदियों में स्नान करने में धर्म मानते है तो भला बतलावो धर्म मार्ग से कितने विपरीत ख्याल है?

शरीर की अशुचिता का और चित्रण―यह शरीर तो इतना अपवित्र है कि जिस शरीर पर कोई चीज लेप दें तो वह चीज भी कुछ गंदी मानी जाती । जैसे फूलमाला पहिन ली और मालूम पड़ गया कि इसकी पहिनी हुई है तो फिर उस माला को कोई पहिनता नहीं है । शरीर पर तेल लगा लिया, अधिक लग गया तो अब वह अधिक लगा हुआ तैल पोंछकर कोई दूसरा व्यक्ति नहीं लगा सकता, किसी टप में कोई स्नान कर ले तो उस स्नान किये हुए जल से कोई दूसरा नहीं नहाना पसंद करता, शरीर पर किसी ने चंदन का लेप किया हो तो उसे पोंछ कर कोई दूसरा नहीं लगाना पसंद करता । तो ऐसा अपवित्र यह शरीर है । और भी देखिये इस शरीर के मल । कान से निकला हुआ मल मायने कनेऊ यह इतना गंदा है कि कोई इसे छूना नहीं चाहता । अब उसके नीचे चलो तो मिली आँख । आंख का कीचड़ कान के कनेऊ से भी अधिक गंदा माना जाता । उसके नीचे है नाक । नाक की नाक उस आँख के कीचड़ से भी अधिक गंदी मानी जाती । और नीचे चलो तो मुख के कफ लार आदिक उससे भी गंदे माने जाते और नीचे चलो तो मलमूत्र और भी अधिक गंदे माने जाते । और फिर इस शरीर के भीतर देखते जाइये तो खून, मांस, मज्जा, आदिक सब गंदी ही चीजें मिलेंगी । ऐसे इस महा अपवित्र शरीर पुतले को नहलवा कर मानना कि मैं धर्म कर रहा तो वह उनका कितना गलत ख्याल है ।

देवादिविनय के लिए गृहस्थ को नहाकर पूजा विधान करने की आवश्यकता होने पर ज्ञानी की रत्नत्रयभाव में ही धर्मत्व की आस्था―गृहस्थी में रहकर सामान्यतया नहाना सो तो ठीक है, यह कर्तव्य माना जाता । क्योंकि बिना नहाये मंदिर आकर पूजा पाठ करने में चित्त नहीं लगता । उसका कारण यह है कि जहाँ अनेक गंदी बातें करते रहते हैं अनेक पाप के कार्य करते, भोग साधनों के पाप करते, रागद्वेष मोहादिक के कितने ही पाप करते तो समझिये कि जहाँ मन इतना अपवित्र हो गया है वहाँ बिना नहाये धोये पूजा पाठ आदि धार्मिक कार्यों में मन कैसे लग सकता है? इससे स्नान करना यह तो भगवान के विनय में शामिल है । अब कोई स्नान कर लेने को ही एक धर्म मान लें कि मैने धर्म कर लिया तो यह तो उचित नहीं है ख्याल, पर भगवान की पूजा पाठ आदि स्नान करके करना यह तो विनय में शामिल है इसलिए गृहस्थी में स्नान करना यह रोज का कर्त्तव्य है ताकि विनय पूर्वक और चित्त के समाधान पूर्वक धर्मसाधना कर सके, पर धर्म मानता तो आत्मा के श्रद्धान ज्ञान और कर सके पर धर्म मानना तो आत्मा के श्रद्धान ज्ञान और आचरण में हैं । दूसरा कोई धर्म नहीं है, मायने मोक्ष का मार्ग अन्य नहीं है । सो यह लोकमूढ़ता के प्रकरण में कह रहे है कि नदी में स्नान करके धर्म मानना और उसके पर्व बनाना उसका जलसा करना आदिक भीतर धर्म की कल्पना करना यह तो लोकमूढ़ता कहलाती है । अरे आत्मन् ! तू आत्मा है अमूर्त है, कर्म उपाधि के वश से तेरे में विकार जगा है, तू अपवित्र बन रहा है तो अपने अमूर्त स्वरूप का ध्यान धर । अविकार स्वरूप से रुचि कर तो ये तेरी बाह्य कल्पनायें, ये बाह्य विकार ये सब दूर हो जायेंगे । पर गंदे शरीर को नहला कर धर्म मानने की बात बिल्कुल मूढ़ता की है । जैसे रिवाज चलाना कि जब धुला कपड़ा किसे दूसरे से छू गया तो वह कपड़ा अशुद्ध हो गया, उसे बदलकर दूसरा शुद्ध कपड़ा पहिनने पर शुद्धि बन पाती, ऐसा लोक व्यवहार में मानते । तो ऐसा अपवित्र है यह शरीर कि जिसके छू जाने पर कपड़े तक अशुद्ध माने जाते । तो इसके नहाने में धर्म मानना मूढ़ता है ।

शरीर की सजावट के अनुराग की मूढ़ता―साथ ही एक बात और ध्यान में रखें । इस शरीर से प्रेम करना भी मूढ़ता है । इस शरीर को अनेक प्रकार के वस्त्रों तथा आभूषणों से सजाना और बड़ा खुश होना मैं कैसा सज गया, मैं कैसा शृंगार में आ गया इससे मिथ्यात्व पुष्ट होता है । अरे यह शरीर सजाने के लिए नहीं मिला, किंतु रत्नत्रय धर्म का पालन करने के लिए मिला, ऐसा अपने चित्त में निर्णय रखें । करना सब पड़ता हैं । बताओ कपड़े पहिनने पड़ते कि नहीं । कपड़े पहिनकर उनमें बड़ी छांट करना कि मेरी इस कटिंग की कमीज हो, ऐसा कोट हो, ऐसे रंग का हो, नये फैशन का हो, उसको पहिनकर गौरव अनुभव करना कि मैं बहुत ठीक हूँ । यह सब मिथ्यात्व को पुष्ट करने वाली बात है । लग रहा होगा ठीकठीक मगर उसके लगाव राग में बड़े ऐब भरे हैं । हां शरीर को थोड़ा बहुत सजाकर रखना भी पड़ता बाल बढ़ गये तो कटाना भी पड़ता, कपड़े साफ स्वच्छ पहनने पड़ते शरीर की भी- सफाई व्यवहार में रखनी पड़ती, यों साधारण रूप से जितनी सफाई चाहिए वह तो ठीक है, पर इस शरीर को भारी सजाना इसे देखकर खुश होना यह तो मिथ्यात्व को पुष्ट करने वाली बात है । सात्विक ढंग से रहना और धर्मधारण के लिए अपना उपयोग लगाना यह कर्त्तव्य होना चाहिए । और धर्म क्या? ज्ञान ज्ञानस्वरूप अंतस्तत्त्व का ज्ञान होना यह धर्म है । जहाँ आत्मज्ञान नहीं वहाँ धर्म की गंध नहीं । उसका परिचय कीजिए । धन मिले, धन जुड़े इस बात को तो आप उदय पर छोड़िये । थोड़ा बहुत उद्यम तो करना ही पड़ेगा मगर उद्यम से क्या लाभ नहीं होता यदि पुण्योदय नहीं है तो । सो अपने धर्म को सम्हालो उसके होते हुए पुण्य भी बनता है, उसके उदय में साधन भी जुटते हैं, किंतु कोई धर्म की तो प्रभावना ही न करे और मात्र यह धन जोड़ लिया, इसको ऐसा कर दिया, इसी-इसी में ही अगर रात दिन चित्त उलझे तो समझो कि उसका जीवन व्यर्थ ही गया । जीवन उसका सत्य है जो रत्नत्रय धर्म का पालन बनाये पर उसके खिलाफ लोक रीतियों में फंसा रहे तो वह तो लोकमूढ़ता स्पष्ट है ।

व्यवहार में लौकिक शुद्धियां करने पर भी ज्ञानी का रत्नत्रयभाव से आत्मशुद्धि का लक्ष्य―देखिये लौकिक पवित्रता भी करनी पड़ती है मगर उसमें आत्मा का धर्म माना नहीं जा रहा । जब रह रहे है और अनेक अशुचि कार्य बन रहे हैं तो लौकिक शुचि चाहिए पर उस लौकिक शुचि से लोक व्यवहार में ही एक मन की समझावट बनती हैं और जब मन कुछ समाधान में है तो धर्म कर सकता । एक बार कोई विद्वान ‘गंगा स्नान’ नामक विषय पर व्याख्यान दे रहा था । उससे जब अनेक कुछ दलीलें देते न बनी तो अंत में एक दलील यह पेश की कि गंगा स्नान करने से शरीर हल्का हो जाता है । शरीर के हल्के होने से जब कोई पुरुष ध्यान करने बैठेगा तो उसका मन ध्यान में लग जाता है । यों कितनी ही बातों की दलील पेश की जाय मगर यह समझो कि स्नान करना तो एक कर्त्तव्य में शामिल हो गया, उससे कहीं धर्म नहीं हो जाता । जहाँ मोह ममता के प्रसंगों के कारण बहुतसा बोझ लाद लिया तो उसका चित्त बदलने के लिए कौनसा कार्य है ऐसा कि जिससे मुड़ जाय? तो वह है स्नान आप देख लीजिए बैठे है विधान होना है, पूजन होना है तो उस समय यदि आप स्नान करके आयेंगे तो आपके भावों में बड़ी विशुद्धि रहेगी और यदि स्नान नहीं किया है तो भावों में विशुद्धि न आयगी । स्नान करके एक मन समझावट बनी ओर उसके बाद धर्ममार्ग में लगे । तो लौकिक दृष्टि से भी आवश्यकता तो है स्नान की पर उसको लोक में ही आवश्यक समझना बस इतना अर्थ है लौकिक शुद्धि में । लोकोत्तर शुद्धि, आत्मस्वरूप का ध्यान, मनन, स्मरण अनुभव ये लोकोत्तर शुद्धियां है । जहाँ जहां राग लगा, द्वेष लगा कषाय लगी है उन सबको दूर करना और अपने आपको विकाररहित अनुभव करना यह है लोकोत्तर शुद्धि ।

संसरणरीति को बदलकर मोक्षपद्धति के मार्ग पर लगने का संदेश―थोड़ा सोचिये तो सही―जिस रंग ढंग से संसार में चले आये हैं, आज मनुष्यजीवन में भी बनाये रहे जन्मे, बड़े हुए धन कमाने की कलायें सीखी, कमा रहे घर में, मोह में मुग्ध हो रहे बस इतना ही तो लक्ष्य है, ख्याल है इससे आगे का ध्यान ही नहीं । जब कभी भगवान का नाम लेने लगते तो कहीं आत्मरुचि के कारण नहीं लेते किंतु दुखों से ऊबकर भगवान का नाम लेते बस यदि यही रफ्तार चलती रही तो बताओ इस जीवन में कल्याण का क्या उपाय किया? अब कुछ कदम उठाना चाहिए मोक्ष मार्ग का, जिसका प्रथम उपाय है सम्यग्दर्शन लाभ । और उसके यत्न में स्वाध्याय अध्ययन सत्संग के तीन बातें चाहिए । सो कितनी ही उम्र हो जाय अपने की इस काम के लिए बालक समझिये । अब हम शुरू करते हैं मोक्षमार्ग की पढ़ाई । एक प्रेक्टिकल तो ऐसे तत्त्वज्ञान द्वारा अपने आप में ज्ञान की वृत्ति करना और उसमें ही तृप्त रहना, बाह्य प्रसंगों के लालच तृष्णा आदि से दूर हो जाना, यह लक्ष्य में बन जाय तो धर्म का मार्ग पा लेना कोई कठिन बात नहीं । वह तो अपनी चीज है । निज की निज में दुविधा ही क्या? कोई पर की चीज लेना चाहता हो तो उसमें कष्ट है । सो स्वाध्याय, सत्संग और अध्ययन द्वारा ज्ञानविकास कीजिए और उस ज्ञान में तृप्त रहने का लक्ष्य बनाइये ।

सम्यक्त्व और चारित्र से आत्मशुद्धि―इस ग्रंथ में समीचीन धर्म कहने की प्रतिज्ञा की है । इसका नाम है रत्नकरंड । पूरा नाम इतना ही है, चूंकि इस रत्नकरंड में श्रावकाचार का अधिक वर्णन है इसलिए उस नाम के आगे श्रावकाचार और बोलने लगते हैं । पूर्ण नाम है रत्नकरंड, याने यह ग्रंथ स्वयं रत्नों का पिटारा है, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र यह ही धर्म है जिससे यह जीव संसार के दुखों छूटकर मोक्ष में पहुंचते है । सम्यग्दर्शन क्या? आत्मा का अपने आप अपने ही सत्त्व के कारण जो स्वयं सहजस्वरूप है उस रूप में अपना दर्शन करना अपना परिचय करना, अपने को मानना यह है सम्यग्दर्शन । मैं यह हूँ । अपने स्वरूपास्तित्व मात्र से जो अपने में बात है उस ही को स्वीकार करने वाला पुरुष स्वयं आत्म चरण की ओर बढ़ता है, विशुद्ध ज्ञान उसके बर्तता है और इस भीतरी प्रेरणा के कारण इसकी उस ओर ऐसी अभिमुखता होती है कि जो रूप लाद रखा है अनादि से जो परिग्रह संग समागम लाद रखा है, जो आरंभ परिग्रह की समता करके बढ़ा रखा है उन सबमें हीनता, उनका त्याग, उनसे छुटकारा होता है । बस इस ही आरंभ परिग्रह से छुटकारा होने का नाम है अणुव्रत, महाव्रत आदिक । सो उन परिस्थितियों में रहकर यह जीव अपने स्वभाव की आराधना में सफल होता है । जिसका व्यवहार धर्म ही गलत है, जो लोक मूढ़ता में रंगा हुआ है, जैसे नदी में स्नान करना । स्नान कराना किसे? इस अशुचि शरीर को और उसमें एक सुना सुनी धर्म मानते है । धर्म क्या है? उसे मानना है यह बात नहीं बनती इसका वक्तव्य नहीं बनता किंतु सुना सुनी धर्म होता है यह मान लिया । यद्यपि लौकिक शुद्धियां 8 है और वे की जाती है गृहस्थदशा में न करें तो मन पवित्र या पात्र नहीं रहता कि वह धर्म मार्ग में चले । लेकिन लौकिक शुद्धि तो साक्षात् हैं आत्मा का दर्शन ज्ञान चारित्र यही है धर्म ।

किन्हीं की लौकिक शुद्धि आवश्यक होकर भी लोकोत्तर शुद्धि में ही धर्मत्व की मान्यता―लौकिक शुद्धियां 8 हैं―(1) कालशौच―समय गुजर गया तो अपने आप पवित्रता बन गई । जैसे किसी चटाई पर कोई महिला बैठी है, उस महिला के तुरंत उठने के बाद उस समय चटाई पर कोई व्रती या मुनि बैठना पसंद नहीं करता और कुछ काल गुजरने पर फिर वही चटाई उनकी दृष्टि में पवित्र बन जाती । यह सब लोक व्यवहार । व्यवहार रहते हुए व्यवहार के कार्य छोड़कर रहने में अनर्थ होगा । जितनी बाड़ बताया है ज्ञान की बाड़ इनमें बचें और प्रवृत्तियां इनमें रहे, इन्हें करें, ये सब आत्मा की पात्रता बनाते हैं । एक संस्कार बनाते है और उस बीच सुरक्षित रहकर फिर अपने ज्ञानस्वभाव की दृष्टि द्वारा अपने आप में रमने का पौरुष होना यह है वह तीक्ष्ण शस्त्र, जिसके बल से कर्मो का क्षय होता है । (2) दूसरी शुद्धि है अग्नि शौच । बर्तनों को आग से तपा लिया, बस मन ने मान लिया कि अब बर्तन शुद्ध हो गये वे व्रती साधुजनों के या शोध वाले के वे बर्तन काम आने लगे । तो यह अग्नि शौच शुद्धि करने से एक मन की ग्लानि मिट गई । तब देखिये और ढंग का संस्कार बन जाता है । अगर कोई इसी को ही धर्म मान ले ऐसी छुवाछूत ऐसी शुद्धि ऐसा फलाना वह एक व्यवहार में पवित्रता है उसके बिना भी गुजारा नहीं है कि हम आगे बढ़ सकें लेकिन वही है धर्म ऐसी मान्यता रखना गलत है, वह तो फिर वहीं अटक जायगा आगे न बढ़ सकेगा । तो लोक शुद्धि आवश्यक है जिनको उन्हें आवश्यक है, पर दृष्टि विशुद्ध होनी चाहिये कि धर्म क्या चीज है, कहां हमें जाना है, कहां हमें पहुंचना है और कहां हमें रमना है । (3) तीसरी शुद्धि भस्मशौच―राख से शुद्ध कर लेना । जैसे जूठे बर्तनों को राख से मल लिया गया तो भस्म शुद्धि हो गई । अब उसे कोई पानी से ही धो ले और उसमें ही खाने पीने लगे तो एक व्यवहार की बाड़ बन जाने से अन्य प्रकार की स्वच्छंदता बढ़ने लगेगी । और मन भी गवाही देता है कि उसको राख से मलकर शुद्ध कर लो । व्यवहार की बात उपयोगी है मगर यही करते रहना यही धर्म है, यही ठीक है, उस शुद्ध-शुद्ध में ही दृष्टि रहना और यह पता ही न रहना कि किसलिए हमें क्या करना था, तो वह आगे प्रगति नहीं कर सकता । लोकमूढ़ता की बात कही जा रही है जो इन अनेक बातों में धर्म मानकर व्यवहार शुद्धि करना लोकमूढ़ता नहीं है । तब प्रकरण पाकर बतला रहे हैं कि व्यवहार शुद्धि आवश्यक होकर भी उस ही को कोई लक्ष्य मान ले तो वह तो वहीं रुक गया और उसका कुछ ठिकाना न रहा । (4) चौथी लौकिक शुद्धि है मृत्तिका शौच । अब इसी के अंदर देख लीजिए । कोई शौच हो आया, तो उसने हाथ को साबुन से धो लिया, दूसरे ने मिट्टी से धो लिया तीसरे ने यों ही खाली पानी से धो लिया, तो इनमें जिसने मिट्टी से हाथ धोया उसका मन पूरा मान जायगा कि हमारे हाथ शुद्ध हो गए बाकी में यह बात न बन पायगी । तो व्यवहार शुद्धि भी आवश्यक है करना चाहिए पर उसको कोई यह मान ले कि यही मेरा कर्त्तव्य है, यही मेरा धर्म है, इतने से ही वह संतुष्ट हो जाय तो यह आत्मकल्याण कराने वाली बात नहीं है ।

लौकिकशुद्धिगत गोमयशुद्धि का प्रयोजन एवं लौकिक शुद्धि की परिमत आवश्यकता― (5) एक शुद्धि है गोमयशुद्धि । मान लो किसी बच्चे ने कहीं टट्टी कर दिया तो उस जगह की शुद्धि लोग गोबर से करते हैं । अब देख लीजिए गोबर स्वयं पशु का विष्टा है और उससे लोग मनुष्य की विष्टा वाली जगह को शुद्ध करते हैं और ऐसा करते हुए में लोगों का मन राजी रहता है और एक तरह से उनकी वह शल्य भी मिट गई कि जो जगह खराब हो गई थी वह पवित्र हो गई । तो व्यवहार में यह एक आवश्यक कार्य हो गया वाह्य शुद्धि का रखना पर वास्तव में आत्म की शुद्धि तो आत्मदर्शन आत्मज्ञान ओर आत्मरमण से है । इस जीवन में अपनी भलाई का लक्ष्य होना चाहिए, दूसरे की भलाई हम कर नहीं सकते । वे परद्रव्य हैं, उनकी परिणति हम बना नहीं सकते, किंतु जब तक राग है तब तक होगा सब कुछ उपदेश भी किया जायगा, बोलचाल भी होगा और उसका आश्रय करके दूसरे लोग अपने कल्याण का काम भी बनायेंगे, यह सब कुछ होगा लेकिन अपने लिए तो कल्याणकारी दृढ़ भावना होना चाहिए । मुझे लोगों को कुछ बताना है, मुझे अमुक बात का प्रचार करके रहना ही है किसमें? इस माया जाल में और उस ही में रहे और अपने में मंदकषाय या आत्माभिमुखिता की बात न निभा सके तो यह जीवन काहे के लिए? आसानी से दूसरों का कुछ हो जाय वह बात अलग है मगर दूसरी के लिए कमर कसकर रहने का अर्थ है कि अपनी और से सिथिल हो गये । अपने लिए जो दृढ़ रहेगा उसके ही वातावरण ऐसा बनेगा कि इसका आश्रय कर लोग भी कल्याणमार्ग में लगेंगे । मुख्य बात तो अपनी-अपनी विचारो । मान लो कोई 100 आदमी यह निर्णय कर लें कि हमें विधान समारोह आदिक करके खूब धर्म का प्रचार करना है और वे उसी-उसी में जुटे रहें तो बतावो उससे वे खुद धर्मात्मा बन गये क्या? एक भी नहीं धर्मात्मा बना और उनमें से अगर कोई दो चार लोग ही ऐसे हो जाये कि जिनको आत्मदृष्टि, आत्मशांति, वही धुन, आत्मकल्याण की भावना चले तो कम से कम उन 100 में चार-पाँच लोग तो धर्मात्मा बने और उस बड़े बखेड़े में तो एक ही धर्मात्मा नहीं बन पाया । तो यह सोचना व्यर्थ है कि हम तो ढोल बाजों से धर्म का खूब प्रचार करेंगे । अगर यही बात सबके सब सोच लें और स्वयं कुछ धर्म न धारण करें, बाहर-बाहर के प्रचार में लगे रहें तब तो यह समझो कि धर्म की रीति हट गई, किंतु सहज ज्ञानस्वरूप का माहात्म्य जीव को समझ में आये यह है धर्म प्रचार । जिस जैन शासन के आश्रय से संसार संकटों से छूट जाय वह बात लोगों के चित्त में आये तो परमार्थत: धर्मप्रचार वह है, पर जहाँ इतना पड़े हुए है, रह रहे है, फंसे है वहाँ व्यवहार की बातें भी सब करनी होती है तब जाकर वह पात्रता बनती है कि हम आगे भी बढ़ते हैं । तो व्यवहार में शुद्धि भी बतायी गई है पर वास्तव में आत्मशुद्धि तो आत्मस्मरण से, आत्मध्यान से होती है ।

भूमिकानुसार बाह्यशुद्धि से गुजरते हुए परमार्थशुद्धि में विवेकी का प्रवेश―जैसे कहते हैं ना पूजा में ‘‘अपवित्र: पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोपि वा, यः स्मरेत्परमात्मानं स बाह्याभ्यंतरे शुचि:’’ और अगर ऐसा करने लगें कि सोकर उठें, चलें मंदिर में ऐसे ही अभिषेक पूजन कर ले, तब तो प्रमाद है, वहाँ तो अपवित्र या पवित्र की बात निभ सकती है मगर जहाँ रातदिन के भोग साधनों में रह रहे गंदे वातावरण में रह रहे वहाँ यह अपवित्र या पवित्र की बात न चलेगी । वहाँ तो पवित्र होकर शुद्धि करके ही पूजन अभिषेक के लिए जाना चाहिए । जैसे स्नान करके शुद्ध हो गए, अब पहले के संस्कार छोड़ दिये, ऐसा मन में संकल्प आये, यह तो प्रभु की विनय है कि स्नान करके प्रभु की पूजा अभिषेक करने आये । तो यह बात सब लोगों के लिए अनिवार्य रूप से कही है, इसमें बेहोशी न रहनी चाहिए ।

जलशुद्धि व वायुशुद्धि की प्रयोग्यता―(6) एक जलशुद्धि भी है । कितनी ही चीजें जल से भी शुद्ध हो जाती हैं । जैसे कीचड़ लग गया तो उसे जल से धो दिया, शुद्ध हो गया, जल से नहा लिया शुद्ध हो गया । तो यह शरीर की शुद्धि भी किसी हद तक ठीक है । शरीर की शुद्धि हुए बिना मन में पवित्रता न आयगी, मगर इससे आगे बढ़कर विचारो कि स्नान कर लेने से कहीं खून, मांस, हड्डी आदि में तो कोई परिर्वतन नहीं हो गया, वे तो ज्यों के त्यों अपवित्र हैं, मगर धर्मभावना की उत्कृष्टता होने से इस शरीर की अशुचिता में भी परिवर्तन हो जाता है । अरहंत प्रभु का शरीर स्फटिक मणि की तरह निर्दोष हो जाता है मगर इसही बाहरी विकल्प में रहकर कोई निर्णय बना ले कि हम शुद्ध हो गये तो वह शुद्ध नहीं है । शरीर अशुचि हैं । इस अशुचि शरीर को कितना ही नहलवाया जाय पर शुद्ध न होगा फिर भी धर्मायतन में शुद्धि आवश्यक बताया है । अब कोई इस वाह्य शुद्धि को ही धर्म समझ ले तो यह उसकी लोकमूढ़ता है । उस लोकमूढ़ता का आधार है परभाव मूढ़ता, सभी भावों का आधार है परभाव मूढ़ता, देव मूढ़ता या पाखंड मूढ़ता । सबका बीज है परभाव मूढ़ता । परपदार्थ में मुग्ध हो गए, और जिन पर का लगाव करके भाव बनाये गये उन भावों में मुग्ध हो गये यह बात तीन मूढ़तावों में पायी जाती है । (7) एक शुद्धि है वायुशुद्धि―कितनी ही चीजें वायु से शुद्ध हो जाती हैं । जैसे काठ का कमंडल जो त्यागी लोग रखा करते, यद्यपि उसी से शौच जाते, स्नान करते, लोगों की दृष्टि से वह अपवित्र जैसा हो जाता फिर भी उसे राख से मलने अथवा अग्नि में तपाने की जरूरत नहीं रहती, वह वायु से ही शुद्ध हो जाता है ।

ज्ञानशुद्धि की विशेषता―कितनी ही शुद्धियां ज्ञान से, कल्पना से हो जाती हैं । तो ये सब शुद्धि है । अशुद्धता का संकल्प मिट गया ऐसी शुद्धि ये सब चलती हैं लेकिन इन बातों में और इससे बढ़कर नदी स्नान समुद्र स्नान, उनका पर्व मनाना, समारोह मनाना यह सब तो लोक मूढ़ता कहलाती है । सम्यग्दृष्टि जीव के लोकमूढ़ता नहीं पायी जाती । पहले यह ही ध्यान दें―बालूक ढेर लगाना और पर्वत से गिरकर मरण करके धर्म मानना और-और कितनी ही बातें, बच्चों को तकलीफ हुई तो चलो किसी देवता को मनाये, जिसमें व्यंतरपने की मान्यता की उसे मनाये, कोई जंत्र मंत्र करवाये, ये सब बातें लोकमूढ़ता में शामिल हैं । ऐसा दृढ़ श्रद्धान हो कि मेरे को तो आत्मस्वरूप से प्रयोजन है और आत्मस्वरूप का जिसके विकास हो और आत्मस्वरूप के विकास का जिसमें उपाय लिखा और आत्मस्वरूप के विकास में जो प्रयत्न कर रहे हैं उनका प्रयोजन हैं, वे हुए देव, शास्त्र, गुरु और स्वयं हुआ अपना अंतस्तत्व । इसके अतिरिक्त मेरे को धार्मिक मामले में कोई दुःख नहीं है । हां दूकान में बैठकर कुछ कमायी करने से मतलब है, ग्राहकों से मतलब है, लिखा पढ़ी करनी पड़ेगी, इन सबके बिना गृहस्थी में रह कैसे सकेंगे वे जिन में इतनी हिम्मत नहीं हैं कि गृहस्थी त्यागकर निर्विकल्प होकर अपने रत्नत्रय धर्म की आराधना में सारे क्षण बितायें । जब गृहस्थी में रहना पड़ रहा है तो गृहस्थो चित्त कार्यं करने ही पड़ेंगे मगर सम्यग्दृष्टि का चित्त सावधान हैं, वह जानता है कि मुझे वास्तव में करना क्या है ? मान लो यहाँ खूब धन कमाते चले गये, करोड़ों अरबों का वैभव जोड़ लिया, फिर भी आखिर होगा क्या उसका? वह सब छोड़कर जाना पड़ेगा । ये सब बाहरी बातें हैं मान लो परिजनों से खूब प्रीति की, आशक्ति की धार उनके मोह-मोह में ही सारी जिंदगी गुजार दिया, पर अंत में लाभ क्या मिलेगा इस जीव को सो तो बताओ? लाभ की तो बात दूर रही, जीवनभर जो मोहवासना बढ़ाया उससे बिकट पाप बंधेगा, जिसके फल में वह दुर्गतियों में जायगा । तो इस जगत में जो कुछ भी समागम मिले हैं उनमें आसक्त हो। से इस जीव को इस समय भी हाथ कुछ नहीं लगता और आगे भी उससे कुछ हाथ न लगेगा । ये बाह्य समागम सुख शांति के आधार नहीं बल्कि ये सब दुःखरूप है । सुख शांति तो मिलती है अपने ज्ञान से, किसी पर वस्तु से नहीं । ही परवस्तु आश्रय भूत है । किसको उपयोग में लेकर किस तरह का ज्ञान बनाये जिससे किस तरह का सुख अथवा दुःख मिले, यह सब उसके ज्ञान पर निर्भर है ।

सांसारिक सुखों की क्षोभरूपता―संसार के सुखों मे तो वस्तुत: दुःख ही बसा हुआ है, सुख के साथ क्षोभ बराबर चल रहा है । क्षोभ राग से भी होता द्वेष में भी होता । द्वेष में क्षोभ का पता जल्दी पड़ जाता, राग में क्षोभ का स्पष्ट पता नहीं पड़ पाता मगर सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो सब पता पड़ जाता है । जैसे एक उदाहरण लो―मान लो कोई भोजन कर रहा है, तो उस समय वह सुख का अनुभव कर रहा है, पर बताओ उस सुख की स्थिति में उसे क्षोभ है कि नहीं? है, क्योंकि वह एक कौर मुख में रखे है, दूसरा हाथ से तोड़ रहा है और तीसरे कौर के लिए उसके विकल्प बन रहा कि इस कौर के बाद मुझे अमुक चीज खाना है । तो वहाँ आकुलता बिना खाने का सुख भी नहीं मिल रहा । तो ऐसे ही समझ लो कि संसार के सारे सुख क्षोभ से, आकुलता से, दुःख से भरे हुए है । अब यदि इन बाहरी पदार्थों को आश्रय बनाकर हम सुख मौज के लिए ही अपने जीवन का निर्णय बनायें तो यह कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है । बाहरी पदार्थो को अपने मन के अनुकूल परिणमना, मनचाही व्यवस्था बनाना यह मेरे आत्मा के अधीन बात नहीं है । ये सब बातें पुण्य पाप के उदय के अनुसार चलती है । तो अपने आत्मस्वरूप की दृष्टि करना, उसकी धुन बनाना, उसका संस्कार बनाना उसे ही ध्यान में रखना, यह बात आपके अधीन है । यद्यपि यह बात कठिन लग रही है इस कारण पराधीनसा चल रहा यह काम, क्योंकि कर्म के उदय, कर्म के संस्कार ऐसे बसे है कि वह काम बडा कठिन जंच रहा किंतु किस पदार्थ के अधीन है वह दृष्टि सो तो बताओ? कोई विषरूप अन्य पदार्थ के अधीन हो आत्मदृष्टि आत्मज्ञान आत्ममनन तो बताओ? केवल अपने को करना है अपने में अपने से होना है, भले ही आज वह मुश्किल है विषय वासनाओं का संस्कार होने से पर उसके छोड़ने का यत्न तो कीजिए । वह यत्न है ज्ञानदृष्टि । ज्ञान का सही स्वरूप क्या है वह अपने उपयोग में समाया रहना चाहिए । विकृत रूप की बात नहीं कह रहे, नैमित्तिक रूप की बात नहीं कह रहे, मगर अपनी दृष्टि कहां लगाना, किसका ध्यान करना इसको सोचना चाहिए ।

ज्ञानबल से निज स्वरूपास्तित्त्व के ग्रहण की संभवता―भले ही आज आत्मा प्रकट रूप से अकेला नहीं है, यह तीन प्रकार के पदार्थों का मेल है और उसी से यह पर्याय हुई है । इतना होने पर भी सत्त्व तो सबका न्यारा-न्यारा है । मिले हुए इस ढंग में भी हम ज्ञान द्वारा केवल अपने सत्त्व को जान नहीं सकते क्या? दूध में घी प्रकट नहीं है आँखों से नहीं दिख सकता, अंगुली से उठाकर नहीं बता सकते कि यह है घी, यहाँ है घी, मगर उसकी चिकनाई देखकर ज्ञान के बल से आप निशंक कह बैठते हैं कि इस किलो भर दूध में एक छटांक घी है । तो ज्ञान में वह कला है कि जो बात सामने प्रकट नहीं है उस बात को भी यह ज्ञान पकड़कर खींचकर निकाल लेता है । आज हम किस स्थिति में हैं इस ढंग की बात चल रही है । जो दशा आज हम आपकी चल रही वह तो चल ही रही, उसे मना तो नहीं किया जा सकता । विकार चल रहे, विभाव बन रहे, पर ज्ञान की ऐसी महिमा है कि इस विकृत अवस्था में भी हम स्वरूपास्तित्त्व को ज्ञान में लेकर ज्ञान द्वारा पर के स्वरूपास्तित्त्व से पृथक् हो सकते है । जो चैतन्य अस्तित्त्व से रचा है वह है जीव और जो पुद्गल के अस्तित्त्व से रचा है वह है पुद्गल । हम यहाँ भेद कर लेते हैं तो इस ही ज्ञानदृष्टि को और सूक्ष्म करके हम अपने स्वरूपास्तित्त्व को समझें । अगर इस हालत में हम केवली को जान सकें और उस केवली की धुन बना सकें तो हम कभी केवल बन जायेंगे । पर इस हालत में करना सब है । क्या-क्या नहीं करना होता? चरणानुयोग शास्त्र में जो बताया है उसको किए बिना गुजारा नहीं है, कोई कर ही नहीं सकता गुजारा मगर ऐसे चरणानुयोग के अनुसार व्रत विधान के करने पर उनसे ही गुजारा होता । हम किसके बल पर आगे बढ़ रहे है वह है ज्ञानबल, ज्ञानदृष्टि । स्वरूपास्तित्त्व मात्र से जो बात है उसका चलना, उसकी धुन, उसे ही अपनाना यह मैं हूँ, इस प्रकार के भीतर के ज्ञान को बसाने का माहात्म्य है कि हम आगे बढ़ते है । तो यही एक अपना कर्त्तव्य है कि व्यवहारचारित्र चरणानुयोग की बातें, उनके अनुसार अपना जीवन गुजारते हुए भीतर में ज्ञान की मुख्यता रखें । अपना ज्ञान बढ़ायें अपने आत्मस्वरूप का दर्शन करें उसका ही बार-बार अनुभव करें तो ये सारे रागद्वेषादिक विकार मेरे से दूर हो जायेंगे ।


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