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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:रत्नकरंड श्रावकाचार - श्लोक 60

From जैनकोष



अन्यविवाहाकरणानंगक्रीडाविटत्वविपुलतृष: ।

इत्वरिकागमनं चास्मरस्य पंच व्यतीचारा: ।। 60 ।।

ब्रह्मचर्याणुव्रत के पांच अतिचार―जिन श्रावकों ने पंचअणुव्रत का धारण किया है वे श्रावक अपने ब्रह्मचर्यव्रत में अतिचार भी नहीं लगाते । अतिचार कहते है दोष को । ऐसा दोष जिस दोष के रहते हुए व्रत का थोड़ा लगाव रहे पर दोष कहलाये । ऐसे दोष 5 होते हैं―(1) पहला अतिचार है अन्यविवाहाकरण । अपने पुत्र पुत्री के सिवाय दूसरे की पुत्र पुत्रियों का रागी रोप करना, विवाह कराना यह अन्यविवाहाकरण नाम का अतिचार है । सद्गृहस्थ को यह शौक न रहेगा कि मैं यहाँ वहाँ के विवाह करवाऊं, ऐसा उसके राग न रहेगा, पर जो घर में हैं पुत्र पुत्री आदिक उनका तो जुम्मा है ही । उनका वह संबंध बनाता है, पर अन्य का संबंध बनाने का राग नहीं रहता ऐसा होता है ब्रह्मचर्याणुव्रती श्रावक । यदि वह राग है तो ब्रह्मचर्याणुव्रत में अतिचार है, कुछ थोड़ा सा राग है उस संबंध में इस कारण दोष है । (2) दूसरा दोष है अनंगक्रीड़ा । कामसेवन के अंगों से भिन्न अंगों से क्रीड़ा करना अनंग क्रीड़ा दोष है । यह दोष भी ब्रह्मचर्याणुव्रती श्रावक के नहीं होता । (3) तीसरा दोष है विटत्व―विटरूप धरना, पुरुष का, स्त्री का स्वांग बनाकर उस तरह के मन, वचन, काय की प्रवृत्ति करना यह अतिचार है । जो ब्रह्मचर्याणुव्रती है वह भेष स्वांग क्यों बनायेगा? और उस स्वांग के द्वारा अपने मन, वचन, काय की चेष्टा क्यों करेगा? (4) चौथा अतिचार है अतिप्रसंग, मायने परस्ती का तो पूर्ण त्याग है ही श्रावक का, पर अपनी पत्नी से भी काम विषयक तृष्णा होना यह ब्रह्मचर्याणुव्रत का अतिचार है, क्योंकि गृहस्थधर्म निभाने का प्रयोजन तो यह है कि चूँकि हम मुनि धर्म का पालन नहीं कर पाते तो इसलिए गृहस्थ धर्म में रहकर ही बहुत से अपराधों से बचे रहेंगे, पर यदि कोई उसको विषय का साधन ही मानता है तो उसके लिए दोष है । (5) पांचवां दोष है इत्वरिकागमन―व्यभिचारी स्त्री के घर जाना, उसको अपने घर बुलाना, उससे अपना लेन देन का संबंध रखना, परस्पर वार्ता करना, रूप शृंगार देखना यह ब्रह्मचर्याणुव्रत का अतिचार है ।

निरतिचार ब्रह्मचर्य के धारक की श्रेष्ठता―अतिचार कोई करता है तो उसकी स्वच्छंदता होने पर अनाचार बन जाया करता है । इसलिए श्रावक अतिचार से भी दूर रहता है । श्रावक का ध्येय ब्रह्मचर्य की परम रक्षा करना है । यह व्रती देवों के द्वारा भी पूज्य है । सो सद्गृहस्थ अपनी विवाहित स्त्री के सिवाय अन्य स्त्रियों को मां, बहिन पुत्री के समान निरखता है । और मां बहिन पुत्री आदिक से भी वार्ता एकांत स्थान में नहीं करता । यद्यपि लगता होगा ऐसा कि घर में है, मां ही तो है, पुत्री ही तो है, बहिन ही तो है । बात होती ही है मगर ब्रह्मचर्याणुव्रत का जिसने संकल्प किया वह संभावना की बातों से भी अलग रहता है । इसलिए एकांत में उनके समीप भी न बसे । अन्य स्त्रियों से मुख जोड़कर, आंखें जोड़कर वार्ता न करना, वैसे आंखें हैं, सब दिख जाता है मगर एक राग होना जो एक लक्ष्य बनाकर वार्ता करे तो वह अतिचार है । और यही प्रकृति प्रवृत्ति कभी बढ़-बढ़कर अनाचार का रूप धारण कर लेती है । शीलवान पुरुष ब्रह्मचर्याणुव्रती तो अन्य स्त्रियों को देखकर अपने नेत्रों को बंद कर लेते हैं या अपने किसी कार्य में ही व्यस्त रहते हैं । ऐसे समस्त बाहरी दोषों से बचता हुआ सद्गृहस्थ ब्रह्मचर्याणुव्रत का पालन करता है ।

ब्रह्मचर्य के निर्दोष पालन की पूरक पंच भावनाओं में आदि की चार भावनायें―ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने के लिए 5 विशिष्ट भावनायें आचार्यों ने बताया है । (1) पहली भावना है स्त्रीराग कथाश्रवणत्याग―स्त्री विषयक राग संबंधी कथावों के सुनने का त्याग होना । ऐसी कथायें भी न सुनेगा जिन में राग का संबंध हो । यह है ब्रह्मचर्याणुव्रती की पहली भावना । तो कहां श्रवण है पर उस श्रवण में जैसे पौराणिक कथायें हैं, सीताजी की कथा है या अन्य कोई कथायें, वे भी स्त्रीविषयक कथायें हैं मगर वे धार्मिक है और शीलव्रत का पोषण करने वाली कथायें है । इसलिए प्रत्येक कथा के सुनने का त्याग नहीं, किंतु जिन कथावों के सुनने से रागभाव पैदा हो उनके सुनने का त्याग रहता है । (2) दूसरी भावना है तन मनोहारांग निरीक्षण त्याग । स्त्रियों के सुंदर अंगों को देखने का त्याग होना । मुख, हाथ, पैर आदिक जो भी अंग, उनके देखने का त्याग रहता हैं ब्रह्मचर्य के प्रेमी को । ऐसी प्रवृत्ति वह नही रखता किं जिसमें राग का एक द्वार मिल जाय जिससे कि वह हृदय में पनप सके । (3) तीसरी भावना है भोगे हुए भोगों की याद न करना । पहले काल में कोई भोग भोगे थे, ये भावनायें चूँकि गृहस्थ में भी चलती है, और मुनियों में भी चलती हैं, पर साधारण भावनायें है इसलिए सब पर अर्थ लगेंगे । जो पहले भोग-भोगे उनका त्याग होने पर अब उनका स्मरण तक भी नहीं करता है कि मैंने ऐसे भोग भोगा था क्योंकि उसके स्मरण में पुन: राग की भावना बन सकती है । इस कारण ब्रह्मचर्यव्रत का अनुरागी पूर्व भोगे हुए भोगों का भी नहीं भोगता । (4) चौथी भावना है इष्ट श्रेष्ठ रस त्याग । हृष्टपुष्ट कामोद्दीपन करने वाले भोजन का त्याग करना । जिससे एक कामवासना बने ऐसे रसीले चटपटे भोजन का त्याग होता है ब्रह्मचर्यव्रत के प्रेमी को । शरीर के लिए जितना आवश्यक है वह सब साधारण भोजन ही पूर्ति कर देता है मगर गरिष्ठ या अन्य कोई ऊंची दवाइयों के ऐसे प्रयोग ये ब्रह्मचर्यव्रत में बाधक हुआ करते है ।

ब्रह्मचर्य की पूरक पंच भावनाओं में अंतिम भावना―(5) पांचवीं भावना है स्वशरीर संस्कार त्याग । अपने शरीर का संस्कार त्याग देना, शरीर को बड़ा सजाकर रखना, अब गृहस्थ में भी यह भावना है और मुनि में भी यह भावना है तो कोई गृहस्थ बड़े चटकीले कपड़े पहने और नई-नई डिजाइनें पसंद करे, इस तरह के अनेक शौक बनाये तो वह शरीर का संस्कार बनाना है, ये ब्रह्मचर्याणुव्रत में बाधक है । वास्तविकता तो यह है कि यह श्रावक घर में तो रह रहा है मगर चित्त इसका कल्याण की ओर ही रहता है । जगत को इसने असार जान लिया । जगत के समागमों में आत्मा का कोई कल्याण नहीं है, यह बात हृदय में भली भांति बैठ गई । अब एक संस्कार का क्या भाव रहेगा? वैसे तो जो ज्ञानी है, शांत है वह किसी भी प्रकार रहे कमीज के बटन खुले हैं तो परवाह नहीं, टोपी टेढ़ी है तो परवाह नहीं, कोई भी स्थिति हो, यदि ज्ञानी है, परोपकारी है तो उसकी वह स्थिति भी लोगो की सुहा ही जायगी । गांधीजी की पोशाक के विषय में सुना ही होगा । जब वह कुर्ता पहनते थे तो उनके कुर्ता के एक दो बटन खुले ही रहते थे, कैसी ही मुद्रा में रहते थे, मगर वे भी लोगों के द्वारा आदरणीय बन गए । तो प्रसिद्धि, यश ये सब शांति और परोपकार पर निर्भर हैं । सो इसके लिए शांति परोपकार नहीं है, वे तो आत्मा को विशुद्ध रखने के लिए शांति और परोपकार है । तो जो आत्मकल्याण की धुन रख रहे हैं ऐसे श्रावक अपने शरीर के संस्कार में क्या अनुराग करेंगे । सो ब्रह्मचर्याणुव्रत को धारण करने वाले गृहस्थ की ये भावनायें रहती हैं ।

इस लोक व परलोक की आपदाओं से बचने के लिए ब्रह्मचर्यव्रत की अत्यावश्यकता―ब्रह्मचर्याणुव्रत क्यों आवश्यक है प्रत्येक गृहस्थ को? इस ब्रह्मचर्य के विरुद्ध प्रवृत्ति करेगा तो वह गृहस्थ इस लोक में भी दुःख पायगा और अगले भव में भी दुःख पायगा । जो कुशील पुरुष है, जो नाम से उन्मत्त है । स्त्री विषयक राग की वासना से जिसकी बुद्धि ठगाई गई है वह विचार रहित कार्य और अकार्य को न जानने वाला मंद बुद्धि हो जाता है । कर्तव्य अकर्तव्य का वहाँ ध्यान नहीं रहता जिसके चित्त में कामवासना का घर बना हुआ है । वह पाप और पुण्य को कुछ नहीं देखता । पुण्य की बात तो वहाँ होगी ही क्या? पाप से उसे डर ही नहीं रहता, क्योंकि बुद्धि उसकी भ्रष्ट हो गई है और काम वासना से हृदय भर गया है । भला देखिये पशु भी आहार, निद्रा, भय, मैथुन इन चारों संज्ञावों में रहते हैं, यह मनुष्य भी यदि उसी प्रकार की प्रवृत्तियों में रहे तो मनुष्य में और पशु में क्या भेद रहा? बल्कि प्रकृति देखिये कि पशुवों के तो अपने ऋतु और समय पर ही काम वासना बनती है किंतु पुरुषों के तो निरंतर कामवासना रहा करती है । तो यह जन्म किसलिए पाया? तो इस लोक में भी बड़ा दंड मिलता है । छोटे लोग भी पीट देते है । सर्वस्व हरण तक का भी दंड मिलता है और मरकर परलोक में दुर्गति पाता है । तो भला ऐसे कुवासना खोटे भावों से आत्मा का अकल्याण है । अपने आत्मस्वरूप को निरखिये । यह स्वयं अविकार स्वरूप है । जो अपनी सत्ता के कारण सहज स्वरूप है उसमें विकार रंच नहीं है । हां वैभाविक शक्ति है । उस अनादि से अशुद्ध जीव का निमित पाकर विकार उत्पन्न करले मगर स्वरूप में विकार नहीं है । हम अपने स्वरूप का ही आदर करें और,अपने स्वरूप में ही लीन होने का यत्न करें । इसके अतिरिक्त बाहरी प्रवृत्तियां तो इस जीव को भटकाने वाली है ।


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