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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 23

From जैनकोष



वरोपलिप्सयाशावान् रागद्वेषमलीमसा: ।

देवता यदुपासीत देवतामूढमुच्यते ।।23।।

आत्मकल्याण का सम्यक्त्व से प्रारंभ―इस जीव की भलाई का प्रारंभ सम्यक्त्व से होता है । सम्यक्त्व में आत्मा के सहज स्वरूप का आत्मरूप से अनुभव होता है । मैं क्या हूँ इसका उत्तर सम्यग्दृष्टि के यह है कि मैं सहज चैतन्य स्वभावमात्र हूँ । त्रिकाल अविनाशी अमूर्त ऐसे सहज चैतन्यस्वभाव में यह मैं हूँ ऐसा अनुभव होना यह है सम्यग्दृष्टि का परिणाम और मिथ्यादृष्टि सहज आत्मस्वरूप के विपरीत परभाव में या एक पदार्थ में यह मैं हूँ, यह मेरा है, इस प्रकार का सम्वेदन करते हैं । यहाँ हम आप जितने लोग बैठे हैं ये सब प्रत्येक तीन चीजों के पिंड हैं, तीन का समुदाय है―(1) जीव (2) शरीर और (3) कर्म । शरीर को तो स्पष्ट जान ही रहे हैं जिसमें ये सब बाधायें आ रहीं । और जीव भी अपने आप जान रहे, और आपके भीतर जो अनुभव चलते हैं उन्हें भी आप समझते हैं, और जीव जब ज्ञानस्वरूप है तो उसमें विकार का काम क्यों होता है? और हो तो रहा, तो उससे सिद्ध है कि जीव के साथ कोई एक चीज और लगी है जिसका निमित्त पाकर जीव में रागद्वेष विकार चलते हैं । तो यह तीन चीजों का पिंडोला है । अब कल्याण इसमें है कि यह तीन चीजों का पिंडोला न रहे और केवल आत्मा ही आत्मा रहे! जीव, शरीर और कर्म ये तीनों पृथक्-पृथक् हो जायें । ऐसी स्थिति में कल्याण है और सिद्ध भगवान कहते भी उसे हैं कि जहाँ केवल वही-वही एक जीव अकेला रह जाय । तो एक बहुत मोटी सी बात यह है कि अपने को अकेला अनुभव करें । मिला हुआ या समागम वाला अनुभव करना ये तो सब धोखे की बातें हैं । अपने को अकेला अनुभव कीजिए अकेला निरखिये, अकेले में ही शांत होइये । यह प्रकृति बनाइये और फिर परमार्थ अकेलापन भी निरखिये । मैं अमूर्त चैतन्यमात्र हूँ । यह इतना ही रहे, इसमें अन्य रागादिक विकार न आयें इसी को कहते हैं परमात्मस्वरूप का होना ।

केवल सहजस्वरूपमात्र की वृत्ति में परमात्मत्व―आत्मा परमात्मा होता है । परमात्मा होने के लिए आत्मा में कुछ चिपकाया नहीं जाता, किंतु यह आत्मा केवल अकेला रह जाय बस इसी को कहते है परमात्मा हो जाना । कितना सुगम उपाय है भगवंत होने का, कितना सुगम सरल उपाय है जो मैं हूँ, एक अकेला सो यह ही मैं रह जाऊं, इसी को कहते हैं सिद्धभगवान होना । सो सिद्ध प्रभु होने के लिए नई चीज आत्मा में नहीं लगाना है किंतु आत्मा स्वयं परमात्मस्वरूप वाला है, इसको ढाकने जो वाले विकार हैं, कर्म हैं इनको दूर करना है भगवान अपने आप प्रकट होगा, जैसे पाषाण की मूर्ति बनाना है । मानो बाहुबलि की मूर्ति बनवाया तो उसे मूर्ति को बनाने के लिए कोई नई चीज नहीं चिपकाना है उस पाषाण में किंतु मूर्ति का आवरण करने वाले जो अगल-बगल के पत्थर हैं उनको छेनी हथौड़े से हटाना है ऐसा ही किया जाता है मूर्ति बनाने के लिए केवल हटाया-हटाया ही जाता है चिपकाया कुछ नहीं जाता और उस हटाने के साधन से हटते-हटते जब परभाव सब हट गये तो वह मूर्ति जो थी, जो वहाँ के अंग थे, जो वहाँ के पाषाण थे बस वे प्रकट हो गए । इसी तरह से आत्मा को परमात्मा होने के लिए कोई नई चीज आत्मा में नहीं चिपकानी है किंतु इस आत्मा का आवरण करने वाले विषय कषाय कर्म आदिक इनको हटाने-हटाने का ही काम है । हट-हटाकर सब हट जायेंगे तो वह स्वरूप जो था वह सब प्रकट हो गया ।

स्वयं में स्वयं को निहारने का अनुरोध―भैया, अपनी दृष्टि कीजिए । मेरा मैं जिम्मेदार । मेरा मुझ से ही उत्थान, मैं ही अपने को पतन में ले जाता, इन सब बातों में निमित्त तो है, पर निमित्त परिणमाता नहीं है, पर उसके सान्निध्य में विकार रूप परिणमन हो जाता है, तो मतलब अपना खुद जिम्मेदार है यह जीव । इसका कोई दूसरा जिम्मेदार नहीं है । खुद के लिए खुद ही महान है यह जीव । खुद का उत्थान करने वाला खुद है यह जीव । सो अपने में ही अपना सब कुछ निहारें । व्यर्थ में परद्रव्यों में मोहभाव करके, लगाव करके, इस भव में भी अपने को दुःखी बना रहे है और आगे भी अपने को दु:खी बनायेंगे । मोह करना कितना बेकार है । इससे पहले भव में भी तो कुछ मिला होगा ना? वहाँ भी मोह किया था । पर क्या है वहाँ का आज साथ सो तो बताओ? जैसे पूर्वभव की कुछ भी चीज आज आपके पास नहीं है इसी तरह इस भव की भी बात संगति संग समागम आँखें मीच जाने पर क्या रहेगा साथ? कुछ नहीं । सब भिन्न द्रव्य हैं पर उनमें लगाव ममता कर करके अपने को कष्ट में डाला जा रहा है ।

मूढ़ता में स्वयं की सुध का अभाव―कभी राजा भोज का जमाना था वह कवीश्वरों को एक-एक काव्य पर लाखों का इनाम दे देता था । यह बात खूब फैल चुकी थी । तो एक बार चार देहातियों ने सोचा कि हम लोग भी कोई कविता बनाकर ले जायें और राजा से मनमाना इनाम पायें । अब वे पढ़े लिखे तो थे नहीं गंवार थे । वे कविता बनाना क्या जाने, पर इनाम के लालच में चल दिये राजा भोज के पास । रास्ते में जाते हुए चारों लोगों ने देखा कि एक जगह एक बुढ़िया रहटा में सूत कात रही थी और वह रहटा चनर-मनर की आवाज करता हुआ भन्ना रहा था । सो वह दृश्य देखकर एक देहाती बोला मेरी कविता तो बन गई ।... सुनावो । चनर-मनर रहटा भन्नाव ।... बहुत ठीक । कुछ आगे बढ़ने पर क्या देखा कि एक तेली का बैल खली भुस खा रहा था । तो उस दृश्य को देखकर दूसरा देहाती बोला―मेरी भी कविता बन गई । अच्छा सुनावो । तेली का बैल खली भुस खाय । बहुत ठीक । कुछ और आगे बढ़ने पर क्या देखा कि कोई धुनिया अपने कंधे पर एक पींजना रखे हुए चला आ रहा था । वह पींजना बिल्कुल धनुषबाण जैसा लग रहा था, सो उसे देखकर तीसरा देहाती बोला―वहां से आ गये तरकस बंद । अब तीन की कविता तो बन गई, चौथे से न बन पायी । उससे भी कविता बनाने को कहा पर उससे बनी नहीं । तो तीन देहाती बोले―हम लोगो को जो इनाम मिलेगा उसे में तुम्हारा हिस्सा न लगेगा, हम तीनों बांट लेंगे । तो वह चौथा देहाती बोला―हम इस तरह से पहले से कविता न बनाकर रखेंगे । उसी मौके पर सहसा ही जो कविता बन जायगी उसी को सुना देंगे । ठीक है । अब चौथे देहातीने क्या कविता बनायी सो जो हम कविता का चौथा चरण बोलें उसे चौथे की कविता जानना । सो जब राजा भोज के दरबार में वे पहुंचे तो द्वारपाल से बोले जावो राजा को खबर कर दो कि आज चार महा कवीश्वर आये है अपनी-अपनी कवितायें सुनाने के लिए । द्वारपाल ने राजा को खबर दिया तो राजा ने आदर सहित उन्हें बुलवाया । और-और भी अनेक विद्वान कवि वहाँ आये । सभी ने अपनी-अपनी कवितायें सुनायी । जब उन चारों देहातियों का कविता सुनाने का नंबर आया तो चारों खड़े हो गये और बारी-बारी से बोलने लगे, अब यहाँ ध्यान देना कि चौथे देहाती ने अपनी क्या कविता सुनायी थी । चनर-मनर रहटा भन्नाय । तेली का बैल खली भुस खाय । वहाँ से आ गए तरकस बंद । राजा भोज है मूसरचंद ।। अब इस कविता को सुनकर सभी लोग दंग रह गए । यह क्या कहा गया इस कविता में? कोई खास कविता भी नहीं जंची । खैर राजा भोज ने वहाँ बैठे कुछ पंडितों से कहा कि आप लोग इनकी कविता का अर्थ लगाये अब क्या अर्थ लगायें यह किसी की समझ में न आया । वहाँ कोई एक विद्वान वृद्ध पंडित बैठा था वह खड़ा होकर बोला―हम बताते है इस कविता का अर्थ । यह कविता बहुत ऊंची है । इसमें बड़ा मर्म भरा है । पहले महा कवीश्वर ने यह कहा था कि चनर-मनर रहटा भन्नाय मायने यह जीव हम आप रात-दिन अपने जीवन में चनर-मनर करने वाले रहटा की भांति भन्नाते रहते हैं, दूसरे कवीश्वर ने यह कहा कि तेली का बैल खली भुस खाय, इसका अर्थ है कि जैसे तेली का बैल रात दिन जुतता और रूखा-सूखा खली भुस खाकर अपना समय बिताता ऐसे ही हम आप रात-दिन दुनियावी कामों में जुतते रहते जहाँ खाने-पीने की भी फुरसत नहीं । आराम से बैठकर खा पी भी नहीं सकते । जल्दी-जल्दी में काम से आये और जो रूखा-सूखा मिल गया वह जल्दी से खाकर फिर काम में लग गए । तीसरे कवि ने यह कहा कि ‘‘वहाँ से आ गए तरकस बंद’’ इसके मायने है कि हम आपका सारा जीवन बीत गया बाहरी दंद फंद में अंतिम समय में काल यमराज आ गया याने मृत्यु का समय निकट आ गया । अब चौथे कवि ने यह कहा कि राजा भोज है मूसरचंद, मायने दशा तो इस प्रकार की है फिर भी ये राजा भोज इतने मूर्ख हैं कि जरा भी कुछ खबर नहीं । व्यर्थ ही बाहरी-बाहरी बातों में पड़कर अपना जीवन गुजार रहे हैं । इस प्रकार के मार्मिक अर्थ को सुनकर सभी को भारी चेतावनी मिली । राजा भोज बड़ा प्रसन्न हुआ और उन चारों देहातियों को भारी पुरस्कार देकर सहर्ष विदा किया ।

संसरण व असंसरण की अमिलष्यता की छांट―अब आप विचारिये कि आपको इस संसार में जन्म मरण के चक्कर लगाते रहना पसंद है या इससे छुटकारा पाना पसंद है । खूब विचार लीजिए । यदि संसार में जन्म मरण के चक्कर लगाते रहाना ही पसंद है तो उसका उपाय यही है कि इस शरीर को आत्मारूप में समझते रहो, याने इस शरीर में ही आत्मीयता की बुद्धि बनाये रखो, जैसा कि अभी तक बनाते रहे, बस ये शरीर ये जन्म मरण बराबर मिलते रहेंगे और यदि न चाहिये ये शरीर न चाहिए, संसार में जन्म मरण का चक्र तो उसका उपाय यही है कि इस शरीर में आत्मीयता की बुद्धि न रहे, अपनी ऐसी दृष्टि रहे कि इस शरीर से निराला अमूर्त ज्ञानमात्र मैं आत्मा हूँ । चैतन्यस्वरूप हूँ, यह शरीर रूप मैं नहीं हूँ इस प्रकार का बोध रहे, बस ये जनम मरण के संकट टल जायेंगे । सो अपनी जिंदगी मानो आत्मकल्याण के लिए । खूब परिवार धन वैभव आदिक बाह्य समागमों का बढ़ाना यह जीवन कोई सारभूत जीवन नहीं है । ये सब चीजें तो भव-भव में प्राप्त हुई । यह जीवन इसलिए है कि अपने आत्मा का परिचय किया जाय । मैं वास्तव में क्या हूँ । यह मैं हूँ ज्ञानस्वरूप । मैं हूँ आनंदमय, सो अपने इस आत्मस्वरूप में रमण करें, इसमें जीवन की सफलता है । विषय कषायों से जीवन की सफलता नहीं है । तो यह सम्यक्त्व जिनके प्रकट हुआ है उनकी 8 अंगरूप स्थिति बनती है । यह पहले बताया था इसी ग्रंथ में ।

देवमूढ़ता में कल्याण की असंभवता―आज सम्यक्त्वांग के विरुद्ध यह बता रहे है कि लोकमूढ़ता, देव मूढ़ता गुरु मूढ़ता के भाव करने से सम्यक्त्व नहीं रहता । देव मूढ़ता की बात इस छंद में कही है । इष्ट पदार्थों की आशा से मुझे धन मिले मेरी मुकदमें में विजय हो या पुत्रादिक हो, ऐसी आशा करके रागद्वेष से मलिन देवतावों की उपासना करना देवमूढ़ता कहलाती है । इतना भीतर पक्का उत्साह रखें कि जब जो स्थिति आयगी उसी में गुजारा कर लेंगे । मैं कोई आशा नहीं करता कि, मेरे को ऐसी चीजों की प्राप्ति हो, क्योंकि सांसारिक चीजें जो मिलती है वे पुण्य पाप के उदय से मिलती है । संसार की बातों में पुरुषार्थ गौण है पुण्य की प्रधानता है और मोक्ष की बातों में पुरुषार्थ की प्रधानता है, अन्यथा बतलावो विदेशों में जो कितने ही लोग करोड़पति अरबपति मिलते वे कहां आज वर्तमान में कुछ दानपुण्य धर्म-कर्म कर रहे, पर उन्हें सारे सुख समागम मिल रहे है । वह सब उन्हें पूर्वकृत कर्म के उदय से मिल रहा, आज वर्तमान में जो करनी कर रहे उसका फल आगे मिलेगा । तो किसी बाह्य सुख समागम की आशा से भगवान की भक्ति न करें । भगवान की भक्ति करके उसके एवज में किसी भी बाहरी चीज की वांछा न करें । यही भाव रखें कि हे प्रभो जिस उपाय को करके आप तिरे उसी उपाय को करके मैं भी तिर जाऊं, संसार के आवागमन से मुक्त हो जाऊं, बस यही मैं चाहता हूँ । इसके अतिरिक्त मुझे आप से कुछ नहीं चाहिए । चाहे भगवान की भक्ति करके या अन्य देवी देवताओं की भक्ति करके यदि सांसारिक सुख साधन के पाने की वांछा की जा रही है तो वह देवमूढ़ता कहलायेगी । चाहे कितनी ही मिन्नतें कर ली जावें किसी देव से पर वह कुछ देने न आयगा । हाँ आपके ही पुण्य का उदय है तो वह चीज आपको थोड़े से ही प्रयास से प्राप्त हो जायगी । भगवान की भक्ति करके इन बाहरी बातों की ओर दृष्टि न रखें, दृष्टि रखें अपने आत्मस्वभाव की ओर । उसके फल में अवश्य ही कोई ऐसे बानक बनेंगे कि सभी सांसारिक चीजें स्वयमेव ही प्राप्त होती रहेंगी और निकट काल में ही मुक्ति प्राप्त होगी । अपना एक यह दृढ़ विश्वास रहे कि मैं आत्मा स्वयं आनंदमय हूँ । मेरे में से ही वह आनंद पर्याय प्रकट होती है मेरे ही ज्ञानगुण में से ज्ञानपरिणमन प्रकट होता है । मैं खुद ज्ञानानंदस्वरूप हूँ ऐसा जान कर इस निज तत्त्व में ही अपने आपको विश्राम, आराम में ले जाना, और वहाँ ही रमाना, यह काम है जीवन में करने का ।

देवमूढ़ता की अनर्थकारिता―न जाने कितने ही कार्य धर्मबुद्धि से लोग किया करते है । बड़े-बड़े व्रत, तप आदि करते, बड़े-बड़े कष्ट सहते, बड़े-बड़े यज्ञ समारोह आदिक धार्मिक क्रियाकांड करते । न जाने क्या-क्या करते? घर के किसी बड़े के मर जाने पर लोग धर्म बुद्धि से श्राद्ध करते, बड़े-बड़े खर्च करते । अरे जब तक वह जीवित रहा तब तक तो उसकी एक बात न पूछा और उसके न रहने पर बड़े खर्च करते तो यह तो धर्म का ढोंग कहलाया । उसके जीते जी यदि उस खर्च किये जाने वाले धन का 100 वां हिस्सा भी उस मरने बाले के लिये खर्च कर देता तो वह भला था । मरने के बाद उसके पीछे कितना ही कुछ खर्च करना किस काम का? तो ऐसी कितनी ही देवमूढ़ता की बातें है । इन सबका आधार क्या? परभावमूढ़ता । परपदार्थों में मुग्ध हो रहे, आत्मा की महिमा नहीं जान पायी कि स्वयं भगवान आत्मा कैसा है? मेरा जो कुछ प्रकट होता है, वह मेरे में से प्रकट होता है, कहीं बाहर से प्रकट नहीं होता । कितने ही देवताओं की आराधना करले मगर मेरा हित उन देवताओं की आराधना से नहीं है । हम यहाँ अरहंत सिद्ध की आराधना क्यों करते हैं? वे भी तो परभाव है, उनकी आराधना इसलिए करते कि उनका स्वरूप और मेरा स्वरूप समान है और जो उपाय करके उन्होंने सुख पाया है, मोक्ष पाया है वह उपाय मैं भी बना सकता हूँ और मैं भी मोक्ष पा सकता हूँ, ऐसी समानता के कारण अरहंत सिद्ध भगवान की भक्ति की गई, पर देने वाला मुझ को कोई दूसरा नहीं है । तीन चीजें होती हैं―(1) धर्म (2) पुण्य और (3) पाप । इनमें पाप तो कहलाये हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील आदिक और पुण्य कहलाये दान, पुण्य, पूजा भक्ति आदिक और धर्म कहलाया रागद्वेष न करके केवल ज्ञातादृष्टा रहना । सो पाप तो अत्यंत हेय है, उन्हें तो कभी करना ही न चाहिए, और उन पापों से बचने के लिए पुण्य बताया है । पुण्य भाव से योग्यता बनाने के बाद फिर धर्म में लीन होने के लिए पुण्य पाप अपने आप छूट जातें हैं । लक्ष्य होना चाहिए अपने आत्मा के शुद्ध स्वरूप का वह जिनको प्रकट हो गया वे कहलाते हैं देव, पर रागीद्वेषी आत्मा को देव मानना, उनकी आराधना करना यह सब देवमूढ़ता कहलाती है । सो सम्यग्दृष्टि जीव देवमूढ़ता से दूर रहता है ।

ज्ञानदृष्टि में आत्मप्रसन्नता―देखिये जीव को सबसे अधिक प्रिय चीज क्या है? लोग कहेंगे कि धन, वैभव, कुटुंब, परिजन, इज्जत प्रतिष्ठा आदिक पर ये कोई वास्तविक प्रिय नहीं हैं । इस जीव को प्रिय है अपने आत्मा का स्वरूप, आत्मा का ज्ञान । आत्मा को आत्मा ही प्यारा होता है । मान लो किसी पर कोई संकट आ गया तो यह खुद की जान बचायेगा और वही मान लो मुनि हो गया, सच्चा ज्ञान जग गया और उस स्थिति में कोई प्राण भी ले तो वह प्राणों की परवाह नहीं करता किंतु अपने ज्ञान की सम्हाल करता है । तो इस जीव को सबसे अधिक प्रिय चीज है ज्ञान । इससे अपना एक निर्णय यही रहे कि हर स्थितियों में अपने ज्ञान की सम्हाल बनाये रहें । पर पदार्थों को असार समझकर उनसे उपेक्षा का भाव रखें ।

यहां कोई भी बाह्य पदार्थ सुख दुःख का देने वाला नहीं है । मेरे ही ज्ञान की सुखरूप अथवा दु:खरूप परिणति से सुख-दुख प्राप्त होते हैं । सो जब यह जान जायेंगे कि मैं तो केवल आत्मा हूँ और ये शरीरकर्म आदिक सब जड़ पुद्गल हैं । ये सब बाहर में दिखने वाले समागम जड़ हैं, पर पदार्थ है किसी भी पर पदार्थ से मेरे में कुछ न आयगा । मैं पर पदार्थों में कुछ नहीं करता, केवल ख्याल ही ख्याल करके विकल्प किया करते, तो उन पर पदार्थों में करने धरने की बुद्धि त्यागकर अपने को ज्ञानरूप अनुभव करें अन्य कुछ न चाहिए । एक अकबर बीरबल का चुटकुला है कि एक दिन अकबर बादशाह ने बीरबल को नीचा दिखाने के लिए कहा कि मंत्रीवर, आज मैंने रात्रि को ऐसा स्वन देखा कि हम तुम दोनों कहीं घूमने जा रहे थे, रास्ते में दो गड्ढ़े मिले, एक गड्ढ़े में भरा था गोबर विष्टा और एक में भरी थी शक्कर सो तुम तो उस गोबर विष्टा वाले गड्ढ़े में गिर गए और मैं गिर गया शक्कर वाले गड्ढ़े में तो उसकी बात काटकर बीरबल बोला―महाराज मैंने भी ठीक ऐसा ही स्वप्न देखा जैसा कि आपने देखा, पर इससे अधिक एक बात और देखा कि आप हम को चाट रहे थे और हम आपको । अब बताओ―बीरबल ने क्या चाटा? शक्कर और अकबर बादशाह को क्या चटाया? गोबर विष्टा । तो ऐसे ही समझलो कि यह गृहस्थी का निवास गोबर विष्टा में रहने जैसा जीवन है मगर अपनी दृष्टि ज्ञानस्वभाव पर रहे तो स्वाद आयगा आत्मानुभव का। मान लो कोई घर गृहस्थी छोड़कर निर्ग्रंथ हो जाय और चित्त में गृहस्थी बसाये रहे तो उसे तो स्वाद आयगा गोबर विष्टा का याने गृहस्थी का, निर्ग्रंथता के पद का स्वाद आयगा। इसलिए अपनी दृष्टि निर्मल रखें, ज्ञानस्वभाव को अपने लक्ष्य में रखें कि यही मैं हूं, यही मेरा सर्वस्व है, अन्य इस संसार में मेरा कुछ नहीं हैं। जो जीव अपने सही स्वरूप को निरखता है, उसी को दृष्टि में रखता है उसकी प्रतीति से रहता है उसके पवित्रता है और वह व्याकुल नहीं होता। व्याकुलता तो मोह में हुआ करती है। जहां किसी परपदार्थ में यह मैं हूं, यह मेरा हैं इसको मैं यों कर सकता हूं, यह मुझे यों सुख देगा आदिक कल्पनाएं जगती हैं उन कल्पनाओं में कष्ट होता है। आत्मा सीधा का सीधा जैसा का तैसा केवल जाननहार रहे तो उसमें कष्ट का क्या काम? पर नहीं रहता इससे कष्ट आते हैं।

कष्टों से बचने के लिए देवीदेवताओं से याचना की व्यर्थता―मिथ्यात्व के उदय में उन कष्टों से बचने के लिए ये संज्ञी जीव नाना देवीदेवताओं की मनौती करते हैं―मेरा कष्ट ये बचाते हैं, पर जैसे यहाँ मनुष्यों में किसी के पुण्य का उदय है तो पड़ोसी लोग भी उसके मददगार बन जाते हैं। मुख्य तो पुण्योदय है। ऐसे ही कदाचित पुण्योदय में कोई देव भी मददगार बन जाय तो उसमें मुख्य तो पुण्योदय है। भले ही ऐसी अनेक घटनायें हुई हैं। उनमें एक सीताजी का ही दृष्टांत ले लो। जब सीताजी को अग्निकुंड में प्रवेश करने का विधान हो रहा था उस समय देव कहीं तीर्थंकर के समवशरण में जा रहे थे। रास्ते में उन्हें यह कौतूहल दिखा तो उनके मन में आया कि कहां तो ऐसी शीलवती धर्मात्मा सीता और कहां यह भीषण अग्निकुंड, इससे सीता का जल पाना ठीक नहीं, यह विचार कर वहाँ थोड़ी देर को रुक गए और जब सीता ने अग्नि में प्रवेश किया तो उन देवों ने अपनी माया से जल का तालाब सा बना दिया और वहाँ कमल खिल गये तो यह घटना हो गई मगर इस घटना से कहीं यह नियम तो नहीं बना कि शील की परीक्षा के लिए आप यों कहने लगें कि धरो आग पर हाथ। तो ऐसा नियम नहीं है कि जितने शीलवान हैं उन सबकी देवताओं ने सहायता की हो। सुकुमाल, सुकौशल, पांडव आदि अनेक शीलवान पुरुष हुए, पर किसने उनकी रक्षा की? जब वे अग्नि में जलाये गए, या गीदड़ी ने उनका भक्षण किया तब कहां गये थे देव लोग? क्या ये देव उस समय न थे? तो वह तो अपने-अपने पुण्य के आधीन बात है। जब खुद के पुण्य का उदय होता है तो कोई न कोई बालक ऐसा बन जाता कि उसका वह संकट टल जाता, नहीं तो कोई यह नियम नहीं कि यह संकट टले ही टले। पंजाब की एक घटना सुना है कि किसी पुरुष को अपनी महिला पर कुछ शंका हुई सो कहा कि हमको तुम्हारे चरित्र पर शंका है। तुम तो हमें परीक्षा देकर दिखाओ तब हमको तुम्हारे चरित्र पर विश्वास होगा। तो वह महिला बोली―कर लो परीक्षा जो करना चाहो। सो पुरुष बोला―हम कुछ लोगों को इकट्ठा करेंगे और उनके बीच तुम्हारे शील की परीक्षा ली जायगी। कडुवा तेल एक कड़ाही में खूब अग्नि से तपाया जायगा। उस खौलते हुये तेल में तुम्हें अपना हाथ डालना होगा। यदि वह हाथ न जलेगा तो समझ लेंगे कि तुम्हारा चरित्र ठीक है। तो वह महिला बोली―हां-हां ठीक है ले लो परीक्षा। आखिर उस पुरुष ने काफी लोगों को इकट्ठा किया, कडुवा तेल एक कड़ाही में खूब खौलाया। वहाँ दर्शकों की अपार भीड़ लग गई। इधर उस महिला ने क्या किया कि पहले से ही नीम की दो छोटी-छोटी टहनियां ले लिया और जब परीक्षा के समय उससे तेल में हाथ डालने को कहा गया तो झट उसने उस खौलते हुए तेल में दोनों टहनियां डाला और दोनों हाथों में स्वस्थ टहनी लेकर वहाँ उपस्थित लोगों के ऊपर तेल छिड़कना शुरु कर किया । जब तेल के छींटे से लोग जलने लगे तो लोगो ने वहाँ से भागना शुरु कर दिया । किसीने कहा उस महिला से―अरे यह क्या कर रही हो? तो महिला बोली हम भी तुम सबके शील की परीक्षा कर रही हैं । पहले तुम्हारे शील की परीक्षा करले बाद में अपने शील की परीक्षा दें । तो भाई यह कोई नियम तो नहीं है कि संकट के समय किसी दूसरे से रक्षा हो ही हो । हां जब खुद के पुण्य का उदय होता है तो उस समय दूसरे भी उसके रक्षक बन जाते हैं ।

पुण्यविपाक में सुख साधनों का लाभ―यहां जो-जो भी सुख समागम प्राप्त होते हैं वे सब पुण्य के उदय । से प्राप्त होते हैं उनका संचय करने के लिए लोग तो बड़े-बड़े छल कपट के काम करते हैं, पर छल कपट करने से उनका लाभ हो, हो यह कोई नियम नहीं । आखिर कर्म सब के साथ लगे है । खोटे कार्य करके कोई लाभ चाहे तो यह हो कैसे सकता? कदाचित खोटे कार्य करते हुए भी लाभ की बात दिख रही हो तो यह समझो कि वह सब पूर्वकृत पुण्य के उदय से मिल रहा, कहीं छल कपट करने से नहीं मिल रहा । तो यह सब निर्णय जानकर किसी देवी देवता से कोई याचना न करना और यहाँ तक कि धर्म करते हुए सुदेव से भी कोई याचना न करना । केवल यही अभिलाषा रखें कि हे प्रभो जैसे आपने ज्ञान पाकर संसार संकटों से मुक्ति प्राप्त की ऐसे ही हम भी अपना विशुद्ध ज्ञानप्रकाश पाकर इस ही ज्ञान में रमकर संसार के संकटों से मुक्त होवे । यही भावना रखें प्रभु के दर्शन, पूजन, वंदन आदि में यदि देवी देवता कोई भी किसी का दुःख हर सकते होते तो आप बतलावो ऋषभदेव जिस समय मुनि हुए उस समय 6 माह तक तो उन्होंने उपवास किया और फिर 6 मोह तक अंतराय हुए, उन्हें भोजन न मिला तो वहाँ देव कहां चले गये थे? अरे वे देव तो अवधिज्ञानी होते वे देव तो भगवान के गर्भ कल्याण में आये, जन्म कल्याणक में आये, अब उस समय वे देव कहां चले गए थे? तो ये सब पुण्याधीन बातें है । यहाँ कोई देवी देवता के प्रति यह भाव न रखें कि ये हमारा इस प्रकार का काम कर देंगे । अरे करें या न करें ये सब बाहरी बातें है । धन वैभव हो तो हो, न हो तो न हो, आत्मा का परिचय आत्मा की इष्टि रहे तो समझो कि मेरे पास सारा वैभव है । सो प्राय: करके लोग मिथ्यादृष्टि देवों में मनौती अधिक करते हैं, देवी दहाड़ी, शीतला, न जाने क्या-क्या? तो जो स्वयं दुखी है, अज्ञानी है उनसे किसी इष्ट की याचना करना, इसे कौन बुद्धिमान स्वीकार करेगा? सो ऐसे अनेक प्रकार के चाहे भगवान के सेवक कह कर भी देव देवताओं की मनौती करे लेकिन वह देव नहीं । बस देव है तो एक वीतराग सर्वज्ञ प्रभु हैं ।

देव और कुदेव के लक्षण व देवमूढ़ता का हेयपना―देव की पहचान यह है कि जिसमें गुण तो पूरे हों और दोष जरा भी न हों बस वही भगवान है । एक कुंजी है । यह आत्मा में गुण क्या? ज्ञान और आनंद । ये जिसके पूर्ण विकसित हुए हों । और दोष क्या? ये क्षुधा आदिक दोष जिसके रंच भी न हों । जिनकी भक्ति के प्रसाद से हमारे आत्मा के स्वरूप की खबर होती है । हम अपने समाधिभाव को प्राप्त हो सकते हैं । यह प्रभु की भक्ति का उपकार है । सो एक वीतराग सर्वज्ञदेव को छोड़कर नाना प्रकार के रूपों में देवी देवता मानकर पूजना देवमूढ़ता है । अब देखिये―हनुमानजी मोक्ष गए, और हनुमानजी कामदेव थे, उन जैसा सुंदर रूप उस जमाने में किसी का न था और सर्व परिग्रह त्यागकर समाधिस्थ होकर मुक्त हो गए । सो हनुमानजी का पूजना बुरा तो नहीं है, ठीक है पूजे, मगर जिस रूप में हुए है जिससे वीतराग और सर्वज्ञता होती उस रूप में माने । पर लोगों ने क्या किया कि उनकी बंदर जैसी शक्ल बना दी रागीद्वेषी बना दिया । जिसमें रागद्वेष हो वह देव नहीं । इसी तरह से श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम हुए पद्मपुराण में उनके नाम से स्वतंत्र ग्रंथ भी बना और उनकी महिमा भी देखो तो श्रीराम भगवान बलभद्र हुए, वे जिनेंद्र हुए, उनका पूजना तो भला है मगर जिस रूप में रागद्वेष नहीं और सर्वज्ञता हो उस मार्ग की दृष्टि से निरखकर पूजिये । अब यह तो ठीक नही कि श्रीराम की मूर्ति बनाकर उन्हें वस्त्रादिक से अलंकृत कर दिया, मुकुट बांध दिया, हाथ में धनुषबाण पकड़ा दिया, और भी रागद्वेष की बातें गढ़ दिया तो इस में पूजना तो ठीक नहीं । वहाँ देवत्व की बात कहां है । देवत्व तो वहाँ माना जाता जहाँ वीतरागता और सर्वज्ञता हो । अब कोई लोग तो वृक्षों में भी देवता की कल्पना करके पूजते, कोई धज्जियां, डोरा, कपड़े की चिट आदि बांधकर पीते, कहीं कुछ पत्थर पड़े हों तो वहाँ कंकड़ पत्थर डालकर उसमें देवत्व पाने की बुद्धि मानकर पूजते । एक सन्यासी था । वह कहीं से भिक्षा मांगते हुए में एक लड्डू पा गया । लड्डू हाथ में लिए हुए जा रहा था । रास्ते में उसके हाथ से लड्डू छूटकर ऐसी जगह पर गिर गया जहाँ कुछ गोबर विष्टा पड़ा था, पर लालचवश उसे उठाकर पोंछकर खा लिया । अब खा तो लिया पर यह शंका बनी रही कि कहीं किसीने हमारी यह करतूत देख न लिया हो सो पोल ढाकने के लिए उस विष्टा के ऊपर कुछ फूल डाल दिया । अब वहाँ से आने-जाने वाले अनेक लोगों ने भी वहाँ पर फूल चढ़ाना शुरू कर दिया यह जानकर कि यहाँ तो कोई देव है । आखिर फूलों का बड़ा भारी ढेर थोड़ी ही देर में लग गया । जब तो फुल्लादेवी कह कर उसे सभी लोग पूजने लगे । किसी विवेकी पुरुष के मन में आया कि इन फूलों को उठाकर देखना चाहिए कि आखिर वह देवी किस प्रकार की है । सो जब सारे फूल उठाये गए तो वहाँ मिला वही मैला । तो कितनी ही बातें ऐसी बन जाया करती है पर यह कोई देव का स्वरूप नहीं । देव वही है जिसमें वीतरागता और सर्वज्ञता हो । ये नदी स्नान, वृक्ष पूजने कंकड़ पूजन आदि के काम सब देवमूढ़ता से संबंधित हैं । वास्तविक देव पूजन नहीं ।


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